म्यांमार में लोकतंत्र की उड़ान

3:41 pm or November 13, 2015
myanmar election

——-अरविंद जयतिलक———

म्यांमार में 25 वर्ष बाद स्वतंत्र रुप से संपन्न हुए चुनाव में लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू की पार्टी नेशनल लीग फाॅर डेमोक्रेसी (एनएलडी) की बढ़त और सैन्य समर्थित सत्ताधारी यूनियन साॅलिडरेट एंड डवलपमेंट पार्टी (यूएसडीपी) द्वारा हार स्वीकारने के बाद म्यांमार में लोकतंत्र के परवान चढ़ने की उम्मीद बढ़ गयी है। लेकिन पूर्व सेना प्रमुख और राष्ट्रपति थीन सीन की यह चेतावनी आशंका पैदा करने वाला है कि अगर सेना के समर्थन वाली यूनियन साॅलिडरेट एंड डवलपमेंट पार्टी चुनाव हार जाती है तो अरब स्प्रिंग के बाद मध्य-पूर्व वाली स्थिति आ सकती है। यानी म्यांमार में उथल-पुथल मच सकती है। बहरहाल संतोष की बात यह है कि संसद के दोनों सदनों की कुल 498 सीटों के लिए हुए मतदान में नेशनल लीग फाॅर डेमोक्रेसी पार्टी ने तकरीबन 70 फीसदी से अधिक सीटें अपनी झोली में डाल चुकी है। सरकार बनाने के लिए उसे 67 फीसद सीटें जीतना आवश्यक है, क्योंकि एक चैथाई सीटें सैन्य प्रतिनिधियों के लिए सुरक्षित है। मौजुदा जनादेश से स्पष्ट है कि आंग सान सू की पार्टी संसद में सबसे ताकतवर पार्टी बनने जा रही है और राष्ट्रपति पद पर भी उसका कब्जा होना तय है। किंतु अभी से इस निष्कर्ष पर पहुंचना ठीक नहीं कि जनतंत्र के इस उभार से म्यांमार में फौजी बूटों की हलचल कम हो जाएगी और लोकतंत्र के दिन बहुर जाएंगे। इसलिए कि 1990 के चुनाव में भी सू की की पार्टी को सफलता मिली थी, पर सेना ने उनकी पार्टी को सत्ता से बेदखल कर दिया। उम्मीद है कि इस बार सेना जनता के फैसले को कुचलने की कोशिश नहीं करेगी। इसलिए कि म्यांमार की जनता ने अब सैन्य वर्दी के खोल से बाहर निकलकर लोकतांत्रिक परिवेश में सांस लेने का फैसला सुना दिया है। उसका जनादेश एक ऐसे म्यांमार को आकार देना है जिसकी संप्रभुता जनता में निहित हो और शासन लोकतंत्र के पहरुओं के हाथ में हो। किंतु उनकी इच्छाओं का कितना सम्मान होगा यह काफी कुछ इस पर निर्भर करेगा कि म्यांमार की सेना के मन में लोकतंत्र को लेकर कितना सम्मान है। लेकिन इस बात के लिए म्यांमार की जनता को धन्यवाद देना होगा कि उसने लोकतंत्र की आस अभी छोड़ी है। उसे विश्वास है कि एक दिन म्यांमार में लोकतंत्र की खुशबू जरुर फैलेगी। गौर करें तो सैन्य शासकों के प्रतिबंध के बाद 25 सालों के दरम्यान यह पहला मौका है जब म्यांमार में लोकतंत्र के शुबह की उम्मीद जगी है। लोकतंत्र को कुचलने के लिए सेना ने 1990 से ही आंग सान सू को नजरबंद कर रखा था। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते नवंबर 2010 में उन्हें नजरबंदी से रिहा करना पड़ा। 27 मई, 1990 को सू की पार्टी ने आमचुनाव में हिस्सा लिया। उस समय भी उनकी पार्टी ने तकरीबन 80 फीसदी सीटों पर जीत दर्ज की थी। किंतु सेना ने जनतंत्र के फैसले का सम्मान नहीं किया और सू की को सत्ता सौंपने के बजाए फिर नजरबंद कर दिया। विश्व समुदाय हैरान रह गया कि जब जनादेश का सम्मान ही नहीं करना था तो फिर चुनाव की जरुरत क्या थी? प्रतिक्रियास्वरुप विश्व के कई देशों ने म्यांमार पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया। मौजुदा चुनाव पर भी विश्व समुदाय अपनी निगाह गड़ाए हुए है। सभी को अपेक्षा है कि इस बार म्यामांर का सैन्य प्रशाषन नागरिक मूल्यों का सम्मान करेगा और लोकतंत्र की बहाली की राह में रोड़ा नहीं डालेगा। गौरतलब है कि विश्व जनमत के दबाव में ही 2010 में म्यांमार में चुनाव हुआ। लेकिन उसका मूल्य-महत्व इसलिए नहीं रहा कि सूकी ने उस चुनाव का बहिष्कार किया। बहिष्कार की कई वजहें थी। मसलन 1990 के चुनावी नतीजे का फौजी वर्दी ने सम्मान नहीं किया। दूसरी बात यह कि अगर सू की चुनाव में भाग लेती तो 1990 के जनादेश के सम्मान का उलंघन होता। तीसरा यह कि सू की ने सेना की मंशा और नीयत भांप ली कि वह चुनाव में गड़बड़ी करने वाला है। हुआ भी ऐसा ही। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने चुनाव में हुई धांधली का जमकर उल्लेख किया। यह जानकर हैरानी होगी कि चुनाव में उम्मीदवारों को वोटर लिस्ट तक मुहैया नहीं कराया गया। चुनाव प्रचार और सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया। पूरी मीडिया सेना के नियंत्रण में रही। 2008 का नया संविधान जो कि लोकतंत्र की भावनाओं के प्रतिकूल था और जनता द्वारा उसका बहिष्कार भी किया गया, के बावजूद भी सैन्य तंत्र उसे जबरन लागू किया। इस जनविरोधी संविधान के प्रावधानों के मुताबिक संसद की एक चैथाई सीटें फौजी हुकमत द्वारा भर दी गयी। यही नहीं करीब आठ दर्जन सीटों पर केवल एक ही उम्मीदवार का नामांकन स्वीकारा गया। राष्ट्रीय संसद के 1158 सदस्यों के लिए मैंदान में तकरीबन तीन हजार से अधिक प्रत्याशी थे जिनमें 82 निर्दलीय और शेष सैंतीस दलों द्वारा नामित थे। सभी निर्दलीय उम्मीदवार सेना समर्थित थे। जो दो सबसे बडे दल थे उनमें एक थीन सीन की नेतृत्व वाली यूएसडीपी थी जिसे सेना का समर्थन हासिल था और दूसरी नेशनल यूनिटी पार्टी जिसके नेता उपसेनापति तुनयी थे। किसी भी लिहाज से चुनावी नतीजा चैंकाने वाला नहीं रहा। अंतर सिर्फ यह रहा कि सैन्य प्रशासकों के स्थान पर सेना समर्थित थीन सीन की सरकार अस्तित्व में आ गयी। कुल मिलाकर फौजी बूटों की धमक कायम रही। अब जब मौजुदा चुनाव का परिणाम आईने की तरह साफ है और लोकतंत्र के पक्ष में बयार बहती साफ दिख रही है तो निःसंदेह म्यांमार की तस्वीर बदलने की उम्मीद बढ़ गयी है। हालांकि यक्ष प्रश्न अभी भी है कि क्या फौजी हुकुमत इस जनादेश का सम्मान करेगी? क्या वह नागरिक अधिकारों के प्रति संवेदनशील होगी? कहना अभी मुश्किल है। लेकिन लोकतंत्र की बहाली को लेकर जनता की उम्मीदें सातवें आसमान पर है। वैसे माना जा रहा है कि अगर सूकी को तनिक भी अंदेशा होता कि सेना सिर्फ दिखावे के लिए चुनाव करा रही है तो शायद वह 2010 के चुनाव की तरह इस बार भी चुनाव का बहिष्कार करती। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने लोकतंत्र की स्थापना के लिए चुनाव में हिस्सेदार बनना और जनता के बीच जाना जरुरी समझा। शानदार ऐतिहासिक जीत से अभिभूत सू की को उम्मीद है कि यह जीत लम्बे समय से दमन का शिकार देश म्यांमार में एक नए युग की शुरुआत करेगा। लेकिन इसके लिए सैन्य प्रशासन को भी सुझ-बुझ दिखाना होगा। इसलिए कि सदन में उनके लिए 25 फीसदी सीटें आरक्षित है और अगर वह रचनात्मक भूमिका का निर्वहन नहीं करता है तो फिर लोकतंत्र को पंख लगना मुश्किल होगा। म्यांमार के सैन्य प्रशासकों को समझना होगा कि लोकतंत्र में ही म्यांमार के लोगों का विकास व भविष्य सुरक्षित है। आज म्यांमार अपने ऐतिहासिक जीवन के सबसे बुरे दौर में है। उसकी ऐतिहासिक सांस्कृतिक छाप लगातार धुमिल पड़ रही है। यही नहीं उसकी वित्तीय दशा भी खराब है। खजाना पूरी तरह खाली है। आज म्यांमार विश्व के सबसे दरिद्रतम देशों में से है। उसकी वित्तीय दशा कितनी खराब है इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वहंा प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 18480 रुपए है जो भारत में मनरेगा कार्यक्रम के तहत काम करने वाले लोगों से भी कम है। कभी म्यांमार उपजाऊ भूमि के लिए जाना जाता था। दूसरे देशों को चावल निर्यात करता था। लेकिन आज उसकी अर्थव्यवस्था रसातल में है। बदहाल कृषि के कारण चावल तक का आयात करना पड़ रहा है। म्यांमार सागौन की लकडि़यों के लिए दुनिया भर में विख्यात है। लेकिन उसकी तस्करी चरम पर है। कच्ची अफीम के उत्पादन से उसकी आय जरुर बढ़ी है। लेकिन उसे इसकी कीमत भी चुकानी पड़ रही है। यानी देश के नौजवान नशाखोरी के लती बनते जा रहे हैं। परिवार विघटित हो रहे हैं। समाज अराजकता की ओर बढ़ रहा है। इन सभी समस्याओं का जड़ म्यांमार का सैनिक शासन ही है जो लोकतंत्र पर कुंडली मार बैठा है। म्यांमार के सैन्य प्रशासकों को समझना होगा कि लोकतंत्र की उदार व्यवस्था में ही विकास की अवधारणाएं पल्लवित-पुष्पित हो सकती है। कृषि, उद्योग-धंधों का विकास तभी होगा जब वहां निवेश बढ़ेगा। किंतु यह तभी संभव होगा जब म्यांमार का सैन्य प्रशासन अपनी फौजी खोल उतारकर लोकतंत्र का जामा पहनेगा। लोकतंत्र अपनाए बगैर उसे अंतर्राष्ट्रीय मदद नहीं मिलने वाली। बेहतर होगा कि म्यांमार का सैन्य प्रशासन मौजुदा जनादेश का सम्मान कर लोकतंत्र को उड़ान भरने की ताकत दे।

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