उप्र में महागठबंधन की राह में रोड़े ही रोड़े!

3:39 pm or November 23, 2015
mulayam-PTI-Jun4

——कृष्ण प्रताप सिंह——-

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की निगाह से देखें तो नीतीश के पांचवीं बार मुख्यमंत्री बन जाने के बाद भी लगता है कि बिहार विधानसभा चुनाव नतीजों ने समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से कहीं ज्यादा दुखी कर रखा है। इस दुःख की छाया आगामी 22 नवम्बर को मुलायम के जन्मदिन समारोह से जुड़ी उनकी पार्टी सपा की खुशियों तक पर भारी है, तो कारण एकदम साफ हैं। पिछले दिनों अपने सांसद भाई रामगोपाल यादव और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अप्रत्याशित भेंट के बाद मुलायम ने ‘धर्मनिरपेक्षता के सिपहसालार’ की अपनी पुरानी छवि दांव पर लगाकर कार्यकर्ताओं के कथित सम्मान के नाम पर सपा को राजद, जदयू व कांगे्रस के महागठबंधन से अलग कर लिया और समानांतर गठबंधन बनाकर बिहार विधानसभा की सारी सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान कर किया, तो उन्होंने ऐसे अंजाम की कल्पना तक नहीं की होगी। महागठबंधन सपा को पांच सीटें दे रहा था, जबकि मतदाताओं ने एक भी नहीं दीं। तिस पर सपा प्रत्याशियों को इतने कम वोट दिये कि उसके सुप्रीमो के तौर पर मुलायम या मुख्यमंत्री के तौर पर अखिलेश यादव के लिए उनके आंकड़े याद रखना भी असुविधाजनक हो गया।

अब सपा के विरोधी आरोप लगा रहे हैं कि मुलायम बहुचर्चित यादव सिंह प्रकरण में मोदी के दिखाये सीबीआई के डर से धर्मनिरपेक्ष मतदाताओं को बिखराने में मददगार बने और खुद मुलायम को यह कसक खाये जा रही है कि उन्होंने महागठबंधन तोड़ने की गलती न की होती, तो आज बिहार में उसकी जीत के असली हीरो वही होते। आखिरकार, जनतादल परिवार की एकता से प्रस्तावित नयी पार्टी या कि महागठबंधन के अध्यक्ष वही थे। लेकिन अब न वे ‘धर्मनिरपेक्षता के विश्वविद्यालय के कुलपति’ रह गये हैं और न ही लालू व नीतीश उनके छात्र, तो बेचारे समझ नहीं पा रहे कि अब आगे कौन-सा डबल या ट्रिपल गेम खेलें? इसलिए सारे राजनीतिक प्रश्नों से बगलें झांकते फिर रहे हैं। इस प्रश्न का जवाब भी नहीं दे रहे कि क्या भाजपा को रोकने के लिए उत्तर प्रदेश में भी बिहार जैसे महागठबंधन की पहल करेंगे? इसे लेकर सपा नेताओं व मंत्रियों के अलग-अलग सुरों को फिर भी बाहर आने से नहीं रोक पा रहे।

सो हालत यह है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव महागठबंधन को लेकर ‘न इनकार, न स्वीकार’ जैसा रुख प्रदर्शित कर रहे हैं जबकि उनके चाचा और उनकी सरकार के सबसे ताकतवर मंत्री शिवपाल यादव गैरबसपा-गैरभाजपा दलों के महागठबंधन पर जोर दे रहे हैं। उनके विपरीत एक अन्य मंत्री फरीद महफूज किदवई दुआ कर रहे हैं कि बसपा भी महागठबंधन में शामिल हो। जाहिर है कि ऐसे में उन रोड़ों को दूर करने की बात सोची ही नहीं जा सकती, जो अभी से ऐसे किसी महागठबंधन की संभावनाओं की भ्रूणहत्या पर आमादा हैं।

बिहार में महागठबंधन तब संभव हुआ, जब लालू और नीतीश दोनों ने वक्त की नजाकत देखते हुए राजनीतिक दूरदर्शिता प्रदर्शित की। लेकिन उत्तर प्रदेश में न सपा और न ही बसपा अपनी पुरानी रंजिश व खुन्नस भूलकर ऐसी दूरदर्शिता से काम लेने को तैयार हैं। लोकसभा चुनाव के बाद प्रदेश के पंचायत चुनावों में भी मात खाने के बावजूद अखिलेश को लगता है कि बिहार विधानसभा से सरकारों की वापसी का जो ट्रेंड चला है, वह महागठबंधन के बगैर भी उनके द्वारा किये गये विकास की बिना पर 2017 में उनकी नैया पार लगा देगा। इस बीच सपा सुप्रीमो की यह सफाई किसी के गले नहीं उतर रही कि उन्होंने महागठबंधन इसलिए छोड़ा, क्योंकि उसमें कांगे्रस शामिल थी।

दूसरी ओर पंचायत चुनावों से उत्साहित बसपा सुप्रीमो मायावती ‘एकता चलो’ की अपनी रीति के विरुद्ध कांगे्रस के साथ मिलकर कोई भाजपाविरोधी खिचड़ी पकाने के मूड में दिखती हैं, लेकिन पदोन्नति में आरक्षण के मामले में दलितों से दुश्मनी बरतने वाली सपा व उसकी सरकार के साथ कोई नरमी बरतने को राजी नहीं हैं, जबकि प्रेक्षक भाजपा-बसपा गठबंधन की संभावनाओं से भी इनकार नहीं कर रहे।

कांगे्रस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं व पत्रकारों से अनौपचारिक चर्चाओं में बसपा को तो अपना स्वाभाविक गठबंधन सहयोगी बताते हैं लेकिन सपा की बाबत मुंह नहीं खोलते। सपा से उनके इस परहेज को समझने के लिए याद करना चाहिए कि उन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव के प्रचार में लालू के साथ कोई मंच साझा नहीं किया। उन्हें याद होगा कि उत्तर प्रदेश में बसपा पीवी नरसिंहराव के प्रधानमंत्रीकाल में कांगे्रस से गठबंधन कर प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ चुकी हैं। उनकी कोशिश बसपा और रालोद को साथ लेकर गैरसपा-गैर भाजपा गठबंधन बनाने की है। लेकिन कई प्रेक्षक कहते हैं कि बसपा की ही तरह रालोद पर भी भाजपा की नजर है, जबकि रालोद के अध्यक्ष अजित सिंह कहते हैं कि उप्र में अखिलेश सरकार के खिलाफ इतनी ऐंटीइन्कम्बैंसी है कि सपा के साथ महागठबंधन बना तो नतीजे बिहार के एकदम उलट आयेंगे। जाहिर है कि उप्र में बिहार जैसा महागठबंधन आसान नहीं है।

जो भी हो, कांगे्रस व बसपा दोनों ऐसे समय में सपा के साथ शायद ही दिखना चाहें जब उसका मुस्लिम यादव समीकरण बिखर चुका है। इतना ही नहीं, उसकी धर्मनिरपेक्षता की साख अपने न्यूनतम बिन्दु पर है, प्रदेश सरकार नाना मोर्चों पर आलोचनाओं का सामना कर रही है और सुप्रीमो मुलायम डबल गेमों के लिए बदनाम हैं। उनका कुछ ठिकाना ही नहीं कि वे किस मोड़ पर किस अभियान को पलीता लगाकर आत्मघाती गोल करने पर उतर आयें।

तभी तो उनके रिश्तेदार लालू तक यह कहते हैं कि वे मोदी के खिलाफ देश भर में मोर्चा खोलेंगे और उसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश में वाराणसी स्थित उनके निर्वाचनक्षेत्र से करेंगे, तो उसमें मुलायम या सपा की किसी भूमिका की चर्चा नहीं करते। भले ही कहते हों कि उनके लिए ‘भूल सुधार’ के रास्ते खुले हुए हैं। जदयू है कि नीतीश के शपथग्रहण समारोह मंे, भावनात्मक आधार पर ही सही, भाजपा के मार्गदर्शक लालकृष्ण आडवाणी को बुलाने की हसरत रखता है लेकिन मुलायम को लेकर उसकी ऐसी कोई हसरत अब तक सामने नहीं आयी है। फिर बुरे दिनों की मजबूरी मुलायम से जो भी करा ले, अपने मुस्लिम यादव समीकरण के अच्छे दिनों में वे ताल ठोंककर कहते रहे हैं कि उन्हें नेताओं व पार्टियों के नहीं मतदाताओं के गठबंधन में यकीन है और वह उनके पक्ष में है।

ऐसे में क्या आश्चर्य कि कई प्रेक्षक सपा से निकल रहे महागठबंधन के संकेतों को पार्टी के भीतर गम्भीर मतभेदों के संकेत के रूप में देख रहे हैं। कहा जा रहा है कि महागठबंधन की जरूरत जताने वाले नेताओं व मंत्रियों ने स्वीकार कर लिया है कि अब अकेली सपा भाजपा को रोकने में सक्षम नहीं है, जबकि मुलायम ऐसे किसी संकेत से बचना चाहते हैं।

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