कुपोषण अब भी सबसे बड़ी चुनौती

4:14 pm or November 23, 2015
Malnutrition

कुपोषण अब भी सबसे बड़ी चुनौती

——जगजीत शर्मा——-

कुपोषण भारत की एक बड़ी समस्या है। आजादी से पहले और आजादी के बाद भी कुपोषण से मुक्ति का प्रयास लगातार रो रहा है, लेकिन समस्या कमोबेश आज भी बरकरार है। इस बात से कत्तई इनकार नहीं किया जा सकता है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने कुपोषण से मुक्ति का हर संभव प्रयास किया है, लेकिन इस प्रयास में कहीं न कहीं कोई कमी जरूर रही है जिसकी वजह से यह खत्म नहीं की जा सकती है। हालांकि यह भी सही है कि पिछले कुछ दशकों में कुपोषण का स्तर घटा है, लेकिन अभी इस मामले में बहुत कुछ करने की जरूरत है। कुपोषण के मामले में भारत ब्राजील से 27 फीसदी, चीन से 26 फीसदी एवं साउथ अफ्रीका से 21 फीसदी पीछे है। ब्राजील में पांच साल से कम उम्र वाले बच्चों की संपूर्ण आबादी में से सिर्फ 2.2 प्रतिशत कुपोषित हैं, वहीं चीन में इसी आयु वर्ग के कुपोषित बच्चों का प्रतिशत 3.4 पाया गया है। इसके बाद दक्षिण अफ्रीका का नंबर आता है और कुल पांच वर्ष से कम उम्र के कुपोषितों की संख्या 8.7 प्रतिशत और नेपाल में 29.1 प्रतिशत है। हालांकि नेपाल को भारत के मुकाबले में मामूली सी बढ़त हासिल है। भारत में यह प्रतिशत 29.4 है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2005-06 में ऐसे ही बच्चों की संख्या 43.5 फीसदी दर्ज की गई थी।  इसके बाद यह आंकड़ा पाकिस्तान में 31.6, अफगानिस्तान में 31.9 और बांग्लादेश में 32.6 प्रतिशत है।

इन आंकड़ों से पता चलता है कि एशिया महाद्वीप में बच्चों में कुपोषण एक बड़ी समस्या है। कमोबेश सभी एशियाई देश इस समस्या से जूझ रहे हैं। इसका कारण गरीबी और अशिक्षा को माना जाता है। एशियाई देशों में पिछले एक सदी से गरीबी, भुखमरी और अशिक्षा के मामले में बहुत खास परिवर्तन देखने को नहीं मिल रहा है। आज से सौ साल पहले जितनी आबादी थी इन एशियाई देशों की, उसके मुकाबले में आबादी कई गुना ज्यादा बढ़ गई और इतने विकास के बावजूद प्रतिशत के हिसाब से आंकड़े भले ही बेहतर दिखते हों, लेकिन संख्या के हिसाब से यह आंकड़ा बढ़ा ही है। कुपोषण के मामले में जो सुधार देखने को मिल रहा है, उसमें शहरों की अपेक्षा गांव आगे दिख रहे हैं। इसका कारण यह माना जा रहा है कि खुले में शौच जाने वालों की संख्या में कमी और बिटामिन ए के प्रति गांववालों में आई जागरूकता है। सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के चलते अस्पतालों में होने वाला प्रसव भी इसका एक प्रभावशाली कारण माना जा रहा है। अब गांवों में महिलाएं पारंपरिक तरीके से प्रसव कराने की अपेक्षा अस्पतालों में प्रसव कराने को ज्यादा तवज्जो दे रही हैं।

साल 2005-06 में अस्पतालों में प्रसव कराने वाली महिलाएं 40.8 फीसदी थी, तो वहीं साल 2013 में यह आंकड़े 78.6 फीसदी तक पहुंच गया था। इंडियास्पेंड की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अस्पतालों में प्रसव कराने वाली महिलओं के बच्चों को अस्पताल में जन्म के तुरंत बाद बिटामिन ए की खुराक दी जाती है जिसके चलते बच्चे काफी हद तक कुपोषित होने से बच जाते हैं। रैपिड सर्वे ऑन चाइल्ड के आंकड़ों के अनुसार, पांच साल से कम उम्र के बच्चों में विटामिन ‘एÓ की खुराक बेहतर हुई है। साल 2005-06 में जहां यह आंकड़े 25 फीसदी थे, वहीं 2013 में यह आंकड़े 46 फीसदी दर्ज की गई है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कुपोषित बच्चों का जो मानक तैयार किया है, उसके मुताबिक अविकसित, कमजोर या शक्तिहीन, सामान्य से कम वजन होने का मतलब है कुपोषित होना। आज भी अशिक्षा और गरीबी के चलते महिलाएं गर्भावस्था के दौरान अपनी सेहत का ख्याल नहीं रखती हैं जिसकी वजह से गर्भस्थ शिशु काफी कमजोर, अविकसित और सामान्य वजन से कम वजन का पैदा होता है। इतना ही नहीं, शिशु के जन्म के बाद भी कोई ध्यान नहीं दिया जाता है जिसका नतीजा जन्म के उसी दिन से लेकर एक वर्ष के भीतर अधिकतर ऐसे बच्चों की मृत्यु हो जाती है। यदि ध्यान न दिया जाए, तो ऐसे बच्चे जीवन भर एक अपंग जैसी हालत में जीते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि अविकसित बच्चों की संख्या में काफी गिरावट दर्ज की गई है। साल 1999 में अविकसित बच्चों की संख्या जहां 59 फीसदी दर्ज की गई थी, वहीं साल 2013-14 में ऐसे बच्चों की संख्या 38.7 फीसदी देखी गई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण एवं आरएसओसी (रैपिड सर्वे ऑन चाइल्ड) के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2006-07 में शहरी इलाकों में ऐसे बच्चों की संख्या 40 फीसदी थी, जबकि साल 2013-14 में यह आंकड़े 32 फीसदी दर्ज किए गए थे। वहीं इसी अवधि में ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़े 51 फीसदी से गिरकर 41 फीसदी दर्ज किए गए थे।

देश में कुपोषित बच्चों के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है। यहां पांच वर्ष से कम उम्र के कुपोषित बच्चों का प्रतिशत जहां वर्ष 2005-06 में 52.4 और वर्ष 2013-14 में 50.6 था, वहीं बिहार में यह प्रतिशत क्रमश: 50.1 और 49.4, झारखंड में 47.2 और 47.3, चंडीगढ़ में 52.6 और 43.0 और गुजरात में 49.2 और 41.8 रहा है। देश में सबसे कमजोर बच्चों वाले पांच राज्यों में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और उड़ीसा अव्वल हैं। वहीं सामान्य से कम वजन वाले सबसे अधिक बच्चों वाले पांच राज्यों में झारखंड, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उड़ीसा गिने जाते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि इन राज्यों के अलावा बाकी राज्यों में फील गुड है। ये तो वे राज्य हैं, जहां कुपोषण के मामले में हालात बद से बदतर हैं। हालात देश के लगभग सभी राज्यों में कुपोषण के मामले में खराब हैं। हां, कुछ राज्यों ने प्रयास करके हालात को बेहतर बनाया है। कुपोषित बच्चों की संख्या में काफी कमी आई है। बच्चों का कुपोषण रोकने की दिशा में मिड डे मील और आंगनबाड़ी जैसे कार्यक्रमों की अच्छी भूमिका रही है। इस मामले में और बेहतर किया जा सकता है, यदि इसको बेहतर योजनाबद्ध तरीके से लागू किया जाए। गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए आने वाला पुष्टाहार किस तरह आंगनबाड़ी कार्यकत्रियां गाय-भैंस पालने वालों और गरीब तबके के लोगों को औने-पौने दामों में बेच लेती हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। यही हाल मिड डे मील का है। यदि इन कार्यक्रमों के संचालन में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म किया जा सके और जरूरतमंदों तक बाल पुष्टाहार पहुंचाया जा सके, तो हालात पर काबू पाना कोई बड़ी बात नहीं है।

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