पेरिस हमलों पर पाखंड

3:39 pm or November 26, 2015
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पेरिस हमलों पर पाखंड

नेहा दभाड़े एवं इरफान इंजीनियर

‘‘एक बार फिर निर्दोष नागरिकों को आंतकित करने का बेरहम प्रयास हुआ है। यह हमला सिर्फ पेरिस पर नहीं है, यह हमला केवल पेरिस के लोगों पर नहीं है, यह हमला पूरी मानवता पर है और उन सभी वैश्विक मूल्यों पर है, जिनके हम साझीदार हैं।’’ यह वह बयान है, जिसे अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पेरिस पर 13 नवंबर को हुए हमलों के बाद जारी किया। आठ अज्ञात हमलावरों ने पेरिस में छः अलग-अलग स्थानों पर हमला किया, जिसमें 129 लोग मारे गए और 300 घायल हुए। घायलों में से 77 को गंभीर चोटें आईं। इन हमलों की जिम्मेदारी आईसिस ने ली है। इस तरह के भयावह हमलों, जिनमें निर्दोषों की जानें जाती हैं, को किसी भी आधार पर औचित्यपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता। ये अक्षम्य हैं। हम इन हमलों की कड़ी भर्त्सना करते हैं। हमलावरों को सज़ा मिलनी चाहिए और पूरी दुनिया को दृढ़ संकल्पित हो आतंकवाद के दानव से मुकाबला करना चाहिए।

जैसा कि अपेक्षित था, विश्व के सभी नेताओं ने फ्रांस के साथ एकजुटता प्रदर्शित करते हुए कहा कि ये हमले पेरिस पर नहीं बल्कि पूरी मानवता पर और स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व के मूल्यों पर हमले हैं। फ्रांस के साथ एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए दुनिया के अलग-अलग स्थानों पर महत्वपूर्ण इमारतों को रोशनी से फ्रांसीसी झंडे के रंगों में रंगा गया। फेसबुक ने ऐसी व्यवस्था की जिससे लोग अपने चित्रों को फ्रांसीसी झंडे की पृष्ठभूमि में दिखा सकें। ये हमले पूरी दुनिया के मीडिया में सुर्खियां बने और पूरे विश्व में शोक, सहानुभूति और करूणा की लहर दौड़ गई।

दोहरे मानदंड

चिंता, दुःख और एकजुटता का यह प्रदर्शन प्रशंसनीय था परंतु इससे एक प्रश्न भी उपजता है। क्या यूरोपीय व उत्तर अमरीकी देशों के नेता और उनके द्वारा नियंत्रित मीडिया, सभी प्रकार की हिंसा के पीडि़तों के प्रति ऐसी ही सहानुभूति दिखाते हैं? क्या वे दुनिया में कहीं भी होने वाली हिंसा की बिना किसी लागलपेट के निंदा करते हैं? यह महत्वपूर्ण है कि हिंसा दुनिया में चाहे कहीं भी हो-हमारे घरों से बहुत दूर भी-तब भी हमें उसे मानवता और अहिंसा, प्रेम, करूणा, जीवन के अधिकार और मानवीय गरिमा पर हमला और उनके लिए खतरा मानें। ये सभी मूल्य किसी भी सभ्यता की आत्मा हैं। ओबामा पेरिस पर हमलों को तो सम्पूर्ण मानवता पर हमला बता रहे हैं परंतु क्या कारण है कि उन्हें तब ऐसा महसूस नहीं होता जब वही आतंकी संगठन, बेरूत, लेबनान या फिलीस्तीन में निर्दोष नागरिकों पर हमला करता है? क्या इन देशों के अरब नागरिक, यूरोपीय देशों के नागरिकों से कमतर हैं?

पेरिस पर हमले के ठीक एक दिन पहले -12 नवंबर को-आईसिस ने बेरूत पर इतनी की क्रूरता से हमला किया था, जिसमें 44 लोग मारे गए थे। बेरूत पर हुए हमले का वर्णन दिल दहला देने वाला है। स्काउट यूनिफार्म पहने हुए एक चैदह साल के लड़के की लाश का चित्र किसी की भी अंतर्रात्मा को झकझोर देगा। एक न्यूज़ पोस्ट में लिखा गया ‘‘…जिस सड़क पर बम धमाके हुए, वहां पत्तागोभी और पार्सले के टुकड़े फैले हुए थे। इन चीज़ों को ले जा रहे ठेले, धमाके में पलट गए थे। कुछ लोग सड़क के किनारे फैले खून को धो रहे थे। फुटपाथ पर जूतों की एक दुकान का सामान, जिनमें बच्चों की चप्पलों से लेकर महिलाओं की सेंडिलें शामिल थीं, बिखरा हुआ था। कई शवयात्राएं कब्रिस्तान जाने के लिए तैयार थीं।’’ क्या यह दुःख और शोक वैसा ही नहीं है, जैसा कि पेरिस का था? परंतु दुनिया के किसी नेता ने इस हमले की चर्चा नहीं की और ना ही उन व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति दिखाई जो इसका शिकार बने। फेसबुक ने अपने उपयोगकर्ताओं को यह विकल्प नहीं दिया कि वे अपने प्रोफाइल पिक्चर की पृष्ठभूमि में लेबनान का झंडा लगा सकें। इस हमले को इज़राईल और अमरीका के पुराने शत्रु हिजबुल्लाह से बदला लेने की आईसिस की कार्यवाही बताते हुए कुछ हद तक औचित्यपूर्ण ठहराया गया।

आईसिस का जिन्न

आईसिस के जन्म के लिए कौन जिम्मेदार है? सीरिया में पांच साल से चल रहे गृहयुद्ध में अमरीका के नेतृत्व वाला गठबंधन, विद्रोहियों को पूरा समर्थन और सहयोग देता आ रहा है और बशर अल-असद सरकार से लड़ने के लिए हथियार और असलाह इसी गठबंधन ने उन्हें उपलब्ध करवाए। सीरिया में अमरीका-परस्त सरकार स्थापित करने के इस प्रयास के नतीजे में आईसिस का जन्म हुआ। सीरिया के निर्दोष नागरिक इस गृहयुद्ध के कारण क्रूर हिंसा का सामना कर रहे हैं। उनके दुःखों का कोई अंत नहीं है। सीरिया के गृहयुद्ध में अब तक 2,10,060 लोग मारे जा चुके हैं अर्थात औसतन 144 मौतें प्रतिदिन। मुंबई पर 26 नवंबर को हुए हमले में 169 लोगों ने अपनी जानें गंवाई थीं और एक अन्य हमले में ट्रेनों में रखे गए बमों के विस्फोट में 188 जानें गईं थीं। उस समय भी दुनिया के नेताओं ने इन हमलों की उतनी कड़ी भाषा में निंदा नहीं की थी, जितनी कि पेरिस के मामले में की गई। हम कतई यह नहीं कह रहे हैं कि पेरिस में जो हुआ, वह घोर निंदनीय नहीं था और ना ही हम किन्हीं दो घटनाओं की तुलना कर रहे हैं। परंतु एक-सी घटनाओं पर अलग-अलग प्रतिक्रियाओं से कोई भी यह सोचने पर मज़बूर हो जाता है कि क्या एक देश के नागरिकों की जिंदगी, दूसरे देश के नागरिकों से ज़्यादा कीमती है?

फ्रांस, पश्चिमी दुनिया का हिस्सा और एक बड़ा पर्यटन केंद्र है। वह यूरोप का प्रतीक है। वह एक आर्थिक महाशक्ति है, वैश्विक नेता है और सबसे महत्वपूर्ण, अमरीका की आतंक के विरूद्ध लड़ाई में उसका सहयोगी है। संक्षेप में, हॉजिलेण्ड के शब्दों में, पेरिस हमला ‘जीवन जीने के हमारे तरीके’ पर हमला है-उस तरीके पर जिसकी जड़ें समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे मूल्यों में हैं। अब अमरीका और फ्रांस, ‘‘जीवन जीने के हमारे तरीके’’ की तुलना गैर-पश्चिमी तरीके से कर रहे हैं। इस्लाम को अपरोक्ष और परोक्ष रूप से बर्बर बताया जा रहा है-एक ऐसा धर्म जो स्वतंत्रताओं और पश्चिम को प्रिय अन्य मूल्यों का सम्मान नहीं करता। यह हमें सैम्युअल हटिंगटन की ‘सभ्यताओं के टकराव’ के सिद्धांत की याद दिलाता है।

सच यह है कि सभ्यताओं के टकराव के सिद्धांत में मूलभूत विरोधाभास हैं। उदाहरणार्थ, प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान फिलीस्तीन के लोगों ने मित्र राष्ट्रों का पूरा साथ दिया था और अपने सहधर्मी ऑटोमन साम्राज्य के विरूद्ध युद्ध किया था। उन्हें यह उम्मीद थी कि इससे उन्हें अपने भविष्य का निर्धारण करने का अधिकार मिलेगा और वे अपने देश में प्रजातंत्र की स्थापना कर पायेंगे। भारत में सूफी संतों ने समानता, प्रेम, अंतर्रात्मा की स्वतंत्रता व अन्य उदारवादी मूल्यों का प्रचार किया और उनके अनुरूप आचरण किया। सूफी संत, भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। पवित्र कुरान कहती है कि एक मनुष्य को मारना पूरी मानवता को मारने के समान है और एक जिंदगी बचाना, पूरी मानवता को बचाने के बराबर है। ‘सभ्यताओं के टकराव के सिद्धांत’ ने एक पूरी पीढ़ी को इस्लाम के प्रति डर और घृणा से भर दिया है और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में विविधवर्णी समाजों में विवादों और हिंसा को जन्म दिया है। आईसिस द्वारा पेरिस पर हमले को अमरीका, इंग्लैंड व फ्रांस द्वारा समर्थित उस युद्ध को औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य ऐसी सरकारों को उखाड़ फेंकना है जो इन देशों के आर्थिक और राजनैतिक हितों के प्रतिकूल हैं। इस प्रयास में ये देश दुनिया के बुरे से बुरे और क्रूर से क्रूर तानाशाह का समर्थन लेने और उन्हें अपना समर्थन देने में हिचकिचाते नहीं हैं। ऐसे तानाशाहों में शामिल हैं सऊदी अरब के शासक, ईरान के शाह और हुस्नी मुबारक व ज़िया उल-हक जैसे सैनिक तानाशाह।

अमरीका ने ईराक पर 2003 में हमला किया और वहां शिया नेतृत्व वाली एक पक्षपाती सरकार की सत्ता स्थापित करवा दी। इस हमले से देश का सामाजिक-राजनैतिक तानाबाना ध्वस्त हो गया। अमरीका को वहां के शक्तिशाली सुन्नियों पर विश्वास नहीं था, जिनका सेना व नौकरशाही में बोलबाला था। सद्दाम हुसैन की सेना के लाखों सैनिक इस अविश्वास के कारण बेरोजगार हो गए, जिन्हें इकट्ठा कर अबू बकर अल-बगदादी ने आईसिस की स्थापना की। बशर अल-असद के विरूद्ध लड़ रहे विद्रोहियों, जिन्हें अमरीका और उसके साथी देशों ने सैन्य साजो-सामान व अन्य संसाधन उपलब्ध करवाए थे, भी अल-बगदादी के साथ हो लिए, जिसने सीरिया और ईराक के कई महत्वपूर्ण इलाकों और शहरों पर कब्जा कर लिया था। ईराक पर अमरीकी हमले, अफगानिस्तान पर सोवियत हमले और लेबनान पर इजराईली हमले-तीनों के नतीजे में हमले के शिकार देशों में राजनैतिक स्थिरता आई, लंबे समय तक गृहयुद्ध हुए और लाखों लोगों ने अपनी जानें गंवाईं। अमरीका ने अफगानिस्तान की सरकार का तख्ता पलटने के लिए तालिबान को हथियार दिए जिसके विनाशकारी नतीजे हुए।

ईराक और सीरिया के अलावा, येमन में भी स्थापित सरकार का तख्ता पलटा गया। येमन में भी गृहयुद्ध चल रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एजेंसियों के अनुसार, इस युद्ध में अब तक 4,300 लोगों ने अपनी जानें गंवाई हैं और 13 लाख लोगों को अपना घर छोड़कर भागना पड़ा है। जो लोग अपने घरों में रह रहे हैं, उन्हें न तो पीने का पानी उपलब्ध है, न बिजली और ना ही स्वास्थ्य सुविधाएं, जिसके कारण वे डेंगु, मलेरिया और अन्य बीमारियों के शिकार बन रहे हैं। एमनेस्टी के अनुसार, सऊदी अरब और उसके मित्र देशों ने ‘‘नागरिकों के खून की नदियां बहा दी हैं’’। यह युद्ध अपराध है। येमन में बच्चे तक मारे जा रहे हैं। अमरीका ने लाखों डॉलर खर्च कर युवाओं की राजनैतिक कार्यशालाएं आयोजित करवाईं और इनका इस्तेमाल दक्षिणी येमन में अलगाववादी आंदोलन को बढ़ावा देने के लिए किया। लीबिया के विद्रोहियों को त्रिपली पर हमला करने के लिए फ्रांस ने 40 टन हथियार दिए। इंग्लैंड ने 80 लाख पाउंड की ‘सहायता’ इन विद्रोहियों को दी और अपने साथी देशों के साथ उन्हें हथियार और प्रशिक्षण उपलब्ध करवाया।

पश्चिम के वर्चस्व वाले एकध्रुवीय विश्व’ का निर्माण करने के इस प्रयास से पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैल गई है और बड़ी संख्या में नागरिक अपने-अपने देशों को छोड़कर लेबनान, मिस्र, जोर्डन व यहां तक कि जर्मनी, फ्रांस और आस्ट्रेलिया में शरण ले रहे हैं। सीरिया के 40 लाख नागरिकों ने अपने देश को छोड़ दिया है। ईराकी और सीरियाई नागरिक अपने व अपने परिवारों की जान की खातिर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचने के लिए खतरों से भरी यात्राएं कर रहे हैं। जिन देशों में वे शरण ले रहें हैं, उनमें से कुछ में उन्हें शरणार्थी और कुछ में प्रवासी का दर्जा दिया जा रहा है। उन्हें न तो जीविका के साधन उपलब्ध हैं, न कानूनी दस्तावेज, न रहने की जगह और ना ही चिकित्सकीय सहायता। वे इन देशों में केवल अपना समय काट रहे हैं। उनका मनोरंजन का एकमात्र साधन फुटबाल खेलना है, जिसके लिए भी उन्हें पैसे चुकाने पड़ते हैं। शरणार्थी शिविरों में बड़ी संख्या में बच्चे जन्म ले रहे हैं परंतु कानूनी दस्तावेजों के अभाव में न तो उनका संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त  में पंजीकरण हो पा रहा है और ना ही उस देश में, जहां उनके माता-पिता ने शरण ली है। ये बच्चे किसी देश के नागरिक नहीं हैं। पेरिस हमलों के बाद, फ्रांस अपनी सीमाओं को उन शरणार्थियों के लिए बंद करने की तैयारी कर रहा है जो उसके द्वारा समर्थित युद्ध के कारण अपने-अपने देशों से पलायन करने पर मजबूर हैं। फ्रांस में रह रहे मुस्लिम अप्रवासियों को भी पेरिस हमले के कारण प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। यह साम्राज्यवाद का एक नया स्वरूप है। अमरीका और उसके साथी देश अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए मध्यपूर्व के सामाजिक-राजनैतिक स्वरूप को पूरी तरह बदल देने की कोशिश कर रहे हैं, जिसका कुप्रभाव संपूर्ण मानवता भुगत रही है। मध्यपूर्व के देशों की सीमाओं को पुनर्निधारित करने का प्रयास भी हो रहा है, जिससे वे कमज़ोर हो जाएं और इज़राईल को सुरक्षित रखा जा सके।

शांति की राह

अमरीका के नेतृत्व में चल रहे ‘‘आतंक के विरूद्ध युद्ध’’ के कारण पूरी दुनिया अशांत और असुरक्षित बन गई है। फ्रांस सहित अमरीका के मित्र देशों और आईसिस के बीच चल रहे युद्ध में निर्दोष लोग मारे जा रहे हैं। यह युद्ध न तो समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व के मूल्यों और ना ही जीवन जीने के पश्चिमी तरीके की रक्षा करने के लिए लड़ा जा रहा है। इसका उद्देश्य इस्लाम या बंधुत्व, समानता, सामाजिक न्याय, करूणा, मानवीय गरिमा और अन्य इस्लामिक सिद्धांतों की रक्षा करना भी नहीं है। ‘‘हमारे जीवन जीने के तरीके की रक्षा’’ जैसे नारे इस युद्ध के शिकार लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए उछाले जा रहे हैं। इनका उद्देश्य जनमत को प्रभावित करना और करोड़ों डॉलर के खर्च और लाखों लोगों की जिंदगियों से खेलने को औचित्यपूर्ण ठहराना है। इस्लाम के प्रति घृणा फैलाना, इस युद्ध का एक महत्वपूर्ण हथियार है।

इस युद्ध और हिंसा को समाप्त करने के लिए तुरंत, बिना शर्त युद्धबंदी की घोषणा की जानी चाहिए और सभी युद्धरत देशों और संगठनों को बातचीत से अपने विवादों को सुलझाना चाहिए। हर प्रकार की हिंसा की निंदा की जानी चाहिए और इनमें इजराईल द्वारा किए जा रहे युद्ध अपराध शामिल हैं। यहां पर यह कहना समीचीन होगा कि भारत के मुस्लिम संगठन और मुस्लिम पुरोहित वर्ग ने हमेशा आईसिस व अन्य आतंकी संगठनों की कुत्सित हरकतों की कड़ी निंदा की है। अपवाद स्वरूप केवल गिनेचुने भारतीय युवा आईसिस में भर्ती हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ को शांति और न्यायपूर्ण विश्व का निर्माण करने के लिए पहल करनी चाहिए|

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