पुरस्कार वापसी प्रजातंत्र को बचाने का प्रयास है

3:46 pm or November 26, 2015
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पुरस्कार वापसी प्रजातंत्र को बचाने का प्रयास है

——-राम पुनियानी———

पिछले कुछ हफ्तों में बड़ी संख्या में लेखकों, वैज्ञानिकों और कलाकारों ने उन्हें सरकार द्वारा दिए गए पुरस्कार लौटाए हैं। यह इन लोगों का विरोध व्यक्त करने का अपना तरीका है। देश में बढ़ती असहिष्णुता और हमारे बहुवादी मूल्यों के क्षरण के विरूद्ध शिक्षाविदों, इतिहासविदों, कलाकारों और वैज्ञानिकों ने वक्तव्य जारी किए हैं। जिन लोगों ने अपने पुरस्कार लौटाए हैं, उनमें से अनेक का साहित्य, कला, फिल्म व विज्ञान के क्षेत्र में असाधारण योगदान रहा है। उन्होंने केवल देश में हो रही वीभत्स घटनाओं के प्रति अपने रोष को अभिव्यक्ति दी है। बढ़ती असहिष्णुता के कारण ही दाभोलकर, पंसारे और कलबुर्गी को अपनी जानें गंवानी पड़ीं। एक मुसलमान को सिर्फ इसलिए पीट-पीटकर मार डाला गया क्योंकि ऐसा संदेह था कि उसके घर में गौमांस है। दूसरी ओर, शासक भाजपा और उससे जुड़े संगठनों के नेताओं ने पुरस्कार वापसी की कड़ी आलोचना की है।

भारत के राष्ट्रपति ने देश में घट रही घटनाओं के प्रति अपनी व्यथा को स्वर देते हुए देश को याद दिलाया है कि हमें हमारी सभ्यता के एक महत्वपूर्ण मूल्य-बहुवाद-की रक्षा करनी चाहिए। उपराष्ट्रपति ने कहा है कि देश के नागरिकों के जीवन की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है। मूडी जैसी अंतर्राष्ट्रीय रेंटिंग एजेंसियों ने कहा है कि अगर मोदी ने अपने साथियों के अवांछित बयानों और हरकतों पर रोक नहीं लगाई तो इससे अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत की साख पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। जूलियो रिबेरो ने कहा है कि वे एक ईसाई बतौर भारत में स्वयं को असुरक्षित पा रहे हैं। नसीरूद्दीन शाह का कहना है कि उन्हें पहली बार यह एहसास कराया जा रहा है कि वे मुसलमान हैं। कवि और फिल्म निर्माता गुलज़ार ने कहा है कि अब वह दौर आ गया है कि लोग आपका नाम पूछने से पहले आपका धर्म पूछते हैं। नारायण मूर्ति और किरण मजूमदार शॉ जैसे जानेमाने उद्यमियों ने बढ़ती असहिष्णुता के प्रति चिंता व्यक्त की है। रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन, उन लोगों में शामिल हैं जिन्होंने बहुवाद के मूल्यों का संरक्षण करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

भाजपा के नेताओं ने इन रचनाधर्मियों और वैज्ञानिकों पर कटु हल्ला बोल दिया है। अरूण जेटली ने कहा है कि यह एक ‘कृत्रिम विद्रोह’ है। यह भी कहा जा रहा है कि जो लोग अपने पुरस्कार लौटा रहे हैं वे या तो वामपंथी हैं या वे लोग हैं जिन्होंने कांग्रेस के शासनकाल में सरकार से खूब लाभ लिए और इसलिए भाजपा के शासन में आने से वे परेशान हैं। यह भी आरोपित है कि ये लोग नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत में चल रही विकास की प्रक्रिया को बाधित करना चाहते हैं। जेटली ने तो यहां तक कहा कि दरअसल पुरस्कार लौटाने वाले नरेन्द्र मोदी के प्रति असहिष्णु हैं। राजनाथ सिंह ने देश में हुई हिंसा की घटनाओं को केवल ‘कानून व्यवस्था’ की समस्या बताते हुए कहा कि इन घटनाओं के लिए संबंधित राज्य सरकारें ज़िम्मेदार हैं और इनके लिए मोदी सरकार पर निशाना साधना अनुचित है।

सच यह है कि जो कुछ घट रहा है, वह न तो कानून व्यवस्था की समस्या है और ना ही इसका संबंध राज्याश्रय खो देने से उपजी कुंठा से है। यह समाज के बढ़ते साम्प्रदायिकीकरण का विरोध है। समाज का साम्प्रदायिकीकरण, सभी सीमाएं पार कर चुका है। यह कहना कि इन लोगों ने तब अपने पुरस्कार क्यों नहीं लौटाये थे जब देश में आपातकाल लगाया गया था, सिक्खों के विरूद्ध हिंसा हुई थी, कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ था या मुंबई में 1993 में बम धमाके हुए थे, बढ़ती असहिष्णुता के प्रति समाज के जागरूक तबके की प्रतिक्रिया को देखने का अत्यंत सतही तरीका है। जिन लोगों ने पुरस्कार लौटाए हैं, उन्होंने और अन्य संगठनों व व्यक्तियों ने ऐसा करने के कारण भी बताए हैं और इन कारणों का संबंध किसी एक घटना से नहीं है। यह देश के वातावरण में ज़हर घोलने के योजनाबद्ध प्रयासों के प्रति रोष की अभिव्यक्ति है। जिन घटनाओं का जिक्र जेटली ने किया, वे हालिया भारतीय इतिहास की त्रासद घटनाएं थीं और कई लेखकों ने उस समय इनका विरोध भी किया था। जिन लोगों ने अभी पुरस्कार लौटाए हैं उनमें से कई को इन घटनाओं के समय ये पुरस्कार मिले ही नहीं थे।

वर्तमान में जो कुछ हो रहा है, उसकी तुलना, कई कारणों से, अतीत की इन त्रासद घटनाओं से नहीं की जा सकती। उदाहरण के लिए आपातकाल की अगर हम बात करें तो इसमें कोई संदेह नहीं कि यह भारतीय इतिहास का एक काला अध्याय था। परंतु आपातकाल के दौरान देश पर शीर्ष से तानाशाही लादी गई थी। इसके विपरीत, वर्तमान में शासक दल से संबद्ध संगठनों का विशाल जाल, पूरे समाज में घृणा फैलाने में लगा है जिसके नतीजे में हिंसा हो रही है। सहिष्णुता और उदारवाद दोनों खतरे में है। इसके साथ ही, शीर्ष स्तर पर योगी आदित्यनाथ, साक्षी महाराज, गिरिराज सिंह और साध्वी निरंजन ज्योति जैसे लोग लगातार बेहूदा, भड़काऊ और घोर सांप्रदायिक बयानबाजी कर रहे हैं। इस प्रकार, देश में ऊपर से लेकर नीचे तक घृणा फैलाने और लोगों को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करने का योजनाबद्ध प्रयास हो रहा है।

एक अन्य स्तर पर सांप्रदायिक ताकतें देश की विभिन्न संस्थाओं पर कब्जा करती जा रही हैं। देश के शीर्ष शिक्षण व वैज्ञानिक संस्थानों को भगवा रंग में रंग दिया गया है। इस नीति के चलते, अंधश्रद्धा को बढ़ावा मिल रहा है। बाबाओं और गुरूओं की एक बड़ी फौज का वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व पर गहरा प्रभाव है। आरएसएस की विचारधारा, सामाजिक और राजनैतिक, दोनों क्षेत्रों में तेज़ी से जड़ें जमा रही है। घरवापसी, लवजिहाद और गौमांस जैसे मुद्दों का इस्तेमाल कर धार्मिक अल्पसंख्यकों में असुरक्षा का  भाव उत्पन्न किया जा रहा है। इसके कारण ही दादरी जैसी घटनाएं हो रही हैं, जिन्हें केवल कानून और व्यवस्था की समस्या बताकर खारिज किया जा रहा है।

जुनूनी सांप्रदायिक हिंसा की जड़ें, धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति पूर्वाग्रह और घृणा में है। हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा, इस घृणा और पूर्वाग्रह की जनक और पोषक है। यही कारण है कि बीफ खाना या गौवध, लोगों को जान से मारने का पर्याप्त आधार बन गए हैं। सांप्रदायिक राष्ट्रवाद के पैरोकार, ‘हमारी गौमाता’ की रक्षा के लिए मरने-मारने को तैयार हैं।

जहां जेटली जैसे लोग समाज के प्रबुद्ध वर्ग की बेचैनी और रोष को ‘कृत्रिम’ बताते रहेंगे और राजनाथ सिंह जैसे लोग उसे केवल कानून व्यवस्था की समस्या निरूपित करते रहेंगे वहीं प्रजातंत्र के हामी वर्गों में असंतोष बढ़ता जाएगा। हमें ऐसे तरीके ढूंढने होंगे जिनसे हम आमजनों का ध्यान हमारे प्रजातांत्रिक समाज पर मंडराते इस बड़े खतरे की ओर आकर्षित कर सकें। ये कोई साधारण दौर नहीं है। बांटने वाली शक्तियों की ताकत में जिस तेज़ी से इजाफा हो रहा है और वे जिस तरह की बेजा हरकतें कर रहे हैं, उन्हें केवल तथाकथित विकास के छलावे के नाम पर नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता।

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