पटरी से उतरती अर्थव्यवस्था

3:38 pm or December 1, 2015
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——अरविंद जयतिलक——-

महंगाई के मोर्चे पर घुटने के बल आ चुकी मोदी सरकार के लिए यह शुभ संकेत नहीं कि अक्टुबर महीने के आंकड़ों में देश का निर्यात 18 फीसदी घटकर 21.35 अरब डाॅलर पर सिमट गया है और अर्थव्यवस्था की सुस्ती से विकास का पहिया रगड़ने लगा है। अक्टुबर के आंकड़ों पर गौर करें तो 30 में से 20 उद्योगों के निर्यात में कमी आयी है और यह गिरावट लगातार 11वें महीने दर्ज की गयी है। तुलनात्मक रुप से देखें तो चालू वित्त वर्ष के शुरुआती पांच महीने में देश का निर्यात 111 अरब डाॅलर का रहा जो पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 16 फीसदी कम है। यह रेखांकित करता है कि निर्यात के मोर्चे पर सरकार द्वारा पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए हैं। इस हालात में अब सरकार के लिए चालू वित्त वर्ष में 300 अरब डाॅलर के निर्यात लक्ष्य को साधना आसान नहीं होगा। हालांकि सरकार के लिए राहतकारी है कि आयात में कमी आयी है और उससे चालू खाते के घाटे की भरपायी में मदद मिलेगी। लेकिन आयात का गिरावट इस बात को भी दर्शाता है कि देश में कच्चे माल की खपत में कमी आयी है, जो अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं है। गौर करें आयात-निर्यात में ही नहीं बल्कि औद्योगिक उत्पादन में भी कमी आयी है। केंद्रीय सांख्यिकीय कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक औद्योगिक उत्पादन पिछले साल के मुकाबले 4 महीने के न्यूनतम स्तर पर है। विनिर्माण क्षेत्र की विकास दर, मैन्यूफैक्चरिंग तथा कैपिटल गुड्स की रफ्तार भी थम गयी है। कंपनियों में उत्पादन क्षमता से 30 फीसद उत्पादन कम हो रहा है और मांग की कमी, भुगतान का संकट और बढ़ते कर्ज ने निजी क्षेत्र की चिंता बढ़ा दी है। दूसरी ओर रुपए का दम निकल रहाहै और वह एक डाॅलर के मुकाबले छाछठ पर आ गया है। यह हालात तब है जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्तमंत्री अरुण जेटली दोनों देशी-विदेशी निवेशकों को लगातार भरोसा दे रहे हैं कि उनकी सरकार अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए हर संभव उपाय कर रही है। पिछले दिनों वित्तमंत्री ने निवेशकों को रिझाने के लिए कई सेक्टरों में एफडीआई की सीमा बढ़ायी और विनिवेश नीति में बदलाव की हामी भरी। वित्तमंत्री ने देश में वाणिज्य, व्यवसाय और उद्योग शुरु करने के लिए विभिन्न शर्तों को आसान बनाने पर जोर दिया और साथ ही व्यवसाय करने के लिए कंपनी अथवा फर्म पंजीकृत कराने में लगने वाले समय को एक दिन करने की बात कही। साथ ही श्रम कानूनों के लिए एक पंजीकरण कराने और कई तरह के करों की संख्या में कटौती का भरोसा दिया। बाजार को निवेशोन्मुख बनाने के लिए उन्होंने गैर-योजना व्यय में 10 फीसदी कटौती के लिए खर्चे में कमी का एलान के साथ नौकरशाहों की प्रथम श्रेणी की विदेश यात्रा पर प्रतिबंध लगाया। लेकिन अचरज है कि इन उपायों के बाद भी निवेशकों में उत्साह नहीं है और यह कुलमिलाकर सरकार की नाकामी को ही दर्शाता है। चूंकि मूडीज सरीखी अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां पहले ही सरकार की अर्थनीति और देश में व्याप्त असहिष्णुता को लेकर आशंका जता चुकी हैं ऐसे में विदेशी निवेशक भी विशाल परियोजनाओं में धन लगाने को तैयार नहीं हैं। यही नहीं दूसरी छोटी कंपनियां भी अपने विस्तार की योजना को ठंडे बस्ते में डाल दी हैं। आर्थिक माहौल कितना नाजुक है इसी से समझा जा सकता है कि पिछले दो सप्ताह के दौरान विदेशी निवेशकों ने भारतीय पूंजी बाजार से 2800 करोड़ रुपए निकाल लिए हैं। अगर सरकार माहौल में तब्दीली नहीं लायी तो हालात और गंभीर हो सकते हैं। अब निवेशकों की नजर जीएसटी और भूमि अधिग्रहण कानून पर है। अगर सरकार इन विधेयकों को शीत सत्र में पारित कराने में विफल रही तो भारतीय बाजार को करारा झटका लगना तय है। सैकड़ों परियोजनाएं जो पूंजी की कमी से ठप्प पड़ी हैं, उनपर पूरी तरह से ग्रहण लग जाएगा। वैसे सरकार जीएसटी और भूमि अधिग्रहण कानून पर सहमति बनाने की कोशिश कर रही है, लेकिन विपक्ष के कड़े तेवर को देखते हुए नहीं लगता कि वह इसमें सफल हो पाएगी। गौरतलब है कि जीएसटी कानून को पहली अप्रैल, 2016 से लागू करने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन इसे लागू करने के लिए आवश्यक है कि संविधान संशोधन विधेयक होने के नाते सबसे पहले संसद से पारित हो। उसके बाद पचास फीसद राज्य विधानसभाओं में भी दो तिहाई बहुमत से पारित होना जरुरी है। भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर भी सरकार और विपक्ष के बीच तकरार कायम है। लिहाजा प्रधानमंत्री के 2013 का भूमि अधिग्रहण कानून लागू करने तथा वित्तमंत्री अरुण जेटली के भूमि अधिग्रहण में कोई दिक्कत नहीं होने के बयान के बाद भी निवेशक आश्वस्त नहीं है। उन्हें सरकार से ठोस नतीजों की दरकार है और सरकार नतीजे देने में नाकाम है। सरकार पर निवेशकों में भरोसा पैदा करने के अलावा चालू खाते के घाटे से निपटना, विकास दर को ऊंचा ले जाना, बचत में वृद्धि, निवेश चक्र बनाए रखना, मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाना, आपूर्ति बढ़ाकर महंगाई को कम करना और ढांचागत क्षेत्र को मजबूती देने की भी चुनौती है। उम्मीद है कि चालू खाते का घाटा चालू वित्त वर्ष के दौरान सकल घरेलू उत्पाद का करीब एक फीसद रहने की संभावना है। वित्तीय क्षेत्र की प्रमुख वैश्विक कंपनी सिटी ग्रुप के मुताबिक यह 2015-16 के दौरान 20.6 अरब डाॅलर रह सकती है। लेकिन अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए उसे न्यूनतम स्तर पर लाना होगा। गौर करें तो सरकार की फजीहत यहीं तक सीमित नहीं है। पिछले दिनों वित्तमंत्री द्वारा 15 महत्वपूर्ण सेक्टरों में विदेशी सीधा निवेश मानदंड नरम किए जाने से भारतीय मजदूर संघ, स्वदेशी जागरण मंच समेत कई संगठन नाराज हैं और सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है। इन संगठनों ने मांग की है कि सरकार एफडीआई पर फैसला वापस ले और एफडीआई के लाभ-हानि पर श्वेत पत्र जारी करे। आने वाले दिनों में यह चुनौतियां और सघन होगी। सरकार को समझना होगा कि अर्थव्यवस्था पटरी पर तभी आएगी जब देश में कारोबार का माहौल निर्मित होगा। लेकिन इसके लिए सबसे पहले महंगाई पर नियंत्रण लगाना होगा। महंगाई की वजह से जनता की क्रयशक्ति घट गयी है। इसे बढ़ाए बिना बाजार गुलजार होने वाला नहीं है। लेकिन विडंबना है कि सरकार के रणनीतिकार मान बैठे हैं कि महंगाई का अर्थव्यवस्था से कोई नाता नहीं है। अन्यथा ऐसे समय में जब जनता पहले से ही महंगाई से लहूलुहान है, सरकार करयोग्य सेवाओं पर 0.5 फीसद स्वच्छ भारत उपकर लगाने का दुस्साहस नहीं करती। रेलमंत्रालय न्यूनतम रेल किराया दोगुना नहीं करता और न ही तेल कंपनियां डीजल मूल्यों में वृद्धि करती। यह वृद्धि भले ही मामूली लगे लेकिन यह महंगाई बढ़ाने में उत्प्रेरक का काम करेगी। उचित होगा कि सरकार कुतर्कों से बचाव करने के बजाए जमीनी सच्चाई को समझे। जहां तक महंगाई का सवाल है तो उसके लिए अंतर्राष्ट्रीय मंदी कम सरकार की नीतिगत नाकामी व कुप्रबंधन ज्यादा जिम्मेदार है। यह तथ्य है कि भंडारण और प्रसंस्करण सुविधाओं के अभाव में देश में सालाना दो लाख करोड़ रुपए की फल व सब्जियां बर्बाद होती हैं। सिर्फ 22 फीसद फल व सब्जियां ही थोक मंडियों में पहुंच पाती हैं। अगर सरकार इसके रखरखाव का समुचित उपाय करे तो महंगाई को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। अब देखना दिलचस्प होगा कि आर्थिक अनिश्चितता के माहौल में सरकार महंगाई कम करने, रुपए की चमक वापस लाने और निवेशकों का विश्वास जीतने के लिए क्या कदम उठाती है।

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