हमें क्या चाहिए? आधुनिक विकसित भारत या अन्धकार का युग?

3:52 pm or December 4, 2015
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हमें क्या चाहिए? आधुनिक विकसित भारत या अन्धकार का युग?

——नसीरूद्दीन शाह——-

यह गौरतलब है कि शाहरूख खान या आमिर खान के बयानों से भड़की उत्तेजना अपमानित पक्षों के असली गुस्से का परिणाम थी अथवा सुर्खियां बटोरने का प्रयास था? या फिर टी.वी. चैनलों द्वारा अपनी टी.आर.पी. बढ़ाने के लिये इसे हवा दी गई?

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हमारी थिएटर कंपनी मोटले’ लाहौर में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले फैज उत्सव समारोह के दौरान 20 वीं सदी के महान उर्दू शायर फैज अहमद फैज को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए पिछले पांच साल से पाकिस्तान जा रही है। हम वहां बगैर सुरक्षा के आसपास के स्थानों पर घूमें। हमने उस शहर में सर्दी की सुनहरी धूप का आनंद लिया। मशहूर उर्दू लेखिका इस्मत चुगताई जिसे ‘‘हवा का नूर’’ कहती थी, उसमें हमने अपने आप को भिगो दिया। हमने वहाँ हमेशा प्यार और सम्मान महसूस किया। वहाँ के लजीज खाने का आनंद तो लिया ही। दोनों देशों के बीच रिश्तों में तल्खी के कारण इस साल मैं थोड़ा झिझका किन्तु मेरा इस बात में दृढ़ विश्वास है कि मसलों को हल करने के लिये लोगों का लोगों से संपर्क जारी रहना चाहिये। अतएव ‘मोटले’ लाहौर में अपनी प्रस्तुति देकर और भगवान श्रीराम के बेटे लव, जिनके नाम पर इस शहर का नाम लाहौर पड़ा है, के मंदिर के दर्शन करके हाल ही में स्वदेश लौटा है।

हमारी टीम के साथ वाघा सीमा पार करने वालों में कनाडा और ब्रिटेन के कुछ सौ सिख तीर्थयात्री भी थे जो सब गुरु नानक जयंती पर ननकाना साहिब में प्रार्थना करने के लिए जा रहे थे। अगले दिन भारत से कुछ हजार सिख तीर्थयात्री भी आने वाले थे। मैंने वहाँ लाहौर में काम करने वाले भारतीय व्यापारियों से भी मुलाकात की। कई भारतीयों को एक साथ पाकिस्तान जाते हुये देखना मेरे लिये अद्भुद था। एक मुसलमान और ‘राष्ट्र विरोधी’ होने के नाते मुझे और मेरी पूरी टीम को वीसा लेने में कोई कठिनाई नही हुई। (संयोग से मेरी टीम में एक भी मुस्लिम नहीं था), किन्तु मुझे इस बात का आश्चर्य है कि भारत में इनदिनों देशद्रोह इस सीमा तक बढ़ गया है कि बहुत सारे भारतीयों को एकसाथ पाकिस्तान भेज दिये जाना चाहिये?

लाहौर में एक पारिवारिक समारोह के दौरान हमने एक कथक नृत्यांगना  और शिक्षिका बीना जावद और उनकी तीन बेटियों (सभी मुस्लिम) द्वारा प्रस्तुत एक सिंधी भजन के अद्भुद गायन को सुना जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश़ का यशगान किया गया था। इसके साथ ही हमने गुरू नानक के प्रथम शिष्य भाई मर्दाना के किस्से भी सुने जो एक मुस्लिम थे तथा उनके वंशज भाई चांद (मुस्लिम) बहुत ही अद्भुद गुरूवाणी गाते है, जो मैने भी उनके मुख से कभी सुनी थी। हम एकाएक हसन-अब्दाल में गुरुद्वारा पंजा साहब को देखने के लिए वहां चले गए थे, जिसमें सिख पुजारी और मुस्लिम सेवक है। ‘लव’ और ‘पंजा साहब’ दोनों ही मंदिर आज भी यहां पूजा प्रार्थना के लिये काफी सक्रिय स्थलों में शुमार है।

मैं यह बता दूँ कि मैं पाकिस्तान में इन अपवादों की ही बात कर रहा हूँ और ऐसा वहां पर सामान्य तौर पर नही होता है अन्यथा ऐसा समझा जायेगा कि मैं पाकिस्तान को रंगीन चश्मा पहनकर देख रहा हूँ। सच यह है कि यह देश धर्मनिरपेक्ष होने का दावा नही करता। यद्यपि वहां पर असहिष्णुता हमारे देश की तुलना में निःसंदेह काफी ज्यादा है, जैसा कि सामंतवाद में होता है। वहाँ अधिकतर संवेदनशील लोग समाज में गहरे विभाजन यथा- ईसाइयों को हाशिये पर डाल देने, हिन्दुओं, अहमदियों और शियाओं के साथ जुल्म और बलूच लोगों में बैचेनी और अशांति के बारे में सजग है। किन्तु मुझे लगा कि यह दर्द उनका है, और जब मैं वहां था तो मेरे देश में ‘‘असहिष्णुता’’ बनाम ‘‘सहिष्णुता’’ की तीव्र बहस  बहुत आगे तक निकलती दिखाई दी। यह सुनना दिलचस्प था कि पाकिस्तान में दक्षिणपंथी मुल्ले लाहौर में वेलेंटाइन डे समारोह में तोड़-फोड़ करते है और मुझे आश्चर्य हुआ कि यदि शिवसेना होती तो इस पर क्या कहती? वे शायद इसका समर्थन करते जैसा कि उन्होने गुलाम अली की उस घोषणा का समर्थन किया कि वे फिर से भारत में अपनी कोई प्रस्तुति नही देंगे। शिवसेना ने कहा -‘‘वे हमारे तर्कों को समझ गये है।’’ क्या मैं यह कहने का साहस कर सकता हूँ कि शिवसेना मुस्लिम कट्टरपंथी भोंदुओं के विचारों का समर्थन करती है?

जैसा कि कमल हासन ने पहले कहा था ; असहिष्णुता हमारे देश में कोई नई नही है। 1984 में सिखों का कत्ले आम किया गया था और अतीत में धार्मिकता के नाम पर अन्य संज्ञाहीन कृत्यों को अंजाम दिया गया। अनमोल दस्तावेजों को नष्ट कर दिया गया, अमूल्य कलाकृतियों को तोड़ दिया गया,  इनमें सक्रिय लोगों की हत्याएं कर दी गई, कलाकारों को धमकियां दी गई और खास तौर पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने हमेंशा शुतुर्मुग जैसा रवैया अपनाया। ‘‘किस्सा कुर्सी का’’ कार्यक्रम सहित अनेक ऐसे उदाहरण है जब अतीत में इन्हे प्रतिबंधित किया गया जैसे कि उदाहरणार्थ-‘‘द सेटेनिक वर्सेस’’ और ‘‘जीसस क्राइस्ट सुपरस्टार’’ आदि। रंगमंचीय कार्यक्रमों में (कुछ साल पहले भोपाल में हबीब तनवीर के नाटक ‘‘पोंगा पंडित’’ और पृथ्वी थियेटर में ‘‘शेक्सपियर की रामलीला नामक एक प्रहसन दोनों कों) दक्षिणपंथियों ने हिंसा की धमकियां देकर तथा उत्पात मचाकर इन्हे रोका गया और किसी ने भी इस उत्पात पर कुछ नही किया। उत्तर-पूर्व के लोगों, बिहारियों, बांग्लादेशियों को समान रूप से निशाना बनाया गया और उनके साथ मारपीट की गई। मकबूल फिदा हुसैन को अपनी जान बचाने के लिये भागना पड़ा और तत्कालीन सरकार उनकी स्वदेश वापसी के लिये उन्हे कोई आश्वासन नही दे सकी।

तो अब जो हो रहा है वह नया नहीं है। लेकिन उन चुभने वाले बयानों की जवाबी प्रतिक्रिया आश्चर्य पैदा करती है जो देश के सर्वोत्तम बुद्धिजीवियों द्वारा दिये गये है। ये वे लोग है जो नारेबाजी करने वाली भीड़ का हिस्सा नही होकर बहुत तर्कशील है। ये वे लोग है जिन्हे पिछली सरकारों ने पुरूस्कृत करने के योग्य समझा।

यह आरोप कि देश के सर्वाधिक सम्मानित कलाकार, साहित्यकार और वैज्ञानिक ‘‘भाजपा के घोर विरोधी’’ है और वे राजनीतिक रूप से प्रेरित है एवं विरोध के बदले में उन्हे पैसा मिल रहा है, इन आरोपों के पीछे जो मानसिक रोग और दिवालियापन है उसका पता लगाया जाना संभव है। एक मंत्री जो हड़ताल कर रहे फिल्म छात्रों को ‘नक्सलवादी’’ कहते है उन्हे यह अधिक अच्छे से जानना चाहिये कि वे एक ऐसे व्यक्ति को एफ.टी.आई.आई. का अध्यक्ष बनाने का विरोध कर रहे थे जो उस संस्थान में प्रवेश पाने के लिये आयोजित परीक्षा को भी शायद उत्तीर्ण न कर सके। यदि कोई हाशिये पर पड़े हुये विक्षिप्त लोगों के बयानों की उपेक्षा भी कर दें तो इस बहस का सबसे अशुभ पहलू सत्तारूढ़ पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं द्वारा अपनी सफाई में दिये गये अनर्गल बयान है।

यह भी गौरतलब है कि शाहरूख खान या आमिर खान के बयान से भड़की उत्तेजना अपमानित पक्षों के असली गुस्से का परिणाम थी या मात्र सुर्खियां बटोरने का प्रयास था या फिर टी.वी. चैनलों द्वारा अपनी टी.आर.पी. बढ़ाने के लिये इसे हवा दी गई?

इस संबन्ध में संचार माध्यमों से आई सूचनाएं स्पष्ट रूप से एकतरफा थी। इन माध्यमों के इरादों पर तब प्रश्नचिन्ह लगता है जबकि वास्तव में उनमें से किसी ने भी एक मुस्लिम होने के कारण किसी के असहज होने के बारे में एक शब्द भी नही कहा। वे देश के नागरिकों की तरह बोले। ये लोग डरावने और उत्तेजित करने वाले अपशब्दों का प्रयोग क्यों करते आ रहे है; इसके कारण को समझना कठिन नही हैं। लेकिन अब यह स्पष्ट हो जायेगा कि हिन्दू-मुस्लिम समस्या वह समस्या नही है जिसके बारे में असहिष्णुता पर बहस हो रही है? किसी भी मामले वे बहुत सारे मुसलमान नही है जो अपने  अवार्ड लौटा रहे है, नही है ना? तो मुसलमानों को सरकार से असंतोष प्रकट करने पर उनके ही देश में देशद्रोही क्यों माना जाना चाहिये? जब लोग 200 साल पहले मर चुके एक मुस्लिम शासक को लेकर एक दूसरे की हत्या करना शुरू करते हैं, तो समझना चाहिये कि वहाँ कुछ गंभीर चूक हो रही है और इसे दुरूस्त किया जाना चाहिए।

निश्चित रूप से सत्तारूढ़ पार्टी यह महसूस करती है कि उसके सामने दो विकल्प मौजूद है। एक ‘आधुनिक भारत का निर्माण’ और दूसरा ‘अंधकार के युग में वापसी’। इन दोनों में उसे जो विकल्प आसान लगे, वही चुनना चाहिये।

(नसीरूद्दीन शाह एक अभिनेता है। लेख में व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत विचार है।)

Courtesy – Hindustan Times

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