कश्मीर: बच्चों को बचा लो !

5:19 pm or November 30, 2016
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कश्मीर के नौनिहाल किस ओर

—– सुभाष गाताडे ——

अगर हिंसा में स्थगन को चीज़ों के सामान्य होने का पैमाना मान लें, तब कहा जा सकता है कि कश्मीर में अब सामान्य स्थिति तेजी से बहाल हो रही है। इस मामले में बोर्ड के इम्तिहानों का ‘सफल सम्पन्न’ होने की ख़बर को भी देखा जा सकता है। ‘द टिब्युन’ की ख़बर के मुताबिक ‘कश्मीर घाटी के दस जिलों लगभग 94 फीसदी बच्चों ने इन इम्तिहानों में भाग लिया’। बच्चों की सहभागिता के हिसाब से अनंतनाग – जो एक तरह से विगत चार महिनों से चल रहे जनअसन्तोष का केन्द्र कहा जा रहा था – नम्बर एक पर रहा जहां के 96.1 फीसदी बच्चों ने 12 वीं के बोर्ड के इम्तिहान में हिस्सा लिया।’ /देखें, द टिब्युन, 15 नवम्बर 2016/

मालूम हो जुलाई माह से ही लगभग बन्द चल रहे स्कूलों के सामने- खासकर बोर्ड इम्तिहान देनेवाले बच्चों के समक्ष – यह विकल्प दिया गया था कि अगर वह नवम्बर में प्रस्तावित इम्तिहान में बैठते हैं तो उन्हें महज 50 फीसदी कोर्स तक ही अपने आप को सीमित करना होगा और फिर दूसरा विकल्प मार्च के इम्तिहान का था। राजबाग के गवर्मेन्ट गल्र्स सेकेन्डरी हाईस्कूल की छात्रा बिसमा अमीन – जो मेडिकल की छात्रा है – ने पत्राकार के सामने ‘इधर आग और उधर खाई’ की बात कहते हुए बताया कि बच्चे किस तरह इस मसले पर कुछ सोच नहीं पा रहे थे।

फिलवक्त़ इस बात पर सोचने का वक्त़ नहीं है कि इतने कम कोर्स के आधार पर इम्तिहान देनेवाले बच्चों के लिए आगे की पढ़ाई कितनी दुश्वार होगी, क्या वह आगे की प्रतियोगितात्मक परीक्षाओं में ठीक से भाग ले सकेंगे या देश के बाकी हिस्सों में पढ़ने के लिए अगर यह छात्रा-छात्राएं आएं तो उनकी मार्कशीटस को किस तरह देखा जाएगा।

बहरहाल कश्मीर में विगत कुछ माह में फैली अशांति को लेकर आप की जो भी राय हों – फिर चाहे आप सरकार के रूख से सहमत हों या न हों या उसकी स्थिति के लिए पड़ोसी मुल्क पर दोषारोपण करने को तैयार हो या न हों – एक बात से सभी सहमत होंगे कि इस सभी घटनाक्रम ने बच्चों पर गोया कहर बरपा किया है।

आप इसे इंशा मुश्ताक लोन की आपबीती से भी समझ सकते हैं, जो दक्षिणी कश्मीर के शोपियां जिले के सेडो गांव की रहनेवाली है।

चैदह साल की इंशा का चेहरा, जिसके चेहरे पर तमाम छर्रे लगे थे और जो द्रष्टिहीन हो चुकी थी, देश और दुनिया की मीडिया में जगह पा चुका है। इन दिनों अपने बगल के गांव में चाचा के घर पर रह रही इंशा को अभीभी वह लमहा याद है जब बाहर गोलियां चलने की आवाज़ सुन कर उसने के घर की खिड़की खोली थी और सुरक्षा बलों के पेलेट गन्स से निकले छर्रों ने उसके चेहरे को छलनी कर दिया था। उसके आगे के तीन दांत टूट गए थे और उसके आंखों की रौशनी चली गयी थी।

श्रीनगर के सबसे अग्रणी अस्पताल से लेकर दिल्ली के एम्स तथा मुंबई के अस्पतालों का चक्कर काट कर वह लौट चुकी है, तमाम आपरेशन्स के बाद नतीजा वही सिफर है, उसकी द्रष्टि नहीं लौटेगी। एक पत्राकार से बात करते हुए इंशा अपने दो सपने सांझा करती है, एक तो वह दिल्ली एवं मुंबई के अपने नए दोस्तों से मिलना चाहती है – अधिकतर कश्मीर के निवासी छात्रा-युवा जो अस्पताल में उससे मिलने आते थे, उसके यह नए मित्रा हैं और दूसरे वह सूरज की रौशनी ‘अपनी’ आंखों से देखना चाहती है।

मेडिकल डाॅक्टर बनने की दिलों में ख्वाहिश रखी इंशा की यह दिल छूनेवाली दास्तां बरबस जम्मू कश्मीर सरकार के स्वास्थ्य महकमे की एक ताज़ा रिपोर्ट की तरफ नए सिरेसे ध्यान आकर्षित कराती है जिसमें बताया गया है कि हिजबुल मुजाहीदीन के कमांडर बुरहान वाणी के मारे जाने के बाद जो विरोध प्रदर्शन चले उसमें सूबे के अलग अलग हिस्सों में घायल नौ हजार लोगों में से 1248 बच्चे थे , जो 15 साल से कम उम्र के थे। अगर इन आंकड़ों को और बारीकी में जाकर देखें तो 243 बच्चे बारह साल से कम उम्र के थे तो 12 से 15 साल के दरमियान के 1005 बच्चे थे। यूं तो आंकड़े यह नहीं बताते कि कितने लोगों, बच्चों की आंखों पर चोट आयी, मगर श्रीनगर के अस्पतालों के तीन आंखों की इकाइयों ने 1,300 ऐसे घायलों का इलाज किया, अधिकतर ऐसे घायल युवा थे, जो पूरी तरह से द्रष्टिहीन बन गए या उनके एक आंख की रौशनी गयी। /देखें, इंडियन एक्स्प्रेस, 10 नवम्बर 2016/

निश्चित ही आज जैसा समय चल रहा है, उसमें कश्मीर में सुरक्षा बलों या दूसरी तरफ मिलिटेण्टों के बन्दूकों के साये में बच्चों का भविष्य कितना उज्वल हो पाएगा इसका अन्दाज़ा लगाना मुश्किल नहीं। उदाहरण के लिए स्कूलों को जलाए जाने की परिघटना को ही देखें, पता चला है कि जुलाई माह से अब तक 25 से अधिक स्कूल पूरी तरह या आंशिक तौर पर दस अलग अलग जिलों में जलाए जा चुके हैं, यूं तो किसी समूह ने उसकी जिम्मेदारी नहीं ली है और राज्य पुलिस ने 22 संदिग्ध व्यक्तियों को गिरफतार किया है। मगर इस मामले में भी सन्देह के बादल बने हु हैं। जम्मू कश्मीर उच्च अदालत ने इस गंभीर मसले के मामले में राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह तत्काल प्रतिबंधात्मक कार्रवाई करे।
पिछले दिनों जारी एमनेस्टी इंटरनेशनल का बयान बच्चों से ही जुड़े दो महत्वपूर्ण पहलुओं को उजागर करता है। एक तो उसने कहा है कि स्कूल जलाए जाने के पीछे जिम्मेदार तत्वों को वह चिन्हित करे तथा सुरक्षा बलों द्वारा स्कूलों में कब्जा करने की प्रव्रत्ति पर भी रोक लगाए। बयान में कहा गया है कि ‘सभी परिस्थितियों में स्कूलों को सुरक्षित स्थान होना चाहिए। स्कूलों मंे आगजनी की घटनाएं कश्मीर के बच्चों के शिक्षा के अधिकार से इन्कार करती हैं।..इसके अलावा कश्मीर के बच्चों के शिक्षा का अधिकार इस बात से भी प्रभावित होता है कि स्कूलों को सैनिक हेतुओं के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है। स्कूलों में सुरक्षा बलों की उपस्थित उन पर हमलों के खतरों को बढ़ाती है, लम्बे समय तक सुरक्षा बलों के स्कूलों में रहने से बच्चों की डापआउट अर्थात स्कूल छोड़ने की दर बढ़ने की संभावना है तथा कम बच्चों के दाखिला लेने की संभावना है। इससे शिक्षकों की भरती भी प्रभावित होगी।

कश्मीर टाईम्स की रिपोर्ट के अनुसार अर्द्धसैनिक बलों ने अगस्त के बाद कश्मीर के कमसे कम सात स्कूलों में अपनी छावनियां कायम की हैं। यह अकारण नहीं कि सरकार ने आनेवाली स्कूल परीक्षाओं के स्थानों को इन स्कूलों से हटा कर दूर भेज दिया है। /4 नवम्बर 2016 /Kashmir Times, http://www.kashmirtimes.in/newsdet.aspx?q=59614/ इस सन्दर्भ में वर्ष 2010 में भारत के नेशनल कमीशन फार द प्रोटेक्शन आफ चाइल्ड राइटस द्वारा जारी दिशानिर्देशक सिद्धान्त रेखांकित करनवाले हैं, जिसमें उसने कहा था कि स्कूलों में सुरक्षा बलो की उपस्थिति तथा उनका प्रयोग ‘शिक्षा के अधिकार की शब्द एवं आत्मा दोनों का ही उल्लंघन करता है क्योंकि वह शिक्षा तक सुगमता को बाधित करता है और उन पर हमलों की संभावना को बनाता है।

छर्रे से घायल बच्चे, जलते स्कूल या सुरक्षा बलों की स्कूलों में दस्तक – यह ऐसी बातें हैं जो मुख्यधारा के कहे गए भारत में सुनाई नहीं देती, गोया भारत के अन्दर ही दो भारत बसते हों।

वैसे इनमें सबसे ताज़ा मसला जुड़ा है कश्मीर की जेलों में बन्द बच्चों का। राज्य में सत्ताधारी पार्टी के नेता एवं पूर्व विधायक रफी मीर की इस मांग के बाद कि ‘जेलों में बन्द बच्चों को बिनाशर्त रिहा किया जाए और उनके लिए सुधारात्मक कदमों का प्रयोग किया जाए’, अब पूर्व वित्तमंत्राी यशवंत सिन्हा की अगुआई में बने अनौपचारिक समूह की तरफ से यह मांग उठी है।

मालूम हो कि इस समूह की कश्मीर यात्रा समाप्त हुई है और वह जल्द ही अपनी सिफारिशें सार्वजनिक करेगा तथा उस सिलसिले में संबंधित लोगों से मिलेगा। अपनी व्यक्तिगत क्षमता में कश्मीर यात्रा पर गए पांच सदस्यीय इस समूह के अन्य सदस्यों में जानेमाने पत्राकार भारत भूषण, अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष हबीबुल्लाह, रिटायर्ड एअर व्हाईस मार्शल कपिल काक, और सेन्टर फार डायलाॅग एण्ड रिकन्सिलिएशन की अध्यक्ष सुशोभा बर्वे शामिल थे, जिन्होंने वहां कई गणमान्य नेताओं तथा अन्य स्टेकहोल्डर्स से बात की।

इस समूह की प्रस्तावित रिपोर्ट की झलक उनके अन्य सुझावों के अलावा – जो कहीं कहीं मीडिया में स्थान पाए हैं – इस बात में दिखती है जिसमें वह सरकार से अपील करनेवाले हैं कि जम्मू कश्मीर घाटी में मौजूद पब्लिक सेफटी एक्ट के तहत जिन अल्पवयस्कों को गिरफतार किया गया है उन्हें तत्काल रिहा किया जाए। इंडियन एक्स्प्रेस से बात करते हुए समूह के सदस्य ने स्पष्ट बताया कि ‘इस अधिनियम के तहत बच्चों को गिरफतार किया गया है जो गैरकानूनी है। हम लोग रिपोर्ट में सुझाव देने वाले हैं कि उन्हें रिहा किया जाए। अगर उन्होंने अपराध भी किया हो तो भी उन्हें जेल नहीं भेजा जा सकता, इसके लिए जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड का सहारा लेने की जरूरत होगी।’ / 7 नवम्बर 2016/ उम्मीद की जानी चाहिए कि कश्मीर के मसले को ‘इन्सानियत’ के दायरे में सुलझाने का दावा करनेवाले देश के कर्णधार जेलों में बन्द बच्चों की स्थिति पर अधिक सहानुभूति से विचार करेंगे और अनुकूल कदम उठाएंगे।

ध्यान रहे कि कश्मीर की जेलों में बन्द बच्चों का सवाल पहली बार नहीं उठा है। एमनेस्टी इंटरनेशनल, हयूमन राइटस वाॅच और इंटरनेशनल कमीशन आफ जूरिस्ट ने पिछले दिनों अपने साझे बयान में पब्लिक सेफटी एक्ट के तहत लोगों को – जिनमें बच्चे भी शामिल हो – की धुंआधार गिरफतारी की निंदा की थी। उन्होंने सरकार से साफ किया था पब्लिक सेफटी एक्ट गिरफतारियों को लेकर अंतरराष्टीय प्रक्रियाओं का साफ उल्लंघन करता है। (http://www.kashmirtimes.com/mobile/newsdet.aspx?q=58750) और उसे बढ़ावा मिलने से पुलिस एवं सुरक्षा बलों में दंडविहीनता/इम्प्युनिटी की भावना पनपती है। फिलवक्त़ भले वहां उठे जनअसन्तोष के बहाने बड़े पैमाने पर गिरफतार बच्चों के चलते उसकी गंभीरता बढ़ी हो, मगर यह मसला लम्बे समय से चर्चा में आता रहा है। तीन साल पहले सर्वोच्च अदालत की त्रिसदस्यीय पीठ ने – न्यायमूर्ति लोढ़ा, न्यायमूर्ति चेलमेश्वर और न्यायमूर्ति लोकुर – श्रीनगर के रहनेवाले 12 साल के बच्चे की ‘‘गैरकानूनी हिरासत, गिरफ्तारी, प्रताडना को लेकर’’ राज्य सरकार को नोटिस भी जारी किया था और बच्चे के लिए 10 लाख रूपए मुआवजे की मांग की। मालूम हो कि पत्थर फेंकने के आरोप में इस बच्चे को अगस्त 2012 में पकड़ा गया था। यूं तो उस बच्चे की जमानत बाद में हुई थी, मगर बच्चे के वकील ने अदालत को बताया कि किस तरह उसकी गिरफ्तारी संविधान की धारा 22 का उल्लंघन करती है और 40 घण्टे तक उसे पुलिस हिरासत में रखना और मैजिस्टेªट द्वारा रिमाण्ड पर देना गैरकानूनी है।

अगर हम बाल न्याय अधिनियम को देखें तो वह इस मायने में स्पष्ट है कि बच्चों को वयस्कों के लिए बने बन्दीगृह में किसीभी सूरत में रखा नहीं जा सकता। बाल सुधार गृह और बाल अदालतों की मौजूदगी संयुक्त राष्ट्रसंघ के बाल अधिकारों के कन्वेन्शन के अनुरूप मानी जा सकती है, जिसमें बच्चों को वयस्कों के साथ बन्दीगृहों में रखने पर सख्त एतराज जताया गया है। अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ जब दिल्ली हाईकोर्ट ने नौ साल से जेल में बन्द एक अल्पवयस्क को तत्काल रिहा करने का आदेश देते हुए स्पष्ट किया था कि ‘बच्चों के अधिकारों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता, भले ही वह हिंसक अपराध में संलिप्त रहे हों।’ (http://www.kashmirtimes.in/newsdet.aspx?q=58662)

कश्मीर का मामला जितना जटिल हो चला है, जिसमें कोई फौरी समाधान भी नहीं दिखता, लेकिन क्या बच्चों पर केन्द्रित करके इस दिशा में कोई सार्थक पहल ली जा सकती है। अगर हुक्मरान वाकई अपनी प्रतिबद्धता को लेकर गंभीर है तो क्या कश्मीर के जेलों में बन्द बच्चों का रिहा करके क्या वह अपनी नियत को स्पष्ट नहीं कर सकते!

कश्मीर के मसले को ‘इंसानियत’ के दायरे में सुलझाने की बात अक्सर की जाती है, क्या अपनी कथनी को करनी में बदलने की दिशा में – खासकर बच्चों के मामले में – देश के कर्णधार नयी जमीन तोड़ सकते हैं !

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