यह प्रधानमंत्री की भाषा तो नहीं है!

6:01 pm or November 30, 2016
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यह प्रधानमंत्री की भाषा तो नहीं है!

—– कृष्ण प्रताप सिंह —–

आपको याद होगा अभी, अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में सारे पूर्वानुमानों को झुठलाती हुई डोनाल्ड ट्रम्प के जीतने की खबर आयी तो इस देश के कई महानुभावों ने उन्हें ‘अमेरिका का नरेन्द्र मोदी’ कहकर खुशियां मनायीं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘भारत का डोनाल्ड ट्रम्प’ तो वे पहले से ही कहते आ रहे थे। क्या पता, अब उन्हें यह जानकर कैसा लगेगा कि अपनी महत्वाकांक्षी नोटबंदी योजना को लेकर ‘भारत के ट्रम्प’ ने गत आठ नवम्बर के बाद से अब तक जैसी ओछी, नकारात्मक, विरोधाभासी और आक्रामक टिप्पणियां की हैं, उनसे उनके और ‘अमेरिका के मोदी’ के बीच की एक बड़ी फांक पूरी तरह बेपरदा हो गयी है। अमेरिका के मोदी ने तो चुने जाते ही, भले ही उनके अनेक देशवासी बिना देर किये उनके खिलाफ सड़कों पर और प्रदर्शनों में उतर आये थे, खुद को ‘सारे अमेरिकियों का राष्ट्रपति’ बता दिया और उनके साथ मिलकर अमेरिका को ‘और बेहतर’ बनाने का संकल्प व्यक्त किया, लेकिन भारत के ट्रम्प को प्रधानमंत्री के रूप में आधे से ज्यादा कार्यकाल गुजार चुकने के बावजूद यह महसूस करने में असुविधा होती है कि वे सारे देश के हैं, उन लोगों के भी जिन्होंने चुनाव में उनका विरोध किया या उन्हें वोट नहीं दिया और उनके प्रति भी उनकी कोई जवाबदेही है।

वे अपनी जवाबदेही स्वीकार करते और विपक्ष को विश्वास में लेने के लोकतांत्रिक आदर्श की अवज्ञा किये बिना संवाद व समन्वयपूर्वक उसे हर फैसले में भागीदार बनाते तो न देश की सबसे पुरानी और प्रमुख विपक्षी पार्टी से उनका विमर्श जली-कटी या सास-बहू के स्तर तक गिरता और न उस देश से, जिसने उन्हें पूरे पांच साल के लिए अपना भविष्य सौंपा हुआ है, रूंधे गले से, लगभग आंसू टपकाते हुए, ‘सिर्फ 50 दिन’ मांगने पड़ते। 30 दिसंबर के बाद कोई गलती निकल जाए तो फांसी तक की सजा के लिए तैयार होने की बात भी तब उन्हें नहीं कहनी पड़ती।

लेकिन उनकी ‘विवशता’ देखिये : वे यह बात कहते हुए उसमें जोड़ते हैं कि यह मुद्दा अहंकार का नहीं है, तो लोगों को बरबस याद आने लगता है कि देश के वर्तमान हालात उनके दुर्निवार अहंकार के ही पैदा किये हुए हैं। फिर भी उनका अहंकार है कि उन्हें समझने नहीं देता कि जब वे देशवासियों से ‘सिर्फ पचास दिन’ मांग रहे हैं, उनकी बेरहम नोटबंदी ने रोज कुएं खोदने और पानी पीने वालों का एक-एक दिन दूभर कर रखा है। यही अहंकार उन्हें उनके किसी भी फैसले पर सवाल उठाने वाले किसी भी शख्स को लाक्षित करने तक ले जाता है। उनका चुपचाप यह देखते रहना भी उनके अहंकार की ही निशानी है कि उनके साथ उनकी पार्टी ने भी मान लिया है कि महज उसी के नेता, समर्थक और चंदा देने वाले ईमानदार हैं, महज उन्हीं द्वारा चुनाव में ‘ईमान की कमाई’ खर्च की जाती है और उन्हें छोड़ सभी विरोधी दल केवल कालेधन के सहारे चल रहे हैं। आप ही बताइये कि अहंकारियों को छोड़ और किसको ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हीं के जीवन में सब कुछ स्वच्छ या कि निर्मल है, और दूसरों में सब कुछ गंदा ही गंदा?

तिस पर हालात का विद्रूप ऐसा त्रासद है कि एक ओर प्रधानमंत्री की पार्टी यह सुख लूटने में मगन है कि उनके एक ही मास्टरस्ट्रोक ने कालेधन के अम्बार पर बैठे उसके विरोधियों को बरबाद कर दिया है तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री को अपनी बाबत बार-बार बताना पड़ रहा है कि उन्होंने देश के लिए अपना घर-परिवार छोड़ दिया है, वे कुर्सी के लिए नहीं पैदा हुए हैं और जिंदा जला दिये जाने पर भी डरने वाले नहीं हैं। काश, वे समझते कि प्रधानमंत्री के तौर पर यह अपने मुह मियां मिट्ठू बनने वाली आत्मविज्ञापक भाषा उन्हें शोभा नहीं देती और वे अपनी ‘देशसेवा’ बारे में ऐसा कोई संदेश देना चाहते हैं तो अपने आचरण से देना चाहिए, जुबानी जमा खर्च से नहीं। वे अपने आचरण से ऐसा कोई संदेश दे पाते तो उन्हें इस आत्मप्रशंसा की जरूरत ही नहीं पड़ती। देश का बच्चा बच्चा उनकी सराहना करता नजर आता। रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मेरो मोल?

लेकिन क्या किया जाये कि हमारे प्रधानमंत्री रोज-रोज सिर्फ और सिर्फ अपनी मर्जी के मुताबिक फैसले लेते और समस्याओं को हल करने के बजाय उनमें नये उलझाव पैदा करते रहते हैं। उनकी सरकार है कि न पूरी तैयारी से कदम उठाती है, न जनता को संभलने का मौका देती है और कोई उसे आईना दिखाने लगे तो सरकार से ज्यादा सरकारी पार्टी भुनभुनाने लग जाती है। उसे ऐसे सवालों से भी असुविधा होती है कि क्या यह वाकई लोकतांत्रिक तरीका है कि सरकार ने अन्य दलों को विश्वास में लिए बिना ही नोटबंदी कर दी? या जब देश में केवल पांच-छः प्रतिशत कालाधन ही नकदी में है और बाकी परिसम्पत्तियों, सोने व बाहरी बैंकों में तो सरकार नोटबंदी को कालाधन खात्मे का निर्णायक कदम कैसे कह रही है और बेचारे गरीबों से इसका खामियाजा क्यों भुगतवा़ रही है? क्यों सारे देश को लाइन में लगा दिया गया है, यहां तक कि प्रधानमंत्री की मां तक को और कोई अरब या खरबपति कतई लाइन में नहीं लगा है?

बेहतर हो कि प्रधानमंत्री अपनी भावुकता दिखाने के बजाय उस आम आदमी के आंसू देखें, जो रोज-रोज इसलिए लाइन में लग रहा है, ताकि कुछ पैसे निकालकर बेटी की शादी की व्यवस्था कर सके, उस मां के आंसू देखें जिसका नवजात बच्चा बिना इलाज के मर गया, क्योंकि डाक्टर ने पांच सौ का नोट लेने से इन्कार कर दिया, उस लड़की के आंसू देखें जिसकी चंद दिनों बाद शादी है और वह बैंक के बाहर खड़ी है, उस महिला के आंसू देखें, जो गाढ़ी कमाई के रुपये बदलवाने बैंक के आगे भीड़ में खड़ी थी और किसी जेबकतरे ने उसे ‘कंगाल’ कर दिया।
लेकिन वे तब तक ये आंसू नहीं देख सकते, जब तक बदले की ऐसी भावना से भरे हुए हैं कि जिस पार्टी को हराकर सत्ता में आये हैं, उससे कहते हैं कि उसमें सिर्फ चवन्नी बंद करने भर की ताकत थी और अब वह उनकी ताकत देखे और उसका लोहा माने। वे उसे यह कहकर चुप कराना चाहते हैं कि उसने चवन्नी बंद की थी तो हमने पूछा था क्या? उससे यह सवाल पूछते हुए वे भूल जाते हैं कि विपक्ष में रहने के दौरान उनकी पार्टी भी नोटबंदी को गरीबविरोधी बताती थी, तो समझा जा सकता है कि वास्तव में उनकी नीयत क्या है? ऐसा ही रहे तो कौन जाने, कल वे उससे यह भी कहें कि उसकी ताकत कम थी सो उसने देशवासियों को कम सताया, अब उनके पास ज्यादा है सो वे उन्हें उससे ज्यादा सताकर दिखा रहे हैं।

शायद वह समय आ गया है, जब प्रधानमंत्री को याद दिलाया जाना चाहिए कि देशवासियों ने उन्हें पुरानी स्थितियों को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने के लिए नहीं,ं बदलने के लिए सत्ता सौंपी थी। यह भी कि जैसे यह देश उस पार्टी का नहीं था, जिसे सत्ताच्युत करके वे सत्तासीन हुए हैं, वैसे ही उनका या उनकी पार्टी का भी नहीं है और जिनका है, वे नाराज हो जायें, तो उनका भी उसके जैसा हश्र करने पर उतर सकते हैं।

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