वित्त मंत्री श्री अरूण जेटली से चन्द सवाल

6:13 pm or November 30, 2016
demonetization

वित्त मंत्री श्री अरूण जेटली से चन्द सवाल

1000 और 500 रुपये मूल्य वर्ग के नोटों को बंद करके अर्थव्यवस्था को चरमरा देने के निर्णय के पीछे मजबूत आर्थिक कारण थे या फिर यह बाहरी विचारों से प्रेरित था?

फ्रांस की महारानी मेरी एन्टोनिटी द्वारा भूख से मर रही अपनी जनता को दी गई मूर्खतापूर्ण सलाह कि–‘‘यदि उनके पास रोटी नही है तो उन्हे केक खाना चाहिये।’’ इन दिनों भारत में नरेन्द्र मोदी को निशाना बनाते हुये सोशल मीडिया पर फिर से ट्रेंण्ड  कर रही है। प्रधानमंत्री की इस सलाह को कि–‘‘यदि लोगों के पास केश नही है तो वे कार्ड का उपयोग करें।’’ उनकी फोटो के साथ लिखकर उन्हे फ्रांस की महारानी की वेशभूषा में दिखाया जा रहा है।

जापान में अनिवासी भारतीयों के एक समूह को संबोधित करते हुये उन्होने कहा था कि भारत में 500 और 1000 रूपये के नोट बंद करने के बाद बड़े घोटालेबाज अब बैंकों के बाहर 4000 रूपये बदलने के लिये कतारों में खड़े हैं। हो सकता है कि प्रधानमंत्री की इस कड़वी और अरुचिकर बात ने ही सोशल मीडिया के इन मसखरों को ऐसा करने के लिये उकसाया हो। उन कतारों में मजबूरी में खड़ें बहुत सारे भारतीय प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी से खुश नही थे।

अर्थव्यवस्था में उथलपुथल पैदा कर देने वाला यह निर्णय संसद के शीतकालीन सत्र के प्रारंभ होने के मात्र एक सप्ताह पूर्व लिया गया, यह बात विशेषज्ञों और आम आदमी को भी समझ में नही आ रही है। क्या इस पागलपन में भी कोई व्यवस्था है और जो हम देख रहे है क्या इससे अच्छा कुछ और हो सकता था?

वित्त मंत्री अरुण जेटली की यह स्वीकारोक्ति कि गोपनीयता बनाये रखने की खातिर एटीएम मशीनों में नये नोटों के अनुरूप तकनीकी बदलाव नही किये गये, एक और प्रश्न उत्पन्न करती है। जब 2000 रूपये के नये करेंसी नोट जारी करने का फैसला कई महीनों पहले ले लिया गया था तो विमुद्रीकरण के फैसले के पहले इन ए.टी.एम. मशीनों को नई करेंसी के अनुरूप क्यों नही बनाया गया? क्या नये करेंसी नोट जारी करने के कुछ दिनों बाद जनवरी में विमुद्रीकरण करना अर्थव्यवस्था के लिये भारी नुकसानदायक था?

ऐसे अनेक सवाल आज भी अनुत्तरित है जबकि भारत के लोग नकद रूपयों के लिये संघर्ष कर रहे है।

विमुद्रीकरण के 12 दिन बाद भी जीवन सामान्य नही हुआ है और लोग संघर्षरत है। ट्रांसपोर्टर्स ने दूध, सब्जियां, फल और दवा की आपूर्ति रोकने की चेतावनी दी है। ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस ने दावा किया है कि 10 ट्रक वाले एक ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर को अपने दैनिक परिचालन खर्च के लिए 35,000 रुपये की आवश्यकता होती है। उन्होने चेतावनी दी है कि 24 नवंबर तक एक सप्ताह में 24,000 रुपये नकदी निकालने की सीमा तय करने से परिवहन व्यवसाय ठप हो सकता है। ऐसी ही चेतावनी जूट उद्योग और चाय बागानों से भी मिल रही है जहां मजदूरों को पाक्षिक या साप्ताहिक भुगतान नकद रूपयों में किया जाता है।

बैंकिंग हलकों में विमुद्रीकरण की सुगबुगाहट तब से थी, जब अप्रेल में स्टेट बैंक आॅफ इंडिया की चेयरमेन अरून्धती भट्टाचार्य ने सार्वजनिक रूप से ऐसी चर्चाओं को नगद निकासी में अभूतपूर्व वृद्धि होने का कारण बताया था। इकोनामिक टाइम्स को दिये गये एक साक्षात्कार में उन्होने यह कहा था कि स्टेट बैंक आफ इंडिया में पहली बार अग्रिम की तुलना में जमा राशि पिछड़ गई है।

मजेदार बात यह है कि सितंबर की तिमाही में बैंकों में जमा राशि में रहस्यमय वृद्धि हुई और स्थिति ने यू टर्न ले लिया। जेटली के समक्ष जब हाल ही में जब यह प्रश्न रखा गया तो उन्होने इसे महत्वहीन बताते हुये खारिज कर दिया तथा कहा कि इसका स्पष्टीकरण 7वें वेतन आयोग के तहत बकाया राशि के भुगतान में निहित है। जब वित्त मंत्री ने विमुद्रीकरण के बाद लोगों को आश्वस्त करने के लिये तीन दिनों में दो प्रेस कॉन्फ्रेंस की तो विमुद्रीकरण से संबन्धित ऐसे अनेक प्रश्न पैदा होते है जो लोगों के मन को उद्धेलित करते है।

कुछ सवाल जो विशेषज्ञों के साथ-साथ आम आदमी द्वारा पूछे जा रहे है, वे निम्नलिखित है:-

  1. क्या यह सच है कि सरकार, पुणे स्थित गैर सरकारी संगठन ‘‘अर्थक्रान्ति प्रतिष्ठान’’ से प्रभावित थी जिसे आरएसएस के करीब माना जाता है, और उसके प्रभाव में सरकार ने विशेषज्ञों की सलाह को नजरअंदाज कर दिया है?

यह संगठन बड़े मूल्य के करेंसी नोट का विमुद्रीकरण करने, आयकर को समाप्त करने, नकद लेनदेन को 2000 रूपये तक सीमित करने, और सभी प्रकार के लेनदेन को बैंक के माध्यम से करने को बढ़ावा देने की हिमायत करता रहा है। हालाकि विशेषज्ञों ने उसके ऐसे प्रस्ताव को यह कहते हुये खारिज कर दिया था कि नकदविहीन अर्थव्यवस्था की आशा करने से पूर्व देश को काफी लंबा रास्ता तय करना होगा। एन.जी.ओ. के इस दावे का अभी तक खण्डन नही किया गया है कि उसकी सलाह पर ही प्रधानमंत्री कार्यालय यह निर्णय लेने के लिये प्रेरित हुआ। क्या इसका मतलब यह है कि प्रधानमंत्री कार्यालय और वित्त मंत्रालय द्वारा एन.जी.ओ. के प्रस्तावों पर भी कार्ययोजनाएं बनाई जाती है?

  1. यह जल्दबाजी क्या बताती हैं?

रिपार्टों के अनुसार सिक्योरिटी प्रिंटर्स को नई करेंसी के प्रारंभ होने की उम्मीद नये साल के आसपास की थी। वे एक तय कार्यक्रम और सप्लाई चेन के अनुसार काम कर रहे थे जिसके बारे में रिजर्व बैंक आफ इंडिया और वित्त मंत्रालय के अधिकारियों को पता था। तार्किक रूप से जब तक व्यवस्था पूरी नही बन जाती, विमुद्रीकरण के लिये प्रतीक्षा की जानी चाहिये थी। किन्तु यह बहुत जल्दबाजी में और बगैर समुचित तैयारी के किया गया। ऐसी कौन सी बात थी जिसने सरकार को इतनी जल्दबाजी और हड़बड़ी में निर्णय लेने को प्रेरित किया?

  1. 2000 रुपये के करेंसी नोट जारी करने के निर्णय के पीछे क्या तर्क है? 

यदि यह तर्क दिया जाता है कि अधिक मूल्य के नोटों का उपयोग कालेधन को जमा करने के लिये किया जाता है और इसलिये 1000 रूपये मूल्य के नोट को वापस ले लिया गया, तो फिर 2000 रूपये का नोट जारी करने का निर्णय समझ में नही आता। आम आदमी प्रायः छोटे मूल्य के नोटों से ही अपना लेनदेन करता है, लेकिन 100 रुपये के नोटों की कमी है तो फिर 2000 का नोट कैसे और किसकी मदद करने जा रहा है?

  1. सरकार सोने की बिक्री पर नियंत्रण करने में क्यों असफल रही?

विमुद्रीकरण की घोषणा के तत्काल बाद, सोना खरीदने के लिए पागलों की तरह भीड़ उमड़ पड़ी। यह साफ जाहिर है कि जिन लोगों के पास काला धन था उन्होने इसके कुछ हिस्से को सोने में बदल लिया जिसके परिणामस्वरूप सोने की कीमतों में भारी उछाल आ गया। क्या सोने की बिक्री पर रोक लगाने के लिये सरकार ने कुछ किया है और इस पर नियंत्रण नही करने से लाभान्वित होने वाले कौन है?

  1. क्या सरकार चरमराती बैंकिंग व्यवस्था के बारे में सजग नहीं थी?

भारतीय बैंकिंग प्रणाली की कमियां वास्तव में सरकार से छिपी हुई नहीं हैं। अपेक्षाकृत अधिक विकसित तमिलनाडु जैसे राज्य में भी ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की पहुंच कम है। यहां  तक कि क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, सहकारी बैंक और डाकघर नकदी वितरण में सक्षम नही है और चिन्हित समय में ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना कार्यक्रम को लागू करने में सफल नही हुये है, ऐसे में सरकार बैंकिंग प्रणाली से कोर बैंकिंग सेवाओं, उपभोक्ताओं और पेंशनरों की कीमत पर इस असंभव कार्य करने की कैसे उम्मीद करती है?

  1. नए 2000 रुपये के करेंसी नोट की डिजाइन कैसे लीक हो गई थी?

सरकार खुद ही नए 2000 रुपये के करेंसी नोट की डिजाइन के उजागर होने के मामले में जांच के आदेश दे चुकी है, यह नोट इस साल सितंबर के बाद से सोशल मीडिया पर चल रहा था। सोशल मीडिया पर चल रहे 2000 रुपये के करेंसी नोट की तस्वीरों के अनुसार, डिजाइन को पहले अमीरों के बीच साझा किया गया था और उसके बाद अक्टूबर में इसके वायरल होने तक यह उसी वर्ग के बीच घूमती रही। इन नोटों के बंडल के फोटोग्राफ प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संबोधन से काफी पहले सोशल मीडिया पर चल रहे थे। इस बात पर कि ‘‘सत्तारूढ़ पार्टी के करीबी लोगों के कुछ वर्गों की पंहुच नये करेंसी नोट तक पहले से ही थी’’, विश्वास करने के कारण मौजूद है। वे कौन भारतीय है जिन्होने जून 2015 से मई 2016 के बीच 30 हजार करोड़ रूपये विदेशों में स्थानंतरित कर दिये?

  1. क्या एक गुजराती सांध्य दैनिक में प्रकाशित रिपोर्ट सिर्फ एक मजाक था?

इस साल 1 अप्रेल को राजकोट से प्रकाशित एक सांध्य समाचार पत्र ‘‘अकीला’’ की हेडलाइन्स में ‘‘500 और 1000 के करेंसी नोट को बंद करने का निर्णय’ शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। शीर्षक के ऊपर एक पट्टी में इसे ‘काले धन, भ्रष्टाचार, नकली मुद्रा और आतंकवाद की बुराई के खिलाफ एक ऐतिहासिक निर्णय’ के रूप में वर्णित किया गया था। प्रधानमंत्री द्वारा अपने संबोधन में अपने निर्णय का औचित्य साबित करने के लिए ठीक इन्ही शब्दों का प्रयोग किया।

अखबार के संपादक किरीट गंटारा ने यद्वपि ‘अंगे्रजी अखबार द टेलीग्राफ’ से कहा कि संभवतया वह एक ‘‘अप्रेल फूल’’ जोक था। उन्होने दावा किया कि इस रिपोर्ट को उन्होने स्वयं लिखा था और कहा कि यह महज एक संयोग ही है कि सात महीनों बाद ऐसा ही निर्णय प्रधानमंत्री द्वारा लिया गया। लेकिन, क्या स्वयं संपादक द्वारा लिखी गई कोई रिपोर्ट उस अखबार के पहले पन्ने पर पाठकों को चैंकाने या उनका मनोरंजन करने के लिये लिखी गई होगी? क्या विमुद्रीकरण के बारे में लोगों को पहले से ही सतर्क कर दिया गया था?

  1. भारतीय रिजर्व बैंक ने विदेशों में रकम भेजने की सीमा दो बार क्यों बढ़ाई?

वे कौन भारतीय है जिन्होने इकोनाॅमिक टाईम्स की रिपोर्ट के मुताबिक जून 2015 से मई 2016 के बीच 30 हजार करोड़ रूपये विदेशों में स्थानंतरित कर दिये? रिपोर्ट में आधिकारिक सूत्रों को उद्धृत करते हुये यह स्वीकार किया गया है कि विदेशों में धन स्थानांतरण में जून 2016 के बाद औसत 100 मिलियन डालर से बढ़कर 400 मिलियन डालर से अधिक का अप्रत्याशित उछाल आया है। यह राशि स्पष्टतया घरेलू बचत और निवेश के विरूद्ध विदेशी उपभोग के लिये देश से बाहर गई है।

भारतीय रिजर्व बैंक जिसने विदेशों में पैसा स्थानांतरित करने की सीमा जून 2014 में 75000 डालर से बढ़ाकर 125000 डालर की थी और इसके बाद जून 2015 में इसे बढ़ाकर 250000 डालर कर दिया थ। इन भारतीयों ने विदेशों में संपत्तियां खरीदने के लिये, विदेशों में शिक्षा के लिये, उपहार के रूप में, रखरखाव के लिये या फिर निवेश के लिये अपने धन को विदेशों में भेज दिया।

क्या इनके पास प्रधानमंत्री की निकट भविष्य में होने वाली सर्जिकल स्ट्राइक का कोई संकेत पहले से था?

नेशनल हेराल्ड ब्यूरो

 

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in