उच्च शिक्षा में सुधार की जरुरत

3:21 pm or July 14, 2014
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अरविंद जयतिलक-

शिक्षा व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की प्रगति के लिए आवश्यक है। कहा गया है कि सा विद्या वा विमुक्तए। यानी शिक्षा मुक्ति देती है। अंधेरे से उजाले की ओर ले जाती है। प्रकाशमान करती है। चेतना का संचार करती है। जागरुक बनाती है। समाज में व्याप्त अंधविश्वास, असमानता और गैर-बराबरी को दूर करती है। लेकिन यह तभी संभव होता है जब राज्य व्यवस्था इस दिशा में सकारात्मक पहल करती है। जब सबके लिए समुचित शिक्षा का बंदोबस्त करती है। लेकिन दुर्भाग्य है कि आजादी के छ: दशक बाद भी देश में शिक्षा की स्थिति दयनीय है। गौर करें तो उच्च शिक्षा का हाल और भी बुरा है। एक आंकड़े के मुताबिक 18 से 24 वर्ष के महज 12.4 फीसद विद्यार्थी ही विश्वविद्यालयों में प्रवेश पा रहें हैं। जबकि विश्व स्तर पर उच्च शिक्षा का औसत दर 23 फीसदी के आसपास है। विकसित देशों की बात करें तो यह दर 40 फीसदी से भी उपर है। अगर भविष्य में भारत को 30 फीसद का लक्ष्य हासिल करना है तो उसे आने वाले वर्षो में लगभग 800 विश्वविद्यालयों और 35000 कालेजों की जरुरत पूरी करनी होगी। फिलहाल देश में 480 विश्वविद्यालय और 22000 कालेज हैं। बावजूद इसके उच्च शिक्षा की सुलभता साकार नहीं हो पा रहा है। उच्च शिक्षण संस्थानों के समक्ष अध्यापकों की कमी और जरुरी संसाधनों का अभाव एक भीषण चुनौती है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के कुल पदों की संख्या 16,602 है। इनमें से 6,542 पद रिक्त हैं। इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ साइंस एजूकेशन एंड रिसर्च में कुल 518 पदों में 131 पद रिक्त हैं। इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ मैनेजमेंट में कुल 618 पदों में 111 पद रिक्त हैं। इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ टेक्नालाजी में शिक्षकों के कुल 5,092 पदों में 1,611 पद रिक्त हैं। इसी तरह इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ इफॉर्मेशन टेक्नालाजी में कुल स्वीकृत 224 पदों में से 104 पद रिक्त हैं। जबकि नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ टेक्नॉलाजी के कुल 4,291 पदों में 1,497 पद रिक्त हैं। मंत्रालय के आंकड़ों पर विश्वास करें तो राज्य विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के मंजूर पदों में 40 से 50 फीसदी पद रिक्त हैं। जी0 के0 चङ्ढा पे रिव्यू कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि हर विश्वविद्यालय में तकरीबन 45 फीसदी से लेकर 52 फीसद तक शिक्षकों के पद खाली हैं। इनमें 44.6 फीसदी पद प्रोफेसरों के हैं। यानी कुल स्वीकृत 2,469 पदों में से महज 1,367 पदों को ही भरा जा सका है। इसी तरह 51 फीसदी रीडर के पद और 52 फीसदी लेक्चरर के पद खाली हैं। एक आंकड़े के मुताबिक बिहार राज्य के सर्वश्रेष्ठ माने जाने वाले पटना विश्वविद्यालय में 48 फीसदी शिक्षकों के पद रिक्त हैं। वही मगध विश्वविद्यालय में 68 फीसदी शिक्षकों के सहारे काम चलाया जा रहा है। अगर लखनऊ विश्वविद्यालय की बात करें तो यहां शिक्षकों के 26 फीसदी पद रिक्त हैं। प्रोफेसर के 50 फीसदी से अधिक, रीडर के 29 फीसदी और प्रवक्ता के 21 फीसदी पद खाली हैं। इसी तरह गोरखपुर विश्वविद्यालय में शिक्षकों के 40 फीसदी, आगरा के डा0 भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में 46 फीसदी, मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में 38 फीसदी और बनारस के संपूर्णानंद विश्वविद्यालय में 40 फीसदी पद रिक्त हैं। तकरीबन हर राज्य के विश्वविद्यालयों की यही स्थिति है। दूसरी ओर हर साल विश्वविद्यालयों और कालेजों में छात्रों की संख्या लगातार बढ़ जा रही है। नामांकन समस्या बनता जा रहा है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि अगर विश्वविद्यालयों और कालेजों में छात्रों की संख्या बढ़ती रही और शिक्षकों के पद रिक्त रहे और उन्हें तत्काल नहीं भरा गया तो फिर पठन-पाठन कैसे संपादित होगा? भारत में उच्च शिक्षा की दुगर्ति की चर्चा विश्व स्तर पर होने लगी है। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 70 फीसदी वयस्क निरक्षर नौ देशों में रहते हैं। जिनमें सर्वाधिक 24.74 फीसदी भारत में हैं। उच्च शिक्षा के सन्दर्भ में भारत अभी भी विकसित देशों से काफी पीछे है। आज विकसित देश उच्च शिक्षा के लिए जहां कुल बजट का 6 से 7 फीसदी खर्च कर रहें हैं वही भारत अभी भी राष्ट्रीय आय का मात्र 0.42 फीसदी धन खर्च कर रहा है। जबकि ज्ञान आयोग द्वारा सुझाव दिया गया है कि शिक्षा पर व्यय को राष्ट्रीय आय के 1.5 फीसदी किया जाना चाहिए। अल्प बजट में उच्च शिक्षा के लक्ष्य को नहीं साधा जा सकता। उच्च शिक्षा का लाभ अधिक से अधिक छात्रों को मिले इसके लिए सरकार बैंकों से कर्ज की व्यवस्था की है। किंतु बैंकों की टेढ़ी कार्यप्रणाली के कारण छात्रों को इसका लाभ मिलता नहीं दिख रहा है। एक आंकड़े के अनुसार अभी तक सरकारी प्रचार-प्रसार के बावजूद भी 2 से 3 फीसदी छात्र ही शिक्षा ऋण प्राप्त करने में सफल हुए हैं। यह ऊंट के मुंह में जीरा है। सैम पैत्रोदा की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय ज्ञान आयोग द्वारा कहा गया है कि 18-24 आयु वर्ग की आबादी का सिर्फ 7 फीसदी भाग ही उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत है। जबकि दूसरी ओर आयोग ध्दारा 2015 तक छात्रों की संख्या दुगनी होने का अनुमान लगाया गया है। पिछले दिनों राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की रिपोर्ट में भी कुछ ऐसा ही कहा गया है। छात्रों की बढ़ती संख्या को देखते हुए आयोग ने सुझाव दिया है कि विश्वविद्यालयों की संख्या 1500 किया जाय। सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाना चाहिए। आयोग ने यह भी सुझाव दिया है कि विश्वविद्यालयों को संबध्द महाविद्यालयों की समस्या से मुक्ति दिलाने के लिए महाविद्यालयों को स्वायतता प्रदान किया जाय। आमतौर पर भारत में महाविद्यालयों की व्यवस्था विश्वविद्यालयों के विकास में रोड़ा माना जाता है। लेकिन विडंबना कहा जाएगा कि सरकार विश्वविद्यालयों की स्थापना के बजाय अधिकाधिक महाविद्यालयों को खोलने पर उतारु है। महाविद्यालयों की विश्वविद्यालयों पर बढ़ती निर्भरता अब उस पर अतिरिक्त बोझ साबित होने लगी है। कुकुरमुत्ते की तरह उग आये सरकारी मान्यता प्राप्त इन महाविद्यालयों में न तो प्रशिक्षित अध्यापक हैं और न ही प्रायोगिक कार्यो के लिए जरुरी संसाधन उपलब्ध है। एक आंकड़े के अनुसार आज 85 फीसदी इंजीनियरिंग और 40 फीसदी मेडिकल कालेजों पर सरकार का नियंत्रण न के बराबर है। सब निजी क्षेत्र के हैं। अगर वाकई में सरकार उच्च शिक्षा के प्रति गंभीर है तो उसे कुछ कड़वे फैसले लेने होगें। मसलन शिक्षकों के रिक्त पड़े पदों को भरना होगा। शिक्षा के व्यवसायीकरण पर लगाम कसनी होगी। जरुरत के हिसाब से विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों की संख्या बढ़ानी होगी। प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति के साथ-साथ तकनीकी संस्थाओं को जरुरी संसाधन उपलब्ध कराने होंगे। अन्यथा उच्च शिक्षा के लक्ष्य को हासिल करना दूर की कौड़ी साबित होगी।

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