मत-भिन्नता को मन-भिन्नता में बदलना, आज की राजनीति का घृणित स्वरुप

5:48 pm or December 2, 2016
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मत-भिन्नता को मन-भिन्नता में बदलना, आज की राजनीति का घृणित स्वरुप

—– योगेन्द्र सिंह परिहार ——

पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक एवं राजनैतिक क्षेत्र में कहीं न कहीं वैचारिक भिन्नता होती ही है और होना भी चाहिए क्योंकि विचारों के आदान-प्रदान से ही अच्छे विकल्प का रास्ता खुलता है। मेरे मन में हमेषा एक बात आती है कि एक परिवार के सदस्य जिस तरह से आपस में प्रेम और सद्भाव से रहते हैं वैसे ही देश के प्रत्येक नागरिक को भी आपस में मिलजुलकर एक परिवार की तरह रहना चाहिए, आखिर देश ही तो हमारा वास्तविक घर है। हमेषा से अनेकता में एकता हमारे देश की विषेषता रही है। ये वो देश है जहां मुस्लिम भाई दुर्गा के पंडालों को सजाते हैं और हिन्दू ताजिए सजाता है।

जब देश गुलाम था तब भी सभी ने मिलकर देश की आजादी की लड़ाई लड़ी। हिंदू, मुस्लिम, सिख व ईसाई सभी ने एक समान रुप से देश को आजादी दिलाने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों से लोहा लिया और जब देश आजाद हुआ तो आजाद भारत को सुदृढ़ और विकसित बनाने का सपना भी सभी ने एक साथ मिलकर देखा। यहां तक कि जब भारत का संविधान लिखा गया तब भी संविधान सभा में हर वर्ग, धर्म, संप्रदाय के लोगों ने सदस्य के रुप में अपने सुझाव दिये और सामूहिक प्रयासों के बल पर भारत का संविधान विष्व का सर्वश्रेष्ठ संविधान बना। जिस वक्त देश आजाद हुआ सिर्फ एक राजनैतिक पार्टी अस्तित्व में थी, जिसे स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई के लिए संगठित किया गया था इसलिए जब उस समय पहली सरकार कांग्रेस के नेतृत्व में बनी। फिर धीरे-धीरे वैचारिक भिन्नता बलवती होने लगी व नई-नई पार्टियों का गठन होने लगा और स्वस्थ लोकतंत्र की ये दरकार भी है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए विपक्षी पार्टियां होना जरुरी हैं क्योंकि एक पार्टी व एक ही मानसिकता के लोग हमेषा सरकार में होंगे तो ये कौन बतायेगा कि देश में क्या गलत हो रहा है। भारत जैसा विषाल देश जहां हर 50-100 किलो मीटर में क्षेत्रीय भाषा बदल जाती है, उत्तर भारत से दक्षिण भारत में भ्रमण करो तो लगता है किसी अन्य देश में आ गये हों, कई राज्यों की सीमाएं इतनी बड़ी कि उसमें 1-2 छोटे देश समा जाये, ऐसे देश को विकास की पटरी पर दौड़ाने के लिए सभी राजनैतिक पार्टियों ने दृढ़ इच्छाषक्ति से एक जुट होकर संगठित प्रयास करे और षनैः-षनैः देश हर क्षेत्र में आगे बढ़ता चला गया। देश के नव निर्माण में साक्षी रहे किसी भी दल के सदस्यों में आपस में कभी वैमनस्यता नही आई। कभी किसी राजनैतिक दल ने देश वासियों के बीच देश-प्रेम और देश-द्रोह जैसी लड़ाई को पनपने नही दिया ।

अब पिछले दो ढाई साल से देश में अजीब सा माहौल बना हुआ है जो पार्टी शासन में है वह विपक्षी पार्टी को देश का दुष्मन साबित करने पर तुली है। हर समय देशप्रेम और देशद्रोह की बातों को लाकर पूरे देश को गुमराह करने का वातावरण बनाया जा रहा है, जिसमें सबसे पुराने राजनैतिक दल को मजाक बनाने का घृणित प्रयास किया जा रहा है। जिस राजनैतिक दल के नेताओं ने अपना सर्वस्व देश की आजादी से लेकर देश के निर्माण में लगाया हो, जिस पार्टी के नेता आतंकवादियों के हमलों के षिकार हुए हों, उस पार्टी के खिलाफ नफरत का बीजारोपण करना कहां तक उचित हैघ् मैं ये नही कहता कि सिर्फ किसी एक दल के समर्थकों ने ही इस देश को आजादी दिलाई या सिर्फ उसी दल के नेताओं ने ही देश के आधारभूत ढांचे के निर्माण में अपनी भूमिका निभाई लेकिन जितना भी योगदान दिया, क्या वो नफरत करने लायक है |

आजकल सोषल मीडिया का इस्तेमाल करके सुबह-शाम  विपक्षी पार्टियों को अपषब्द कहना, उनके नेताओं को अपमानित करने के लिए उनका मजाक उड़ाना, जैसे फैषन सा बन गया है । लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन होती है और जनता ने एक पार्टी को दिल खोल कर बहुमत दिया है, अब सरकार काम करे और वो सब करके दिखाए जो उसे लगता है कि पिछले 60 सालों में नही हुआ। जनता ने विपक्षी पार्टियों को नकार कर बीजेपी को पूर्ण बहुमत दिया है अब डर किस बात का है। क्यूं सरकार के बयानों में सुबह-षाम प्रमुख विपक्षी दल का ही जिक्र होता है। हर रैली में ये कहना कि 60 सालों में देश में कुछ नही हुआ, सिर्फ लोगों ने लूट मचाई है, तो माननीय आपकी सरकार है आप जांच करो, सजा दो, जो चाहे करो लेकिन कम से कम नफरत तो मत फैलाओ। सोषल मीडिया में आज की पीढ़ी के बच्चे उन षख्स की बातों में आ रहे हैं जिनके जीवन का निर्माण इन्ही 60 सालों में हुआ और वे इतने सबल हो गये कि वे आज देश के प्रधान हो गये। मैं इन सभी युवाओं से पूछना चाहता हूं कि पिछले 60 सालों में यदि ज्यादातर एक ही पार्टी की सरकार रही तो वोट भी इन्ही युवाओं के पिता व दादा-परदादाओं ने दिया होगा और वे ना-समझ तो नही रहे होंगे ये तो तय है। किसी एक आदमी के कहने पर अपने ही देश में रहने वाले भाईयों को नफरत भरी निगाहों से देखना और चेटिंग के दौरान अपषब्द कहना सर्वथा अनुचित है। कल ही की बात है जब प्रमुख विपक्षी दल के बड़े नेता का वेरिफाईड ट्विटर एकाउन्ट हैक करके उसमें गंदी-गंदी गालियां लिखी गईं जो कि सिर्फ और सिर्फ संकुचित मानसिकता की परिचायक हैं। अरे भाई, लड़ाई लड़ना है तो विचारधारा की लड़ो, इस तरह नफरत फैलाना, स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण मात्र है। सोचिए एक ही देश के निवासी देश-द्रोही कैसे हो सकते हैंघ् आपसी मत-भिन्नता को इस तरह से मन-भिन्नता में बदलना, आज की राजनीती का घृणित स्वरुप है जो देश के लिए घातक है।

इस संदर्भ में मुझे बीजेपी के वयोवृद्ध नेता पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई जी का संसद में दिया वो बयान याद आता है जो आज भी प्रासंगिक है, जिसमें उन्होने कहा था कि देश आज संकटों से घिरा है जब-जब कभी आवष्यकता पड़ी, संकटों के निराकरण में हमने उस समय की सरकार की मदद की है उस समय की कांग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव जी ने भारत का पक्ष रखने के लिए मुझे विरोधी दल के नेता के नाते जिनेबा भेजा था और पाकिस्तानी मुझे देखकर चमत्कृत रह गए उन्होने कहा कि ये कहां से आये हैं क्योंकि उनके यहां विरोधी दल का नेता ऐसे राष्टीय कार्य में भी सहयोग देने के लिए तैयार नही होता, वो हर जगह सरकार को गिराने के काम में लगा रहता है। ये हमारी परंपरा नही है, ये हमारी प्रकृति नही है। मैं चाहता हूं कि परंपरा बनी रही, ये प्रकृति बनी रही। सत्ता का खेल तो चलेगा, सरकारे आयेंगी, जायेंगी, पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी मगर ये देश रहना चाहिए, इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए ।

 

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