मोदी सरकार का मॉन्यूमेंटल मिसमेनेजमेंट : पी. चिदम्बरम्

4:21 pm or December 6, 2016
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मोदी सरकार का मॉन्यूमेंटल मिसमेनेजमेंट

—– पी. चिदम्बरम् ——

ऐसा प्रतीत होता है कि मॉन्यूमेंटल मिसमेनेजमेंट या ‘‘अविस्मरणीय कुप्रबंधन’’ एन.डी.ए. सरकार की ‘‘सिग्नेचर ट्यून’’ बन जायेगी।

डॉक्टर मनमोहन सिंह कम बोलने वाले व्यक्ति है। वे धीरे बोलते है और इस बात के प्रति सावधान रहते है कि उनकी बात से कोई आहत न हो। ये मेरी नजर में एक नेता के सर्वोत्तम गुण है। किन्तु एक कोलाहलपूर्ण और कर्कष प्रजातंत्र में ये गुण कमजोरी समझे जाते है। हमारा लोकतंत्र जोर से बोलने की क्षमता को प्रोत्साहित करने में जरा कमजोर है। हमारे तर्क-वितर्क दुर्बल है क्योंकि तथ्य और तर्क झूँठ और वाक्पटुता द्वारा पराजित कर दिये जाते है।

डॉ. मनमोहन सिंह गुरूवार, 24 नवंबर 2016 को राज्यसभा में बोले। वे धीरे, रूक-रूककर और लगभग क्षमाशीलता के भाव से सदन की कार्यवाही मे हिस्सा लेते हुये बमुश्किल 7 मिनिट बोले! उन्होने कहा कि करेंसी नोट के विमुद्रीकरण के निर्णय के क्रियान्वयन में सरकार ‘‘अविस्मरणीय कुप्रबंधन’’ की दोषी है। प्रधानमंत्री सदन में उपस्थित थे किन्तु उन्होने सदन में न तो कोई स्पष्टीकरण दिया और न ही जवाब।

भले ही मीडिया का सरकार के प्रति कितना भी झुकाव हो (कुछ मीडिया हाउस तो बहुत अधिक पक्षपातपूर्ण और खुशामदी है), वे डॉ. मनमोहन सिंह की टिप्पणी को दिखाने को विवश हुये। अतएव ‘मॉन्युमेंटल मिसमेनेजमेंट’’ शब्द को टी.वी. पर बार-बार दिखाया गया और उसे सोशेल मीडिया तथा प्रिंट मीडिया में भी बार-बार दोहराया गया। ऐसा करके उन्होने लोगों के मन पर एक अमिट छाप छोड़ी।

सिग्नेचर ट्यून

ऐसा लगता है कि ‘‘मॉन्यूमेंटल मिसमेनेजमेंट’’ एन.डी.ए. सरकार की सिग्नेचर ट्यून होगी। जिस भी चुनौतीपूर्ण काम को वे प्रारंभ करते है, वह समाप्त होते-होते पहले से भी अधिक जटिल और खतरनाक हो जाता है। विमुद्रीकरण इसका ताजा उदाहरण है। जो इस निर्णय के बारे में बता रहे है और जो लोग इस काम में लगे हुये है उन दोनों को साथ रखकर देखने पर यह स्पष्ट है कि सिर्फ चार प्राधिकारियों को विश्वास में लिया गया और विमुद्रीकरण के कार्य को अंजाम देने का निश्चय किया गया। इनमें से किसी को भी मुद्रा के उत्पादन और प्रबंधन का समुचित ज्ञान नही है और इसीलिये निम्नलिखित गंभीर प्रश्नों को न तो पूछा गया और न ही इनका उत्तर दिया गया।

1. 8-9 नवंबर की मध्यरात्रि को बन्द किये गये कितने करेंसी नोट विधिमान्य मुद्रा नही रहेंगे? उत्तर- 2,300 करोड़ नोट।

2. सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की प्रिंटिंग प्रेस की क्षमता क्या है? उत्तर- 300 करोड़ नोट प्रतिमाह।

3. विमुद्रीकृत किये गये नोटों को नये नोटों से बदलने में कितना समय लगेगा? उत्तर- यह हम समान मूल्य के नोट से बदलें तो इसमें सात महीने लगेंगे। यदि हम 500 रूपये के नोट को 100 रूपये के नोट से बदलें तो इसमें पांच गुना समय अधिक लगेगा। यदि हम 2000 के नोट अधिक छापें, तो समय कम हो जायेगा।

अजीब निर्णय

4. क्या 2000 रूपये के नोट को लाने का कोई औचित्य है? उत्तर- बिलकुल नही। यदि भ्रष्टाचार और कालेधन की समस्या उच्च मूल्यवर्ग के नोट से पैदा होती है, और इसी वजह से 500 और 1000 के नोटों को बंद किया गया है तो फिर उच्च मूल्यवर्ग के नोट को जारी करने का अवश्य ही कोई कारण नही बनता।

5. क्या नये नोटों को ए.टी.एम. मशीनों द्वारा तुरन्त वितरित किया जा सकेगा? उत्तर- नही। ए.टी.एम. मशीनों में नये 2000 और 500 के नोट डालने और उन्हे निकालने के लिये उनमें फिर से तकनीकी बदलाव करने होंगे। 2,15,000 ए.टी.एम. में तकनीकी बदलाव में एक महीना या शायद इससे भी अधिक समय लगेगा।

6. तो फिर नये नोटों को शीघ्रता से कैसे वितरित किया जायेगा? उत्तर- बैंक शाखाओं और बैंक स्टाफ के सीमित होने के कारण नये नोटों को तत्काल वितरित नही किया जा सकेगा।

7. तो क्या फिर करेंसी की कमी आयेगी और यह कब तक रहेगी? उत्तर- करेंसी की भारी कमी रहेगी और यह लंबे समय तक चलेगी। ऊपर उल्लेखित सीमाओं के अतिरिक्त सर्वाधिक निर्णायक कारक बैंक शाखाओं और ए.टी.एम. का असमान वितरण है।

बैंक शाखाएं (कुल 1,38,626)
ऽ इनमे से दो तिहाई बैंक शाखाएं महानगरों, शहरी और अर्द्धशहरी क्षैत्रों में है।
ऽ सिर्फ एक तिहाई (47,443) शाखाएं ग्रामीण क्षैत्रों में है और अनेक गांवों से निकटतम शाखा की दूरी कई किलोमीटर तक हो सकती है।

ए.टी.एम. (2,15,000)

·  55,690 ए.टी.एम. सात महानगरों में स्थित है।
·  सभी ए.टी.एम. के कुल 90 प्रतिशत  ए.टी.एम.16 राज्यों में स्थित है।
·  सभी ए.टी.एम. के सिर्फ 10 प्रतिशत (21,810) 13 राज्यों और 7 केन्द्रशासित प्रदेशों में स्थित है।
·  उत्तर-पूर्व के सात राज्यों में सिर्फ 5,199 ए.टी.एम. है जिनमें से 3,645 असम में है।

अर्थव्यवस्था पर खर्च

विमुद्रीकरण के कारण इसका अर्थव्यवस्था पर कितना बोझ आयेगा? उत्तर- इसका काफी बोझ आयेगा। ऐसा माना जा रहा है कि इसके कारण सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) में एक प्रतिशत की कमी आ जायेगी। बजट दस्तावेजों के अनुसार 2016-17 के अंत में सकल घरेलू उत्पाद 150 लाख करोड़ रूपये होगा। इसका एक प्रतिशत 1.5 लाख करोड़ रूपये होगा।

भारतीय अर्थव्यवस्था निगरानी केन्द्र ने विमुद्रीकरण की लागत 8 नवंबर से 30 दिसंबर के मध्य 50 दिन की अवधि में 1,28,000 करोड़ रूपयेक होने का अनुमान लगाया हैः

·  आम जनता (कतार में लगने और लेनदेन पर): रू. 15,000 करोड़
·  सरकार और आर.बी.आई. (प्रिंटिंग): रू. 16,800 करोड़
·  व्यवसाय (व्यवसाय, बिक्री में घाटा): रू. 61,500 करोड़
·  बैंक (स्टाफ़ लागत): 35,100 करोड़

9. विमुद्रीकृत करेंसी में से कितनी करेंसी नोटों को बदलने अथवा जमा करने पर सिस्टम में वापस लौटेगी? उत्तर- विमुद्रीकृत नोट का कुल मूल्य 31 मार्च 2016 की स्थिति में 14,17,000 करोड़ रूपये था। यदि इनमें से 90 प्रतिशत मूल्य के नोट भी सिस्टम में आ जाये तो प्रभावकारी विमुद्रीकरण सिर्फ 1,40,000 करोड़ का होगा। इससे अधिक तो जी.डी.पी. का ही नुकसान हो जायेगा।

(27 नवंबर तक 8,44,982 करोड़ मूल्य के नोट बदले या जमा किये जा चुके थे। मुझे अपने सूत्रों ने बताया है कि रूपये 11,00,000 करोड़ विगत शुक्रवार तक जमा किये जा चुके है। यदि आगामी चार सप्ताह तक जमा करने की दर यही रही तो 90 प्रतिशत से अधिक विमुद्रीकृत नोट सिस्टम में आ सकते है!)

10. यदि लगभग सारे विमुद्रीकृत नोट पुनः सिस्टम में आ जाये तो फिर हमें यह सब क्यों करना चाहिये? उत्तर- क्योंकि कभी-कभी सरकार ऐसा करके अपना मन बहलाती है। भले ही फिर ‘‘खोदा पहाड़ और निकली चुहिया’’ वाली कहावत क्यों न चरितार्थ हो।

(लेखक पूर्व वित्त मंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता है।)

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