राजनीति में महिलाओं के अच्छे दिन कब आएंगे ?

3:28 pm or July 14, 2014
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डॉ. गीता गुप्त-

भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को लेकर लम्बे समय से बहस छिड़ी हुई है। राजनीति में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण की मांग अभी तक ठण्डे बस्ते में है और यह काफी विवादास्पद है। वर्ष 2010 में गोवा के मुख्यमंत्री दिगम्बर कामत ने कहा था कि ‘महिलाएं राजनीति से दर रहे तो बेहतर होगा क्योंकि राजनीति उन्हें पागल बना देगी। राजनीति का रास्ता कांटों भरा है, जिसे पार कर पाना मुश्किल है। उन्हें 33 प्रतिशत आरक्षण पर नहीं जाना चाहिए बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ी को देखना चाहिए।’ कामत के इस बयान से पुरुष वर्ग भले ही सहमत हो, पर स्त्री-जगत में इसकी बहुत आलोचना हुई है। और अब हाल ही में सेण्टर फॉर सोशल रिसर्च और यूनाइटेड नेशन्स द्वारा किया गया यह खुलासा सुर्खियों में है कि राजनीति में महिलाओं को कई तरह के अत्याचार सहने पड़ते हैं। उन्हें शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप् से प्रताड़ित किया जाता है। ‘वायलेंस अगेन्स्ट वूमन इन पॉलिटिक्स’ नामक इस अध्ययन में भारत, नेपाल और पाकिस्तान को शामिल किया गया है। इसमें बताया गया है कि उक्त देशों में राजनीति से जुड़ी महिलाएं राजनेता, मतदाता और एक नागरिक के तौर पर अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग नहीं कर पातीं। उन्हें कभी अपनों तो कभी पार्टी लीडरों के सामने झुकना पड़ता है।

जिन 750 महिलाओं पर यह अध्ययन किया गया, उसमें 80 प्रतिशत महिलाएं किसी न किसी रूप में राजनीति से संबध्द हैं। उनसे संवाद के बाद यह निष्कर्ष निकला कि शारीरिक-मानसिक शोषण के अलावा धमकियों और चरित्र हत्या जैसी अप्रिय स्थिति से जूझना उन स्त्रियों की नियति बन गई है। इस मामले में भारत की स्थिति पाकिस्तान और नेपाल से भी बदतर है क्योंकि वहां तो प्राय: चरित्र पर लांछन ही लगाया जाता है मगर भारत में स्त्रियां हिंसा का भी शिकार हो जाती हैं। शोध से स्पष्ट हुआ है कि कई बार नेताओं ने अपनी महिला साथियों को सरेआम थप्पड़ मारे और वरिष्ठ नेताओं के पैर छूने को कहा गया। यही नहीं, अपनी ही पार्टी के नेताओं द्वारा उन्हें धमकियां भी दी गई।

यहां कुछ स्त्रियों का नामोल्लेख प्रासंगिक है, जो सीधे तौर पर राजनीति में नहीं आयी मगर राजनेताओं से अंतरंगता और अपनी महत्वकांक्षाओं के कारण मौत का निवाला बनीं। उत्तर प्रदेश की मधुमिता शुक्ला ने मंत्री अमरमणि त्रिपाठी से प्रेम की पींगे बढ़ायीं और मारी गई। गुड़गांव की एयर होस्टेस गीतिका शर्मा ने इसलिए आत्महत्या कर ली कि हरियाणा के गृह राज्यमंत्री गोपाल काण्डा ने उसका श्शारीरिक एवं मानसिक शोषण्ा किया। राजस्थान की भंवरी देवी ने मंत्री मदेरणा से मैत्री की और जीवन से हाथ धो बैठी। हरियाणा के उपमुख्यमंत्री चन्द्रमोहन और असिस्टेण्ट एडवोकेट जनरल रह चुकी अनुराधा बाली का प्रेम-प्रसंग बहुत चर्चित रहा। दोनों ने धर्म बदलकर इस्लाम कबूल किया। चांद मोहम्मद और फिज़ा बनकर शादी की। फिजा ने शादी के बाद राजनीतिक महत्वकांक्षा की पूर्ति हेतु ‘फिजा-ए-हिन्द’ नामक पार्टी भी बनायी। मगर यह रिश्ता लम्बा नहीं चला। चन्द्रमोहन अपने घर लौट गए। कुछ समय बाद फिजा की सड़ी गली लाश मिली और इस कथा का अन्त हो गया। मगर राजनेता शशि थरूर की पत्नी सुनन्दा पुष्कर की मौत का रहस्य अब तक अनसुलझा है। चाहे राजनेताओं की निकटता प्राप्त कर रुतबा, ताकत, शोहरत पाने और राजनीतिक धरातल पर स्थापित होने की आकांक्षा को अथवा सीधे-सीधे राजनीति को जीवन का उद्देश्य बनाने की लालसा हो, दोनों ही स्त्रियों के लिए घातक सिध्द हो रहे हैं।

एक ताज़ा मामला गौरतलब है। तृणमूल सांसद तापस पाल ने पश्चिम बंगाल के नादिया जिले में अपने समर्थकों के बीच कहा कि ‘अगर सीपीआईएम कार्यकर्ता हमारे लोगों व औरतों को सताते हैं तो मैं उन्हें गोली मार दूंगा।….’ मैं अपने लोगों से कहूंगा कि अगर जरूरी हो तो जाओ और सीपीआईएम की महिलाओं के साथ रेप करो।’ एक मोबाइल फोन के वीडियो क्लिप में दर्ज तापस का यह बयान घोर निन्दनीय है। राजनीतिक स्पर्धा, दुर्भावना या प्रतिशोध का शिकार स्त्री ही क्यों न हो ? क्या इसलिए कि उस तक पहुंच आसान है ? आम जीवन में भी लोग स्त्री को ही लक्षित कर गाली-गलौज़ या अपशब्दों का उपयोग करते हैं। तो आख़िर स्त्री का सम्मान किस धरातल पर सुरक्षित है ?

लगभग सभी क्षेत्रों में सफलता के सोपान तय कर रही स्त्रियों से राजनीति का क्षेत्र अभी अछूता है। सत्ता में स्त्रियों की भागीदारी अब भी पुरुषों को स्वीकार नहीं इसलिए वर्तमान 543 सदस्यीय लोकसभा में केवल 62 यानी 11 प्रतिशत महिला सांसद हैं। संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भारत 21 प्रतिशत के वैश्विक औसत से काफी पीछे है। वर्ष 1996 से 33 प्रतिशत महिला-आरक्षण की बात करने वाले नेता जब अपनी ही पार्टी में इस इच्छा को अंजाम नहीं देते तब राष्ट्रीय स्वीकृति तो दूर की बात है। कहा जाता है कि राजनीति मे केवल चालाक और धूर्त लोग ही सफल हो सकते हैं। मौजूदा संसद में आपराधिक प्रकरणों में लिप्त 185 सांसद हैं, जिनमें 15 महिलाएं हैं। यह खुश होने की बात नहीं कि महिलाएं कम भ्रष्ट हैं। महाराष्ट्र के नासिक जिले के एक गांव में स्थानीय निकाय का चुनाव लड़ने के लिए एक महिला का अपने तीसरे बच्चे के जन्म की जानकारी छिपाना यही सिध्द करता है कि पद के लिए नेता कोई भी झूठ बोल सकते हैं। मगर हमें सोचना होगा कि राजनीति में भ्रष्ट महिलाओं का परिवार, समाज और देश पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? पंचायती राज और नगर निगम चुनाव में 50 प्रतिशत महिला-आरक्षण्ा के सकारात्मक परिणाम कहां-कहां और कितने प्रशित आए हैं ? मेरा मानना है कि अपनी शिक्षा, बुध्दि-विवेक, स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता, देश की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थितियों की समझ और कार्य करने की उत्कट अभिलाषा के बल पर ही स्त्रियां राजनीति में कोई उल्लेखनीय योगदान कर सकती हैं। क्योंकि राजनीति को समाज और देश के हित में कार्य करने की क्षमता से भरपूर प्रबुध्द जन चाहिए, न कि भेड़चाल और देश के हित में कार्य करने की क्षमता से भरपूर प्रबुध्द जन चाहिए, न कि भेड़चाल चलने वाले स्त्री-पुरुष। अपनी योग्यता के बल पर निर्वाचित महिलाएं ही देश-प्रदेश का सही प्रतिनिधित्व कर सकती हैं, आरक्षण की बैसाखी के आधार पर नहीं। आरक्षण देना तो उन्हें जबरदस्ती राजनीति के मैदान में धकेलना होगा।

आज राजनीति ग्लैमर, वर्चस्व, रौब, धनार्जन और जनाकर्षण का एक आसान माध्यम बन गई है। जबकि समूचे देश की आशाएं-आकांक्षाएं राजनेताओं पर टिकी होती हैं। राजनीतिक जीवन एक सार्वजनिक जीवन होता है, उसमें निजी इच्छाओं का महत्व नहीं होता। कोई राजनेता घर-परिवार और देश-दोनों के प्रति समान रूप से न्याय नहीं कर सकता। भारतीय परिवेश में महिलाएं नौकरी और पारिवारिक जीवन में आसानी से सन्तुलन नहीं बनाये रख पातीं क्योंकि उन्हें घर-परिवार का सहयोग आज भी नहीं मिलता। फिलहाल सोनिया गांधी, मेनका गांधी, प्रिया दत्त, मीरा कुमार, सुप्रिया सुले, वसुन्धरा राजे आदि जितनी भी महिलाएं राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय हैं, उन्हें यह विरासत में मिली है। वे सभी उन परिवारों से आती हैं, जहां स्त्री पर घरेलू उत्तरदायित्व नहीं है। वे चौबीसों घण्टे राजनीति में रमी रह सकती हैं। उनका जीवन पूरी तरह राजनीति को समर्पित है। मगर क्या राजनीति में अपना भविष्य संवारने की इच्छुक हर स्त्री को यह सहूलियत मिल पाएगी ? फिर राजनीति तो ‘फुल टाइम जॉब है,’ तो कितनी स्त्रियां अपने पारिवारिक जीवन और निजता का त्याग कर इस मैदान में कूदना चाहेंगी, जहां आग ही आग है ?

हमारा राजनीतिक पर्यावरण बुरी तरह दूषित हो चुका है। राजनेताओं में अनुशासन, संयम, शील, मर्यादा, विनय, सौहार्द्र और सहिष्णुता का घोर अभाव है। इसीलिए उनका आचरण अमर्यादित है और वे स्त्रियों के प्रति विनम्र व सदाशयी नहीं हैं। देश के प्रति सच्ची निष्ठा और समर्पण का भाव भी उनमें नहीं है, इसी कारण वे जनता का विश्वास खो रहे हैं। ऐसे में मुट्ठी भर प्रबुध्द स्त्रियां राजनीति में 33 प्रतिशत महिला-आरक्षण की मांग करके अपना सिक्का जमाने में भले ही कामयाब हो जाएं मगर आम औरतों की राह अब भी कांटों से भरी है। उन्हें अशिक्षा, अज्ञान, रूढ़ियों, हिंसा और आर्थिक असुरक्षा की त्रासदी से उबारे बिना राजनीतिक धरातल पर सही अर्थों में स्त्रियों की प्रतिभागिता सुनिश्चित नहीं हो सकती। खास तौर पर तब, जबकि राजनीति में स्त्रियों का शोषण निरन्तर उजागर हो रहा है, इस क्षेत्र के पर्यावरण की शुध्दि अनिवार्य है। अन्यथा गैर राजनीतिक परिवारों की स्त्रियां इस क्षेत्र में प्रवेश का साहस नहीं जुटा सकेंगी।

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