मुंबई में विविधता

3:15 pm or December 23, 2016
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मुंबई में विविधता

—– नेहा दाभाड़े —–

मुंबई की 19 वर्षीय छात्रा निकिता का कहना था कि ‘‘विभिन्न धर्म, अलग-अलग चीजें सिखाते हैं। उनके बीच मतभेद अपरिहार्य हैं और टकराव भी। विभिन्न धार्मिक समुदाय शांतिपूर्ण सहअस्तित्व में रह ही नहीं सकते।‘‘ यह राय निकिता ने 2 नवबंर को व्यक्त की, जब वे शहर के 14 अन्य विद्यार्थियों के साथ सेंटर फार स्टडी ऑफ सोसायटी एंड सेकुलरिज्म (सीएसएसएस) द्वारा आयोजित ‘‘डायवर्सिटी एक्पोजर केम्प‘‘ (विविधता परिचय शिविर) के अंतर्गत मुंबई की विविधता के अध्ययन के लिए 15 दिवसीय भ्रमण पर निकल  रही थीं।

 सीएसएसएस द्वारा युवाओं को मुंबई की सांस्कृतिक विविधता के विभिन्न पक्षों से परिचित करवाने के लिए यह शिविर आयोजित किया जाता है। इस साल यह शिविर 2 से 16 नवंबर तक आयोजित किया गया।

मुंबई को देश की व्यावसायिक राजधानी, सपनों का शहर, ग्लैमर की नगरी आदि नामों से जाना जाता है। मुंबई एक जीवंत और कभी न सोने वाला शहर है, जिसमें विभिन्न जातियों व धर्मों के और अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोग रहते हैं। इन लोगों के अलग-अलग खानपान, संगीत व साहित्य व विविध कामधंधे इस शहर को विविधताओं की नगरी भी बनाते हैं। यह शहर कई अलग-अलग संस्कृतियों का मिलन स्थल है। इसकी संस्कृति के निर्माण में यहां रहने वालों और बाहर से आकर यहां बसने वालों – दोनों का योगदान है।

इस कार्यक्रम के अंतर्गत विद्यार्थियों को ऐसे स्थानों पर ले जाया गया, जहां मुंबई में रहने वाले भी शायद ही कभी जाते हैं और उनमें से अधिकांश तो इन स्थानों के बारे में जानते तक नहीं हैं। मुंबई में ऐसे स्थानों का एक बड़ा खजाना है जो शहर की अचंभित कर देने वाली विविधिता और उसकी समृद्ध विरासत का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रतिदिन सुबह प्रतिष्ठित विद्वानों के साथ एक विचार गोष्ठी में भाग लेने के बाद, विद्यार्थी भ्रमण पर निकल पड़ते थे। जिन स्थानों पर विद्यार्थियों को ले जाया गया उनमें शामिल थे चोर बाजार, कोलीवाड़ा गुरूद्वारा, वसई के ईसाई व मछुआरा समुदायों की बस्तियां, तुरभे की मस्जिद और वहां के दलित व मुस्लिम रहवासियों का इलाका, मझगांव, मुम्बरा में स्थित राशिद कम्पाउड और धारावी व त्रिवेणी समाज विकास केन्द्र। इन स्थानों के भ्रमण से विद्यार्थियों को मुंबई की विविधता की एक झलक देखने को मिली।

चोर बाजार एक दिलचस्प इलाका है। इस व्यावसायिक केन्द्र में दोनों समुदायों के लोग एक दूसरे पर आर्थिक रूप से निर्भर हैं और उनके बीच के रिश्ते केवल और केवल व्यावसायिक हितों पर आधारित हैं। नल बाजार में जब विद्यार्थियों ने एक विक्रेता से हिन्दू और मुसलमान दुकानदारों के आपसी रिश्तों के बारे में पूछा तो उसका जवाब था, ‘‘धंधे में धरम कहां से आता है?‘‘ चोर बाजार बहुत बड़ा है और वहां की गलियों की भूल-भुल्लैया में कोई भी खो सकता है। दो विद्यार्थियों के साथ ऐसा ही हुआ और उन्हें एक रिक्षे में बैठकर बीस मिनिट तक अपने साथियों की तलाश करनी पड़ी। जहां कुछ विद्यार्थी बोहरी मोहल्ला के शोर-शराबे को देखकर अचंभित थे वहीं अन्य, एक ऐसे इलाके में, जहां सिर्फ मुसलमान रहते हैं स्वयं को असहज महसूस कर रहे थे। बाद में उन्होंने यह स्वीकार किया कि इसका कारण मुसलमानों के बारे में वे पूर्वाग्रह हैं, जो उनके मन में बैठे हुए थे। कुछ विद्यार्थियों ने मोहल्ले के प्रसिद्ध चिकिन शावरमा और तरबूज के ठंडे मिल्कशेक का आनंद भी लिया।

सभी विद्यार्थी गुरूद्वारे को देखने के लिए बहुत उत्सुक थे। गुरूद्वारे में घुसते ही गर्मागर्म खाने की खुशबू ने उन्हें लंगर की ओर खींच लिया, जहां उन्होंने भरपेट भोजन किया। विद्यार्थियों ने गुरूद्वारे में आए श्रद्धालुओं से बातचीत की और ग्रंथों ने उन्हें वहां होने वाले दैनिक धार्मिक अनुठानों के बारे में बताया और सिक्ख धर्म की शिक्षाओं के बारे में भी, जो हिन्दू धर्म और इस्लाम दोनों के कुछ सिद्धांतों पर आधारित हैं। यह सुनकर विद्यार्थी चकित रह गए कि हर शाम गुरूद्वारे के गुरूग्रंथ साहिब ऊपर स्थित एक वातानुकूलित कमरे में रखा जाता है और सुबह, फिर गुरूद्वारे में लाया जाता है। जहां गुरूद्वारे में विद्यार्थियों को सिक्ख समुदाय के सदस्यों से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ वहीं वसई की यात्रा उनके लिए एक अलग ही अनुभव थी, जहां वे ईसाई और मछुआरा समुदायों के सदस्यों से मिले। वसई, विविधता का मूर्तरूप है। इस क्षेत्र पर शोध कर रहे एक अध्येता ने इस विविधता का एक उदाहरण विद्यार्थियों को दिया। उन्होंने बताया कि इस इलाके के ईसाई लेखकों, जिनमें ध्यानोबा-तुकाराम पुरस्कार विजेता फादर फ्रांसिस डी ब्रिटो शामिल हैं, ने मराठी साहित्य को समृद्ध करने में अभूतपूर्व योगदान दिया है। फ़्रांसिस डी ब्रिटो एक प्रमुख मराठी लेखक हैं। यह जानकारी विद्यार्थियों को अचंभित करने वाली थी क्योंकि वे सामान्यतः ईसाई समुदाय को पश्चिमी संस्कृति में रचाबसा एक ऐसा समूह मानते थे, जिसके सदस्य पश्चिमी पोशाकें पहनते हैं और अंग्रेजी बोलते हैं। उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि एक ईसाई शादी में महिलाएं मराठी शादियों की तरह पारंपरिक रेशमी साड़ियां पहने हुई थीं। एक विद्यार्थी ने कहा, ‘‘मैं हमेशा सोचता था कि ईसाईयों की शादियों में मेहमान तंग पश्चिमी परिधान पहनते हैं पर यहां तो महिलाएं बालों में गजरा तक लगाए हुए हैं।‘‘ उन्हें यह बताया गया कि ईसाई समुदाय एकसार नहीं है और इसमें कई पंथ हैं। विद्यार्थियों को यह समझ आया कि धार्मिक पहचान कोई कठोर अवधारणा नहीं है और कई बार एक ही धर्म के लोगों का जुड़ाव अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों से हो सकता है। जो परिवार इस समूह की मेजबानी कर रहा था, उसने विद्यार्थियों को गांव में लगने वाले मेलों के बारे में बताया, जिनमें हिन्दू और ईसाई मछुआरे एकसाथ भागीदारी करते हैं। विद्यार्थियों ने उस परिवार के बुजुर्ग माता-पिता के साथ फोटो भी खींची, जो अपने पारंपरिक परिधान में बहुत आकर्षक लग रहे थे।

हमारे समाज में धार्मिक और भाषाई विविधता तो है ही, लैंगिक विविधता भी है। विद्यार्थियों को यह बात त्रिवेणी समाज विकास केन्द्र की उनकी यात्रा के दौरान समझ मे आई। यहां रहने वाले तीसरे लिंग के लोगों ने उन्हें बताया कि किस तरह उन्हें हिंसा और दमन का सामना करना पड़ता है और इसका कारण है उनसे भेदभाव करने वाले कानून और समाज में उनके संबंध में फैली मिथ्या धारणाएं। विद्यार्थियों ने उनसे कई प्रश्न भी पूछे। इनमें शामिल था कि क्या एक बार ‘‘घराने‘‘ में आ जाने के बाद उन्हें अपने घरों में वापिस जाने की इजाजत नहीं होती और यह भी कि क्या वे बच्चों का अपहरण कर उन्हें जबरदस्ती किन्नर बना देते हैं।

संस्था के सदस्यों ने उन्हें बताया कि पहले किन्नरों को उनके घरों में वापिस जाने नहीं दिया जाता था क्योंकि वहां उनके साथ हिंसा और दुर्व्यवहार होता था। ‘‘हमारी कई बहनें एक बार अपने घर गईं तो लौटकर ही नहीं आईं और अंततः गुरूओं ने यह तय किया कि किसी को उसके घर जाने नहीं दिया जाएगा। परंतु अब हालात बदल गए हैं। अब हम कभी-कभार अपने घर जाते रहते हैं परंतु वहां हमें उसी लिंग के व्यक्ति के रूप में आचरण करना पड़ता है, जिसे हमारे बचपन में हमारे माता-पिता ने हमें दिया था। वहां हम किन्नरों की तरह नहीं रह सकते। जहां तक बच्चों का अपहरण कर उन्हें किन्नर बनाने का सवाल है, ये आरोप हम पर लंबे समय से लगते रहे हैं। यह हो सकता है कि कुछ किन्नर बच्चों का अपहरण करते हों परंतु इसके लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना ठीक नहीं है।‘‘

इस यात्रा के बाद एक विद्यार्थी की टिप्पणी थी ‘‘मैं किन्नरों को घृणा और तिरस्कार की दृष्टि से देखती थी। उनसे मुलाकात के बाद मुझे यह अहसास हुआ कि वे भी हमारे और आपकी तरह मनुष्य हैं।‘‘

मुंबई विभिन्न समुदायों, उनकी संस्कृतियों और परंपराओं का मोजेक है। बहुत कम लोग यह जानते हैं कि मुंबई में एक चीनी आराधना स्थल है जो क्वान कुंग मंदिर कहलाता है। नब्बे साल से भी अधिक पुराना यह मंदिर, मझगांव या जिसे मुंबई का चायना टाउन कहा जाता है, में है। इस इलाके में सी युप कून नामक एक चीनी समुदाय रहता है। इस समुदाय के सदस्य दक्षिणी चीन से ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए व्यापारियों और नाविकों के रूप में काम करने के लिए आए थे। समूह को बताया गया कि यहां रहने वाले चीनी अपनी पारंपरिक पोशाक पहनते हैं और यहां कई ऐसे छोटे-छोटे रेस्त्रां हैं जिनमें चीनी व्यंजन परोसे जाते हैं। सन 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद, समुदाय के अधिकांश सदस्य चीन लौट गए परंतु कई ने भारत में ही रहना स्वीकार किया। यह मंदिर यहां रह रहे चीनियों का आराधना स्थल है और मुंबई का एकमात्र चीनी पवित्र स्थल है। इस आराधना स्थल की यात्रा, विद्यार्थियों के लिए एक अनोखा अनुभव थी। उन्हें लगा कि मानो वे किसी दूसरी दुनिया में पहुंच गए हों। छत पर हस्तलिपि में चीनी भाषा में बहुत सुंदर अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था और पूजा की बेदी के पास चीनी युद्ध देवताओं की छोटी-छोटी मूर्तियां रखी हुईं थीं। इलाके में रहने वाले सभी चीनी हर रविवार की सुबह यहां एकत्रित होते हैं और यहां चीनी नया साल जोरशोर से मनाया जाता है। श्रद्धालुओं को चाकलेट बांटी जाती हैं। विद्यार्थियों को यह सब अत्यंत चित्ताकर्षक लगा। जिस चीज ने उनका ध्यान आकर्षित किया वह यह थी कि जहां पूरा मंदिर चीनी संस्कृति में रचा बसा था वहीं अंदर की एक सीढी पर रंगोली के स्टिकर चिपके हुए थे, जो कि सामान्यतः हिन्दू मंदिरों में देखे जाते हैं।

मझगांव में कई और अंचभित करने वाली चीजें विद्यार्थियों का इंतजार कर रही थीं। मझगांव के सामाजिक-सांस्कृतिक तानेबाने पर समुद्र और बंदरगाहों का गहरा प्रभाव है। यहां कुड या क्लब की व्यवस्था है जो 150 साल पुराने हैं। मझगांव के आसपास बड़ी संख्या में कुड हैं। इन कुडों में रहने के लिए छात्रावासों जैसी व्यवस्था है। हर कुड का नाम गोवा के एक गांव के नाम पर रखा गया है और वहां उस गांव के ईसाई कैथोलिक पुरूष ही रूक सकते हैं। उन्हें केवल 50 रूपये प्रतिमाह किराया देना होता है। हर कुड में रसोईघर है जहां वहां रहनेवाले मिलकर भोजन पका सकते हैं। कुड की सदस्यता विरासत में प्राप्त होती है, अर्थात वे ही लोग किसी कुड के सदस्य बन सकते हैं जिनके पूर्वज उसके सदस्य रहे हों। पहले बंदरगाहों पर काम करने के लिए लोग बाहर से आकर इन कुडों में रूका करते थे परंतु अब गोवा से आकर मुंबई में निजी कंपनियों में काम करने और यहां व्यापार-व्यवसाय करने वाले लोग भी इन कुडों में रूकते हैं। जब समूह के एक सदस्य ने कुड में रह रहे एक व्यक्ति से यह जानना चाहा कि जो लोग मंहगे होटलों का खर्च उठा सकते हैं वे भी कुड में क्यों रहते हैं तो उसका जवाब था कि कुड केवल रहने के स्थान नहीं हैं वे सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन के केन्द्र भी हैं।

मुंबई का डोंगरी इलाका हाल में गेंगवारों के कारण चर्चा में था। डोंगरी को एक ऐसा इलाका माना जाता है जहां मुसलमानों का बहुमत है, भीड़ भरी संकरी गलियां हैं और छोटे-छोटे कामधंधे हैं। परंतु मुंबई के अंधेरे पक्ष के रूप में पहंचाने जाने वाले इस इलाके में कई ऐसे नायाब मोती हैं, जिनके बारे में बहुत लोग नहीं जानते। इनमें से एक है मुगल मस्जिद। यह नीले पत्थरों से बनी एक शानदार इमारत है। इन नीले पत्थरों पर बहुत बारीक डिजाइनें बनी हुई हैं और इनकी चमक आंखों को चैंधिया देने वाली है। मस्जिद के आलीशान दरवाजे से अंदर घुसते ही हमें दर्शन होते हैं एक बहुत बड़े क्षेत्र में फैले हरे घास के लान के, जिसके बीच में एक सुंदर कुंड बना हुआ है। मस्जिद के बाहर जहां शोर-शराबा और अफरातफरी है वहीं अंदर शांति का साम्राज्य है। इस 150 साल पुरानी इमारत का इतिहास बहुत दिलचस्प है। एक समय ईरान और उसके आसपास के इलाके से बड़ी संख्या में व्यापारी मुंबई आया करते थे। इन्हीं व्यापारियों ने इस मस्जिद का निर्माण करवाया था। इस मस्जिद की एक विशेषता यह है कि इसमें कोई गुंबद नहीं है, केवल मीनारें हैं। इससे यह पता चलता है कि मस्जिदों की वास्तुकला में कितनी विविधिता है। यह मस्जिद ईरान की शिराजी वास्तुकला पर आधारित है।

इसके बाद हम लोग डोंगरी के एकमात्र हमाम में पहुंचे जो इमामबाड़ा में स्थित है। हमाम एक सार्वजनिक स्नानागार है। यह हमाम केवल पुरूषों के लिए है जहां रूपये 100 के बदले एक पहलवान आपकी जमकर मालिश करता है जिसके बाद आप भाप स्नान कर सकते हैं। यह स्नान आपको एकदम तरोताजा बना देता है। इस हमाम का निर्माण ईरानियें ने करवाया था और यह उनकी संस्कृति की याद दिलाता है।

डोंगरी की यात्रा ने विद्यार्थियों का परिचय मुंबई की समृद्ध उर्दू परंपरा से और वहां की शाही संस्कृति से करवाया। यहां का वजीर रेस्त्ररां जो अब शालीमार होटल कहलाता है, उर्दू कवियों और फिल्म निर्माताओं का अड्डा था जहां वे हर शाम इकटठे होते और अपनी कविताएं और अन्य रचनाएं सुनते-सुनाते थे। उन्हें वह सड़क भी दिखाई गई जिस पर बने एक मकान में उर्दू के प्रतिष्ठित लेखक सआदत अली हसन मंटों कुछ वर्षों तक रहे थे।

पन्द्रह दिनों की इस यात्रा ने विद्यार्थियों को उनके शहर के बारे में बेहतर समझ विकसित करने में मदद की और उनके कई नए मित्र भी बने। विद्यार्थी यह देखकर चकित थे कि मुंबई की सांस्कृतिक विविधता कितनी समृद्ध है और कैसे वह सदियों से जिंदा बनी हुई है। निकिता अब समझ गई है कि विभिन्न धर्मों के लोग कैसे एकसाथ मिलजुलकर रह सकते हैं। उन्हें विविधतापूर्ण किंतु समावेशी संस्कृति की डोर एक-दूसरे से बांधे रहती है

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