एक दिवस मतदाता-जागरूकता के नाम

2:13 pm or January 19, 2017
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एक दिवस मतदाता-जागरूकता के नाम

—– डॉ0गीता गुप्त ——

लोकतान्त्रिक प्रणाली में मतदान का बहुत महत्त्व है. इसके माध्यम से जनता शासन-व्यवस्था में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकती है लेकिन भारत में यह अनिवार्य नहीं है. लोकतन्त्र की सुदृढ़ता हेतु आदर्श यही है कि प्रत्येक वयस्क नागरिक चुनावों में मतदान करे.परन्तु विडम्बना यह है कि मतदान के औसत में निरन्तर कमी आ रही है. मतदान न करने वालों में अधिकतर संख्या पढ़े-लिखे और शिक्षित लोगों, वह भी अधिकारी-कर्मचारी और विद्यार्थी या युवा वर्ग की है. मतदान के दिन सार्वजानिक अवकाश होने के बावजूद शासकीय सेवक सौ फ़ीसदी तो दूर, पचास फ़ीसदी भी मतदान नहीं करते. इसी तरह शिक्षा-संस्थानों में अवकाश के बावजूद विद्यार्थी और युवा वर्ग भी मतदान की अपेक्षा पिकनिक या मनोरंजन में समय का उपयोग करते हैं. इस प्रवृत्ति पर विराम लगाना आवश्यक है. मतदान के प्रति उदासीनता इतनी बढ़ती चली गई है कि निर्वाचन आयोग के लिए भी यह चिंता का विषय बन चुकी है.

अस्तु, कुछ वर्ष पूर्व केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल की बैठक में २५ जनवरी को मतदाता –दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव रखा गया, जिसे विधि मन्त्रालय ने स्वीकृति दे दी. चूंकि सन १९५० में भारतीय संविधान लागू होने से पहले २५ जनवरी को ही चुनाव आयोग का गठन किया गया था अतएव चुनाव आयोग की ६१वीं वर्षगाँठ पर इसी तिथि को ‘राष्ट्रीय मतदाता दिवस’ के रूप में स्वीकार कर लिया गया. देशवासियों में मतदान को लेकर जागरूकता बढ़ाने हेतु सरकार युद्ध स्तर पर प्रयत्नशील है. हालाँकि मतदाताओं में जागरूकता के अभाव की बात आज गले के नीचे नहीं उतरती क्योंकि अब ग्रामीण मतदाता भी इतने सजग हो चले हैं कि कई गाँवों के लोग सामूहिक निर्णय लेकर मतदान का बहिष्कार करके सरकार के प्रति अपना विरोध दर्ज करवा रहे हैं. तो प्रश्न यह है कि ६८ बरस पुरानी हो चुकी लोकतान्त्रिक पद्धति के बावजूद मतदाताओं को जागरूक करने के लिए अलग से जागरूकता दिवस मनाने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? और क्या सिर्फ़ ‘राष्ट्रीय मतदाता दिवस’ मनाने से ही मतदाता जागरूक हो जाएँगे? और यह भी कि क्या शत-प्रतिशत अथवा अधिकाधिक मतदान होने से देश की वे सारी समस्याएँ हल हो जाएँगी जिन्हें राजनीतिक भ्रष्टाचार अथवा भ्रष्ट राजनीतिक तन्त्र ने जन्म दिया है?

उल्लेखनीय है कि कई देशों में मतदाताओं के लिए मत देना अथवा मतदान-स्थल पर उपस्थित होना अनिवार्य है. यदि मतदाता ऐसा नहीं करता तो उसे ज़ुर्माना देना पड़ता है अथवा सामुदायिक सेवा करनी पड़ती है. ज़ुर्माना या सामुदायिक सेवा न देने पर क़ैद भी हो सकती है. बेल्ज़ियम में मत न देने पर ज़ुर्माना भरना पड़ता है. लगातार चार चुनाव में मतदान न करने पर मताधिकार छीन लिया जाता है और मत न देने वालों को नौकरी मिलने में कठिनाई होती है. आस्ट्रेलिया में मतदान-स्थल पर उपस्थिति आवश्यक है. वहाँ पहुँचकर भले ही सभी उम्मीदवारों को खारिज़ कर बिना मत दिए लौटा जा सकता है. मगर उपस्थित न होने पर बीस से पचास डॉलर ज़ुर्माना भरना पड़ता है, ज़ुर्माना न देने पर क़ैद की सज़ा होती है. बोलीविया में मत देने पर एक कार्ड मिलता है. चुनाव के बाद तीन माह तक यदि मतदाता अपना कार्ड नहीं दिखाता तो बैंक से वेतन निकालने पर रोक लगाई जा सकती है. यूनान में मत न देने पर नया पासपोर्ट या ड्रायविंग लायसेन्स प्राप्त करना कठिन हो जाता है. इटली में बच्चों के पालन-पोषण के लिए जगह हासिल करने में कठिनाई होती है. सिंगापुर में मतदाता-सूची से नाम काटा जा सकता है,जिसे पुनः जुड़वाना आसान नहीं होता. पेरू में मतदान के बाद कुछ दिनों तक सुविधाओं की प्राप्ति हेतु वोटिंग स्टाम्प लेकर चलना पड़ता है.

जिन देशों में मतदान अनिवार्य है, वे हैं- अर्जेन्टीना, आस्ट्रिया, स्विट्ज़रलैंड, इटली, तुर्की, आस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, बेल्ज़ियम, चिली, कांगो, इक्वेडोर, फिजी, पेरू, सिंगापुर, थाइलैंड, फिलीपीन्स,मैक्सिको,उरुग्वे, दक्षिण अफ्रीका, बोलीविया और मिस्र. इनमें से कई देशों में १६ से १८ वर्ष की उम्र और ७० वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए छूट का प्रावधान है. मिस्र में केवल पुरुषों के लिए मतदान अनिवार्य है. नीदरलैंड में १९६७ के बाद मतदान की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई. इसके बाद वहाँ मतदान में बीस फ़ीसदी कमी आई. इसी तरह १९९३ में वेनेजुएला में अनिवार्य मतदान समाप्त होने के बाद मतदान में 30% कमी आ गई.

भारत में भी मतदान अनिवार्य बनाने के लिए सन २००५ में भारतीय जनता पार्टी के बचीसिंह रावत न निजी विधेयक पेश किया था, जिसे पूरी तरह खारिज़ कर दिया गया था.अप्रैल २००९ में इसी सन्दर्भ में महाराष्ट्र के एक मतदाता अतुल सरोदे की याचिका उच्चतम न्यायालय न खारिज़ कर दी और कहा कि लोगksa dks +कानून के ज़रिए मतदान-स्थल तक नहीं लाया जा सकता. दिसम्बर २००९ में जब गुजरात-सरकार न मतदान को अनिवार्य घोषित करने के इरादे से एक विधेयक पारित किया तो अन्य राज्यों में उसका व्यापक विरोध हुआ. यद्यपि मतदान की अनिवार्यता सरकार में जनसंख्या के बहुत बड़े भाग का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कर सकती है; परन्तु इस विचार से इत्तफ़ाक़ न रखने वालों का कहना है कि मतदान नागरिक-कत्र्तव्य की बजाय अधिकार का मामला अधिक है। अतः इसके उपयोग का निर्णय मतदाता की इच्छा पर छोड़ा जाना उचित है।

वर्ष 1950 में भारत का संविधान लागू होते ही 21 वर्ष तथा उससे अधिक उम्र के नागरिकों को मतदान का अधिकार प्राप्त हुआ। बाद मंे वर्ष 1988 में इकसठवें संविधान-संशोधन द्वारा मताधिकार हेतु 18 वर्ष की आयु सीमा निर्धारित की गई ताकि अधिकाधिक लोग शासन-व्यवस्था में भागीदारी कर सकें। लेकिन यहाँ आम चुनावों में मतदाताओं की संख्या बढ़ने की बजाय निरन्तर घट रही है। लगभग इकतालीस प्रतिशत लोग मताधिकार का उपयोग नहीं करते। अधिकार के प्रति उनके मन में स्वेच्छाचार का भाव उपजता है कि वे अपने अधिकार का उपयोग करें, चाहे न करें। नेशनल इलेक्शन स्टडीज़ की एक रपट के अनुसार, मतदान न करने वालों में अमीर-ग़रीब और सभी वर्गों के लोग शामिल हैं। इनमें सर्वाधिक संख्या महिलाओं, निरक्षरों, युवाओं और शहरी लोगों की है। यह लोकतान्त्रिक व्यवस्था की बहुत बड़ी ख़ामी है कि कहने को तो अब्राहम लिंकन के शब्दों में-‘प्रजातन्त्र जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा शासन है;‘ परन्तु इसमें सचमुच जनता की भागीदारी कहाँ है? कुल तीस-चालीस फ़ीसदी मतदान होने पर भी, इतने कम मतों में से भी सर्वाधिक (बहुमत) मत संख्या वाले दल की सरकार बन जाती है। तो यह जनता का तन्त्र कैसे हुआ, जबकि समूची जनता अपने मताधिकार का अनिवार्यतः उपयोग नहीं करती?

भारत जैसे देश में निष्पक्ष चुनाव करवाना ही एक चुनौती है तो अनिवार्य मतदान कैसे सम्भव होगा? अलबत्ता, मतदान को संविधान के अनुच्छेद 51 ए में मूल कर्तव्यों की सूची में सम्मिलित कर लिया जाए तो मतदाता देश के प्रति अपने इस कर्तव्य के पालन हेतु अवश्य प्रेरित होगा। अनिवार्य मतदान को व्यावहारिक रूप देना भारत में अत्यन्त कठिन है। ज़ुर्माना वसूलना अथवा अन्य प्रकार से दण्ड देना भी एक बड़ी क़वायद होगी, जिसमें बहुत धन और श्रम व्यय होगा। इसलिए ऐसे उपाय किये जाने चाहिए जिनसे मतदान में वृद्धि सुनिश्चित हो। जैसेकि मतदाताओं को मतदान-प्रमाणपत्र दिया जाए। ड्राइविंग लाइसेन्स, राशन कार्ड, नौकरी हेतु आवेदन तथा पासपोर्ट बनवाने के लिए यह प्रमाणपत्र अनिवार्य हो। सरकार की किसी भी योजना से लाभान्वित होने के आकांक्षी वयस्कों के लिए मतदान-प्रमाणपपत्र आवश्यक हो। शासकीय सेवकों के लिए मतदान अनिवार्य कर दिया जाए और मतदान न करने वालों की वार्षिक वेतन-वृद्धि रोक दी जाए। इन चन्द उपायों से भी मतदान का प्रतिशत बढ़ सकता है।

एक स्वच्छ और मज़बूत सरकार का निर्माण तभी सम्भव है, जब मतदाता अधिकाधिक संख्या में मतदान करें। लेकिन विगत डेढ़-दो दशक से राजनीति में आई गिरावट ने जनता को निराश व खिन्न कर दिया है। आज शासन-तन्त्र में धनवानों, बाहुबलियों और देशहित को हाशिए पर रखकर सिर्फ़ सत्ता-सुख के लिए राजनीति करने वालों की भरमार है। राजनीति में‘परिवारवाद‘ जैसी बुराई का भी सहज समावेश हो गया है। मतदाताओं के सामने अधिक विकल्प नहीं है, सिवाय इसके कि वह ज़्यादा बुरे या कम बुरे नेता में से किसी एक का चुनाव करें। मतदान के प्रति उदासीनता जैसी समस्या इसीलिए उत्पन्न हुई है। जनता समझ चुकी है कि उसका प्रतिनिधि कैसा होना चाहिए? अब उसे संसद या विधान-सभा में हंगामा करने वाला, रिश्वत लेकर सवाल पूछने वाला, गुपचुप वेतन-भत्ते बढ़ाने वाला, विदेश-यात्राओं के अवसर ढूँढ़ने वाला, झूठे वादे करने वाला जननायक नहीं चाहिए। उसे ऐसा जनप्रतिनिधि चाहिए जो सचमुच मतदाताओं की अपेक्षाओं पर खरा उतरे और अपने निर्वाचन-क्षेत्र तथा राष्ट्र के हित में कार्य कर सके। लोकतन्त्रात्मक शासन प्रणाली की सफलता इसी में निहित है।

सरकार को स्वीकारना होगा कि समस्या केवल मतदान में कमी या मतदाताओं की उदासीनता की नहीं है बल्कि चुनाव-प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन की भी है। वर्ष 2013 में सम्पन्न हुए पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों में ‘नोटा‘ (None of the Above) अर्थात् ‘उपर्युक्त में से कोई नहीं‘ के आँकड़ों ने यह सन्देश दे दिया है कि यदि राजनीतिक दल साफ़-सुथरी छवि वाले जन-प्रतिनिधियों की अनदेखी करेंगे तो मतदाता उसे नहीं स्वीकारेंगे। जनता राजनीतिक सुधार चाहती है। देश की सत्ता की बाग़डोर सम्भालने वालों के लिए कुछ बाध्यकारी नियम चाहती है। ऐसा नियम तो होना ही चाहिए कि किसी भी प्रकार के आपराधिक मामलों में संलिप्त व्यक्ति चुनाव में उम्मीदवार न बन सके। उनके लिए भी उम्र, शिक्षा एवं अन्य अर्हताएँ निर्धारित हों। दो से अधिक सन्तान वाले तथा रोगग्रस्त व्यक्ति चुनाव-प्रत्याशी न बन सकें। दल-बदल पूर्णतः प्रतिबन्धित हो। आजीवन राजनीति की पारी खेलने पर भी प्रतिबन्ध हो ताकि नये नेता सामने आ सकें।

बहरहाल व्यापक पैमाने पर ‘राष्ट्रीय मतदाता दिवस‘ मनाया जा रहा है। निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देश पर मतदान-वृद्धि हेतु सरकार संकल्पित है। लेकिन औसत मतदान में वृद्धि मात्र से जनता और देश का कुछ भला नहीं होगा। आज शिक्षा-संस्थानों में ज़ोरशोर से जागरूकता अभियान चलाये जा रहे हैं, मतदान के महत्त्व पर भाषण, निबन्ध, स्लोगन और वाद-विवाद प्रतियोगिताएँ आयोजित की जा रही हैं। परन्तु ‘मतदाता दिवस‘ मनाने से कहीं अधिक आवश्यकता निर्वाचन-प़द्धति में ऐसे सुधारों की है, जो राजनीति में मतदाताओं के खण्डित विश्वास को पुनस्र्थापित कर सकें। भारत जैसे देश में, जहाँ करोड़ों निरक्षर मतदाता हैं,उन्हें अपना नाम मतदाता सूची में दर्ज करवाने से लेकर फ़ोटो पहचानप़त्र लेने और समूची मतदान-प्रक्रिया की जानकारी दी जानी चाहिए। वोटिंग- मशीन पर अपनी पसन्द के प्रत्याशी के नाम व चुनाव-चिह्न के सामने वाला बटन दबाकर मत देने के अलावा ‘नोटा‘ का प्रयोग भी समझाया जाना चाहिए। वे चुनावी घोषणापत्रों का मतलब नहीं समझते और बिना सोचे-समझे किसी धमकी, दबाव या लालच में आकर मतदान करते हैं। उन्हें यह समझाना नितान्त आवश्यक है कि मतदान जाति, धर्म या समुदाय के आधार पर नहीं बल्कि साफ़-सुथरी छवि वाले, योग्य और ईमानदार प्रत्याशी के पक्ष में करना चाहिए।‘मतदाता दिवस‘ का आयोजन तब सार्थक होगा, जब प्रत्येक मतदाता शपथ ले कि उसका मत बिकाऊ नहीं है। उसका स्वाभिमान किसी प्रलोभन के आगे नहीं डिगेगा। वह अपने मत का ‘दान‘ नहीं करेगा बल्कि उसका विवेकसम्मत उपयोग कर सही जननायक चुनेगा।

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