भारत का सुनहरा भविष्य दो युवाओं के हाथ

3:28 pm or February 4, 2017
akhilesh_rahul

भारत का सुनहरा भविष्य दो युवाओं के हाथ

—— अलका गंगवार ——-

राहुल गांधी और अखिलेश  यादव के उत्तर प्रदेश  के गठबंधन को लेकर जो शंका  और आशंका  देखी जा रही थी वह लखनऊ प्रेस कान्फ्रंेस के बाद काफूर हो गयी है। यह एक ऐतिहासिक क्षण है जो एक सुनहरे भविष्य की और संकेत कर रहा है। अब भारत में युवा राजनीति और समन्वय की राजनीति का युग प्रारंभ हो रहा है। समाजवादी पार्टी जिसके आदर्श नेता लोहिया और जे.पी. काग्रेंस परिवार के ही सदस्य थे आज परिवारवाद व क्षेत्रीयता के आवरण से अखिलेश यादव के नेतृत्व में बाहर निकलने के लिए अपने अंदर ही संघर्ष कर रही है । वही काग्रेंस भी उत्तर प्रदेश  में अपने अस्तित्व के लिए साम्प्रदायिक ताकतों से अंतिम लड़ाई लड़ रही है । आज दिल्ली में बैठी साम्प्रदायिक ताकते उस भारतीय इतिहास की ही पुनरावृत्ति कर रही है जो दिल्ली में सत्ता हथियाने का बाद धीरे धीरे क्षेत्रीय ताकतों को नष्ट या अप्रभाव्शील  कर देते थे।

इन ताकतों ने जनता को भ्रम में डालकर और काग्रेंस के खिलाफ युवा पीढी में जहर घोलकर 31 प्रतिषत मत लेकर दिल्ली पर कब्जा  कर लिया है और अब सत्ता का दुरूपयोग कर संवैधानिक संस्थाओं को नष्ट कर देश  को एक साम्प्रदायिक देश  में बदलने की कोशिश कर रह जिसमें नफरत और अहम भरा हो। ऐसी हालत में देश  में राहुल एवं अखिलेश  ने एक ऐसा प्रयास किया है जो समसामयिक एवं प्रषंसनीय है। दोनांे युवा जो पढें लिखे है और राजनीति में उनका अपना एक मुकाम है ने अपने स्थानीय मतभेदों को भुलाकर एवं राजनीति की गलाकाट प्रतियोगिता से बाहर आकर भारत को एक नई दिषा देने का संकल्प लिया है। यह भी एक संयोग है कि दोनों युवाओं को ही बाह्य साम्प्रदायिक ताकतों के अतिरिक्त अपने दल के भीतर की संकुचित ताकतों से भी लडना पड़ रहा है। यह गठबंधन दक्षिणपंथी ताकतों के खिलाफ एक प्रयास है जो राहुल और अखिलेश  के नेतृत्व में किया जा रहा है जहां पुरानी पीढी नैपथ्य में जाकर युवाशक्ति को अवसर दे रही है यह एक शुभ संकेत है।  आज दक्षिणपंथी विचारधारा न केवल भारत बल्कि अमेरिका और यूरोप जैसे पढ़े लिखें और अति विकसित देषों में भी उभर रही है परन्तु उन देषों में स्थापित जनतात्रिक  संस्थायें एवं बुद्धिजीवी डट कर मुकाबला कर रहा है वही भारत जैसे विकासशील देश  में जहां लोकतात्रिक एवं गणतात्रिक संस्थाओं अभी पनप ही रही है, को एक बडा खतरा है। प्रधानमंत्री मोदी जी का योजना आयोग , रिजर्व बैंक, सुर्पीम कोर्ट और संसद जैसी संस्थाओं के प्रति रूखापन एवं अनास्था इस आशंका  को और मजबूत करती है। आर.एस.एस. जैसी अनुदारवादी संस्था जिसके प्रचारक  आज भारतीय  राजनीति एवं ब्यूरोक्रेसी में अपनी गहरी पैठ बना चुके है से इन युवाओं को लडने की प्रबल इच्छा एवं इरादे एक आषा की किरण है। लेकिन आवष्यक है कि हर स्तर पर बुद्धिजीवीयों को इनके पीछे अपने मतभेद भुलाकर खडा होना होगा तभी व्यक्ति की गरिमा जो संविधान द्वारा प्रदत्त हैं को हम सुरक्षित रख सकेगें।

उत्तर प्रदेश  के चुनाव राष्ट्र के लिए भी एक ऐतिहासिक मोड़ होगा।  यदि गलती से 2017 के इस चुनाव में साम्प्रदायिक ताकतें जीतती है तो वे राष्ट्र के 80 प्रतिषत हिन्दुओं  को 20 करोड़ मुस्लमानों के विरूद्ध खडा करा देगी, साथ ही 27 करोड़ दलित भी अपनी अस्मिता को लेकर आशंका  व भय से डूब जायेगे। राष्ट्र का बुद्धिजीवी वर्ग या तो भाड में बदल जायेगा और आम जनता घुटन महसूस करेगा। साम्प्रदायिक ताकतें देश  की शैक्षणिक संस्थाओं से हिन्दु मिथ्या को इतिहास और विज्ञान सिद्ध करने में अपनी ऊर्जा लगा देगें। पष्चिम की खिड़की को पूर्वाग्रह के कारण बन्द करने की कोशिश को पंख लग जायेगे और गोबर ओर गउ मूत्र से सनी एक अवैज्ञानिक विचारधारा का पोषण किया जायेगा। ये काली ताकतें असहमति एवं विभिन्नता का डटकर विरोध करेंगी।  असहमति को राष्ट्रद्रोह एवं विभिन्नता को संस्कृति का संकट माना जायेगा। नव जागरित राष्ट्र निर्माण की जगह इसे प्राचीन जम्मूद्वीप में बदलने की कोशिश राजनैतिक एवं प्रषासनिक स्तर पर शुरू हो जायेगी। ऐसे ऐतिहासिक संकट के समय उत्तर प्रदेश  का यह प्रयोग एक ताजी हवा का झोंका है। अब समय की चैखट पर ही तय होगा कि यह प्रयोग सफल व अविरल होगा या देश  फिर एक अन्धी सुरंग में घुस जायेगा जहां से उसे निकलने में अगली एक या दो पीढी को संघर्ष का रास्ता चुनना होगा।

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