अखिलेश मार्का लोकतंत्र की नाकामियां

3:12 pm or February 7, 2017
rajabhaiya

अखिलेश मार्का लोकतंत्र की नाकामियां

—— हरे राम मिश्र ——

अखिलेश यादव सरकार के सबसे विवादित चेहरों में से एक, रघुराज प्रताप सिंह उर्फ ’राजा भइया’ के उदय और अपराध की सैकड़ों कहानियां कुंडा और प्रदेश राजनीति में भले ही प्रचलित हों, लेकिन उनके इलाके की आम जनता के लिए इन कहानियों के कुछ खास मायने नहीं हैं। वह इन पर बहुत ’ध्यान’ नहीं देती है। भले ही इस मुल्क में लोकतंत्र का सूरज उदय हुए सत्तर साल हो गए हों लेकिन कुंडा और उसकी आस पास की जनता के लिए आज भी राज शाही और उसके निशान जिंदा हैं। इस क्षेत्र की आम जनता की निगाह में रघुराज प्रताप सिंह उनके राजा हैं और वे उनकी प्रजा हैं। यूं तो अपने राजनैतिक कैरियर के पच्चीस सालो में राजा भइया गंभीर आपराधिक धाराओं और पोटा तक के आरोपी रह चुके हैं, लेकिन जनता की सामान्य चेतना यह मानती है कि राजा कभी गलत नहीं हो सकता क्योंकि वह भगवान का अवतार होता है।

गौरतलब है कि भारतीय राजनीति में देश के ’सामन्ती’ घरानों का सक्रिय होना और बदलते परिदृश्य में ’तंत्र’ में जगह बनाना बिल्कुल नया नहीं है। देश के तकरीबन हर राज्य में राज परिवारों के लोग राजनीति में सक्रिय हैं। चाहे वह राजस्थान का वसंुधरा राजे का परिवार हो या फिर मध्य प्रदेश का राज घराना, सब ने बदलते परिदृश्य में अपने को बदलकर कमोवेश लोकतांत्रिक किया है। कुछ तो मजबूत नेता के बतौर राजनीति में स्थापित भी हुए हैं। लेकिन, ऐसा माना जाता है कि अपने बीस वर्षों के राजनैतिक कैरियर में राजा भइया कभी एक ’नेता’ के बतौर स्थापित नहीं हो पाए। यह ’कुंठा’ उनके समर्थकों में भी देखी जाती है। हलांकि यह बात अलग है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति की ’ठाकुर’ लाॅबी में इनकी अपनी ’खास’ पकड़ है और इसी के कारण ’निर्दलीय’ होते हुए भी राजा भइया अखिलेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे।

अपने समर्थकों में ’भगवान’ की तरह पूजे जाने वाले राजा भइया के विरोधी भी हैं। उनके राजनैतिक विरोधी बताते हैं कि अखिलेश यादव के पांच साल के शासन काल में कुंडा और बाबागंज में कानून के राज का घोर ’संकट’ था। विरोधियों के मुताबिक इनके लोग ’थानेदारी’ तक तय करने में दखल देते थे। इनके विरोधी कहते हैं कि अगर आप इनके लोगों की शिकायत पुलिस थाने में लेकर जाइए और थानेदार ही आप से यह कहने लगे कि आप इन लोगों से नहीं लड़ सकते इसलिए ’शिकायत’ मत करिए तो फिर प्रशासन में इनके लोगों के दखल का अंदाजा लगाया जा सकता है। जिले की ठेकेदारी में इनके ही नजदीकी लोगों का वर्चस्व रहा है।

यही नहीं, पंगु प्रशासन का एक वाकिया इनके विरोधी और बताते हैं। दरअसल अखिलेश यादव के शासन काल में संपन्न हुए जिला पंचायत चुनाव में कुंडा और बाबागंज विधान सभा क्षेत्र की जिला पंचायत की सभी बारह सीटें निर्विरोध हो गईं। इन सीटों पर निर्वाचित लोग राजा भइया के अति करीबी और ज्यादातर अपराधी किस्म के थे। विरोधियों का कहना था कि इन ’सीटों’ पर राजा भइया के समर्थकों ने ’किसी’ को नामांकन करने ही नहीं दिया। दरअसल पिछले लोक सभा चुनाव में जब मोदी लहर में उनके लाख प्रयासों के बावजूद कौशाम्बी लोक सभा सीट से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार शैलेन्द्र कुमार चुनाव हार गए तब इनके समर्थकों की बड़ी ’किरकिरी’ हुई थी। लोग बताते हैं कि इनके समर्थक चुनावी हार जीत को भी ’सामंती’ प्रतिष्ठा और नाक का ’सवाल’ मानते हैं। इस किरकिरी के बाद उनके समर्थक जिन्हें राजा भइया के विरोधी खास भाषा में ’अंडे-बच्चे’ बोलते हैं, ने ’अघोषित’ डर के चलते जिला पंचायत चुनाव में किसी को भी ’नामांकन’ नहीं करने दिया। इसका नतीजा यह रहा कि ’लोकतंत्र’ में चुनाव लड़ने और अपनी बात कहने की आधारभूत ’लाईन’ को भी इस क्षेत्र में तोड़ डाला गया। गौरतलब है कि उस दौरान मैने इनके समर्थकों से बात की थी और इस बावत पूछा था कि क्या वजह है कि निर्वाचित लोगों के खिलाफ चुनाव में एक भी नामांकन नहीं हुआ। उनके कुछ समर्थक यही कहते रहे कि राजा भइया के खिलाफ किसकी ’हिम्मत’ है कि चुनाव लड़े, जबकि थोड़ा समझदार इसे ’लोकप्रियता’ की जीत बता रहे थे। लेकिन, इस लोकतंत्र में किसी नेता की ऐसी ’लोकप्रियता’ भी एकदम व्यवहारिक नहीं है।

यहां यह ध्यान देने लायक है कि जिला पंचायत चुनाव में मुलायम सिंह जैसे नेता भी काफी प्रयासों के बाद, अपने इलाके की महज एक सीट को निर्विरोध निर्वाचित करवा पाए थे। राजनैतिक तंत्र में अपनी बात कहने और उम्मीदवारी प्रस्तुत करने से रोकने की इस घटना ने इलाके के लोगों पर बहुत ही नकारात्मक असर किया। बाद में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चुनाव परिणाम आने के अगले ही दिन इसी वजह से रघुराज प्रताप सिंह से मंत्रिमंडल से इस्तीफा ले लिया। इस घटना ने प्रतापगढ़ के जिला प्रशासन को भी सवालों के कटघरे में खड़ा किया और यह साबित कर दिया कि कुछ खास लोगों के लिए प्रतापगढ़ में ’कानून’ का कोई मतलब नहीं है। सब कुछ उनकी मुट्ठी में है।

हलांकि, राजा भइया के समर्थक इन बातों को महज ’दुष्प्रचार’ बताते हैं और कहते हैं कि विरोधियों की इन बातों का कोई मतलब नहीं है। लेकिन इसमें भी कोई ’शुबह’ नहीं है कि कुंडा में बिना उनकी मर्जी के एक पत्ता भी नहीं डोलता है। इस दौरान मेरी कई लोगों से बात हुई और बहुतों ने दबी जुबान यह माना कि इनके अंडे-बच्चे प्रशासन में अनावश्यक हस्तक्षेप करते रहते हैं। राजनीति में अपराधीकरण के बढ़ते प्रभाव ने प्रशासन के इकबाल को किस तरह से ’हाशिए’ पर रख दिया है- इसका सर्वोत्तम उदाहरण प्रतापगढ़ का जिला प्रशासन है।

कुल मिलाकर, इस पूरी ’त्रासदी’ के लिए समाजवादी पार्टी जिम्मेदार है। राजनीति के अपराधीकरण का पोषण सबसे ज्यादा किसी ने किया है तो वह समाजवादी पार्टी है। और यही वजह है कि इस सरकार के दौर में ’कानून और व्यवस्था’ का सवाल उत्तर प्रदेश में चुनाव का सबसे बड़ा सवाल बना है। राजनीति का अपराधीकरण और सामंतवाद के अवशेष के साथ उसकी दोस्ती का ’काकटेल’ लोकतंत्र के बुनियादी सवालों को ’शमशान’ पहुंचा चुका है। व्यवस्था में उपजा यह संकट इस लोकतंत्र की एक भयानक नाकामी है। क्या इस नाकामी को अखिलेश यादव विकास के शोर में ढंक पाएंगे?

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