खतरा पाठयपुस्तक ? वायवीय दावे और नफरत के बुलावे – सुभाष गाताडे

4:17 pm or February 21, 2017
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खतरा पाठयपुस्तक ?
वायवीय दावे और नफरत के बुलावे

—– सुभाष गाताडे ——

क्या जीवित प्राणियों को हवा की जरूरत होती है, इसे प्रायोगिक तौर पर समझाने के लिए बिल्ली के बच्चे को मरने देना चाहिए ? उत्तर भारत में पाठयपुस्तकों की दुनिया में चर्चित एक प्रकाशक द्वारा पर्यावरण विज्ञान के लिए वितरित की गयी एक किताब को लेकर यही सवाल प्राणियों के अधिकारों के लिए काम कर रहे समूहों ने उठाया है। मालूम हो कि चैथी कक्षा में ‘द ग्रीन वल्र्ड’ नाम से पढ़ायी जा रही उपरोक्त किताब जीवन में हवा का महत्व समझाने के लिए बन्द बक्से में बिल्ली के बच्चे को रखने की सलाह बच्चों को देती है, जिससे वह ‘मर जाए’ और फिर बच्चे जानें कि हवा जीवितों के लिए कितनी जरूरत है।(http://indianexpress.com/article/education/need-air-for-life-to-find-out-put-kitten-in-a-box-says-textbook-4513055/)

अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ महाराष्ट स्टेट बोर्ड आफ सेकेण्डरी एण्ड हायर एजुकेशन द्वारा 12 वीं कक्षा के लिए सिफारिश की गयी समाजविज्ञान की किताब विवादों में थी जिसने दहेज की वजह के तौर पर ‘लड़की के गन्दा दिखने और विकलांग होने’ को बताया था और कहा था कि चूंकि ऐसी लड़कियों की शादी होने में कठिनाई होती है इसलिए दहेज देना पड़ता है। विडम्बना थी कि छह अग्रणी शिक्षकों/विद्वानों द्वारा तैयार की गयी उपरोक्त पाठयपुस्तक की इस नारीद्रोही समझदारी पर किसी का ध्यान नहीं गया था। और दहेज को लेकर यह पाठ ‘भारत की प्रमुख सामाजिक समस्याओं’ वाले अध्याय में शामिल था जिसमें जेण्डर असमानता, घरेलू हिंसा और किसानो ंकी आत्महत्या आदि को लेकर चर्चा की गयी थीं।

अब चाहे ग्रीन वल्र्ड का प्रसंग हो या समाजशास्त्रा की उपरोक्त किताब का, या कुछ वक्त पहले सूर्खियां बनी जम्मू कश्मीर की 11 वीं कक्षा की एक पाठैयपुस्तक का – जिसमें एक सरकारी दस्तावेज के अहम हिस्से को ही छाप दिया गया था – यह ऐसी भूलें हैं, जो बताती है कि पाठयपुस्तकों को तैयार करने का काम कितनी सावधानी से करना चाहिए ताकि बच्चों के मन अनावश्यक कलुषित न हों। ऐसी गलतियों को लेकर जानेमाने शिक्षाविद प्रोफेसर क्रष्णकुमार बेबाकी के साथ अपनी राय रखते हुए बताते हैं कि ‘दुर्भाग्य की बात है कि अधिकतर राज्यों के पास ऐसी संस्थागत क्षमता नहीं है कि वह विचारप्रवाही पाठों का तैयार करे, न उनके पास स्थापित प्रक्रियाएं हैं जो पाठयपुस्तकों की गुणवत्ता की देखरेख कर सकें।’

बच्चों के भविष्य के प्रति सरोकार रखनेवाले समूह या सरकारों के लिए यह निश्चित ही जरूरी है कि वह इस पर अतिरिक्त ध्यान रखें।

विडम्बना ही है कि जैसा वातावरण बन रहा है वहां अतिरिक्त ध्यान देना दूर रहा, ऐसी मनगढंत बातें पाठयपुस्तकों के जरिए परोसी जा रही हैं, जो तथ्यों से मेल नहीं खाती हैं या विज्ञान तथा मिथकों का अजीब घालमेल कर देती हैं। राजस्थान के पाठयपुस्तकों में राणाप्रताप तथा अकबर के बीच चले हल्दीघाटी की लड़ाई को लेकर जो बदलाव प्रस्तावित किए जा रहे हैं, उन्हें ऐसी श्रेणी में डाला जा सकता है। यह सर्वविदित है कि उपरोक्त लड़ाई में राणाप्रताप की हार हुई थी और उन्हें पलायन करना पड़ा था। राणाप्रताप के खिलाफ अकबर द्वारा छेड़ी गयी इस लड़ाई का नेत्रत्व राजा मानसिंह जैसा राजपूत राजा ही कर रहा था। और अब यह सुनने में आ रहा है कि कमसे कम राजस्थान की पाठयपुस्तकों में यह दिखाया जाए्रगा कि अकबर की नहीं बल्कि राणाप्रताप की ही जीत हुईं। अब चूंकि विशिष्ट समुदायों के जाति अभिमान की बात को वस्तुनिष्ठ सच्चाई से अधिक वरीयता दी जा रही है, लिहाजा ऐसे कई परिवर्तन संभव है।

ध्यान रहे कि मध्यकालीन इतिहास पर आधिकारिक किताबांे में सतीश चन्द्र की किताब ‘मीडिएवल इंडिया: फ्रोम सलतनत टू द मुगल्स – मुगल एम्पायर /1526-1748/ विख्यात है, जो बताती है कि उपरोक्त लड़ाई को ‘हिन्दुओ और मुसलमानों के आपसी संघर्ष के तौर पर कतई नहीं देखा जा सकता, न उन्हें राजपूतों की आज़ादी के संघर्ष के तौर पर देखा जा सकता है, जिसकी वजह यही थी कि राजपूतों के एक प्रभावी तबके ने पहले से ही मुगलों का साथ देना कबूल किया था।’ उनके मुताबिक हल्दीघाटी की लड़ाई अकबर एवं राणाप्रताप के बीच के गतिरोध को तोड़ नहीं सकी और राणाप्रताप को दक्षिणी मेवाड़ की पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ी। हल्दीघाटी की लड़ाई के बाद अकबर खुद अजमेर आया और उसने राणाप्रताप के खिलाफ लड़ाई की अगुआई की, जिस प्रकिया में गोगन्डा, उदयपुर आदि पर मुगल सेनाओं का कब्जा हुआ और राणाप्रताप को दक्षिणी मेवाड के बीहड जंगलों में काफी अन्दर जाना पड़ा।

जहां राजस्थान सरकार मुगलों या अन्य मुस्लिम राजाओं के तमाम सन्दर्भों को वहां की पाठैयपुस्तकों से समाप्त करती दिख रही है ताकि भारत को आदिम समय से एक समरूप हिन्दू राष्ट के तौर पर दिखाया जा सकें, वहीं उसने आठवी कक्षा के समाज विज्ञान किताबों से भारत के प्रथम प्रधानमंत्राी जवाहरलाल नेहरू के हर उल्लेख को हटा दिया। कल्पना करें कि राजस्थान के स्कूल में अध्ययन कर रहे बच्चे अगर गलत इतिहास सीखेंगे, कुछ मनगढंत बातों को सच्चाई मान कर रटते रहेंगे तो अन्ततः नुकसान उन बच्चों का ही होगा, जो दुनिया भर में हंसी के पात्रा बनेंगे।

गुजरात सरकार द्वारा सरकारी स्कूलों के लिए अनिवार्य बना दी गयी दीनानाथ बात्रा की किताबों को पलटें, तो इसका और अन्दाज़ा लगता है। /2014/ जिन्हें गुजरात सरकार ने एक परिपत्रा के जरिए राज्य के 42,000 सरकारी स्कूलों पूरक साहित्य के तौर पर अनिवार्य बनाया है। ‘तेजोमय भारत’ किताब में विज्ञान की खोजों की जड़ें भी हिन्दू धर्म में ढंूढने पर जोर है और वैदिक काल को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया गया है, फिर चाहे स्टेम सेल रिसर्च के लिए भारत के किन्हीं ‘बालकृष्ण गणपत मातापुरकर’ को श्रेय देना हो जो ‘महाभारत से प्रेरित हुए थे’ (पेज 92-93); या टेलीविजन के आविष्कार के लिए ‘भारत के मनीषियों की दिव्य द्रष्टि’ को रेखांकित करना हो या ‘मोटरकार’ का अस्तित्व ‘वैदिक काल में होने की बात हो जिसे ‘अनाश्व रथ- ’ कहा जाता था।

अब इसे विचित्रा संयोग कह सकते हैं कि पाठयपुस्तकों के माध्यम से अपने एकांतिक आग्रहों का आगे बढ़ाने का काम भारत में ही नहीं बल्कि हमारे पड़ोसी मुल्कों में भी तेजी से चल रहा है। पिछले दिनों न्यूयार्क टाईम्स ने अपनी एक स्टोरी में /22 जनवरी 2017/ बांगलादेश में पाठैयपुस्तकों में आ रहे बदलाव किस तरह सेक्युलर बांगलादेशियों को चिंतित कर रहे हैं, उसे बताया था: ‘बांगलादेश का शिक्षा मंत्रालय पाठैयपुस्तकों के 2017 के संस्करण तैयार करने में जिन दिनों मुब्तिला था उन दिनों रूढिवाी इस्लामिक धार्मिक विद्वानों ने सरकार से यह मांग की कि इन किताबों में से 17 कविताएं और कहानियां हटायी जाएं जो एक तरह से ‘नास्तिकता’ को बढ़ावा देती दिखती है। जब तक जनवरी 2017 में किताबें तैयार हुई तब वह 17 कविताएं तथा कहानियों का हटा दिया गया था और जिसे लेकर कोई स्पष्टीकरण सरकार की तरफ से नहीं था।’बात यहीं नहीं रूकी है। इस्लामिक विद्वानों, संगठनों ने साफ कहा कि पाठयपुस्तकों में प्रयुक्त हिन्दू, ईसाई नामों को हटा देना चाहिए तथा उनके स्थान पर ‘सुंदर मुस्लिम नाम’ दिए जाएं। इतनाही नहीं किताबों मे लड़का और लड़की के बीच आपसी बातचीत को भी हटा दिया जाए क्योंकि:इस्लाम में किसी युवति से यं ही बात करना पाप माना जाता है।’ इन आग्रहों पर भी सरकार ने कोई प्रतिरोध नहीं किया।

बांगलादेश इस मामले में पाकिस्तान के नक्शेकदम पर चल रहा है, जहां हालत पहले से बदतर है। वहां के शिक्षा तथा पाठयक्रम के बदतर होते हालात पर पाकिस्तान के मशहूर भौतिकीविद एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता परवेज हुदभाॅय ने अपने एक हालिया आलेख में बताया कि किस तरह विज्ञान एवं तर्कशाीलता के विरोध ने ‘पाकिस्तान के विश्वविद्यालयों का प्रबोधन के दीपक या नये चिन्तन के अगुआ होने के बजाय भेड़ों के फार्म में रूपांतरण’ की यह परिघटना हर तर्कशील व्यक्ति को चिन्तित कर सकती है। मुमकिन है ऐसे लोग इस बात पर हंस भी सकते हैं कि वहां दसवीं कक्षा की भौतिकी की किताब में भौतिकी के इतिहास में न्यूटन और आईनस्टाइन गायब हैं बल्कि टोलेमी द ग्रेट, अल किन्दी, इब्न ए हैथाम आदि विराजमान हैं या किस तरह खैबर पखतुनवा प्रांत में पाठयक्रम के लिखी जीवविज्ञान की किताब डार्विन के इवोल्यूशन के सिद्धांत को सिरेसे खारिज कर देती है।

पूरे मुल्क में बढ़ती इस बन्ददिमागी एवं अतार्किकता का जो परिणाम दिखाई दे रहा है, उसका निष्कर्ष निकालते हुए उन्होंने लिखा था:

.. दुनिया में किसी भी अन्य इलाके की तुलना में पाकिस्तान एवं अफगाणिस्तान में अतार्किकता तेजी से बढ़ी है और ख़तरनाक हो चली है। लड़ाइयों में मारे जानेवाले सिपाहियों की तुलना में यहां पोलियो कर्मचारियों की उम्र कम होती है। और अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि, इस हक़ीकत को देखते हुए स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालय युवा मनों का प्रबोधन करने के बजाय उन्हें कुचलने में लगे हैं, अतार्किकता के खिलाफ संघर्ष निश्चित ही यहां अधिक चुनौतीपूर्ण होने वाला है।(http://hoodbhoy.blogspot.in/p/dr-pervez-hoodbhoy-complete-repository.html)

अन्त में प्रश्न उठता है कि बाल मन को ‘खतरा’ बनती दिखती पाठयपुस्तकों को लेकर, दक्षिण एशिया में पूरे हिस्से में आखिर नयी जमीन कैसे तोड़ी जाए ।

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