यह मनोबल क्या है श्रीमान

5:21 pm or July 14, 2014
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रीना मिश्रा-

जिस समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के नाम पर किसी भी तरह विदेशी पूंजी निवेश को आकर्षित करने के लिए विदेश यात्राओं का क्रम शुरू कर रहे थे,ठीक उसी समय दिल्ली में केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह अर्ध्दसैनिक बल सीआरपीएफ के कामकाज की समीक्षा के नाम पर विदेशी पूंजी निवेशकों को किसी भी कीमत पर ‘सुरक्षा और संरक्षा’का संदेश दे रहे थे। इसी संदेश में उन्होंने नक्सलियों के खिलाफ लड़ रही सीआरपीएफ को ‘लोकतंत्र का प्रहरी’ बताते हुए यह साफ कर दिया कि सरकार इसके ‘मनोबल’ को बनाए रखने की हर संभव कोशिश करेगी। गृहमंत्री ने समीक्षा बैठक में ही यह भी साफ कर दिया कि नक्सलियों के खिलाफ नई रणनीति बन रही है तथा उनसे कड़ाई से निपटा जाएगा और उनसे सीधी बातचीत का कोई प्रस्ताव भी नहीं है। यह इस बात का संदेश था कि केन्द्र सरकार नक्सलियों के खिलाफ कोई बड़ा सशस्त्र अभियान जल्द ही शुरू करने जा रही है। उन्होंने नक्सली हिंसा के खिलाफ लड़ रहे जवानों को जम्मू-कष्मीर के तर्ज पर भत्ता देने की बात कह अप्रत्यक्ष रूप से जवानों के भत्ता संबंधित असंतोष को भी खत्म करने की बात कही।

गौरतलब है कि इस समय देश के करीब नौ राज्य नक्सली हिंसा की चपेट में है। इन राज्यों में अपार खनिज संपदा और प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं। सरकार के प्रयास से जो भी विदेशी पूंजी निवेश आ रहा है, वह अमूमन इन्हीं इलाकों में ही आ रहा है। पिछली यूपीए सरकार ने नक्सलियों से निपटने के नाम पर आपरेशन ‘ग्रीन हंट’ नामक अभियान भी लंबे समय तक चलाया था ताकि इन इलाकों में निवेशकों के बीच सुरक्षा बोध और विश्वास पैदा किया जा सके। इस अभियान में सुरक्षाबलों पर नक्सली होने के आरोप में कई सौ ‘बेगुनाह’ आदिवासी नौजवानों का फर्जी एनकाउंटर, आदिवासी लड़कियों का सामूहिक बलात्कार, हत्या, अपंगता समेत मानवाधिकार हनन के गंभीर आरोप लगे थे। निहत्थे आदिवासियों के खिलाफ सत्ता प्रायोजित हिंसा की इस प्रतिक्रिया में नक्सली संगठनों द्वारा भी सुरक्षाबलों की छुट-पुट हत्याएं जरूर हुईं, लेकिन दोनों ओर की इस हिंसा-प्रतिहिंसा की कीमत निहत्थे और बेगुनाह आदिवासियों को ही चुकानी पड़ी।

अभी कुछ माह पहले ही कथित तौर पर नक्सलियों ने सीआरपीएफ के कुछ जवानों की घात लगाकर हत्या कर दी। हत्या के बाद तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने नक्सलियों से ‘बदला’ लेने की बात कही तो हड़कंप मंच गया। क्या कोई लोकतांत्रिक राज्य अपने खिलाफ की गई किसी हिंसा का ‘बदला’ लेता है? या फिर एक निर्धारित न्यायिक तरीका अपनाते हुए पारदर्शी इंसाफ करता है। राज्य के मूल में हिंसा भले ही हो लेकिन उसे इंसाफ का लबादा तो ओढ़ना ही होता है। जब बदला लेने की बात सामने आ जाती है तो फिर सही और गलत रास्तों का भेद खत्म हो जाता है। ऐसी अवस्था में किसी भी राज्य के तानाशाही की ओर जाने की शुरुआत हो जाती है। तो क्या अब हमें मान लेना चाहिए कि भारतीय राज्य तंत्र निरंकुशता की ओर बढ़ चला है। समूचे मुल्क में तानाशाही फैलने की बात तो सही नहीं कही जा सकती, लेकिन देश के कई राज्य इस समय घोर निरंकुशता युक्त तानाशाही के ताने-बाने में सिसक रहे हैं। चाहे वह सुशील कुमार शिंदे का ‘बदला’ लेने की बात हो या फिर राजनाथ सिंह का ‘मनोबल’ न गिरने देने संबंधी बयान, दोनों को इसी परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाना चाहिए। वैसे भी राजनाथ सिंह का ‘मनोबल’ संबंधी यह बयान लोकतंत्र में सबसे निचले तबके की सहभागिता और समाज में बंदूक की जगह पर एक गंभीर बहस की मांग भी करता है।

कुल मिलाकर, राजनाथ सिंह का यह बयान कई सवालों को जन्म देता है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह को यह स्पश्ट करना ही चाहिए कि आखिर यह ‘मनोबल’ क्या है। आखिर क्या सुरक्षाबल इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में, जहां अस्सी फीसदी लोग आज भी हाशिए पर हों, को बचाने और कथित ‘विकास’ के नाम पर कुछ भी करने और बेचने को आमादा सरकारों के लिए ‘अपनी की हुई कारवाइयों’ पर जवाबदेही से मुक्त रहेंगे? क्या राजनाथ सिंह चाहते हैं कि नक्सलियों को खदेड़ने के नाम पर सुरक्षाबल चाहे जो करें उस पर सवाल न उठाया जाए? वे हत्या लूट बलात्कार, उत्पीड़न, फर्जी एनकाउंटर कुछ भी करें उन पर सवाल नही उठना चाहिए? आखिर सीआरपीएफ या फिर कोई अन्य बल अपनी की गई कारवाइयों पर जवाबदेही से भाग क्यों रहा है। आखिर इस जवाबदेही से उन्हें डर क्यों है। क्या इस देश की आवाम को सुरक्षाबलों के मनोबल के नाम पर एक गैर जवाबदेह तंत्र स्वीकार होगा? क्या राजनाथ सिंह इस मुल्क के लोकतंत्र को बंदूक के बल पर ही चलाना और महफूज रखना चाहते हैं?

आखिर मोदी सरकार की सुरक्षाबलों को खुली छूट देने की असलियत क्या है? मोदी के विकास का एक ही मंत्र है किसी तरह अधिकतम विदेशी पूंजी निवेश। अब इनके सारे राजनैतिक कृत्य इसी के इर्द-गिर्द घूम रहे हैं। विदेशी पूंजी आए तो उसकी लूट में किसी किस्म का गतिरोध नहीं होना चाहिए। क्योंकि खनिज संपदा वाले राज्य में ही नक्सलियों की पैठ है लिहाजा ऐसे कथनों से सरकार विदेशी कंपनियों को भी सीधे संदेश दे रही है कि उन्हें इस मुल्क की संपदा लूटने में कोई परेशानी नहीं होगी। किसी भी विरोध की संभावित संभावना को ही निर्ममता से कुचला जाएगा। इस ‘मनोबल’ शब्द का शायद यही मतलब है और ऐसा लगता है कि मोदी सरकार ने नक्सलियों से निपटने के नाम पर ‘बेगुनाह आदिवासियों’ के सामूहिक कत्लेआम का प्लान बना लिया है। क्या मोदी का लोकतंत्र आदिवासियों के सीने पर चढ़े बिना, उनके सामूहिक कत्लेआम के बिना चमकदार नहीं होगा? शायद महफूज तो तब तक नहीं रहेगा जब तक बंदूक का संगीन साया निहत्थे आदिवासियों को दहशत में न रखे।

लेकिन सवाल उठता है कि क्या राजनाथ सिंह जैसे लोग सिंर्फ बंदूक के बल पर नक्सलियों को काबू में कर पाएंगे। अब तक के अनुभव इस दिशा की निराशाजनक तस्वीर ही प्रस्तुत कर रहे हैं। विचारधारा को हथियार खत्म नहीं कर सकते। लेकिन मोदी सरकार को शायद इसकी समझ ही नहीं है। वह बंदूक में ही समस्या का समाधान देखती है। अब देखना यह है कि विकास के नाम पर केवल विदेशी पूंजी निवेश की राह देख रही मोदी सरकार ‘मनोबल’ के नाम पर निहत्थे आदिवासियों का सामूहिक कत्लेआम कब शुरू करती है?

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