सेल्फी के खुमार में खोती जिंदगी

5:16 pm or August 19, 2016
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94 मिलियन सेल्फी प्रतिदिन दुनिया में क्लिक होते हैं। सेल्फी यानी खुद की फोटो खींचना। भारत ही नहीं पूरे देश में इसके प्रति लोगों की दीवानगी बढ़ी है लेकिन युवाओं में इसका खुमार सर चढक़र बोलता है। युवाओं के अलावा शायद ही कोई ऐसा वर्ग होगा जो इसके खुमार से अछूता हो। वर्ष 2013 में ‘सेल्फी’, ऑक्सफोर्ड वर्ड ऑफ द इयर बना जो इसके खुमार की दास्तां बयां करता है। अगर देखा जाए तो इसका चलन पिछले तीन से चार साल में ज्यादा बढ़ा है। स्मार्टफोन कल्चर के दौर में इसे सबसे ज्यादा बढ़ावा मिला। क्योंकि सेल्फी लेना फ्रंट कैमरे से मुमकिन होता है। गूगल के सर्वे से पता चलता है कि स्मार्टफोन के इस दौर में आज के युवक-युवतियां जो पूरे दिन में रोजाना औसतन 11 घंटे अपने फोन पर बिताते हैं वे पूरे दिन में एक-दो नहीं बल्कि 14-14 सेल्फी लेते हैं।
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ष्ट्रीय स्तर की स्टीपलचेज खिलाड़ी पूजा कुमारी की डूबने से मौत हो गई। पूजा सेल्फी के खुमार का शिकार हो गई। जब भोपाल के समीप भारतीय खेल प्राधिकरण के परिसर में अपनी सहेलियों के साथ सेल्फी खींचने के दौरान वह दुर्घटनावश तालाब में गिर गई और उसकी मौत हो गई इस घटना ने सबको हिलाकर रख दिया। राष्ट्रीय स्तर की स्टीपलचेज खिलाड़ी पूजा कुमारी अपने देश का नाम रोशन करना चाहती थी। आज पूरी दूनिया मैं सेल्फी का का बुखार सिर पर चढक़र बोल रहा है। और हम सभी यह बखूबी जानते हैं कि देश ही नहीं पूरे संसार में कई लोग गलत तरीके से सेल्फी लेने के चक्कर में अपनी जान गवां रहे हैं। वहीं, दूसरी ओर एक और घटना प्रकाश में आई है जो मन को विचलित करती है। यूपी के कानपुर में गंगा बैराज में कुछ छात्र घूमने के लिए गए थे। सेल्फी का शौक और उसका खुमार उनकी जिंदगी पर इस कदर भारी पड़ा कि इस चक्कर में सात लोगों की डूबकर मौत हो गई। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सेल्फी के चक्कर में कभी-कभी हमें इसकी बहुत बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ती है, जिसका हमें अंदाजा भी नहीं होता। युवाओं में इसका खुमार कुछ ज्यादा ही है जो अब जानलेवा साबित हो रहा है।
सेल्फी का खुमार दरअसल एक जानलेवा जोखिम साबित हो रहा है, जहां मौज-मस्ती की चाह और कुछ नया कर गुजरने की ख्वाहिश रखने वाले (ज्यादातर युवाओं) को जान से हाथ धोना पड़ता है या अन्य दुर्घटना का शिकार होना पड़ता है। यह अजीब विडंबना है कि महज एक सेल्फी का खुमार युवाओं की जिंदगी को लील रहा है। अब सेल्फी स्टिक के जरिए युवा इसे लेकर ज्यादा खुमारी हो उठे हंै। सेल्फी से जुड़ा प्रयोग दरअसल जानलेवा साबित हो रहा है लेकिन ज्यादातर युवा इसे नजरअंदाज कर रहे है जिससे भयावह स्वरूप हम सामने देख रहे है, जो चिंतित करने वाला है।
सेल्फी स्मार्टफोन की तकनीक की देन है जिसमें उसमें लगे कैमरा की अहम भूमिका होती है। अगर स्मार्टफोन है तभी सेल्फी ली जा सकती है। भारत की आबादी 125 करोड़ को पार कर चुकी है लेकिन देश में मोबाइल की संख्या उसका पीछा करती हुई दिख रही है। देश में इस वक्त कुल 105.92 करोड़ मोबाइल यूजर्स है। ऐसा लगता है कि कुछ साल में देश की आबादी से ज्यादा मोबाइल यूजर्स की संख्या हो जाएगी। क्योंकि ज्यादातर लोग एक से ज्यादा मोबाइल रखने लगे हैं। देश में 103.42 करोड़ वाई-फाई उपभोक्ता है जो वाई-फाई नेटवर्क का इस्तेमाल करते है। लगभग 16 करोड़ लोग ब्रॉडबैंड के जरिए इंटरनेट का प्रयोग करते है। यह कुछ आंकड़े है जिनसे यह पता चलता है कि देश में मोबाइल,स्मार्टफोन और इंटरनेट का इस्तेमाल दिन-ब-दिन कितनी तेजी से बढ़ता चला जा रहा है।
94 मिलियन सेल्फी प्रतिदिन दुनिया में क्लिक होते हैं। सेल्फी यानी खुद की फोटो खींचना। भारत ही नहीं पूरे देश में इसके प्रति लोगों की दीवानगी बढ़ी है लेकिन युवाओं में इसका खुमार सर चढक़र बोलता है। युवाओं के अलावा शायद ही कोई ऐसा वर्ग होगा जो इसके खुमार से अछूता हो। वर्ष 2013 में ‘सेल्फी’, ऑक्सफोर्ड वर्ड ऑफ द इयर बना जो इसके खुमार की दास्तां बयां करता है। अगर देखा जाए तो इसका चलन पिछले तीन से चार साल में ज्यादा बढ़ा है। स्मार्टफोन कल्चर के दौर में इसे सबसे ज्यादा बढ़ावा मिला। क्योंकि सेल्फी लेना फ्रंट कैमरे से मुमकिन होता है। गूगल के सर्वे से पता चलता है कि स्मार्टफोन के इस दौर में आज के युवक-युवतियां जो पूरे दिन में रोजाना औसतन 11 घंटे अपने फोन पर बिताते हैं वे पूरे दिन में एक-दो नहीं बल्कि 14-14 सेल्फी लेते हैं।
सेल्फी का खुमार कितना जानलेवा साबित हो रहा है, यह हम देख रहे है। लेकिन लोगों की स्मार्टफोन से बढ़ती अनावश्यक आसक्ति चिंतित करने वाली है। एक सर्वे के मुताबिक पुरुष 20 सेकेंड से ज्यादा समय तक भी अपने मोबाइल फोन या स्मार्टफोन से दूर नहीं रह पाते। दूसरी तरफ महिलाओं की स्थिति इस मामले में पुरुषों से थोड़ी बेहतर है। महिलाएं अपने करीब से मोबाइल की दूरी 57 सेकेंड से ज्यादा बर्दाश्त नहीं कर पाती है। मतलब साफ है कि पुरुषों को अगर 20 सेकेंड और महिलाओं को 57 सेकेंड में मोबाइल की गैर-मौजूदगी उन्हें बैचन करती है।
दूसरी तरफ भारत अब भी ‘सेल्फी डेथ कंट्री’ में शुमार होता है जहां रिपोर्ट के मुताबिक सेल्फी के दौरान सबसे ज्यादा मौतें होती है। ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ ने चंद महीने पहले अपनी एक रिपोर्ट में यह दावा किया था कि साल 2015 में भारत में कई लोगों ने खतरनाक तरीके से सेल्फी लेने की कोशिश की। इस वजह से उनकी जान चली गई। दुनियाभर में सेल्फी के चक्कर में 27 लोगों की जान गई जिनमें 15 से ज्यादा मौतें सिर्फ भारत में हुईं। यह आंकड़ा चिंतित करने वाला है।
ज्यादातर ये देखा गया है कि लोग या फिर युवा खतरनाक जगहों पर और खतरनाक स्थिति में सेल्फी के दीवाने होते है। एक ऐसी स्थिति जिस जगह सेल्फी की चाहत एक दुर्घटना को जन्म देती है और यह मौत का भी कारण बन सकती है। युवाओं को इस तरह की सेल्फी लेने और फिर उसे व्हाट्सएप पर भेजने या सोशल साइट पर अपलोड करने की जल्दी होती है। यही जल्दी एक लापरवाही में तब्दील होती है जिससे लोग अपनी जिंदगी की अपने हाथों बलि दे रहे हैं। जनवरी 2016 में सेल्फी लेने के चक्कर में मुंबई में पुलिस ने 16 पिकनिक स्पॉट को ‘नो सेल्फी जोन्स’ जोन बनाया। मकसद यही था कि फिर सेल्फी के चक्कर में किसी की जिंदगी नहीं जाए। इन्हीं सब चीजों को ध्यान में रखते हुए पिछले साल नासिक कुंभ मेले के दौरान कुछ जगहों पर भी ‘नो सेल्फी जोन्स’ बनाए गए थे। पिकनिक स्पॉट, समंदर की लहरों, ऊंची चट्टानों, नदी की जलधारा युवाओं को सेल्फी लेने के लिए आकर्षित करती है और यही दीवानगी जानलेवा साबित हो रही है। मैं देशवासियों से आग्रह करता हूँ कि आप सभी सैल्फी लें पर अपनी जिंदगी गवांकर नहीं।

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