समर्थन और विरोध के तर्कों के बीच जीएम फसलें

5:43 pm or October 2, 2016
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जीएम फसलों पर अभी तक संशय बरकरार
-शशांक दिवेदी
डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च), मेवाड़ यूनिवर्सिटी ,राजस्थान

जीएम (जेनेटिकली मॉडिफाइड) फसलों का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है । पिछले दिनों जीएम प्रौद्योगिकी के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, स्वास्थ्य तथा पर्यावरण संबंधी प्रभावों पर देश की की सात संस्थाओं ने मिल कर व्यापक अध्ययन किया है और अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया है। यह रिपोर्ट सरकारों के लिए जीएम फसलों के सामाजिक-आर्थिक मूल्यांकन के दिशा-निर्देश के दस्तावेज प्रस्तुत करती है। इस रिपोर्ट के आधार अपर अनुमान लगाया जा रहा है कि केंद्र सरकार जैव परिवर्तित (जीएम) सरसो की व्यवसायिक खेती को मंजूरी दे सकती है ।जीएम फसलों के पक्ष और विरोध में लोगों के अपने अपने तर्क है लेकिन ये बात सही है कि दुनिया के अधिकांश देशों में जीएम प्रौद्योगिकी को लेकर संशय है। जीएम फसल यानी जेनेटिकली मोडीफाइड या हिंदी में कहें जैविक रूप से कृत्रिम तरीके से बनाई गईं फसल बीज। जीएम फसलों के समर्थकों के अनुसार यह बीज साधारण बीज से कहीं अधिक उत्पादकता होंगे। उनके अनुसार इससे कृषि क्षेत्र की कई समस्याएं दूर हो जाएंगी। और फसल का उत्पादन का स्तर सुधरेगा। जबकि विरोधियों के अनुसार भले ही शुरूआती दौर में जीएम फसलों से उत्पादकता बढ़ जाएँ लेकिन बाद में जीएम फसल जैव विविधता को खासा नुकसान पहुंचाएगा ।

कृषि में जीएम (जेनेटिकली मॉडिफाइड) फसलों की स्वीकृति-अस्वीकृति पर बहस फरवरी 2010 में सामने आई, जब जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जीइएसी) की अनुशंसा के बावजूद तत्कालीन पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश ने बीटी बैंगन की जीएम खेती को मंजूरी देने से मना कर दिया। दरअसल, जीइएसी ने 14 अक्तूबर, 2009 को बीटी बैंगन को पूरी तरह सुरक्षित घोषित करके इसकी व्यावसायिक खेती को स्वीकृति दे दी थी। लेकिन लोगों और सामाजिक संस्थाओं के भारी विरोध के कारण इसे जयराम रमेश और उनके बाद जयंती नटराजन ने भी स्वीकृति देने से मना कर दिया। विभिन्न राज्यों की सरकारों ने भी अनेक आधारों पर अपने यहां आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) फसलों की खेती को मंजूरी देने से मना कर दिया।

भारत की अकेली जीएम ‘फसल’ बीटी कॉटन की खेती वर्ष 2002 में, अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी मोनसैंटो और महाराष्ट्र हाइब्रिड सीड कंपनी की साझेदारी से शुरू हुई थी। एक दशक तक तो बीटी कपास की खूब अच्छी पैदावार हुई, क्योंकि जीएम फसलों की खासियत यह होती है कि अधिक उर्वर होने के साथ ही, इनमें अधिक कीटनाशकों की जरूरत नहीं होती और ये सूखा-रोधी और बाढ़-रोधी भी होती हैं। लेकिन कुछ सालों के बाद स्थिति ये नहीं रही और बीटी कपास की फसलों में कृमि आने शुरू हो गए। महंगे बीजों, कीटनाशकों और बर्बाद हुई खेती के चलते हजारों बीटी कपास किसानों ने आत्महत्या की। 2014 में जर्मनी की गोटिंजेन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने पूरे विश्व में किए गए अपने कृषि सर्वेक्षणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि जीएम प्रौद्योगिकी से फसलों की पैदावार में 22 फीसद की बढ़त होती है, 37 फीसद कम कीटनाशक डालने पड़ते हैं और किसानों की आय 68 फीसद बढ़ जाती है और यह प्रौद्योगिकी विकसित देशों के मुकाबले विकासशील देशों के लिए अधिक लाभकारी है। दुसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र के अनुसार साल 2050 तक दुनिया की आबादी का पेट भरने के लिए आज से 70 फ़ीसदी ज्यादा खाद्य की जरूरत होगी। इसलिए पैदावार बढ़ाने के लिए खेती में नए प्रयोगों को महत्त्व देना होगा । अधिकांश वैज्ञानिक जीएम खेती की तरफदारी करते हैं। लेकिन कृषि-बायोटेक्नोलॉजी कार्यदल के अध्यक्ष एमएस स्वामीनाथन ने यह भी कहा कि यदि यह प्रौद्योगिकी अपना भी ली जाए, तो कृषि में जैव-विविधता बचाए रखने के लिए, इससे जुड़े विशेष क्षेत्रों को इस प्रौद्योगिकी से अलग रखा जा सकता है।

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हालांकि विभिन्न राज्यों में अनेक जीएम फसलों की खेती पर प्रयोग चल रहे हैं, लेकिन अभी तक केवल बीटी कपास पर सरकारी स्वीकृति मिली हुई है, जबकि अमेरिका में मक्का, सोयाबीन, कपास, कनोला, चुकंदर, पपीता, आलू; कनाडा में कनोला, सोयाबीन, चुकंदर; चीन में कपास, पपीता और पॉप्लर; अर्जेंटीना में सोयाबीन, मक्का, कपास, ब्राजील में सोयाबीन, मक्का, कपास तथा बांग्लादेश में बैंगन की जीएम खेती आधिकारिक रूप से होती है। अफ्रीका सहित कुछ अन्य देश हैं जो केवल मक्का और कपास की जीएम खेती करते हैं। फ्रांस और जर्मनी सहित यूरोपीय संघ के उन्नीस देशों में जीएम खेती पर पूर्ण प्रतिबंध है। यूरोपीय संघ के देशों में विदेशों से आयातित खाद्य पर भी लेबलिंग होना जरूरी है कि यह जीएम खाद्य है अथवा गैर-जीएम, जबकि अमेरिका में लेबलिंग अनिवार्य नहीं है। भारत में इस प्रौद्योगिकी का विरोध करने वालों का कहना है कि हमारे देश में कृषि में इतनी जैव-विविधता है, जो जीएम प्रौद्योगिकी को अपनाने से खत्म हो जाएगी। बड़ी बहुदेशीय कंपनियों के एकाधिकार के कारण किसानों को महंगे बीज और कीटनाशक उनसे खरीदने पड़ते हैं। खेती में काम करने वाले बहुत से हाथ भी इसे अपनाने से बेरोजगार हो जाएंगे। जीएम खाद्य का दो तरह से इंसानों के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ सकता है- एक तो उसे खाने से, दूसरा उन पशुओं के दूध और मांस के जरिए जो जीएम चारे पर पले हों। पर्यावरण पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

लेकिन अब खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से भारत इस पर नरम पड़ता दिख रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रौद्योगिकी को अपनाने से भारत के लगभग चौदह करोड़ किसानों को फायदा हो सकता है। फिलहाल भारत के आठ राज्यों में चावल, मक्का, सरसों, बैंगन, काबुली चना और कपास की जीएम खेती पर परीक्षण चल रहे हैं। किसी भी प्रकार की जीएम फसलों को मंजूरी देने से पहले इन फसलों के, उपभोक्ताओं के लिए सुरक्षित होने, किसानों के लिए दीर्घकाल तक लाभप्रद होने और पर्यावरण के अनुकूल होने पर, किसी स्वतंत्र वैज्ञानिक संस्था द्वारा व्यापक शोध और अध्ययन किए जाने की जरूरत है। तब यह शोधकार्य स्वायत्त संस्था ‘विकासशील देशों की अनुसंधान एवं सूचना प्रणाली (आरआइएस- रिसर्च ऐंड इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर डेवलपिंग कन्ट्रीज)’ ने अपने हाथों में लिया।

गुजरात इंस्टीट्यूट आँफ डेवलपमेंट रिसर्च, इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट, नेशनल एकेडमी आँफ एग्रीकल्चरल रिसर्च मैनेजमेंट, इंस्टीट्यूट आँफ सोशल-इकोनोमिक चेंज, तमिलनाडु एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी आँफ एग्रीकल्चरल साइंसेज- इन विशेषज्ञ संस्थाओं के साथ मिलकर आरआइएस ने जीएम फसलों से जुड़े विभिन्न पक्षों का व्यापक अध्ययन किया है और पिछले हफ्ते अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। यह रिपोर्ट सरकारों के लिए जीएम फसलों के सामाजिक-आर्थिक मूल्यांकन के दिशा-निर्देश के दस्तावेज प्रस्तुत करती है। इस अध्ययन में जीएम फसलों से जुड़े पांच महत्त्वपूर्ण पहलुओं – आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, स्वास्थ्य तथा पर्यावरण संबंधी पर शोध किया गया है । इसमें बीटी कपास के अलावा, एरोबिक चावल, बीटी बैंगन, सरसों और अन्य फसलों पर भी अध्ययन किया गया है। इसमें बताया गया है कि किसान विभिन्न फसलों की उन्नत किस्मों के बीजों के इच्छुक हैं। हालांकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एकाधिकार के कारण उन्हें महंगे बीज खरीदने पड़ते हैं, फिर भी वे इनके लिए ज्यादा खर्च करने को तैयार हैं, बशर्ते कि उनकी कमाई में इजाफा हो। कई किसान मानते हैं कि सूखा-रोधी और बाढ़-रोधी जीएम फसलें लाभकारी हो सकती हैं। जीएम फसलों में कम कीटनाशक डालने पड़ते हैं और पैदावार भी अधिक होती है। कीटनाशकों का कम प्रयोग किसानों के स्वास्थ्य और वातावरण के लिए भी फायदेमंद है। इससे भूमि की उत्पादकता पर विपरीत असर नहीं पड़ता और भूजल भी दूषित नहीं होता। दुनिया के हर देश में, किसानों और उपभोक्ताओं, दोनों में जीएम प्रौद्योगिकी को लेकर संशय है। अत: किसी भी देश में जीएम फसलों की मंजूरी उनके सामाजिक-आर्थिक प्रभाव के मूल्यांकन के बाद ही दी जा सकती है। इस लिहाज से यह रिपोर्ट खासी महत्त्वपूर्ण है। यह जहां इन फसलों के सुरक्षा संबंधी पक्ष को सामने रखती है, वहीं इनके लाभकारी पक्ष पर भी प्रकाश डालती है। बहरहाल जीएम फसलों पर अभी तक संशय बरकरार है इसके पक्ष और विपक्ष के अपने अपने मान्य तर्क है इसलिए इस मुद्दे पर सरकार को बिना जल्दबाजी किये हुए गंभीरता पूर्वक निर्णय लेना होगा । सरकार को जीएम सरसो की व्यवसायिक खेती की मंजूरी देने से पहले दुनियाँ भर के देशों में जीएम सरसों की खेती और उसके विभिन्न पक्षों /प्रभावों का भी अध्ययन करना चाहिए ।

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