सांप्रदायिकता के सहारे नाकामियां छिपाती भाजपा

5:52 pm or July 14, 2014
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हरे राम मिश्र-

श्चिमी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले मे स्थित कांठ कस्बे में पिछले दिनों एक धार्मिक स्थल से लाउडस्पीकर उतारे जाने को लेकर जमकर हिंसक बवाल हुआ। इस हिंसक बवाल में जहां मुरादाबाद के जिला अधिकारी की एक आंख फूट गई, वहीं एसएसपी, सीओ सहित कई अन्य पुलिस अफसर और सिपाही गंभीर रूप से घायल हो गए। इस बवाल में भारतीय जनता युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं, पष्चिमी उत्तर प्रदेश से निर्वाचित भाजपा सांसदों, विधायकों तथा उसके अन्य आनुसंगिक संगठनों की संलिप्तता जिस तरह से खुलेआम उजागर हुई, वह देश और प्रदेश की राजनीति के सामने कई गंभीर सवाल खड़े करती है। मुजफरनगर में पिछले साल हुई भीषण सांप्रदायिक हिंसा की त्रासदी को लोग अभी भुला भी नहीं सके थे कि एक बार फिर से भाजपा द्वारा छोटे से मुद्दे पर महापंचायत करने की जिद ने यह साबित कर दिया कि वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक और मुजफरनगर न केवल देखना चाहती है बल्कि मौका मिले तो खुद भी संलिप्त होकर चुनाव पूर्व उत्तर प्रदेश में एक और गोधरा कांड करने से गुरेज नही करेगी। इस घटना ने यह सिध्द कर दिया है कि पष्चिमी उत्तर प्रदेश आज भी सुलग रहा है और लोगों के बीच उपजे अविश्वास को आज तक नहीं पाटा जा सका है।

दरअसल इस पूरे बवाल की पृष्ठभूमि बहुत ही सामान्य थी, जिसे सामान्य समझदारी से ही हल किया जा सकता था। जिले के अकबरपुर के नया गांव में एक मन्दिर जो अनुसूचित जाति (जाधव) के लोगों से संबंधित है, पर हमेशा शिवरात्रि को लाउडस्पीकर लगाया जाता था, लेकिन बीती सोलह मई को मंदिर पर परम्परा के विपरीत लाउडस्पीकर लगा दिया गया। स्थानीय लोगों के विरोध के बाद जिला प्रशासन द्वारा इसे उतरवा दिया गया। सांप्रदायिक सौहार्द्र को बनाए रखने के लिए इसमें कुछ भी गलत नहीं था, लेकिन सांप्रदायिक मुद्दे की खोज में लगी रहने वाली भाजपा भाजपा को यह मुद्दा राजनैतिक फायदे की सीढ़ी लगा और वह इसमें कूद पड़ी। सियासी फायदे के लिए इस सवाल पर भाजपा ने महापंचायत करने का ऐलान कर दिया जिसमें पिछले दंगे के मुख्य आरोपी संगीत सोम से लेकर आस पास के तमाम सांसद और भाजपा विधायक अग्रणी भूमिका में थे। इस मुद्दे पर मुरादाबाद कई दिन सुलगा और अंतत: चार जुलाई को कांठ मे हिंसा भड़क गई और आज फिर तक हालात सामान्य नहीं हो सके।

अब सवाल यह बनता है कि आखिर भाजपा को इन सामान्य सवालों को सांप्रदायिक रंग देने की जरूरत क्यों पड़ रही है? इसके पीछे उसकी कौन सी राजनैतिक रणनीति काम कर रही है? आखिर इसके पीछे कौन सा माइंडसेट काम कर रहा है जो हालात को सामान्य नही होने देना चाहता। इस बवाल का असल नुकसान किसे उठाना होगा? आखिर भाजपा इस मुल्क को किस राह पर ले जाना चाह रही है? इन सवालों के तर्कपूर्ण उत्तर निकालना देश की राजनीति और उसके आवाम के हित में होगा।

गौरतलब है कि मोदी सरकार को अभी केन्द्र की सत्ता में आए दो माह भी नहीं हुए थे कि सरकार के तमाम जन विरोधी फैसले से लोगों में एनडीए सरकार के खिलाफ गुस्सा भर गया। लोगों को यह साफ लगने लगा कि ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ का नारा देकर सत्ता में आने वाले मोदी, वास्तव में कुछ खास लोगों के हितों के लिए ही काम कर रहे हैं। इन जन विरोधी फैसलों से आवाम को यह लगने लगा कि मोदी की पॉलिसी में आम जनता के लिए कुछ भी नहीं है। मोदी का ‘अच्छे दिन’ लाने का नारा महज एक धोखा था और ऐसा कोई दिन कहीं आने नहीं जा रहा है। इस मुल्क के इतिहास में षायद यह पहली बार हुआ है कि सरकार के जनविरोधी फैसलों के कारण उसके चुने जाने के एक माह के अंदर ही प्रधानमंत्री का पुतला फूंका गया हो। जब मोदी और भाजपा सरकार के पास लोगों को देने के लिए सिवाए मंहगाई, बेरोजगारी के अलावा कुछ न हो तो लोग गुस्सा क्यों नहीं होगें? भाजपा के सामने यक्ष प्रष्न यह था कि लोगों के इस गुस्से से निपटा कैसे जाए? उसे मैनेज कैसे किया जाए? इसके लिए उसने सांप्रदायिकता का अपना चिर परिचित अस्त्र निकाल लिया। वह हर एक घटना को अब सांप्रदायिक रूप देने लगी है ताकि धार्मिक भावनाओं की आड़ लेकर उपजाए गए फर्जी सवालों द्वारा मोदी सरकार की नाकामियों को छिपाया जा सके। वैसे भी केन्द्र में सत्ता में आने के बाद मोदी के दंगाइयों के हौसले काफी बुलंद हैं।

और फिर, अभी कुछ दिनों बाद उत्तर प्रदेश की कुछ सीटों पर उप चुनाव भी होने वाले है। ऐसे में सांप्रदायिक माहौल की बढ़ोत्तरी ही भाजपा के लाभ पहुंचा सकती है क्योंकि जिस तरह से भाजपा के खिलाफ मंहगाई और बेरोजगारी समेत आम जनता के अन्य सवालों को लेकर माहौल बनने लगा है उससे उसे उप चुनाव में हार जाने का भय भी सताने लगा है। ऐसे में भाजपा का प्रयास यही है कि लोग केवल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के आधार पर ही उप चुनाव में मतदान करें ताकि इन सीटों को फिर से जीत कर मोदी सरकार की नीतियों के पक्ष में जनता का समर्थन होने का भ्रामक प्रचार किया जा सके। चूंकि इस बार ‘विकास की राजनीति’ का भ्रम लेकर भाजपा उपचुनाव में कूदना नहीं चाहती, लिहाजा वह दूसरे छद्म मुद्दों की तलाश में भी है।

लेकिन फिर प्रश्न है कि मोदी की दंगाई सेना ने गुजरात के बाद उत्तर प्रदेश को ही अपने सांप्रदायिक प्रयोगों के लिए क्यों चुना है? शायद इसलिए कि यहां का निजाम बेहद अयोग्य और छद्म सेक्यूलर विचारों वाला ऐसा व्यक्ति है जिसका शासन को लेकर कोई विजन नही है। वह लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के सदमे से अभी तक उबर नही सका है। वह प्रदेश में भाजपा की मजबूती को ही अपने अस्तित्व की जरूरी शर्त मानता है। वह मोदी से मुकाबले को लेकर ‘कन्फ्यूज’ है। ऐसे में मोदी की दंगाई सेना जो पिछले मुजफरनगर हिंसा का लोकसभा चुनाव में बेहतरीन लाभ ले चुकी है, उत्साहित क्यों नही रहेगी? समाजवादी पार्टी सांप्रदायिकता के आधार पर ही मुस्लिम जनाधार में पैठ जमाने की कोशिश कर रही है। और इसीलिए वह भी कांठ प्रकरण में अपने लाभ के फूंक-फूंक कर ही कदम उठा रही है। एक बात और, कांठ की घटना ने एक और गंभीर सवाल भारतीय राजनीति के सामने खड़ा किया है- वह है दलितों का तेजी से ‘हिन्दुत्वीकरण’। संघ पिछले कई सालों से इस दिषा में काम कर रहा था और उसने इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की। पिछले लोकसभा चुनाव में पिछड़ी और दलित जातियों के एक बड़े वर्ग ने ‘विकास’ के नाम पर नरेन्द्र मोदी को वोट दिया था। आज संघ द्वारा भाजपा को दिए गए इस दलित समर्थन को नए सिरे से परिभाषित करने की कोषिषें हो रही हैं जो खतरनाक हैं। देश के दलितों का अपने को हिन्दू होने के गौरव की पहचान और एक हो जाने की संघी मुहिम ने देश की राजनीति को कुछ नए सवाल दिए हैं जिसका मंथन किया जाना चाहिए। देश के दलितों और पिछड़ों का भाजपा के साथ खड़ा होना खतरनाक है। कुल मिलाकर, कांठ की घटना ने यह साबित कर दिया है कि भाजपा के पास आज भी सांप्रदायिकता के अलावा राजनीति करने का न तो काई दूसरा अस्त्र है और न ही अपनी नाकामियों को छिपाने का कोई दूसरा तरीका। देखना है मोदी सांप्रदायिकता की आड़ में कब तक पूंजी का हित संवर्धन करते हैं।

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