भीम ऑटो पर राधिका वेमुला – सुभाष गाताडे

6:02 pm or March 10, 2017
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भीम ऑटो पर राधिका वेमुला

—– सुभाष गाताडे ——

मार्च महिन के मध्य से एक अलग ढंग की यात्रा तेलंगाणा और आंध्र प्रदेश की सड़कों पर निकलेंगी।

यात्रा एक नीले रंगे के पिकअप टरक ;जतनबाद्ध पर चलेगी – जिसे भीम आटो के नाम से संबोधित किया जा रहा है – और जिसमें अपने बेटे के साथ सवार होगी लगभग पचास साल की उम्र की राधिका वेमुला, उनका बेटा राजा और चन्द करीबी सहयोगी। दलित स्वाभिमान रथ यात्रा के नाम से संबोधित की जा रही प्रस्तुत यात्रा गांव गांव में बनी दलित बस्तियों में पहुंचेगी और लोगों को बताएंगी कि किस तरह जातिवादी ताकतों ने दलितों को उनके अधिकारों से वंचित कर रखा है और किस तरह आज तक उनके बडे़ बेटे रोहिथ वेमुला को – जो हैद्राबाद सेन्टल युनिवर्सिटी में रिसर्च स्कॉलर था और ऐसी ताकतों का विरोध करता था – न्याय नहीं मिल सका है, जिसे ऐसी ताकतों के चलते आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा था। (http://www.hindustantimes.com/india-news/rohith-vemula-s-mother-announces-dalit-rath-yatra-in-telangana-andhra/story-9uKlANIBSDUVovfS66U67N.html)

एक साल से अधिक वक्त गुजर गया जब रोहिथ ने आत्महत्या की, मगर अभी भी उसे न्याय दिलाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा सके हैं बल्कि टालमटोल की जा रही है। सभी जानते हैं कि किस तरह अंबेडकर स्टुडेंटस एसोसिएशन के इस जुझारू कार्यकर्ता ने – जिसने अपनी राजनीतिक जीवन की शुरूआत वामपंथी संगठन से की थी – उसने किस तरह विश्वविद्यालय परिसर में दक्षिणपंथी विचारों एवं उनके वाहक संगठनों की मुखालिफत की थी और किस तरह केन्द्र में बैठे प्रस्तुत संगठन के आंकाओं ने दबाव डाल कर उसे तथा उसके सहयोगी मेधावी दलित छात्रों के जीवन के साथ खिलवाड़ किया था, यहां तक कि कथित तौर पर दो केन्द्रीय मंत्रियों ने इस मामले में दखलंदाजी दी थी, उन्हें छात्रावासों से निकाल दिया गया, उनकी स्कालरशिप रोकी गयी थी और अंततः वह शिक्षा संस्थान के परिसर में टेन्ट लगा कर रहने को मजबूर किए गए थे। रोहिथ की आत्महत्या से पैदा आक्रोश ने देश भर में जबरदस्त सरगर्मी पैदा की थी, वाम तथा अंबेडकरवादी संगठनों ने तथा अन्य आम छात्रों ने मिल कर जोरदार आंदोलन चलाया था, जिसके चलते हैद्राबाद सेन्टल युनिवर्सिटी के विवादास्पद कुलपति पोडिले अप्पाराव को अस्थायी तौर पर अपने पद से हटना भी पड़ा था।

मगर जब आंदोलन की लहर का असर कम हुआ तो कुलपति ने अपना पदभार फिर ग्रहण किया और उनकी हर मुमकिन कोशिश यही है कि शिक्षा संस्थान के परिसर में असहमति की तमाम आवाज़ों को कुचल दिया जाए। विश्वविद्यालय प्रशासन विरोध के सभी स्वरों को खामोश करने के लिए इस कदर बेचैन रहा है कि जब रोहिथ की प्रथम बरसी /17 जनवरी/ पर छात्रों, युवकों तथा अन्य लोगों ने सुश्री राधिका वेमुला के साथ मिल कर रैली के जरिए विश्वविद्यालय में प्रवेश करना चाहा तो उन्हें अन्दर घुसने तक नहीं दिया गया और गेट पर ही गिरफतार किया गया था।
हालांकि अभी भी रोहिथ को न्याय नहीं मिला है, उसे आत्महत्या के लिए मजबूर करनेवाले बेदाग घुम रहे हैं, मगर इसी दौरान एक बात अवश्य हुई है कि पिछले साल उठे आन्दोलन के ज्वार के चलते रोहिथ की आत्महत्या को लेकर अनुसूचित जाति जनजाति /अत्याचार निवारण/ अधिनियम, 1989 के तहत पुलिस के पास प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हुई है जिसमें कथित तौर पर पोडिले अप्पाराव तथा दो केन्द्रीय मंत्रियों का भी जिक्र है। यह अलग बात है कि मामला वहीं लटका हुआ है, आगे की कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

प्रस्तुत यात्रा की गंभीरता को ऐसे भी समझा जा सकता है कि प्रशासन तथा सरकारों ने बेहद सुनियोजित तरीके से यह कोशिश चलायी है कि रोहिथ की दलित की पहचान से इन्कार किया जाए ताकि उसे एक रैडिकल कार्यकर्ता के तौर पर नहीं बल्कि एक धोखेबाज के तौर पर पेश किया जा सके। (http://www.epw.in/journal/2017/9/margin-speak/robbing-rohith-his-dalitness.html) अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ जब आंध्र प्रदेश की चंद्राबाबू नायडू की सरकार ने रोहिथ को लेकर कुछ गैरजिम्मेदाराना वक्तव्य दिए थे और फरवरी माह में माला नामक दलित जाति में जनमी राधिका वेमुला से मांग की थी कि वह 15 दिनों के अन्दर खुद के दलित होने को ‘प्रमाणित’ करे।

इसके पीछे का उनका तर्क सीधा है – रोहिथ के दलितत्व से इन्कार करो और उसकी आत्महत्या से जुड़ी प्रथम सूचना रिपोर्ट में जिन जिन लोगों के नाम दर्ज है, उनके खिलाफ दलित अत्याचार निवारण अधिनियम के सख्त प्रावधानों के तहत हो सकनेवाली कार्रवाई से उन्हें बचा लो। और इसे अंजाम देने के लिए उन्होंने हर मुमकिन तरीका अपनाया है ताकि रोहिथ को वडेरा जाति – एक पिछड़ी जाति जिससे उसके पिता आते हैं – का दिखाया जाए। ध्यान रहे कि रोहिथ के पिता ने बहुत पहले अपनी पत्नी राधिका वेमुला का परित्याग किया था और रोहिथ एवं उसके भाई बहनों का लालन पालन उनकी मां ने दलित बस्ती में रह कर ही किया।

इसे अंजाम देने के लिए उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के एक ऐतिहासिक फैसले तक की अनदेखी की है जिसे न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति रंजना देसाई की द्विसदस्यीय पीठ ने लगभग पांच साल पहले सुनाया था। अंतरजातीय विवाह के मामलों में जहां माता का ताल्लुक अनुसूचित समुदाय से हो तथा पिता कथित उंची जाति से जुड़ा हो, वहां पर बच्चे की जाति को कैसे तय किया जाए, उस पर उसने विचार किया था और मत दिया था कि ‘ऐसे बच्चे की जाति का निर्धारण तथ्यों के आधार पर होना चाहिए, जिसके लिए सबूत पेश किए जा सकें।’ अदालत के मुताबिक बच्चा अपनी मां की जाति पर दावा कर सकता है अगर उसे उसी ने पाला हो।’ फैसले में न्यायमूर्ति द्वय ने लिखा था ‘यह मानना कि ऐसे शादी से पैदा संतानों को अपने आप अपने पिता की जाति मिलेगी, इससे गंभीर समस्या पैदा हो सकती है’ / द हिन्दू, @ http://www.thehindu.com/todays-paper/tp-national/intercaste-child-can-get-st-status-if-raised-in-mothers-tribal-environs/article2821924.ec@

इतनाही नहीं प्रशासन को इस बात की भी कोई फिक्र नहीं है कि किस तरह रोहिथ ने अपने आप को दलित के तौर पर पहचाना था, जो बात वह अपने अंतिम वीडिओ में करता दिखता है। (http://indianexpress.com/article/india/india-news-india/i-am-a-dalit-says-rohith-vemula-video-before-suicide-3088768/) इस वीडिओ को उसके साथियों ने तब जारी किया जब उसकी जाति को लेकर सवाल खड़े किए जाने लगे। उपरोक्त वीडिओ में रोहिथ साफ कहता है –

‘मेरा नाम रोहिथ वेमुला है। मैं गुंटूर जिले का रहनेवाला दलित हूं। सभी को जयभीम। मैं वर्ष 2010 से हैद्राबाद विश्वविद्यालय का छात्रा हूं और समाज विज्ञान विभाग से पी एच डी कर रहा हूं। विश्वविद्यालय ने पांच दलित छात्रों को निलंबित करने का तथा उन्हें छात्रावास परिसरों से बाहर करने का निर्णय लिया है। हमें जो नोटिस थमाया गया है उसमें लिखा है कि सार्वजनिक स्थानों पर, छात्रावास परिसरों में प्रशासनिक भवन में महज हमारी उपस्थिति को भी आपराधिक कार्रवाई समझा जाएगा। मैं एक दैनंदिन श्रमिक का बेटा हूं और मेरी मां ने मुझे पाला है।’

गुंटूर जिला कलेक्टर कांतिलाल दांडे ने भी अपनी रिपोर्ट में रोहिथ को दलित प्रमाणित किया था और इस मामले में अनुसूचित जाति के लिए बने राष्टीय आयोग को जानकारी दी थी, जिसमें उन्होंने रोहिथ को दलित बताया था। कलेक्टर की रिपोर्ट तथा अन्य सूचनाओं के आधार पर आयोग ने भी अपनी अंतिम रिपोर्ट ने रोहिथ को दलित घोषित कर, उसे आत्महत्या के लिए मजबूर करनेवालों के खिलाफ अनुसूचित जाति जनजाति /अत्याचार निवारण/ अधिनियम, 1989 के सख्त प्रावधानों के तहत कार्रवाई करने की मांग भी की थी।

यह अलग बात है कि इस मामले की जांच के लिए बनाए गए एक सदस्यीय रूपनवाल आयोग ने उसे दिए टर्म आफ रेफरेन्स को लांघ कर रोहिथ की जाति पर अपना फैसला सुना दिया तथा उसे गैरदलित घोषित कर दिया, जबकि यह पहले से स्पष्ट था कि उन्हें इस मसले पर राय देने के लिए नहीं कहा गया था, न ही वह उसके लिए जिम्मेदार अधिकारी थे, जो ऐसा करने में सक्षम थे। इतनी सारी कवायद के बाद भी सरकार को शायद सुकून नहीं था। उन्हें शायद अन्देशा था कि रोहिथ की पहचान से इन्कार करने में उन्होंने निभाए विवादास्पद रोल को लेकर उनकी बदनामी हो सकती है, इसलिए उन्होंने एक और चाल चली। एक दसनापू श्रीनिवास, जो खुद एक दलित है मगर किसी हिन्दूवादी संगठन का कार्यकर्ता है, उसके माध्यम से गुंटूर के कलेक्टर के पास यह अर्जी दे डाली कि रोहिथ का छोटा भाई राजा वेमुला ने अपने आप को दलित साबित करने के लिए फर्जी प्रमाणपत्रा का इस्तेमाल किया है। विडम्बना ही है कि जिस कलेक्टर ने रोहिथ के दलित होने पर मुहर लगायी थी उसी ने उपरोक्त शिकायत को जिले की जाति पड़ताल कमेटी को भेज दिया और इस समिति ने कहा कि राजा दलित नहीं है।

पूरे मामले को सरसरी निगाह से देखनेवाले भी बता सकते हैं कि इस पूरे प्रसंग में केन्द्र सरकार का बहुत कुछ दांव पर लगा है। न केवल साख बल्कि केन्द्रीय मंत्रियों के पदों का सवाल भी जुड़ा है। और मामले के सभी आयामों को मददेनज़र रखते हुए उसने शायद यही तय किया है कि रोहिथ के दलितत्व को प्रमाणित करने का मामला जहां तक संभव हो टालते रहा जाए।

अगर हम मामले की तह में जाएं तो यह पता चलता है कि मामला महज रोहिथ के साथ हुए अन्याय तक सीमित नहीं है और न ही उसी बहाने हिन्दुत्व की सियासत के दलितद्रोही अन्तर्वस्तु पर से परदा हटने का नहीं है। यह बार बार देखने में आ रहा है कि विगत ढाई साल से अधिक वक्त़ से जबसे भाजपा हुकूमत में आयी है तब कई उदाहरण हमारे सामने आते हैं जहां किसी न किसी प्रकार से उसकी कोशिश दलितों के स्वतंत्रा एसर्शन अर्थात स्वतंत्रा दावेदारी को रोकने की रही है, भले ही वजीरे आज़म मोदी अपने आप को अंबेडकर का परम शिष्य घोषित करते फिरते हों। फिर चाहे हम आई आई टी मद्रास में दलित बहुजन छात्रों द्वारा गठित फोरम अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्कल पर पाबंदी लगाने के प्रसंग को देखें (http://nsi-delhi.blogspot.in/search/?q=ambedkar+periyar+study+circle) या मुंबई स्थित अंबेडकर भवन – जिसका निर्माण खुद डा अंबेडकर ने किया था – उसे ध्वस्त करने के मामले पर गौर करें (http://indianexpress.com/article/india/india-news-india/mumbais-ambedkar-bhavan-demolition-from-left-to-right-leaders-join-protest-2924596/) या राजस्थान के छात्रावास में रह रही मेधावी छात्रा डेल्टा मेघवाल के साथ हुए बलात्कार और उसकी हत्या के मामले को रफा दफा करने की कोशिशों को देखें (https://sabrangindia.in/article/real-story-behind-rape-and-killing-dalit-girl-student-delta-meghwal) या देश के अग्रणी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की बेहद प्रगतिशील एवं समावेशी प्रवेश नीति जिसने वंचित तबकों के वहां प्रवेश को बेहद सुगम बनाया था उसे कमजोर करने की, खतम करने की विश्वविद्यालय प्रशासन की कोशिश देखें, (https://www.telegraphindia.com/11a70102/jsp/nation/story_128075.jsp#.WL-HlG997IU) हम ऐसे कई उदाहरणों से रूबरू होते हैं जो मौजूदा हुकूमत के चिन्तन की मनुवादी अन्तर्वस्तु को बेपर्द करते हैं।

और यह अकारण नहीं था कि पिछले साल जब रोहिथ को न्याय दिलाने तथा देश भर के शिक्षा संस्थानों में भेदभाव की समाप्ति के लिए रोहिथ अधिनियम लागू करने को लेकर देशव्यापी आंदोलन हो रहा था और छात्रा-युवा समुदाय ही नहीं बल्कि दलित तबकों में बढ़ती बेचैनी ने हुकूमत को बचावात्मक पैंतरा अख्तियार करने के लिए मजबूर होना पड़ा था, उन्हीं दिनों समूची केसरिया पलटन ने मीडिया से सांठगांठ करके – फिर भले उसके लिए नकली वीडिओ का इस्तेमाल करना पड़े – ‘राष्टवाद’ के मसले को उछाला था तथा रोहिथ को न्याय दिलाने के मुददे से ध्यान भटकाने की कोशिश की थी।

जब तक इन पंक्तियों से आप रूबरू होंगे नीले टरक पर सवार होकर निकली राधिका वेमुला की इस स्वाभिमान यात्रा का आगाज़ हो चुका होगा। मौजूदा माहौल को देखते हुए और इस अनुभव पर गौर करते हुए कि केन्द्र में सत्तासीन सरकार किसी भी मामले में उत्पाडित तबके की मांगों को मानना तो दूर उनके प्रति संवेदनशीलता दिखाने से भी दूरी बनाए रखती है, इस बात का कयास लगाना मुश्किल नहीं है कि यात्रा का परिणाम क्या निकलेगा ?

नतीजा जो भी निकले, यह तो स्पष्ट है कि इस अनोखे संघर्ष में जिसके न्यायपूर्ण होने पर कोई सन्देह नहीं कर सकता उन्हें नैतिक जीत पहले ही मिल चुकी है।

रोहिथ गुजर गया है, मगर जिस मकसद के लिए वह लड़ रहा था, वह अभी अधूरा है।

प्रश्न उठता है कि कौन आगे आएगा ताकि आईन्दा किसी रोहिथ के सामने इस तरह अपनी जीवनलीला अधबीच ही समाप्त करने की नौबत न आए !

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