अंबेडकर और राष्ट्रवाद

10:38 am or June 29, 2016
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जिन राजनैतिक दलों ने डॉ. बाबासाहब अंबेडकर के समानता, सामाजिक न्याय, स्वतत्रंता और बंधुत्व के एजेण्डे को सुनियोजित ढंग से कमज़ोर किया, वे ही दल राजनैतिक लाभ के लिए बाबासाहब का 125वां जन्मदिवस धूमधाम से मना रहे हैं..

दरअसल, वे बाबासाहब की विरासत पर कब्ज़ा करना चाहते हैं और अंबेडकर को अपने राजनैतिक मंतव्यों के समर्थक के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं. तथ्य यह है कि अंबेडकर के विचार, इन पार्टियों की नीतियों, कार्यक्रमों और विचारधारा के एकदम उलट थे.

हिंदू राष्ट्रवादी कभी भी अपनी विद्वता के लिए नहीं जाने जाते थे परंतु उनकी समझ इतनी कम होगी, इसका बहुतों को अंदाज़ा नहीं था. या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि यह भलीभांति जानते हुए भी कि बाबासाहब उनके एजेण्डे के घोर विरोधी थे, वे उनके नाम का इस्तेमाल हिंदू राष्ट्रवाद को देश पर थोपने के लिए करना चाहते हैं.

बाबासाहब को ‘राष्ट्रवादी’ या ‘देशभक्त’ बताना, तथ्यों के साथ खिलवाड़ होगा. बाबासाहब एक उदारवादी प्रजातांत्रिक थे जो सामाजिक न्याय के साथ स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों के हामी थे. अपनी पुस्तक ‘‘पाकिस्तान ऑर द पार्टिशन ऑफ इंडिया’’ में बाबासाहब ने देश के विभाजन से जुड़े मुद्दों का राष्ट्रवादी परिप्रेक्ष्य से नहीं बल्कि तार्किक और वस्तुनिष्ठ परीक्षण किया है. इस पुस्तक में बाबासाहब ने मुसलमानों की पाकिस्तान की मांग और हिंदुओं के उसके विरोध का निष्पक्ष विश्लेषण किया है.

पुस्तक के 1946 में प्रकाशित संस्करण में बाबासाहब ने उसमें खंड 5 जोड़ा और इस विषय पर अपने विचारों को इस नए खंड के अध्याय 13 और 14 में प्रस्तुत किया. उन्होंने कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, पूर्वी आयरलैंड और स्विट्जरलैंड में धार्मिक, नस्लीय और भाशायी टकरावों का विश्लेषण किया और यह बताया कि ये देश किस तरह उपयुक्त प्रणालियां और शासन का ढांचा विकसित कर इन टकरावों का प्रबंधन कर रहे हैं. उनका निष्कर्ष यह है कि अल्पसंख्यकों को एक अलग देश की मांग करने की बजाए देश के संवैधानिक ढांचे में अपने हितों की रक्षा के लिए समुचित प्रावधान किए जाने की मांग करनी चाहिए. यहां यह ध्यान देने योग्य है कि बाबासाहब ‘‘अल्पसंख्यकों के हितों’’ की बात करते हैं, ‘राष्ट्र’’ के हितों की नहीं.

बंबई में 6 मई, 1945 को ऑल इंडिया शिड्यूल्ड कास्टस फेडरेशन के अधिवेषन को संबोधित करते हुए बाबासाहब ने आत्मनिर्णय के सिद्धांत का समर्थन करते हुए कहा कि ‘‘मैं पाकिस्तान के खिलाफ नहीं हूं. मैं यह मानता हूं कि पाकिस्तान की मांग, आत्मनिर्णय के सिद्धांत पर आधारित है और इस सिद्धांत पर प्रश्नचिन्ह लगाने के लिए अब बहुत देरी हो चुकी है. मैं उन्हें इस सिद्धांत का लाभ देने के लिए तैयार हूं…’’.

बाबासाहब का मानना था कि मुसलमान, पाकिस्तान की मांग की बजाए उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लेंगे क्योंकि उससे उन्हें बेहतर सुरक्षा उपलब्ध हो सकेगी और अपनी इसी सोच के चलते वे देश के विभाजन के विरोधी थे. इसके विपरीत, कोई राष्ट्रवादी देश के विभाजन के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर देता और आत्मनिर्णय के सिद्धांत की बात करना, उसके लिए ‘‘राष्ट्रविरोधी’’ और गुनाह होता. आज भी ‘आत्मनिर्णय’ शब्द का उच्चारण मात्र करने वाले व्यक्ति पर हिंदू राष्ट्रवादियों की भीड़ हल्ला बोलने के लिए हरदम तैयार रहती है. संक्षेप में, बाबासाहब का प्रस्ताव यह था कि विधायिका और कार्यपालिका में अल्पसंख्यकों का पर्याप्त

प्रतिनिधित्व सुनिष्चित करने के लिए उपयुक्त प्रावधान किए जाएं. वे लिखते हैं, ‘‘बहुसंख्यकों का शासन सिद्धांतः अस्वीकार्य और व्यवहार में अनुचित होगा. बहुसंख्यक समुदाय को प्रतिनिधित्व में आपेक्षिक बहुमत तो दिया जा सकता है परंतु वह कभी पूर्ण बहुमत का दावा नहीं कर सकता.’’ बाबासाहब यह नहीं चाहते थे कि विधायिका में बहुसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व इतना अधिक हो कि वह छोटे अल्पसंख्यक समुदायों की मदद से अपना शासन स्थापित कर ले.

बाबासाहब के अनुसार, भारत में विधायिका में बहुमत का अर्थ, सांप्रदायिक बहुमत होगा. यह स्थिति इंग्लैंड से एकदम अलग है जहां के सभी नागरिक मुख्यतः एक ही धर्म का पालन करते हैं और एक ही भाशा बोलते हैं. जहां तक भारत का सवाल है, यहां आनुपातिक प्रतिनिधित्व की बात तो दूर रही, किसी ऐसी सकारात्मक कार्यवाही की बात, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि अल्पसंख्यक विकास की दौड़ में पीछे न छूटें और उनके साथ भेदभाव न हो, करने मात्र से हिंदू राष्ट्रवादियों की भृकटियां तन जाती हैं और वे ऐसे किसी भी प्रयास को ‘‘अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण‘‘ बताते हैं.

अगर भारत के संविधान में विधायिका में आनुपातिक प्रतिनिधित्व और अल्पसंख्यकों के लिए पृथक मताधिकार की व्यवस्था नहीं है तो इसका कारण यह नहीं है कि बाबासाहब सिद्धांतः इसके खिलाफ थे बल्कि ऐसा इसलिए है क्योंकि संविधानसभा की अल्पसंख्यक व मूल अधिकार परामर्षदात्री समिति के अध्यक्ष सरदार पटेल ने अल्पसंख्यकों को सफलतापूर्वक पृथक मताधिकार की मांग न करने के लिए राज़ी कर लिया था और यह एक सही कदम था. विभाजन के बाद भारत में जो अल्पसंख्यक बच गए उन्हें ऐसा लगा कि उन्हें बहुसंख्यक समुदाय का सद्भाव अर्जित करना चाहिए {कांस्ट्यिूएंट असेम्बली डिबेट्स, खंड पांच (14.08.1947 से 30.08.1947), 2003, पृष्ठ 198-200}.

राष्ट्रवाद और हिंदू राज
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत का दावा है कि बाबासाहब, संघ की विचारधारा में यकीन करते थे और उन्होंने संघ के कार्यकर्ताओं को सामाजिक एकता और अखंडता का प्रतीक बताया था. भागवत ने यह दावा भी किया कि अंबेडकर, आरएसएस के भगवा ध्वज को राष्ट्रध्वज बनाना चाहते थे. इन दावों में कोई सच्चाई नहीं है.

बाबासाहब हिंदू धर्म के कटु विरोधी थे क्योंकि यह धर्म अछूत प्रथा और जाति-आधारित पदानुक्रम को स्वीकृति देता है. यही कारण है कि उन्होंने अपने उन तीन लाख समर्थकों, जिनने उनके साथ हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया था, को यह शपथ दिलवाई थी कि वे ब्रह्मा, विष्णु, महेश, राम और कृष्ण में कोई आस्था नहीं रखेंगे और हिंदू धर्म का पूर्णतः परित्याग करेंगे.

बाबासाहब ने न केवल जिन्ना के मुस्लिम राष्ट्रवाद की कड़ी निंदा की वरन उन्होंने यह भी लिखा कि पूरा विश्व राष्ट्रवाद की बुराईयों से परेशान है और किसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन की शरण में जाना चाहता है (डॉ. अंबेडकर, 1990, पृष्ठ 352-353). बाबासाहब के अनुसार, भारतीय केवल एक लोग हैं, राष्ट्र नहीं और वे यह भी मानते थे कि अगर भारतीय राष्ट्र नहीं हैं और राष्ट्र नहीं बनेंगे तो इसमें शर्म की कोई बात नहीं है (डॉ. अंबेडकर, 1990, पृष्ठ 353).

दूसरी ओर, आरएसएस का यह मानना है कि हिंदू राष्ट्र अत्यंत प्राचीन है, जिसका उदय दो हजार साल या उससे भी पहले हुआ था. हिंदू राज या हिंदू राष्ट्र भला एक राष्ट्र कैसे हो सकता है? बाबासाहब के अनुसार, हिंदू समाज गैर-प्रजातांत्रिक है और उसके इस गैर-प्रजातांत्रिक चरित्र के कारण, करोड़ों षूद्र, गैर-ब्राह्मण और अछूत घोर कष्ट भोग रहे हैं (डॉ. अंबेडकर, 1990, पृष्ठ 356).

जहां संघ हिंदू राष्ट्र की स्थापना करना चाहता है वहीं बाबासाहब की यह मान्यता थी कि हिंदू राष्ट्र, देश के लिए सबसे बड़ी आपदा होगा क्योंकि वह स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए बड़ा खतरा होगा और इसे किसी भी स्थिति में रोका जाना चाहिए (डॉ. अंबेडकर, 1990, पृष्ठ 358). जहां तक सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक स्थिति का संबंध है, बाबासाहब का यह मानना था कि इस संदर्भ में हिंदू समाज के निचले तबकों और मुसलमानों में कोई खास फर्क नहीं है और इन सबको एक होकर अपने उन मानवाधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करना चाहिए, जिनसे ऊँची जातियों ने उन्हें सदियों तक वंचित रखा (डॉ. अंबेडकर, 1990, पृष्ठ 359).

बाबासाहब के प्रति दिखावटी प्रेम
सत्ताधारी दल जहां एक ओर हिंदू राष्ट्र के गैर-प्रजातांत्रिक एजेंडे को आक्रामक ढंग से लागू करने के हर संभव प्रयास कर रहा है वहीं वह बाबासाहब पर कब्ज़ा ज़माने के लिए भी आतुर है. बाबासाहब के प्रति अपने प्रेम का प्रदर्षन करने के लिए वह उनके भव्य स्मारक बना रहा है और यह दावा कर रहा है कि उसने कांग्रेस की तुलना में बाबासाहब के कहीं अधिक स्मारक बनाए हैं. बाबासाहब के भव्य स्मारकों से दलित राजनेताओं का एक तबका, जो महत्वाकांक्षी नवदलित श्रेष्ठि वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, प्रसन्न हो सकता है और इससे दमित,

वंचित और भेदभाव के शिकार आम दलितों की आंखें चौंधिया सकती हैं परंतु ये भव्य स्मारक, दलितों की मूल समस्याओं को हल नहीं कर सकते. ईट-पत्थर के स्मारक बाबासाहब के विचारों का प्रसार नहीं करेंगे और ना ही वे दलितों को समानता, सामाजिक न्याय और गरिमा के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देंगे. बाबासाहब की मूर्तियां और उनके शानदार स्मारक, दरअसल, दलितों की अंतरात्मा की आवाज़ को कमज़ोर करेंगे और उन्हें अपने महानायकों से वंचित करेंगे.

सत्ताधारी दल एक ओर बाबासाहब के भव्य स्मारक बना रहा है तो दूसरी ओर स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और सामाजिक न्याय के उन सिद्धांतों को कमज़ोर करने के प्रयास में जुटा हुआ है, जो भारत के उस संविधान में निहित हैं जिसे बाबासाहब ने घोर परिश्रम से तैयार किया था और संविधानसभा से पारित करवाया था. जो लोग बाबासाहब के भव्य स्मारक बना रहे हैं वे ही अदालतों के प्रांगणों में पुलिस की मौजूदगी में उन लोगों पर, जो उनके विचारों से सहमत नहीं हैं, हिंसक हमले कर रहे हैं. और ऐसे लोगों के खिलाफ कोई कार्यवाही भी नहीं हो रही है.

स्वतंत्रता के सिद्धांत का घोर उल्लंघन करते हुए वे कुछ चुनिंदा नारों को उन लोगों के मुंह में ठूंस रहे हैं जो इन नारों को नहीं लगाना चाहते. वे राष्ट्रवाद के नाम पर नए पदानुक्रम बना रहे हैं और देश को इसके लिए मजबूर कर रहे हैं कि वह नव-राष्ट्रवादियों के विषेशाधिकारों को स्वीकार करे. ये नव-राष्ट्रवादी स्वाधीनता संग्राम के दौरान औपनिवेशिक सत्ता के साथ थे. वे चाहते हैं कि उनसे असहमत लोगों को समान नागरिक अधिकारों से वंचित कर दिया जाए.

दरअसल, वे नव-अछूतों का एक नया वर्ग बनाना चाहते हैं. ये नव-अछूत हैं देश के अल्पसंख्यक, महिलाएं, किसान, श्रमिक, कुछ ओबीसी समुदाय और वे दलित और आदिवासी, जिन्हें ये राष्ट्रवादी अपने झंडे तले ले आए हैं. कानून के राज को चुनौती देते हुए ये राष्ट्रवादी हिंसा कर रहे हैं और नफरत फैलाने वाले भाषण दे रहे हैं. इनकी हिंसा के शिकार हैं नव-अछूत.

कांग्रेस के शासन के दौरान, उस पार्टी ने भी बाबासाहब को केवल औपचारिक रूप से सम्मान दिया था. कांग्रेस के राज में भी दलित उतने ही दमित थे जितने आज हैं. उनके साथ उतना ही भेदभाव किया जाता था जितना आज किया जाता है और वे आज भी अपने रोजाना की जिंदगी में उतनी ही हिंसा का सामना कर रहे हैं जितनी उस समय किया करते थे. उस समय भी दलितों की पीने की पानी के स्त्रोतों और शासकीय सुविधाओं तक पहुंच नहीं थी. आंध्रप्रदेश के गुंटूर जिले के सुदूर गांव और बेलची में हुए दलित हत्याकांड और भागलपुर में कैदियों को अंधा करने की घटनाएं इसकी गवाह हैं.

कांग्रेस ने भी दलितों के साथ भेदभाव करते हुए कुछ दलित नेताओं के सामने सरकारी कल्याण योजनाओं के टुकड़े फंेक कर उन्हें अपने साथ मिला लिया था.

प्रजातंत्र में आस्था रखने वाले हम सभी भारतीय नागरिकों को हमारी संस्कृति के प्रजातंत्रिकरण के लिए एकजुट होकर संघर्ष करना होगा और बाबासाहब की समानता और सामाजिक न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाना होगा. इसी राह पर चलकर भारत में सचमुच अच्छे दिन आएंगे

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