वजूद के संकट में मायावती – प्रमोद भार्गव

2:40 pm or March 20, 2017
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वजूद के संकट में मायावती

—– प्रमोद भार्गव —–

दलित हितों की रक्षा और सार्वजन के नारों के बूते दिल्ली की सत्ता हथियाने की होड़ में लगी मायावती का स्वप्न तो चकनाचूर हुआ ही, बहुजन समाज पार्टी को अखिल भारतीय आधार देने के मंसूबे भी ध्वस्त हो गए। साफ है, मायावती और उनकी पार्टी जबरदस्त वजूद बचाने के संकट में घिर गए हैं। सामाजिक अभियांत्रिकी के बहाने जातीय उन्माद के असंगत गठजोड़ का प्रतीक बने हाथी को आखिरकार बहुजन ने ही लगाम लगा दी। मायावती भले ही कहती रहें कि उनका दलित वोट बैंक तो स्थिर है, किंतु इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों द्वारा गड़बड़ी कर दी गई। गौरतलब है कि दलित और मुस्लिम मतदाताओं के बेमेल गठजोड़ ने इस राजसी-नेत्री के न केवल स्वप्न नकारा है, बल्कि माया की उस महत्वकांक्षा को भी नकारा है, जिसने दलितों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल कर अपराधी, माफियाओं, बाहुवलियों और भ्रष्टाचारियों जैसे असामाजिक तत्वों को हाथी की पीठ पर लाद उत्तर प्रदेश की सत्ता हथियाने की कोशिश की थी।

यह लोकतंत्र की ही महिमा है कि देश का कोई भी दलित नागरिक राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बनने का स्वप्न देख सकता है। संविधान में प्रदत्त ऐस प्रावधानों के चलते आम आदमी सक्रिय राजनीति में बढ़-चढ़कर भागीदारी कर रहा है। वह समाज और राजनीति मे ंनए परिवर्तन लाने का माद्दा भी रखता है। अलबत्ता यहां संकट वह नेतृत्व है, जो जन-आकांक्षाओं पर खरा उतरने की बजाए स्वयं की आकांक्षा पूर्ति की जल्दबाजी में अपना धीरज खो देता है। परिणामस्वरूप वास्तविक दायित्व और नैतिक कत्र्तव्यपरायणता को नजरअंदाज कर असमाजिक तत्वों के अनैतिक गठजोड़ की गोद में जा बैठता है। अन्य क्षेत्रीय दलों की तरह मायावती ने भी यही किया, वे बहुजन के उभार से मिली उस शक्ति को आत्मसात नहीं कर पाईं, जो राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस और भाजपा के बाद तीसरे अखिल भारतीय दल के रूप में राष्ट्रीय विकल्प बन सकता था ? इसी विकल्प की केंद्रीय धुरी से दलित प्रधानमंत्री अवतरित होता। इस जनभावना को आत्मसात करने के लिए मायावती को कांशीराम से विरासत में मिली बहुजन हितकारी विचारधारा और जनहित के स्वस्थ कार्यक्रमों को ईमानदारी से धरातल पर क्रियान्वित करने की जरूरत थी, लेकिन असफल रहीं। अंबेडकर ने दलितों को संवैधानिक अधिकार दिए। काशीराम ने इन अधिकारों के प्रति चेतना जगाई, किंतु मायावती ने इन्हें भुनाकर केवल सत्ता हथियाने का काम किया। उनकी कथित सोशल इंजीनियरिंग सत्ता पर काबिज होने के लिए थी, न कि समाज बदलने के लिए। अपने हितों पर चोट न पहुंचे, इसलिए उन्होंने पार्टी का न तो संगठनात्मक ढांचा खड़ा किया और न ही नया दलित नेतृत्व उभरने दिया।

मायावती ने मूर्तियों के माध्यम से दैवीय प्रतीक गढ़ने की जो कवायद की, हकीकत में ऐसी कोशिशें ही आज तक हरिजन, आदिवासी और दलितों को कमजोर बनाए रखती चली आई हैं। उद्यानों पर खर्च की गई धन राशि को यदि बंुदेलखण्ड की गरीबी दूर करने अथवा दलितों के लिए ही उत्कृष्ठ विद्यालय व अस्पताल खोलने में खर्च की गई होती तो एक तरफ खेती-किसानी की माली हालत निखरती और दूसरी तरफ वंचितों को निशुल्क शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाएं मिलती। किंतु मायावती की अब तक की कार्य संस्कृति में मानक व आदर्श उपायों और नई दृष्टि का सर्वथा अभाव रहा। इसके उलट सवर्ण और पिछड़ों को लुभाने के लिहाज से मु,यमंत्री रहते हुए 22 कानून शिथिल किए थे, जो उत्तर-प्रदेश अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत आते थे।

आरक्षण की सुविधा के चलते चिकित्सा और उच्च तकीनीकी संस्थानों में प्रवेश पा लेने वाले दलित छात्रों का जातीय और अंग्रेजी में पारंगत न होने के आधार पर लगातार उत्पीड़न झेलना पड़ रहा है। नतीजतन छात्र लगातार आत्महत्याएं कर रहे हैं। लखनऊ के छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्व विद्यालय में वंचित तबकों के करीब पचास ऐसे छात्र हैं, जिन्हें शास्त्रीय अंग्रेजी की कमजोरी के चलते लगातार अनुत्तीर्ण किया जा रहा है। दिल्ली के एम्स में भी उत्पीडन के चलते कई दलित छात्र आत्महत्या कर चुके हैं। किंतु मायावती ने इस भाषायी समस्या के निदान की कभी कोई पहल की हो, देखने में नहीं आया ? देश में 13 लाख से भी ज्यादा दलित महिलाएं सिर पर मैला ढोने के काम में लगी हैं, लेकिन मायावती ने कभी इस समस्या से निजात के लिए राज्यसभा में हुंकार भरी हो, कानों में गूंजी नहीं ? ऐसे में बसपा का दलित वोट बैंक का खिसकना लाजमी है ? उनका दल उत्तर प्रदेश में महज 18 सीटों पर सिमट गया और अन्य किसी प्रांत में तो खता भी नहीं खुल पाया। नतीजतन अगली बार मायावती राज्यसभा सदस्य भी निर्वाचित नहीं हो पाएंगी।

मायावती जिस जाति और वर्ग से आती हैं, गोया उन्हें अनुभूति होनी चाहिए की मूर्तिपूजा, व्यक्तिपूजा और प्रतीक पूजा के लिए ढ़ली प्रस्तर-शिलाओं ने मानवता को अपाहिज बनाने का काम किया है। जब किसी व्यक्ति की व्यक्तिवादी महात्वाकांक्षा, सामाजिक चिंताओं और सरोकारों से बड़ी हो जाती है, तो उसकी दिशा बदल जाती है। मायावती इसी मानसिक दुर्दशा की शिकार हुई हैं। महत्वकांक्षा और वाद अंततः हानि पहुंचने की ही पृष्ठभूमि रचते हैं। आंबेडकर के समाजवादी आंदोलन को यदि सबसे ज्यादा किसी ने हानि पहंुचाई है तो वह ‘बुद्धवाद’ है। जिस तरह से बुद्ध ने सामंतवाद से संघर्ष कर रहे अंगुलिमाल से हथियार डलवाकर राजसत्ता के विरुद्ध जारी जंग को खत्म करवा दिया था, उसी तर्ज पर दलितों के बुद्धवाद और मायावती की प्रधानमंत्री बनने की महत्वकांक्षा ने व्यवस्था के खिलाफ जारी लड़ाई को आखिरकार कमजोर ही किया।

बहुजन समाजवादी पार्टी को वजूद में लाने से पहले कांशीराम ने लंबे समय तक दलितों के हितों की मुहिम डीएस-4 के माध्यम से लड़ी थी। इस डीएस-4 का सांगठनिक ढांचा खड़ा करने के वक्त बसपा की बुनियाद पड़ी और पूरे हिन्दी क्षेत्र में बसपा का आधार तैयार हुआ। कांशीराम के वैचारिक दर्शन में आंबेडकर से आगे जाने की सोच तो थी ही, दलित और वंचितों को करिश्माई अंदाज में लुभाने की प्रभावी शक्ति भी थी। यही कारण रहा कि बसपा दलित संगठन के रूप में सामने आई, लेकिन मायावती की धन व पद लोलुपता ने बसपा में विभिन्न प्रयोगों व प्रतीकों का तड़का लगाकर उसके बुनियादी सिद्धांतों के साथ खिलवाड़ किया। नतीजतन कालांतर में बसपा सवर्ण और दलित तथा शोषक और शोषितों का बेमेल समीकरण बिठानक में लगी रही। बसपा के इन संस्करणों में कार्यकर्ताओं की भूमिका नगण्य रही। वे गैर दलित उम्मीदवारों को बसपा का टिकट बेचती रही। ऐसी ही कुछ अन्य वजहें हैं कि मायावती ने उन नीतियों और व्यवहार को महत्व नहीं दिया जो सामाजिक, शैक्षिक व आर्थिक विषमताएं दूर करते हुए सामाजिक समरसता का माहौल बनाने वाली साबित होतीं।

सवर्ण नेतृत्व को दरकिनार कर पिछड़ा और दलित नेतृत्व तीन दशक पहले मण्डल आयोग की अनुशंसाएं लागू होने के बाद इस आधार पर परवान चढ़ा था कि पिछले कई दशकों से केंद्र व राज्यों में सत्ता में रही कांग्रेस ने न तो सबके लिए शिक्षा, रोजगार और न्याय के अवसर उपलब्ध कराए और न ही सामंतवादी व जातिवादी संरचना को तोड़ने में अंह्म भूमिका निभाई। बल्कि नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों ने इन जड़-मूल्यों को और सींचने का काम किया। लिहाजा सामाजिक, शैक्षिक व आर्थिक विषमता की खाई उत्तरोत्तर प्रशस्त ही हुई। इसलिए अपेक्षा थी कि पिछड़े, हरिजन, दलित व आदिवासी समूह राजनीति व प्रशासन की मुख्यधारा में आएं। स्त्रीजन्य वर्जनाओं को तोडं़े। अस्पृश्यता व अंधविश्वास के खिलाफ लडे़ं। ऐसा होता तो रूढ़ मान्यताएं खंडित होकर समाज से विसर्जित होतीं और विचार संपन्न नव-समाज आकार लेता। लेकिन पिछड़े और दलित नेताओं ने किसी भी प्रकार के पाखण्ड से लड़ने को जोखिम नहीं उठाया। इसके उलट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘सबका साथ, सबका विकास‘ का शखंनाथ करते हुए अपना देशव्यापी जनाधार बढ़ाते चले जा रहे हैं। सामाजिक समरसता और शैक्षिक व आर्थिक विषमता दूर करने का यही मूल-मंत्र है।

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