तपती धरती पिघलता जीवन – शब्बीर कादरी

2:22 pm or April 1, 2017
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तपती धरती पिघलता जीवन

 —– शब्बीर कादरी —–

ग्रीष्मकाल की पहचान यूं तो गर्मी के लिए होती हैै पर पिछले कुछ दशक से इस मौसम में भारत सहित विश्व के अधिकांश शहरों में बढ़ते हुए तापमान ने मौसम विज्ञानियों को चैकन्ना कर दिया है, इस तापमान ने अपना रौद्र रूप दिखाकर कई मनुष्यों और पशुओं को अकाल मौत का शिकार तो बनाया ही है, पेयजल और कृषि उत्पादन की स्थिति को भी विकराल रूप से प्रभावित कर अधिसंख्य जीवों के जीने की राह दुश्वार कर दी है। विश्वभर में वातावरण का तापमान क्यों बढ़ रहा है और इसके दुष्परिणाम क्या होंगे इस बिंदू पर विकसित और विकासशील देशों के वैज्ञानिक एकजुट हो चिंतन कर रहे है और इससे बचने के उपाय भी सुझा रहे है। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि संयुक्त राष्ट्र की मौसम एजेंसी में दर्ज पिछले 150 वर्षों के तापमान के रिकार्ड का अध्ययन करने पर मालूम होता है कि विश्व में अब तक के पिछले सबसे गर्म दस वर्ष 1994 के बाद ही पड़े हैं जो लगातार बढ़ रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग और अलनीनौ मौसम सिद्धांत के कारण दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन ने चेता दिया है कि यदि मानवजाति अपनी जीवनशैली बदलने को अब भी तैयार नहीं तो आपदाआंे की श्रंखला उसके अस्तित्व पर गहन संकट बनकर टूट पड़ेगी।  हाल ही मंे विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्लूएमओ) ने एक रिपोट्र्र स्टेट आॅफ दी ग्लोबल क्लाइमेट जारी की है जिसमें धरती पर बढ़ते तापमान को रेखांकित किया गया है रिपोर्ट में कहा गया है कि पूर्व औ़़द्योगिक काल वर्ष (1750-1850) की तुलना में धरती का तापमान 1.1 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। इस कारण आर्कटिक क्षेत्र में तेजी से बर्फ की चादर झीनी हो रही है जाहिर है खतरे का यह सूचक मानवजाति के जीवन चक्र को उलट-पुलट में बदल देगा।

बढ़ते तापमान से ग्लोबल वार्मिंग में वृद्धि दर्ज की जाने लगी है, कई शहरों की समुद्र सतह में बढ़ोतरी आंकी जा रही है और समुद्री जीवों पर संकट मंडराने लगा है। समुद्री सतह में वृद्धि से प्राकृतिक तटांेे का कटाव शुरू हो जाएगा इस प्रकार मानव बसाहट का बड़ा हिस्सा डूब में आ सकता है और तटीय इलाकों में रहने वाले लोग बेघर हो जाऐेंगे। बढ़ते तापमान का प्रभाव दूसरी तौर पर मानवीय स्वास्थ्य पर भी पड़ेगाा मलेरिया, डेंगू ओर यलो फीवर जैसे संक्रामक रोग अधिक प्रतिरोधक क्षमता केे साथ मनुष्य पर हमला करंेगे और हमारी चिकित्सा व्यवस्था को चुनौती देंगे। वैज्ञानिक मानते हैं कि हमारे पास पीने के लिए स्वच्छ जल,खाने के लिए ताजा भोजन और सांस लेने के लिए स्वच्छ वायु की कमी पेश आ सकती है। 2016 में तापमान मे सबसे अधिक वृद्धि का प्रभाव यह देखा गया कि समुद्र का जलस्तर पहले की तुलना में और अधिक बढ़ गया। समुद्री सतह का तापमान बढ़ने से आर्कटिक क्षेत्र मेें बर्फ का द्रव्यमान 04 मिलियन स्क्वाॅयर किलोमीटर गिरा है जिससे ट्रापिकल वाटर में समुद्री जीवों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा और उनकी जान गई यहां तक कि आर्कटिक क्षेत्र में लाखों व्यक्तियों को जान बचाने के लिए विस्थापित भी होना पड़ा है। कई वर्ष पूर्व मौसम विज्ञानियों ने हमंे चेताया था कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते यदि वातावरण तापमान में दो डिग्री से. की वृद्धि दर्ज की गई तो इसके दुष्परिणाम से दुनियाभर में गरीबी पर बुरा प्रभाव पड़ेगा अब इस चेतावनी को साक्षात महसूूस किया जा रहा है। इसके दुष्परिणामों से दुनिया भर के विभिन्न क्षेत्रों में गरीबी के और भी बुरे प्रभाव हो सकते हैं।’ ‘टर्न डाउन द हीटः कंफ्रंटिंग द न्यू क्लाइमेट नाॅर्मल’ नामक नई रिपोर्ट का मुख्य ध्यान गर्मी के विशेष क्षेत्रीय प्रभावों पर है। रिपोर्ट के अनुसार दो डिग्री की वृद्धि ब्राजील की सोयाबीन फसल का उत्पादन 70 फीसदी तक कम कर सकती है। पिघलते ग्लेशियर एंडीज के आसपास के शहरों के लिए खतरा बन सकते हैं और पश्चिमी तट पर रहने वाले समुदायों की मत्स्य आपूर्ति क्षीण हो सकती है। दो डिग्री की वृद्धि से मकदूनिया में मक्का, गेहूँ और अंगूर की फसलों के उत्पादों में 50 फीसदी की कमी आ सकती है। उत्तरी रूस में इसके कारण बर्फ से ढका क्षेत्र लगातार पिघलेगा। इसके कारण नुकसानदायक मेथेन का उत्सर्जन बढ़ सकता है, जिसके चलते ऊष्मण के चलन में वृद्धि होगी। विश्व बैंक ने अत्यधिक गरीबी को वर्ष 2030 तक मिटाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। यह तभी किया जा सकता है जब हम ऊष्मण वृद्धि को महज दो डिग्री के अंदर तक सीमित रखें।

अभी हाल यह है कि जलवायु परिवर्तन के चलते वतावरण में कार्बन-डाई-आक्साइड 400-0:01 प्रति मिलियन बढ़ गया है। इससे श्वसन प्र्र्रणाली, त्वचा, ब्रेन औेर एलर्जिक रोगो में वृद्धी अंकित की जा सकती है। (डब्लूएमओ) की एक रिपोट्र्र स्टेट आॅफ दी ग्लोबल क्लाइमेट के अनुसार हर दस वर्ष में तापमान में 0.1 से 0.2 डिग्री से. बढ़ोत्री मापी जा रही है बढ़ते तापमान से वर्ष 2016 भी झुलसता गुजरा,  अब वर्ष 2017 में गर्मी की तेजी ने अपने तेवर अभी से दिखा दिये हैं। भारत के अधिसंख्य शहर अत्यंत भीषण गर्मी से पिघल कर रिकार्ड तोड़ रहे हैं। डब्लूएचओ का कहना है कि वर्ष 2017 में भी ग्लोबल वार्मिंग से बचा नहीं जा सकेगा जबकि अलनीनों अभी तक नहीं आया है हालांकि समुद्री गर्म हवाऐं 2017 में तीन बार से अधिक बार चल चुकी हैं आर्कटिक क्षेत्र में इसका असर उच्च स्तर पर है वहां बर्फ का स्तर लगातार गिरने से मौसम ओर जलवायु पर परिवर्तन की रफ्तार अपनी गति से जारी हैै। यह सब आगामी खतरे के संकेत हैैं

विश्व के विकसित देशों का राजनीतिक नेतृत्व इस दिशा में अपनी नीतियों और कूटनीतियों के अनुसार वर्तमान परिस्थिति से लगभग निश्चिंत नजर आता है। डब्लूएमओं का मत है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पेरिस समझौते के प्रति नकारात्मक नीति इस स्थिति को चिंताजनक बनाती है क्योंकि पेरिस समझौते पर अमल न होने की स्थिति में संभावित परिवर्तन को नियंत्रित करना  तो दूर उसके वर्तमान ट्रेंड को स्थिर रखना भी संभव नहीं हो पाएगा। विषम परिस्थिति में ट्रंप के लिए जरूरी है कि वे नासा और डब्लूएमओ की रिपोर्ट के देखते हुए अपने रवैए में बदलाव पेश करें। हमारे देश के ऊर्जा मंत्री ने भी हाल ही में दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम पर्यावरण पर वैश्विक सम्मेलन-2017 को संबोेधित करते हुए कहा है कि हमें एलइडी और अक्षय ऊर्जा का उपयोग बढ़ाने की जरूरत है क्योंकि जलवायु परिवर्तन केवल मानव जनित समस्या है ओर जिसका समाधान भी वही कर सकता है।

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