गुरू गोरखनाथ और उनकी विरासत

2:39 pm or April 1, 2017
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गुरू गोरखनाथ और उनकी विरासत

योगी आदित्यनाथ के उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री चुने जाने के निर्णय ने मोदी सरकार के सबसे प्रबल समर्थकों को भी चकित कर दिया है। वर्ष 2014 और 2017 में भाजपा के लिए मतदान करने वाले युवा पुरूष और महिलाएं भी विकास के एजेंडे के भविष्य को लेकर वास्तव में चिंतित हैं। वे योगी के रूप में नफरत की राजनीति, बहुसंख्यकवाद, ध्रुवीकरण, सांप्रदायिक विचारधारा, सामाजिक अपरिपक्वता, और गुंडागिरी के अपने भय को मूर्त होते हुए देखते है।

यह एक विडंबना ही है कि योगी की नैतिक, राजनैतिक शक्ति और संसाधनों का जो स्त्रोत है वह उनके विचारों और कृत्यों के बिलकुल विपरीत है जिनके माध्यम से वे उत्पीड़क, हिंसक, मुस्लिम विरोधी और महिला विरोधी प्रतीत होते है।

गोरखपुर स्थित गोरखनाथ पीठ या मठ, जिसके प्रमुख महंत आदित्यनाथ योगी है, सदियों से तार्किकता, सहिष्णुता, जात-पात विहीन, वर्गविहीन, लोकतांत्रिक-मानवतावादी विचार और उनका पालन करने हेतु प्रचार करने वाले मठ के रूप में जाना जाता है। जैसा कि आगे उल्लेखित है, वास्तव में, योगी की गोरखनाथ पीठ ने पैगंबर मोहम्मद को बुद्धिमान व्यक्ति के रूप में स्वीकार किया है। जिस भूमि पर गोरखनाथ मंदिर स्थित है, वह एक मुस्लिम नवाब द्वारा मठ को दान दी गई थी।

गोरखनाथ के क्रांतिकारी वक्तव्य

सामान्यतः, अधीनस्थ आंदोलनों (दलितों और गैरबराबरी के शिकार लोगों द्वारा अपनी स्थिति में सुधार के लिये किये गये आंदोलन) को गैर-वैदिक या यहां तक कि वैदिक विरोधी के रूप में दर्षाया गया है किन्तु 12 वीं शताब्दी के विश्वप्रसिद्ध महान संत गुरु गोरखनाथ जो शिव के अवतार तथा हठयोग और नाथ संप्रदाय, एवं  वाममार्ग के भी जनक माने जाते है ने तीसरा मध्यमार्ग प्रशस्त किया। गोरखनाथ अनेक क्षत्रिय कुलों, नेपाली गोरखा और चीन तथा इंडोनेशिया के अन्य उप-कुलों के संस्थापक पिता भी हैं जिनके नाम से योगी की पीठ चलती है। उनमें वैदिक देवताओं के प्रति निष्ठा है लेकिन ज्ञान की ठोस, भौतिक शर्तों की व्याख्या करने के लिए वेदों और उपनिषदों के अर्थ का वे विस्तार करते है।

गोरखनाथ ने सत्ता पर सवाल उठाये, उन्होंने अनुभव के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने और जाति भेद से उपर उठकर व्यक्ति का महत्व स्थापित करने पर जोर दिया। उन्होने कहा था:-

अदेखी देखीबा, देखी विचारिबा अदिष्टि राखिबा चीया।

आप भजिबा, सद्गुरू खोजीबा, जोगपंथ न करिबा हेला।

अर्थात- अदृष्य को देखो (स्वयं को अनुभव करों), देखे हुये के बारे में सोचो, अंधविश्वास पर भरोसा मत करो। समस्याओं का स्वयं समाधान करो। एक सच्चे गुरु की खोज करो और किसी भी संप्रदाय का अन्धानुकरण मत करो।

ये वास्तव में, क्रांतिकारी पंक्तियां हैं। गोरख स्पष्ट रूप से यह कहते है कि ‘‘किसी भी सिद्धांत या विश्वास की पूजा मत करो। तुम स्वयं की पूजा करो, सच्चाई में विश्वास करो जो तुम्हारे भीतर अंतर्निहित है…..’’ गोरख आगे कहते हैं, आपका अपना प्रकाश हो और जो कुछ भी तुमने उस प्रकाश की चमक में देखा है वह तुम्हारा है जो तुम्हे ग्रहण करना है। तत्पष्चात चिन्तन कीजिये, सोचिये और अनुभव कीजिये। फिर उस अनुभव से जो आपकी अपेक्षाओं के अनुकूल निकलता है, वही सचमुच तुम्हारा है।

यदि यही बात कहीं अन्य जगह प्रतिध्वनित होती है तो वह ह्यूम और डेकार्टेस, के संदर्भ में प्रतिध्वनित होती है जो 16 वीं/17 वीं शताब्दी में पश्चिमी ज्ञान के अग्रणी दार्शनिक थे। अनुभव और तर्क के संदर्भ में क्रमशः ह्यूम और डेसकार्टेस के विचार गोरखनाथ के विचारों का समर्थन करते है।

इसलिए यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि गोरख का  दृष्टिकोण वैज्ञानिक था और वे अपने समय से बहुत आगे थे। वेदों का सिर्फ शाब्दिक पाठ करने के फल पर उन्होने जो सवाल उठाये है वैसी ही बात भगवद्गीता में भी कही गई है।

आस्था और तर्क

गोरख के अनुसार ‘केवल तभी आपकी आस्था (चिन्तन, तर्क और अनुभव पर आधारित) दृढ़ होगी और आपमें भक्ति आयेगी, जब आप अपने दिव्य अनुभव के फल का स्वाद चख लेंगे। तब आपके सभी संदेह मिट जाएंगे। यह भक्ति सरल, वास्तविक और सांप्रदायिक सीमाओं के मापदंडों के बाहर होगी। आप केवल तभी आस्था और भक्ति पर अपना दावा कर सकते है।’

गोरख सिद्धांत और व्यवहार के साम्य पर भी जोर देते हैं:

पाथिदेखी पंडिता राही देखी सरम अपनी करनी उतारिबा परम।

अर्थात- हे पंडित! तुम पर्याप्त सीख चुके हो। जो कुछ भी तुमने सच्चा सीखा है, उसे व्यवहार में लाओ। यदि तुम ऐसा करते हो (जैसा कि मैंने तुम्हे बताया) तो तुम पार लग जाओगे।

गोरख अज्ञात को जानने पर जोर देते हैं। यहां वे पंडित या परंपरागत ज्ञान बाॅटने वाले व्यक्तियों को नसीहत देते हुये रूढ़िवादिता को पुनः चुनौती देते है।

अबूझि बूझिले हो पंडित, अकथ कथिले कहानी।

शीश नवावन्त सद्गुरु मिलिया, जागत रैन बिहानी।

हे पंडित, अबोध्य का बोध प्राप्त कर, अनकही कथा को कह।

जब तुम उस परमसत्ता के समक्ष आत्मसमर्पण कर दोगे तभी तुम्हे गुरू मिलेगा। तब तुम नींद में भी अपने आप को जागृत पाओगे।

महन्तशाही के विरोधी

गोरख वैदिक ज्ञान का सम्मान करते हैं लेकिन वह महन्तशाही के खिलाफ है। वे वेदों का अध्ययन करने वालों को कहते हैं- ‘पौत्रों’ (पिताजी और दादाजी के बाद तीसरा स्थान) तुम्हारे पिताजी और दादाजी दोनों वे है जो न सिर्फ वेदों का पाठ करके बल्कि उनका अनुभव और गहन चिन्तन करके सत्य को खोज रहे है। इसलिए उन्हें उच्च श्रेणी में रखा गया है।

इसलिए, गोरख के अनुसार जो वेदों को नहीं जानते हैं, लेकिन अनुभव और चिन्तन में समृद्ध हैं वे वेद पढ़ने वाले पंडितों से ऊपर है।

कथनीकथाई सो शीषेबोलिये वेद पढ़े सो नाती।

रेहनी रेहई सो गुरू हमारा हम राह तक साथी।

अर्थात- जो कहे गये को दोहराता है, वह एक छात्र है, जो भी वेद (शास्त्र) सीखता है वह पौत्र है।, जो सत्य के साथ जी रहा है वह हमारा गुरू है। मैं उसका मित्र हूं, जो उस सच्चाई में जी रहा है।

रहेता हमारे गुरू बोलिये हम रहे तक चेला।

मन माने तो संग फिरे, नी तो फिरे अकेला।

जो भी (सच्चाई के साथ) जी रहा है वह मेरा गुरू है, मैं उसका (सच्चाई का) शिष्य हूँ। जब भी मैं चाहूं, मैं उसके (गुरू के) साथ रहता हूं  अन्यथा मैं अकेला रहता हूं।

ज्योत जगे सिरथान में सूरज कोटि समान।

जो सुख गहरा जानियो, धरो ज्योति का ध्यान।

अर्थात- प्रकाश जो मस्तिष्क के अंदर प्रकट हो रहा है वह अनगिनत सूर्य के प्रकाश के समान है। यदि आप गहरी खुशी को जानना चाहते हैं तो उस प्रकाश का ध्यान करें।

जहां जोग तहां रोग न ब्यापे, ऐसा पारखी गुरू करना।

तन-मन सुनजे पारखी नाही, तो काहे को पचि मरना।

अर्थात- जहां योग है, कोई रोग और भ्रम नहीं है, इस तरह के (अनुभवी) गुरु को तलाशो। जिसने शरीर और मन की पहचान नहीं की है, वे आजीवन कष्ट भोगेंगे।

आसनद्रिध आहारद्रिध जे निद्रादिध होय।

गोरख कहे सुनो रे पुतर, मरे न बुड्ढा होय।

गोरख कहते है कि – हे बच्चों, सुनो- जब आसन की स्थिति सुनिश्चित हो, खाने की प्रक्रिया सही हो और नींद में भी जो जागृत हो, वह न तो कभी बूढ़ा होता है और न ही कभी मरता है।

हबीकिनाबोलीबा, थबाकिनचालीवा, धीरेधरीबापांव।

गरब न करिबा सहजे रहिबा भणत गोरख्राणवम।

अर्थात- आवेग में आकर बात न करें, अहंकार भरी चाल न चलें, धीरे-धीरे चलें, भगवान गोरख कहते हैं, गर्व न करें, और सरल जीवन जियें।

गोरख और जात-पांत से मुक्ति

गोरख गुरुनानक, कबीर और भक्ति आंदोलन के अन्य कवियों से सीधे प्रभावित थे। नाथ संप्रदाय ने एक आंदोलन चलाया जिसने अंततः हिन्दू साधु बिरादरी को जाति का त्याग करने और एक समतावादी व्यवस्था बनाने के लिए प्रेरित किया, जिसमें एक साधु की पृष्ठभूमि और सामाजिक उत्पत्ति अप्रासंगिक थी। परिणामस्वरूप, भारतीय इतिहास के प्रारंभिक आधुनिक काल में आज पिछड़ी और दलित कही जाने वाली जातियों में से दादू, बाबदास और रैदास जैसे अनेक बुद्धिजीवी और संत निकले।

दक्षिण एशियाई परंपराओं में गुरु गोरखनाथ द्वारा जातिभेद से मुक्ति दिलाने में अदा की गई भूमिका काफी महत्वपूर्ण है।   19वीं शताब्दी के ज्योतिबा फुले और छत्रपति शाहू महाराज सहित कई सुधारवादियों ने गोरखनाथ को सम्मान दिया है।

गोरख और मोहम्मद बोध

नाथ सम्प्रदाय के योगियों, जो गोरख के अनुयायी है, सूफी पीर और मुस्लिम भक्तों के बीच परस्पर संबंध इतने अधिक गहरे हैं कि विद्वानों ने इस दक्षिण एशियाई सामंजस्य के विभिन्न पहलुओं पर पूरे खंड लिखे हैं। मुसलमान, विशेष रूप से पेशावर के जाफरपीर और पंजाब के मुस्लिम योगी आज भी स्वयं को गोरखनाथ के अनुयाई कहते है।

लेकिन इस अंतर्फलक का सबसे दिलचस्प और प्रासंगिक हिस्सा मोहम्मद बोध (मोहम्मद का ज्ञान) है जो गुरू गोरखनाथ की शिक्षाओं में समाविष्ट है। दक्षिण एशिया के अनुशासनिक शैक्षणिक पत्र ‘वेरोनिक बूलियर’ में एक वयोवृद्ध शिक्षाविद और नाथ परंपरा के ज्ञाता उल्लेख करते है कि मोहम्मद बोध (पैगंबर मोहम्मद का ज्ञान) गोरखनाथ पीठ की शिक्षाओं का एक अनिवार्य हिस्सा था। (देखें https://Samaj.revues.org/3878)

नाथ-संप्रदाय में बौद्ध धर्म और जैन धर्म की शिक्षाओं को भी शामिल किया गया है। सूफी ग्रन्थों में भी अनुयायियों की शिक्षा के लिये कुछ अध्याय गुरू गोरखनाथ के विचारों को समर्पित किये गये है।

नवाब आसाफ-उद-दौला और गोरख पीठ

मुस्लिम और सूफी संतों पर गोरख का प्रभाव इतना अधिक था कि गोरखपुर के 18 वीं शताब्दी के महान सूफी संत रोशन अली शाह ने अवध के तत्कालीन नवाब आसाफ-उद-दौला को गोरखपुर मठ के लिए भूमि दान देने हेतु अनुरोध किया।

आसफ-उद-दौला ने इमामबाड़ा के निर्माण के लिए रोशन अली शाह को अनुदान दिया था। किन्तु रोशन अली गोरख मंदिर के लिए भी उतना ही अनुदान चाहते थे।

इंडियन एक्सप्रेस के 8 फरवरी, 2007 के संस्करण में  एक लेख प्रकाशित हुआ है जिसमें इमामबाड़ा के वर्तमान अध्यक्ष अदनान शाह को उद्धृत करते हुये लिखा गया है कि ‘‘ सूफी संतों ने कैसे आधा गोरखपुर अपने लिए और शेष आधा अपने हिन्दू भाइयों के लिये चाहा था।’’

इसी लेख में गोरखपुर विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर चितरंजन मिश्रा को स्पष्ट रूप से उद्धृत करते हुये कहा गया था कि किंवदंतियों के अलावा, यह दस्तावेजी साक्ष्य भी है कि असफ-उद-दौला ने इमामबड़ा और गोरखपीठ के लिए भूमि और संपत्तियां दान की थी। आज भी शहर का अधिकांश भाग या तो इमामबाड़ा के स्वामित्व में हैं या पीठ के।

(देखें- http://archive.indianexpress.com/news/sufi-tradition-waits- for-peace-in-gorakhpur/22791/2)

आसफ-उद-दौला द्वारा गोरखपीठ को जमीन दान देने के और भी प्रमाण गोरख मंदिर के रिकार्ड और इमामबाड़ा के 200 वर्ष पुराने अभिलेखागार में मौजूद हैं।

योगी आदित्यनाथ और वर्तमान

रोशन अली शाह का इमामबाड़ा गोरखपुर में हिंदू-मुस्लिम तीर्थस्थल का एक महान केंद्र है। योगी आदित्यनाथ, जिन्होने गोरखनाथ की दिव्य और रूढिवाद विरोधी शिक्षाओं को विकृत कर गोरखपुर में एक मुस्लिम-विरोधी विरासत का निर्माण किया है, वे एक ऐसे मठ में बैठते है जोएक मुस्लिम नवाब द्वारा उनके पूर्ववर्तियों को दान में दिया गया था।

यह तो पराकाष्ठा है कि योगी आदित्यनाथ ने 2007 में मोहर्रम के दौरान इमामबाड़ा के ताजिया जुलूस को रोक दिया था, जिसकी वजह से गोरखपुर के मियां बाजार इलाके में दुकान चलाने वाले 2000 हिंदुओं को लूट लिया गया था। योगी के कृत्यों ने गोरखपुर में आयोजित ‘खिचड़ी मेला’ में विशाल हिंदू और मुस्लिम भागीदारी को भी प्रभावित किया।

योगी आदित्यनाथ के कृत्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा सोशल मीडिया पर किये जा रहे इस प्रचार के विरूद्ध जाते है कि उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री किस प्रकार मुसलमानों के प्रति उदार है। कड़वा सच यह है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने गोरखपुर की उदार हिंदू विरासत की हत्या कर दी है।

जैसा कि गुरु गोरख चाहते थे ‘‘गोरखपुर की यात्रा करने वाले व्यक्ति को गोरखपुर की साझा संस्कृति की वास्तविकता जानने के लिए, गोरख मंदिर और इमामबाड़ा, दोनों जगह जाना चाहिए। इससे उन्हे यह भी पता चलेगा कि शहर के लोकाचार को विकृत करने की कोशिश कौन लोग कर रहे है।’

स्रोतः-

  • Agrawal, Purushottam (2011) ‘The Naths in Hindi Literature’, in David N. Lorenzen& Adrian Munoz (eds.), Yogi Heroes and Poets: History and Legends of the Nāths, New York: SUNY Press, pp. 3-18.
  • Badā’ūnī, ‘Abd al-Qādir (1986) Muntaḫab al-tawārīḫ, English translation: Muntakhabu-t-tawārīkh, W. H. Lowe, ed., Delhi: Renaissance, vol. 2.
  • Bharthwal, Pitambardatta (ed.) (1994) Gorakhbānī, Prayag: Hindi SahityaSammelan.
  • Bhattacharya, France (2003-2004) ‘Untexte du Bengalemédiéval: le yoga du kalandar (Yoga-Kalandar). Yoga etsoufisme, le confluent de deuxfleuves’, BEFEO, 90-91, pp. 69-99.

 

 

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