‘वॉचडॉग या लैपडॉग’   मीडिया आखिर जनाब मोदी को किस तरह ‘कवर’ करता है

12:52 pm or July 7, 2014
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सुभाष गाताडे-

पनी हुकूमत के पहले तीस दिन पूरे होने के अवसर पर लिखे अपने ब्लॉग में तमाम अन्य बातों के अलावा जनाब मोदी ने यह उल्लेख किया कि किस तरह उनकी सरकार को कोई ‘हनीमून पीरियड’ नहीं मिला और सत्ता की सूत्रों सम्भालते ही उनकी आलोचना शुरू हुई। बहरहाल अगर तथ्यों को देखें तो कोई भी तटस्थ्य विश्लेषक वज़ीरे आज़म मोदी के इस कथन से असहमत हो सकता है और इस बात को उजागर कर सकता है कि उनके दावे और जमीनी हालात की स्थिति में गहरा अन्तराल है।

इस छोटेसे अन्तराल में ही ऐसी तमाम मिसालें दी जा सकती हैं जो बताती है कि मीडिया – जिसने चुनावी मुहिम के दिनों में भी उनके प्रति बेहद नरम रूख अख्तियार किया था – उसके रूख में कोई गुणात्मक तब्दीली नहीं आयी है। और उसने ऐसे मसलों से कन्नी काटने की लगातार कोशिश की है, जो मोदी की प्रक्षेपित छवि के लिए प्रतिकूल मालूम पड़ते हों। न उनके प्रधान सचिव के तौर पर जनाब एन के मिश्रा की नियुक्ति के लिए नवनिर्वाचित सरकार द्वारा अध्यादेश के सहारा लिए जाने की आलोचना हुई , जिसके चलते इसके पहले की वाजपेयी की अगुआाईवाली राजग सरकार के एक अहम फैसले को पलटा गया था और न ही गोपाल सुब्रह्यण्यम नामक एक बेदाग छवि वाले न्यायविद के सर्वोच्च न्यायालय में नामांकन को बाधित करने के लिए सीबीआई एवं इंटेलिजेन्स ब्युरो की तरफ से फैलायी गयी इधर उधर की बातों को लेकर कोई हल्ला मचा।

अब बड़े गाजेबाजे के साथ सम्पन्न हुई उनकी भूटान यात्रा को ही देखें – जो उनकी पहली विदेश यात्रा थी – जिसमें उन्होंने भूटान सरकार को 4,500 करोड़ रूपए की मदद का ऐलान किया। मुख्यधारा की मीडिया में यह ख़बर कहीं देखने को ही नहीं मिली कि किस तरह भूटान की नेशनल असेम्ब्ली के अपने सम्बोधन में उन्होंने ‘भूटान’ को ‘नेपाल’ के तौर पर सम्बोधित किया और अपनी ‘गलती सुधारते हुए’ फिर उसे ‘लड़ाख’ के तौर पर सम्बोधित किया, जबकि वहां गणमान्य लोग मौजूद थे। निश्चित तौर पर यह जबान फिसलने की बात थी, मगर राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसे प्रसंगों को ढंका नहीं जाता, ऐसी बातें रिपोर्ट अवश्य की जाती हैं।

अगर सोशल मीडिया खासकर टि्वटर नहीं होता यह ख़बर दबी ही रह जाती। कल्पना करें कि (पूर्व) प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अगर अपनी किसी आधिकारिक यात्रा में ऐसी गलती करते तो क्या मीडिया उनके प्रति उतनी ही सहानुभूति का परिचय देता या उन्हें चार उलाहना और देता। यह सही है कि भूटान की असेम्ब्ली में जनाब मोदी की जुबां फिसली थी, जबकि चुनाव प्रचार मुहिम में उनके भाषण तथ्यों की गैरजानकारी के लिए चर्चित हो चले थे। हम अभी भी याद कर सकते हैं कि किस तरह उन्होंने दावा किया था कि ‘पटेल के अन्तिम संस्कार में नेहरू शामिल नहीं हुए थे’ जबकि तथ्य इसके विपरीत थे ; पटना की अपनी रैली में उन्होंने ‘एलेक्जाण्डर के बिहार पहुंचने और बिहारियों द्वारा उसे शिकस्त देने’ और ‘तक्षशिला के बिहार में होने’ की बात कही थी, जबकि सच्चाई यही थी कि एलेक्जाण्डर ने कभी गंगा नहीं लांघी थी और तक्षशिला पाकिस्तान में स्थित है।

अक्षरधाम आतंकी हमले को लेकर आए अदालती फैसले को ही पलटें, जो उसी दिन आया था जबकि लोकसभा चुनावों के नतीजे घोषित हो रहे थे। देश की सर्वोच्च न्यायालय ने इस हमले में संलिप्तता के नाम पर बारह साल से जेलों में सड़ रहे अभियुक्तों को बेदाग बरी करते हुए उन्हें इस मामले में फंसाने वाले अधिकारियों एवं जिम्मेदार मंत्री के खिलाफ तीखी टिप्पणियां की थीं। अदालत का कहना था कि इन निरपराधों को ‘प्रीवेन्शन आफ टेररिस्ट एक्ट’ अर्थात पोटा के तहत लाने का फैसला ‘बिना सोच कर लिया गया था।’ तथ्य बताते हैं कि उन दिनों गुजरात सरकार के मुख्यमंत्रीपद पर नरेन्द्र मोदी ही विराजमान थे और गृहमंत्रालय – जो ऐसे निर्णय लेता था – उन्हीं के मातहत था। इन निरपराधों को फंसाने में मुब्तिला दोषी पुलिस अधिकारियों को दंडित करने, इन निरपराधों को उचित मुआवजा देने आदि की बात तो छोड़ ही दें, मीडिया की मुख्यधारा ने इस अहम ख़बर को लेकर चुप्पी बरतना ही मुनासिब समझा था। इस मुद्दे को लेकर राजधानी दिल्ली में आयोजित एक प्रेस सम्मेलन में अपनी बात रखते हुए अक्षरधाम आतंकी मामले में फंसाए गए व्यक्ति ने आपबीती बयां की थी। उसका कहना था अपनी जेल यात्राा के दौरान उसकी मुलाकात बी एल सिंघल नामक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से हुई थी, जो खुद उन दिनों इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ मामले में जेल की सलाखों के पीछे थे। उसने सिंघल को पूछा – जो उन दिनों अपने बुरे दिन से गुजर रहे थे, जबकि कुछ समय पहले ही उनके बेटे द्वारा की गयी आत्महत्या का समाचार मिला था – कि आपने मुझे क्यों फंसाया, जिसका उनके पास कोई जवाब नहीं था।

यही सिंघल, जो चार हत्याओं के अभियुक्त हैं, और इन दिनों जमानत पर चल रहे हैं, उन्हें गुजरात सरकार ने अपने पद पर बहाल कर दिया। यहां पर भी मीडिया ने इस बहाली को लेकर दिखायी जा रही जल्दबाजी को लेकर कोई बात नहीं की, न उसने यह बात रेखांकित की कि प्रथमदृश्या अर्थात प्राइमा फेसी उनके खिलाफ मामला बनता है और न यह जोर देकर कहा कि इन फर्जी मुठभेड़ों के गवाह के तौर पर वह महत्वपूर्ण कड़ी हैं। कुछ माह पहले यह ख़बर राष्ट्रीय मीडिया में छायी थी कि किस तरह इन्हीं सिंघल ने जांच एजेंसियों को एक आडिओ टेप सौंपी है जो इस बात के प्रमाण प्रस्तुत करती है कि उन्हें इस फर्जी मुठभेड मामले में ऊपर से निर्देश मिले थे। टेप में उल्लेखित ‘सफेद दाढ़ी’ और ‘लाल दाढ़ी’ से किसकी तरफ इशारा है, यह भी उसमें बताया गया था। (http:// www.truthofgujarat.com/gujarat-government-reinstates-gl-singhal-quadruple-murder-accused-snoopgate-protagonist/)

मगर मीडिया के मौन ही हद संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण का जवाब देते वक्त जनाब मोदी द्वारा कही गयी अहम बातों के सन्दर्भ में अधिक प्रखरता से उजागर होती है, जिसमें उन्होंने ‘बारह सौ साल की गुलाम मानसिकता’ की बात की थी। उनका कहना था कि ‘बारह सौ साल की गुलामी की मानसिकता हमें परेशान कर रही है। बहुत बार हमसे थोड़ा उंचा व्यक्ति मिले तो सर उंचा करके बात करने की हमारी ताकत नहीं होती।’

अब इस बात पर लिखा जा चुका है कि किस तरह हर भारतीय आज तक ‘दो साल की गुलामी’ की बात ही सुनता आया है जबकि अंग्रेजों ने यहां शासन किया। 1757 में प्लासी की लड़ाई में हुई भारतीय रजवाड़ों की हार से लेकर 1947 में बर्तानवी उपनिवेशवादियों की वापसी के इस अन्तराल को ही मुख्यत: गुलामी के कालखण्ड के तौर पर चित्रित किया जाता रहा है। यह इस मामले में भी वस्तुनिष्ठ बयान मालूम पड़ता है क्योंकि इसके पहले यहां आए तमाम आक्रांता यहीं के होकर रह गए। वे भले ही टर्की से आए हों या अरब मुल्कों से आए हों या मध्य एशिया से आए हों, उन्होंने यहां की जनता को लूट कर कहीं ‘बाहरी मुल्कों’ में – जहां से वे आए थे – नहीं भेजा। यह अकारण नहीं कि यहां गंगा जमनी तहजीब ने एक नायाब शक्ल धारण की, जिसकी छाप कई जगहों पर दिखती है।

संसद के पटल पर प्रधानमंत्री के मुंह से निकली यह बात निश्चित ही कोई साधारण बात नहीं थी, जो एक तरह से इतिहास की एक नयी व्याख्या का सूत्रपात करने की खास समूहों में चल रही कोशिशों को ही नयी वैधता देने का प्रयास था। बर्तानवी शासकों एवं पहले के मुस्लिम शासकों के बीच के फरक को खारिज करनेवाला यह चिन्तन सारत: एक बहुसंख्यकवादी विमर्श को जुबां देना था।

विडम्बना ही कही जाएगी कि जनाब दीनानाथ बात्रा की अगुआई में ‘आक्षेपार्ह’ लगनेवाली किताबों को ‘लुगदी’ बनाने या उन्हें ‘संशोधित’ करने की जो मुहिम इधर बीच तेजी पकड़ी है, जिसको लेकर प्रबुध्द समुदाय में एक गुस्सा है, उसकी ख़बरें देने में संकोच न करनेवाले मीडिया ने संसद के पटल पर जनाब मोदी के इस वक्तव्य को समाचार लायक भी नहीं समझा।

अधिक चिन्ताजनक बात यह भी है कि यह कोई पहली दफा नहीं था कि मोदी ने यह कहा हो, और न ही इसे उनके जुबां फिसलने तक सीमित किया जा सकता है, इसके पहले की कई सभाओं में वह यही बात कहते दिखे हैं। पिछले साल पंद्रह अगस्त के अपने सम्बोधन में जो उन्होंने गुजरात में दिया था, वहां पर भी उन्होंने ‘1,200 साल की इसी गुलामी’ की बात की थी। जानकार बता सकते हैं कि संघ के दायरों में यही समझदारी विद्यमान है। आपातकाल, जिसे भारतीय लोकतंत्र का एक ‘काला अध्याय’ समझा जाता है, उसकी सालगिरह पिछले दिनों ‘मनायी गयी।’ यह ऐसा दौर था जब हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जेल की सलाखों के पीछे डाला गया था और नागरिक आजादियों एव जनतांत्रिक अधिकारों में जबरदस्त कटौती की गयी थी। यही वह कालखण्ड था जब मीडिया जिसे ‘जनतंत्रा का प्रहरी’ कहा जाता है, उसके शर्मनाक समर्पण की बातें सामने आयी थीं। आपातकाल के दौरान मीडिया के इस व्यवहार को लेकर एक विश्लेषक की टिप्पणी काबिलेगौर थी ‘ उन्होंने रेंगना कुबूल किया जबकि उन्हें झुकने के लिए कहा जा रहा था।’ आज भले ही ऐसा कोई आपातकाल नहीं है, मगर शायद मीडिया इस बात को प्रमाणित करना चाहता है कि आपातकाल में उसके व्यवहार को अपवाद नहीं समझा जा सकता।

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