स्कूल में दीनदयाल तालीम की उपेक्षा, नफरत की दीक्षा ? -सुभाष गाताडे

3:57 pm or April 7, 2017
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स्कूल में दीनदयाल

तालीम की उपेक्षा, नफरत की दीक्षा ?

—– सुभाष गाताडे ——

पड़ोसी मुल्क बांगलादेश के शिक्षाविद पिछले दिनों अचम्भित थे जब सरकार की तरफ से जारी किए गए नए पाठयपुस्तकों में से सतरह कहानियां और कविताएं अचानक ‘विलुप्त’ दिखी, जिसे लेकर उसकी तरफ से कोई स्पष्टीकरण भी नहीं दिया गया था। बाद में पता चला कि जब शिक्षा मंत्रालय पाठयपुस्तकों के नए संस्करण तैयार करने में मुब्तिला था तब रूढिवादी इस्लामिक धार्मिक विद्वानों ने मांग की थी कि इन्हें हटाया जाए क्योंकि यह उनके हिसाब से ‘नास्तिकतावादी’ दिखती हैं। बहरहाल सेक्युलर हुकूमत में चल रहे बांगलादेश के पाठयपुस्तकों में लाए जा रहे बदलाव या जोड़ी जा रहीं बातें बरबस भारत के शिक्षा जगत पर ध्यान दिलाती हैं, जहां ऐसे बदलावों को चतुर्दिक महसूस किया जा सकता है। इस सन्दर्भ में सूबा राजस्थान एक किस्म की नज़ीर बनता दिख रहा है।

गौरतलब है कि सूबे के शिक्षा मंत्रालय के कर्ताधर्ता जनाब वासुदेव देवनानी और उनका महकमा – कभी उनके वक्तव्यों से तो कभी उनके कदमों से – आए दिन चर्चा में रहता है। मिसाल के तौर पर जीवविज्ञान की बुनियादी समझदारी को सर के बल खड़ा कर देता उनका वह बयान कुछ वक्त़ पहले सूर्खियां बना था जिसमें उन्होंने ‘गायों द्वारा सांस लेने और छोड़ने में भी ऑक्सिजन रहने की बात की थी’ (http://timesofindia.indiatimes.com/city/jaipur/cows-inhale-exhale-oxygen-says-rajasthan-education-minister-vasudev-devnani/articleshow/56612529.cms)  पिछले दिनों अजमेर स्थित अकबर किले का नाम बदल कर उसे अजमेर किला बनाने के सन्दर्भ में उनका एक अन्य बयान विवादों में था, जिसमें कथित तौर पर वह सम्राट अकबर को आतंकवादी कहते नज़र आए थे, मगर उन्होंने बाद में सफाई दी कि वह ‘आतंकवादी’ नहीं ‘आक्रमणकारी’ कह रहे थे। (http://www.indian364.com/india/81006/Rajasthan-Will-remove-terrorist-names-says-Vasudev-Devnani)

बहरहाल, यह अलग बात है कि उनके महकमे के एक अन्य हालिया कदम पर अधिक बात नहीं हो सकी है, जिसमें सरकारी परिपत्रा के जरिए सभी सरकारी माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों को संघ के प्रचारक एवं भारतीय जनता पार्टी की पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य दीनदयाल उपाध्याय की पन्द्ररह खंडों में बंटी रचनाओं को खरीदने का निर्देश दिया गया है, जिनकी जन्मशती इन दिनों मनायी जा रही है। मालूम हो कि उपरोक्त संकलन को भाजपा के पूर्व राज्य प्रमुख महेशचंद्र शर्मा ने संपादित किया है तथा जिसका विमोचन बीते साल अक्तूबर ने खुद प्रधानमंत्रा मोदी ने किया है।

विडम्बना ही है कि जहां बयान एवं ऐलान सूर्खियां बनते हैं, इस आपाधापी में राज्य की शिक्षा की स्थिति पर बात नहीं हो पाती – जो नाकाफी फंड, अच्छी गुणवत्तावाले शिक्षकों की कमी और सभी स्कूलों में संतोषजनक अवरचनागत सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है और ऐसे पाठयपुस्तकों से भरा पड़ा है जिसमें बारे में विशेषज्ञ कमेटी का कहना है कि उनमें ‘अन्तर्वस्तु की सीमाएं’ और पूर्वाग्रहं  साफ नज़र आते हैं। (http://www.huffingtonpost.in/2016/05/23/rajasthan-school-textbook_n_10107124.html)

उदाहरण के तौर पर अभी पिछले साल की बात है जब एक वेबसाइट ने इस बात का विस्त्रत विवरण चार चार्ट के जरिए पेश किया था कि आखिर ‘राजस्थान की शिक्षा के साथ समस्या क्या है ? ( https://scroll.in/article/805320/four-charts-show-what-is-wrong-with-rajasthan-education-it-has-nothing-to-do-with-kanhaiya-kumar) उपरोक्त स्टोरी लगभग एक साल पहले प्रकाशित हुई थी जिसमें बताया गया था कि ‘छात्रों में देशभक्ति की भावना जगाने के लिए’’ पाठयक्रमों में ‘बड़े बदलाव’ लाने के शिक्षा मंत्रा के उत्साह में न केवल ‘शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन होता’ दिख रहा है और ‘‘शिक्षा के गिरते पाठयक्रम को सुधारने के लेकर भी उपाय’’ करने को लेकर भी वह निरूत्साहित दिखते हैं। रिपोर्ट में बताया गया था कि ‘‘राज्य के कक्षा तीन के महज 45 फीसदी शब्दों को पढ़ सकते हैं जबकि कक्षा के दो के 20 फीसदी छात्रा अक्षरों को पहचान तक नहीं सकते। /देखें ‘एन्युअल स्टेटस आफ एजुकेशन रिपोर्ट’ जिसका प्रकाशन 2014 में हुआ था। [ http://img.asercentre.org/docs/Publications/ASER%20Reports/ASER%202014/fullaser2014mainreport_1.pdf] और सालों साल विद्यार्थियों की पढ़ने तथा आकलन करने की क्षमता लगातार घटती गयी है।

विडम्बना ही थी कि जहां राज्य में ‘राष्टीय औसत से भी दोगुनी रफतार से बच्चों के स्कूल छोड़ने की रफतार दिखती है’, ‘शिक्षा में निवेश की स्तर भी निम्न है’, ‘स्कूल का कभी मुंह न देखनेवाले बच्चे पूरे देश में सबसे अधिक है’ इसके बावजूद विगत दो साल से अधिक समय से राज्य सरकार ने यहां के हजारों सरकारी स्कूलों को बन्द किया है और जिसके पीछे तर्क ‘संसाधनों के अपर्याप्त इस्तेमाल’ और ‘समायोजन’ का दिया है। (https://www.telegraphindia.com/1160620/jsp/nation/story_92219.jsp#.WMJHpW997IU)  सरकार ने इस संभावना को भी ध्यान में नहीं रखा कि घर और स्कूल की दूरी बढ़ने के साथ साथ गरीब बच्चों के लिए स्कूल पहुंचना लगभग असंभव हो जाएगा, और उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ेगा।

राजस्थान राज्य बोर्ड की पाठयपुस्तकों की अन्तर्वस्तु का मसला भी अकादमिशियनों की बीच चिन्ता का विषय रहा है। (http://www.huffingtonpost.in/2016/05/23/rajasthan-school-textbook_n_10107124.html) शिक्षाशास्त्रियों की एक टीम ने वर्तमान सरकार द्वारा संशोधित पाठयक्रमों की समीक्षा करने के बाद राजस्थान उच्च अदालत में जनहितयाचिका दाखिल करने का भी निर्णय लिया है। प्रस्तुत याचिका में वह शिक्षाशास्त्रा के निगाह से पाठयपुस्तकों की कमियों और उसकी अन्तर्वस्तु की सीमाओं के मुददे को उठाया है। किताबों को 45 दिन के कम वक्त़ में जल्दबाजी में तैयार करने को लेकर तथा किताबों की अन्तर्वस्तु के ‘केसरियाकरण’ को लेकर भी उनके सवाल थे। उनके मुताबिक किताबों में हाशियाक्रत समुदायों को भी स्थान नहीं मिला है। मिसाल के तौर पर पाठयक्रम की सामग्री आर्यो को भारत का मूल निवासी बताती है, वर्ण व्यवस्था को अच्छा आचार घोषित करने के अलावा हड़तालों की भर्त्सना करती है। उनके मुताबिक अल्पसंख्यक समुदायों को लेकर भी किताबें अपना पूर्वाग्रह जाहिर करती हैं।

निश्चित ही ऐेसे वातावरण में जहां किताबों में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री  जवाहरलाल नेहरू शायद ही कहीं स्थान पाते हों या निजामुददीन औलिया को ‘मुसलमान होने के बावजूद’ अच्छा संत घोषित किया गया हो, वहां इस बात पर आश्चर्य नहीं जान पड़ता कि बच्चों एवं किशोरों के विकसित होते मस्तिष्कों के सामने दीनदयाल उपाध्याय को धूमधड़ाके के साथ पेश किया जा रहा है, जिनके लिए सिर्फ हिन्दु ही राष्ट का निर्माण करते हैं, वह कहते हैं :

‘‘भारत में सिर्फ हिन्दुत्व ही राष्टवाद का आधार है।.. हिन्दुओं के लिए यह बिल्कुल गलत होगा कि वह यूरोपीय पैमाने पर अपनी राष्टीयता को प्रमाणित करें। हजारों साल से उसे स्वीकारा गया है।’’ [[v] BN Jog, Pandit Deendayal Upadhyaya: Ideology & Perception-Politics for Nation’s Sake, vol. vi, Suruchi Prakashanek, Delhi, 73.]

गौरतलब है कि खुद उनकी संकलित रचनाओं के सम्पादक के मुताबिक वह ‘हिन्दु मुस्लिम एकता के खिलाफ’ थे और मानते थे कि ‘मुसलमान होने के बाद कोई व्यक्ति देश का दुश्मन बन जाता है।’ हिन्दु मुस्लिम एकता की हिमायत करनेवालों को उपाध्याय ‘मुस्लिम परस्त’ के तौर पर संबोधित करते थे। (http://indianexpress.com/article/cities/lucknow/article-in-rss-monthly-deendayal-upadhyaya-was-against-hindu-muslim-unity/) मालूम हो कि ‘राष्टधर्म’ के एक विशेषांक में डा महेश चंद्र शर्मा – जो राजस्थान भाजपा के पूर्व अध्यक्ष रहे चुके हैं और जो 15 खंडों में बंटी उनकी संकलित रचनाओं को सामने लाए हैं – दीनदयाल उपाध्याय पर लिखे अपने लेख में आगे यह भी बताते हैं कि दीनदयाल उपाध्याय के मुताबिक ‘कोई मुसलमान व्यक्तिगत तौर पर अच्छा हो सकता है, मगर समूह में ‘बुरा’ हो जाता है और एक हिन्दू जो व्यक्तिगत तौर पर बुरा हो सकता है, मगर ‘समूह में अच्छा हो सकता है।’

कोई पूछ सकता है कि आखिर एक सूबा विशेष में शिक्षा जगत में लाए जा रहे बदलावों पर राष्टीय स्तर पर चर्चा क्यों जरूरी है ? इसकी वजह यही है कि केन्द्र सरकार का मानव संसाधन मंत्रालय शिक्षा क्षेत्रा में राजस्थान सरकार के कदमों से सीखने की बात करता है। यह अकारण नहीं कि समायोजन के नाम पर इस राज्य द्वारा हजारों सरकारी स्कूलों को बन्द करने तथा एक दूसरे में मिला देने के बहुचर्चित प्रयोग का अनुकरण करने की सलाह केन्द्र सरकार ने बाकी राज्यों को भी सलाह दी है और मानव संसाधन विकास मंत्रालय इस सम्बन्ध में दिशानिर्देश भी बना रहा है। /  (https://www.telegraphindia.com/1160620/jsp/nation/story_92219.jsp#.WMJHpW997IU) /

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