जुबां पर भीमा या भीम, अमल में मनु – सुभाष गाताडे

2:50 pm or April 20, 2017
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जुबां पर भीमा या भीम, अमल में मनु

—– सुभाष गाताडे —–

 

लोगों के दुख एवं परेशानियां असीमित हैं और उन्हें कोई कैसे सहन कर सकता है

मेरी आत्मा को नरक में भेज दो मगर ब्रहमांड को मुक्ति दे दो

– भीमा भोई

भीमा भोई, सन्त, कवि और समाज सुधारक, जो उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में संिक्रय रहे और जिन्होंने अपनी कलम को तत्कालीन सामाजिक अन्याय, धार्मिक पाखण्ड और जातिभेद के खिलाफ प्रयोग किया, उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई में उनकी विरासत पर दावा ठोंकनेवाले ऐसे पैदा होंगे जो उन तमाम बातों की नुमाइन्दगी करते हैं, जिनका वह ताउम्र विरोध करते रहे। महिमा आन्दोलन या महिमा धर्म के प्रचारक भीमा ‘इस्लाम, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, वैष्णववाद और तंत्रा योग’ से तत्वों को ग्रहण करते दिखते हैं और और उन्होंने ‘जातिप्रथा तथा पश्चिमी एवं मध्य उड़िसा में व्याप्त सामंती प्रथाओं की मुखालिफत की और उनका ध्येय था ‘जगत उद्धार’।

हाल में भीमा भोई का नाम राष्टीय अख़बारों की सूर्खियों में था जब भाजपा ने भुवनेश्वर में आयोजित राष्टीय कार्यकारिणी की बैठक के स्थल को उनका नाम दिया। इस प्रतीकात्मक कार्रवाई की अहमियत जागरूक लोगों को तत्काल समझ में आयी क्योंकि उन्हें पता था कि आनेवाले चुनावों के मददेनज़र सत्ताधारी पार्टी ‘उड़िसा की आबादी का सतरह फीसदी दलितों को अपने पक्ष में मोड़ना चाहती है।’ कार्यकारिणी की बैठक के लिए मीडिया सेन्टर का उदघाटन करते हुए केन्द्रीय मंत्राी धर्मेन्द्र प्रधान ने स्पष्ट भी किया कि ‘इस क्रांतिकारी कवि की विचारधारा  उड़िसा, छत्तीसगढ़ और झारखण्ड के करोड़ो लोगों पर प्रभाव रखती है।’  *  (http://www.ndtv.com/india-news/bjp-names-party-meet-venue-in-odisha-after-dalit-poet-bhima-bhoi-1681490)

यह अलग बात है कि हिन्दुत्व परिवार द्वारा भीमा भोई को प्रातस्मरणीयों की अपनी कतार में समाहित करने की दिशा में उठाए गए पहले कदम हो या ‘भीम’ नाम से संबोधित – जो एक तरह से भीमराव अंबेडकर के अनुयायियों को अपने पक्ष में करने का भोंडा प्रयास दिखता है – डिजिटल एप को देश के नाम फिर एक बार समर्पित करने की कवायद हो, यह दोनों प्रयास ऐसे वक़्त में सामने आए हैं, जब चाहे वे लोग जो भीमा भोई का आदर करते हैं या जो लोग जो डा अंबेडकर के पदचिन्हों पर चलना चाहते हैं, उन सभी के लिए यह बेहद ख़राब समय है।

पंजाब के मानसा के दलित खेत मजदूर के बेटे बूटा सिंह – जो फिलवक्त 70 अन्य लोगों के साथ ‘अभियुक्त नंबर 10 है जिस पर यह आरोप लगाया गया है कि उसने गैरइरादतन हत्या की कोशिश की – की दास्तां के जरिए हम इस सच्चाई से रूबरू हो सकते हैं। मालूम हो कि पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ के यह सभी छात्रा विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा की गयी जबरदस्त फी बढ़ोत्तरी के खिलाफ आन्दोलनरत थे। याद रहे कि वित्तीय संकट का बहाना बनाते हुए तमाम पाठयक्रमों की सालाना फीस को आठ से दस गुना करने के फरमान को लेकर छात्रों में असंतोष खदबदा रहा था। इस असंतोष की परिणति छात्रों द्वारा बनाए गए संयुक्त मोर्चो – जिसमें विद्यार्थी परिषद के अलावा वाम से लेकर छात्रों के विभिन्न जनतांत्रिक संगठन शामिल थे – की अगुआई में जुझारू प्रदर्शन में हुई, जिसका दमन किया गया। (https://kafila.online/2017/04/12/reclaiming-punjab-university-student-protests-erupt-in-chandigarh/)

केन्द्र सरकार के मातहत काम करनेवाली चंडीगढ़ पुलिस ने आन्दोलनरत छात्रों के खिलाफ देशद्रोह की धाराओं के तहत मुकदमे कायम किए, जिसे उसे बाद में खारिज करना पड़ा क्योंकि जनता का जबरदस्त दबाव बना। बुटा सिंह और उसके जैसे सैंकड़ो छात्रों द्वारा संचालित इस जुझारू आन्दोलन के बहाने विश्वविद्यालय की बदतर स्थिति को लेकर एक अख़बार के बोल थे कि ‘आज विश्वविद्यालय वहां मिल रहे पैकेजों और या कुलपतियों द्वारा वहां से कैम्पस से हुई प्लेसमेंट के लिए जाने जाते हैं, कोई इस बात की चर्चा नहीं करता कि वहां किस किस्म का ज्ञान पैदा हो रहा है।  इसमें एक सवाल भी उठाया गया था कि

‘‘आखिर बूटा सिंह पानी की बौछारें क्यों झेलने के लिए तैयार था ? आखिर पुलिस की लाठियां उसे क्यों नहीं डरा सकीं ? आखिर उसका कमजोर शरीर इस यातना को किस तरह झेल सका ? ’

‘Why Buta Singh Must Protest Again’ (http://www.tribuneindia.com/news/ludhiana/education/why-buta-singh-must-protest-again/392603.html))

लेख का अंत इस नोट से हुआ था:

‘बूटा सिंह को विरोध करनाही होगा कि दुनिया के हर वंचित के लिए ज्ञान तक समान पहुंच का अधिकार है; उसे चाहिए कि वह विरोध करें क्योंकि असहमति का साहस समाप्त नहीं होना चाहिए ; विद्रोह का स्वप्न जिन्दा रहना चाहिए। उसे प्रतिरोध करना ही चाहिए ताकि विश्वविद्यालय पिंजरे में, प्लेसमेंट सेन्टर में, एक पैकेज डील में तब्दील न हो, उसे प्रतिरोध करना ही होगा क्योंकि जिन्दा रहने के लिए वहीं एकमात्रा रास्ता बचा है। /-वही-/

अगर हम बूटा सिंह की युवा जिन्दगी पर निगाह डालें तो देख सकते हैं कि देश के तमाम शिक्षा संस्थानों से ऐसे तमाम युवा – जो बेहद कठिन परिस्थितियों से जूझते हुए वहां पहुंच रहे हैं। अगर हम उनके बचपन या किशोरावस्था की कहानी पढ़ें तो हम जान सकते हैं कि आज़ादी के सत्तर साल बाद भी साधारण प्रष्ठभूमि से – फिर चाहे आर्थिक तौर पर गरीब तबके के हों या सामाजिक तौर पर उत्पीड़ित समुदायों से संबंधित हों – आनेवाले छात्रों के लिए अच्छे अकादमिक संस्थानों में प्रवेश पाना आज भी बाधा दौड़ जैसा मामला बना हुआ है। निश्चित ही इसमें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे अपवाद भी दिखते हैं जहां की विशिष्ट प्रवेश नीति के चलते – जिसे अब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के इशारे पर खतम किया जा रहा है – ऐसे छात्रा काफी संख्या में मिलते हैं। अभी पिछले साल की बात है जब एक लेखक ने इस संस्थान की सामाजिक संरचना पर लिखा था, जब राष्टवाद की दुहाई देते हुए इस अग्रणी संस्थान को निशाना बनाया गया था:

… सालों से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय समाज के आर्थिक एवं सामाजिक तौर पर वंचित तबकों से आनेवाले मेधावी और सबसे तेज दिमागांे का केन्द्र बना हुआ है। और जब वे सामाजिक आर्थिक प्रष्ठभूमि की पड़ताल करते हैं तब माक्र्सवाद की तरफ आकर्षित होते हैं ….अनुमान के मुताबिक विश्वविद्यालय के कमसे कम 70 फीसदी छात्रा गरीब या निम्न मध्यम वर्गीय प्रष्ठभूमि से आते हैं।

पिछले साल के दाखिलों के बाद, जनेवि में अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ी जाति से आनेवाले छात्रों की संख्या का प्रतिशत 55 फीसदी तक हो गया है। अरेबिक, पर्शियन और अन्य भाषाओं में तमाम मुस्लिम छात्रा भी दाखिला लिए हुए हैं। उनके बारे में आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। अगर उनके साथ मिल कर , अशरफ मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों को जोड़ा जाए तो आसानी से आकलन किया जा सकता है कि विश्वविद्यालय के 70 फीसदी छात्रा गैरद्धिज श्रेणी से आते हैं। ध्यान रखें कि जनेवि में अन्य पिछड़ी जाति से आनेवाले छात्रों की संख्या वर्ष 2006 के 288 से 2015 के 2434 तक पहुंची है अर्थात नौ सालों के अन्दर दस गुना बढ़ोत्तरी। छात्राओं की संख्या में भी काफी बढ़ोत्तरी हुई है।

(/kafila.online/2016/03/01/bahujan-discourse-puts-jnu-in-the-crosshairs-pramod-ranjan/)

अगर हम पंजाब विश्वविद्यालय में जारी आन्दोलन की तरफ फिर लौटें तो देख सकते हैं कि आन्दोलनकारी छात्रों पर लगाए गए देशद्रोह के आरोप भले ही जनदबाव में वापस लिए गए हों, मगर अन्य धाराओं में मुकदमे कायम हुए हैं तथा दमन जारी है। ख़बरें आ रही हैं कि पुलिस छात्रों के घरों पर छापा डाल कर माता पिताओ ंको आतंकित कर रही है। मगर यह बेहद सकारात्मक है कि शिक्षा के बुनियादी अधिकार पर हुए इस हमले के खिलाफ पंजाब की जनता छात्रों के साथ खड़ी दिख रही है। राज्य में विभिन्न स्थानों पर छात्रों के हक़ में प्रदर्शन हुए हैं।

जाहिर है कि हमारी आंखांे के सामने पंजाब विश्वविद्यालय में जो कुछ घटित हो रहा है उसे हम देश के अन्य शिक्षा संस्थानों में चल रहे सिलसिले का ही भ्रूण रूप देख सकते हैं। तरीके अलग हो सकते हैं, निशाने बदल सकते हैं और औचित्य प्रदान करने के लिए पेश तर्क अलग हो सकते हैं, मगर लक्ष्य साफ है। केन्द्र में सत्तासीन केसरिया पलटन शिक्षा संस्थानों से ‘अवांछित तत्वों’ के नाम पर असहमति रखनेवाले छात्रों को हटा देना चाह रही है या खामोश करना चाह रही है और ऐसे इंतज़ाम करना चाह रही है कि ऐसे तत्व भविष्य में भी प्रवेश न ले सकें और इन सभी शिक्षा संस्थानों को आधुनिक वक्त़ के गुरूकुलों में वह तब्दील कर सकें जहां के छात्रों को शिक्षकों एवं अधिकारियों के सामने नतमस्तक होने में या उनकी हां में हां मिलाने में कोई गुरेज नहीं होगा। वह अनुशासित छात्रों की ऐसी जमात निर्मित करने के लिए आमादा हैं जो ऐसी संस्थानों में बीतनेवाले कालखण्ड को रटटा मारने में गुजार दें और /अगर कहीं नौकरी मिली तो वहां पर उसे / बाद में उगल दें।

शायद उनका सपना है कि हर विश्वविद्यालय को बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय की तरह गढ़ा जाए, जिसके बारे में तमाम ख़बरें आ चुकी हैं कि वहां पर किस तरह जनतंत्रा का हनन हो रहा है। मालूम हो कि राष्टीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े व्यक्ति की कुलपति के तौर पर तैनाती के बाद  वहां छात्राओं को विशेष निशाना बनाया गया है और उन पर तमाम प्रतिबन्ध लगाए गए हैं। रात दस बजे के बाद छात्राएं अपने मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं और न ही वह 24 घंटे खुले रहनेवाले पुस्तकालय को रात में इस्तेमाल कर सकती हैं। सभी छात्रों के लिए उपलब्ध बस सुविधा का भी वह कथित तौर पर इस्तेमाल नहीं कर सकतीं और उन्हें यह लिख कर देना होता है कि वह किसी विरोध प्रदर्शन या धरने में शामिल नहीं होंगी। उन पर आहार सम्बन्धी प्रतिबन्ध भी लगाए गए हैं, छात्रा जहां मीट-मछली का सेवन कर सकते हैं, छात्राएं नहीं कर सकती हैं। साइबर लाइब्रेरी कायम करने के लिए वहां के छात्रों द्वारा जब आन्दोलन चलाया गया तो प्रशासन ने उनकी मांगों को मानने से इस आधार पर इन्कार किया कि ‘‘ऐसी साइबर लाइब्रेरी का इस्तेमाल छात्रों द्वारा पोर्नोग्राफी देखने के लिए किया जा सकता है। ऐसे साइबर लाइब्रेरी की जरूरत इस वजह से भी नहीं है कि पाठयक्रम के बाहर पढ़ने की जरूरत छात्रों के लिए नहीं है। *(thewire.in/67205/bhu-rsss-new-education-lab-open-gender-discrimination/))

अब चाहें हम मद्रास आई आई टी में छात्रों द्वारा कायम अंबेडकर पेरियार स्टडी सर्किल पर लगायी गयी पाबंदी के मसले को देखें /जिसे जनदबाव में उठाना पड़ा/, या एफटीआईआई में निम्न दर्जे के एक कलाकार को निदेशक के तौर पर भेजने के मानवसंसाधन मंत्रालय के तुघलकी फैसले को देखें – जिसके खिलाफ लगभग पांच महिने ऐतिहासिक आन्दोलन चला – या हम दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कालेज में आयोजित सेमिनार पर केसरिया पलटन के तूफानी दस्तों द्वारा पुलिस की मिलीभगत से किए हमले को देखें या जोधपुर विश्वविद्यालय में आयोजित एक सेमिनार के बहाने फर्जी रिपोर्टों के सहारे अध्यापकों को प्रताडित करने की कोशिशों को देखें, यह साफ है कि वह अपने वर्चस्व कायम करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की ताज़ा घटनाएं बताती हैं कि उन्हें किसी भी वैध-अवैध तरीके को अपनाने से – फिर चाहे फर्जी विडिओ का इस्तेमाल होे, झूठी ख़बरें प्रसारित करना हो या पुलिस बल का खुल कर इस्तेमाल करना हो या सरकारी भक्ति में लीन मीडिया का नग्न इस्तेमाल करना हो – कोई गुरेज नहीं है। जिस तरह देश के इस अग्रणी विश्वविद्यालय में पढ़ रहे छात्रों के लिए छात्राव्रत्ति के पैसे नहीं भेजे जा रहे हैं, जिसके लिए तरह तरह के बहाने बनाए जा रहे हैं या जिस सुनियोजित तरीके से विभिन्न पाठयक्रमों की सत्तर से अस्सी फीसदी सीटांे में कटौती की गयी है, वह इसी बात को दिखाता है कि उनके इरादे कत्तई नेक नहीं हैं।

पिछले दिनों देश के एक अग्रणी अख़बार ‘ द टेलीग्राफ’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया गया है कि किस तरह जनेवि में सूखे का अकाल पैदा किया जा रहा है।  (https://www.telegraphindia.com/1170416/jsp/frontpage/story_146624.jsp#.WPUy7Pl97IU) मिसाल के तौर पर

दो हजार रूपए प्रति माह की मेरिट कम मीन्स स्कालरशिप – जिसके हकदार विश्वविद्यालय के लगभग एक हजार स्नातक एवं स्नातकोंत्तर छात्रा लाभान्वित हो रहे हैं तथा जिसे उन विद्यार्थियों को दिया जाता है जिनके माता पिता सालाना ढाई लाख से कम कमाते हैं, – उसको बंद करना

‘नान नेशनल इलिजिबिलिटी टेस्ट स्कालरशिप के फंड का सोता सूख जाना, जिसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग देता है, तथा जिससे विश्वविद्यालय के तीन हजार रिसर्च स्कालर्स प्रभावित हुए है। नान नेट स्कालरशिप उन रिसर्च स्कालर्स को दी जाती है जिन्हें जुनियर रिसर्च फेलोशिप नहीं मिलती है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग/मानव संसाधन मंत्रालय के दबाव में एकीक्रत/इंटीग्रेटेड पीएचडी-एमफिल पाठयक्रमों की सीटों में जबरदस्त कटौती, अब वह 1,058 छात्रों के बजाय महज 130 छात्रों को ले सकती है।

पिछडे इलाकों एवं हाशियाक्रत तबकों से आनेवाले रिसर्च स्कालर्स के प्रवेश को सुगम बनाने के लिए गठित ‘डिप्राइवेशन पाइट’ के पैमाने का खतम करना

वे सभी जो देश के शिक्षा संस्थानों के घटनाक्रमों को लेकर, वहां नवउदारवाद के नाम पर या मूलवाद के नाम पर चल रहे आक्रमणों से वाकीफ हैं, वह बता सकते हैं कि जहां डा अंबेडकर ने ‘शिक्षित हो, संगठित हो, संघर्ष करो’ का नारा दिया था, वहीं मौजूदा हुक्मरान ‘बाहर करो, अलगाव में डालो, उत्पीड़ित करो’ के नारे को बुलन्द किए हुए हैं। भाजपा एवं उसके भक्तगण जो भी दावा करें यह स्पष्ट है कि द्रोण मानसिकता फिलवक्त उरूज पर है और देश के बेहतर शिक्षा संस्थानों के दरवाजे हमारे समय के ‘एकलव्यों’ और ‘शंबुकों’ के लिए बन्द किए जा रहे हैं।

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