अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

2:54 pm or April 21, 2017
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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

—– अजीत कुमार श्रीवास्तव ——-

हम भारत के लोग  भारतीय संविधान की  महानता का हर जगह जिक्र करते है।  यह उल्लेख उन स्वतंत्रताओं के लिए भी किया  जाता है  जो संविधान में हमको भारत का नागरिक होने के कारण  उपलब्ध हुई है। इन्ही स्वतंत्रताओं में एक है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। सम्पूर्ण मीडिया और समाचार जगत अपनी इस   स्वतंत्रता के लिए अप्रत्याशित रूप से जागरूक है।  देश के पक्ष विपक्ष के सारे राजनैतिक दल  और उनके नेता एवं  अनुयायी अपनी इस स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध हैं। कन्हैया जैसे उदीयमान विद्यार्थी नेता इस स्वतंत्रता के लिए लगातार झंडा उठाये घूम रहे है. इनकी इस स्वतंत्रता की क्या कीमत इस देश को और इस देश के नागरिकों को चुकानी पड़  रही है इससे कोई  अनजान  नहीं हैं किन्तु यह स्वतंत्रता इनके लिए अनमोल है. उधर दूसरी ओर  भारतीय प्रशासनिक सेवा की  एक कर्मठ अधिकारी है दीपाली रस्तोगी।  इन सभी उल्लिखित वर्गों के  प्रतिनिधियों से किसी तरह  कम  नहीं हैं।  विद्वान है बुद्धिमान है एक अखिल भारतीय प्रतियोगिता में मेरिट  में स्थान पाकर उन्होंने यह पद प्राप्त किया है  लेकिन उनको अभिव्यक्ति की आज़ादी  संविधान में उपलब्ध नहीं है।  शासन ने उन्हें शो कॉज नोटिस  दिया है क्योंकि कुछ नियम शासकीय कर्मचारियों  के लिए बनाये गए हैं जो उनको  एक नागरिक के रूप में संविधान से प्राप्त अधिकार छीन लेते हैं. क्या कह दिया दीपाली रस्तोगी ने ? यही न कि  जहाँ  किलोमीटर में दूरी तय कर पानी भर कर लाना पड़ता है वहां फ्लश टैंक से शौचालय में पानी कैसे डाला जावेगा।  क्या गलत कह दिया है? जिसके लिए उनको इस तरह प्रताड़ित किया जा रहा है।  सम्पूर्ण घटनाक्रम से केवल एक सत्य पता चलता है कि  जनता के बीच से आये प्रतिनिधियों के मुकाबले  दीपाली रस्तोगी को जनता की तकलीफों का ज्ञान अधिक है और वे राजनेताओं की अपेक्षा जनता की परेशानियों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं।  शासन में बैठे राजनेता इस कड़वी सच्चाई से अनभिज्ञ रहे और उनके रीढ़विहीन प्रशासनिक अधिकारी उनके अव्यव हारिक निर्णय पर मौन साधे  रहे और अब एक संवेदनशील अधिकारी की स्वाभाविक प्रतिक्रिया  को पुराने  सड़े  गले नियमो का हवाला देकर इस बेबाक अधिकारी को मौन कराने में लगे हुए हैं. दीपाली रस्तोगी की कमी यह है कि  वे एक ऐसे संगठन की सदस्य हैं जिस संगठन ने अंग्रेजों  के समय से लेकर आज तक केवल गुलामी करना सीखा  है. “क्या हुक्म है मेरे आका?” ही जिस संगठन की सफलता और तरक्की का मूल मंत्र है।  यदि वे किसी राजनैतिक दल या प्रेस की सदस्य होती तो अब तक हजारो लोग उनके पक्ष में खड़े हो जाते।

आप निर्भीक होकर अपनी बात पर  अटल रहे दीपाली मेरे जैसे लाखो लोग आपके और आपके कड़वे सच के साथ हैं

प्रशासनिक सेवाओं के किसी  संगठन से तो मुझे कोई उम्मीद नहीं है लेकिन मैं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिघ से जरूर अपेक्षा करता हूँ वे गांव के रहने वाले हैं और दीपाली के कड़वे सच से सौ प्रतिशत इत्तिफाक रखते होंगे । शिवराज जी आगे आइये  आप  हस्तक्षेप करिये  दीपाली को दिया नोटिस वापिस लेकर एक सन्देश प्रदेश के अधिकारीयों को दीजिये की आपके राज्य  में प्रशासन संवेदनशील है और जनता की  वास्तविक तकलीफों को उजागर करने वाले अधिकारीयों को प्रोत्साहित नहीं किया जा सके तो नियमो की आड़ लेकर कम  कम   उन्हें प्रताड़ित नहीं किया जावेगा।

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