यूपीएससी का ये कैसा खेल गैर अंग्रेजी भाषी हो गए फेल

1:06 pm or July 7, 2014
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मोहम्मद आरिफ-

पिछले कुछ दिनों से दिल्ली और इलाहाबाद में सिविल सेवा परीक्षा में गैर-अंग्रेजी भाषी प्रतियोगियों की घटती सफलता दर को लेकर बड़े विरोध प्रदर्शन हुए हैं। हाल में घोषित सिविल सेवा परीक्षा 2013 के नतीजों में कुल 1122 सफल उम्मीदवारों में गैर-अंग्रेजी माध्यम से केवल 53 प्रत्याशी सफल हुए हैं, जिनमे से हिंदी माध्यम वालों की संख्या 26 है। ऐसे में गैर अंग्रेजी भाषी प्रतियोगियों का विरोध जायज़ भी है और यह चिंता का विषय भी है कि देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा में अंग्रेजी भाषा का एकाधिकार स्थापित कर दिया गया है।

यूपीएससी के इस भाषाई खेल को समझने के लिए सीसैट यानि सिविल सर्विसेज एप्टीटयुड को समझना आवश्यक है। दरअसल सीसैट ही वह कुटिल यन्त्र है,जिसके माध्यम से गैर अंग्रेजी भाषी प्रतिभागियों को सोची समझी साज़िश के तहत फ़िल्टर किया जाता है। सीसैट को लागू करते वक्त यह तर्क प्रस्तुत किया गया था कि इससे प्रतियोगियों में समानता स्थापित की जा सकेगी और बदलते हुए वैश्विक परिदृश्य में वांछित योग्यता वाले उम्मीदवारों का चयन किया जा सकेगा।

हालाँकि वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट है, क्योंकि केवल कुछ प्रश्नों के आधार पर किसी की अभिवृत्ति का पता नहीं लगाया जा सकता है। व्यावहारिक रूप में सीसैट का उद्देश्य ‘बदलते हुए वैश्विक परिदृश्य में वांछित योग्यता वाले उम्मीदवारों का चयन’ करना है। इस तरह की योग्यता वाले उम्मीदवारों के चयन के पीछे की मंशा को थोड़े चिंतन से समझा जा सकता है। दरअसल सीसैट लागू होने से पहले सिविल सेवा परीक्षा में इलाहाबाद विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों की अच्छी खासी उपस्थिति रहती थी जबकि सीसैट लागू होने के बाद यह केवल दहाई में सिमटकर रह गया है। यहाँ यह जोड़ने की आवश्यकता नहीं है कि यहाँ के छात्र मेधावी होने के साथ-साथ राजनीतिक सरोकारों से भी बखूबी परिचित होते हैं और यह झुकाव दूसरे हिंदी पट्टी के विश्वविद्यालय के छात्रों में भी देखा जा सकता है। परन्तु पिछले कुछ समय से छात्र राजनीति को साफ़ सुथरा बनाने और सुधारने के नाम पर लिंगदोह जैसी समितियों के सुझाव लागू किये गए हैं, जिसने छात्र राजनीति को अधोगामी बना दिया है। ऐसा लगता है यूपीएससी भी इसी मानसिकता को आगे बढाने में प्रयासरत है। हालाँकि ऊपरी तौर पर यह विषयेतर लग सकता है लेकिन समग्र रूप में देखने पर यह बिल्कुल एक दूसरे से जुड़े हुए मुद्दे हैं कि आखिर ऐसे बदलाव क्यों किये जा रहे हैं जिनसे राजनीतिक रुझान के संस्थानों के छात्र सिविल सेवा से बाहर होते जा रहे हैं।

अब इसे समझना कठिन नहीं होगा कि विशेष तरह की योग्यता वाले अभ्यर्थी जो नयी पूंजीवादी संस्कृति के ध्वजवाहक हैं, जिनका राजनीति से दूर दूर तक कोई सरोकार नहीं है और जो किसी चीज को केवल प्रोजेक्ट के तौर पर देखते हैं, उनका चयन आवश्यक क्यों है। दरअसल इन्हें शुरू से ही समय सीमा के भीतर कार्य पूरा करने के लिए और ‘बॉस इज़ ऑलवेज़ राईट’ की शिक्षा प्रणाली में प्रशिक्षित किया गया है। इसलिए ये वर्तमान पूंजीवादी संस्कृति के सबसे अच्छे प्रशासक हो सकते हैं। यह विदित है की सीसैट के पूर्व इस तरह के प्रतियोगी बड़ी संख्या में सफल नहीं हो पा रहे थे। इसलिए विशेष तरह की वांछित योग्यता और बदलाव को ध्यान में रखते हुए, जैसे मजबूत तर्कों के साथ सीसैट लागू किया गया। इसमें मनचाही सफलता भी प्राप्त हुई जिसे सीसैट लागू होने के बाद के परिणामों में देखा जा सकता है।

वास्तव में एक प्रशासक को दिन भर जनता और राजनेताओं के संपर्क में रहना होता है और इस कारण यह वांछनीय है कि उसे राजनीति का ज्ञान हो और वह प्रशासन को सुचारु रूप से चला सके क्योंकि प्रशासन को किसी पूर्वनिर्धारित सूत्र पर नहीं चलाया जा सकता है। एक प्रशासक को नित नयी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और यहीं उसकी अभिवृत्ति और मौलिकता सामने आती है। वस्तुत: ऐसा कोई थर्मामीटर नहीं है, जिससे किसी की अभिवृत्ति का ठीक ठीक पता लगाया जा सके किन्तु यूपीएससी ने अभिवृत्ति जांचने के नाम पर जिस तरह के बदलाव किये हैं, वे न तो देश हित में हैं और न ही गैर अंग्रेजी भाषी प्रतिभागियों के हित में। ऐसे में यूपीएससी से यह सवाल पूछा ही जाना चाहिए कि किसी उम्मीदवार का चयन अंग्रेजी ज्ञान के लिए किया जा रहा है या फिर उसकी प्रशासनिक क्षमता और मौलिकता के लिए।

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