नर्मदा सेवा यात्रा या रेत खनन की नई योजना का आगाज़ – योगेन्द्र सिंह परिहार

4:50 pm or May 1, 2017
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नर्मदा सेवा यात्रा या रेत खनन की नई योजना का आगाज़

—- योगेन्द्र सिंह परिहार —–

प्राचीन काल से ही जब गांव और नगरों की बसाहट हुई तो सिर्फ एक ही बात का विशेष ध्यान रखा गया कि जल के सबसे उम्दा श्रोत नदियों के नज़दीक ही जन-मानस को बसाया जाय । जल के बिना जीवन नहीं है इसीलिये नदियों को जीवन दायिनी कहा गया और उन्हें माँ की संज्ञा दी गई । हम मध्यप्रदेश के निवासी हैं और मध्यप्रदेश में माँ नर्मदा, माँ ताप्ति, माँ बेतवा का नाम प्रमुख नदियों के रूप में जाना जाता है और जिस तरह से एक ज़माने में हमने माँ नर्मदा की अविरल धारा देखी वो आज महसूस कर पाना भी संभव नहीं है । धार्मिक मान्यताओं में कहा जाता है कि माँ नर्मदा के दर्शन मात्र से पाप धुल जाते हैं । हम जब छोटे थे तब दीवाली की छुट्टियों में अपने गाँव जाते थे और विशेष आकर्षण होता था, नर्मदा जी में स्नान करना। घाट के किनारे से नर्मदा के किनारे पहुँचने में 15-20 मिनिट लग जाते थे क्योंकि रेत इतनी ज्यादा होती थी कि पैर रेत में गप जाते थे इसीलिए चलने में परेशानी होती थी, लेकिन जैसे-तैसे हम लोग नर्मदा जी के पास पहुंच ही जाते थे और इतना स्वच्छ और निर्मल जल होता था कि नहाने में खूब आनंद आता था । लेकिन अब माँ नर्मदा की धार पतली होती जा रही है कई घाटों में नाम मात्र को जल दिखाई देता है और रेत, रेत का तो नाम ही मत लीजिये। गाँव के बड़े बुज़ुर्ग बताते हैं कि बेटा, पहले इन घाटों में 15 से 20 फ़ीट ऊंचाई तक रेत थी इन 14-15 सालों में ऐसा लगता है किसी की नज़र लग गई ।

अब सोचिये कि इसका दोषी कौन है, प्रकृति से खुले-आम छेड़छाड़ कौन कर रहा है, कहाँ, नर्मदा मैया के पास हम जल के लिए जाते थे और अब हमारी ज़रूरत बढ़ गई हैं अब हम अपने घरोंदे बनाने के लिए नर्मदा जी के पास रेत के लिए जाते हैं । रेत ज़रूरत के हिसाब से सरकार के मानदंडों, पर्यावरण संरक्षण के नियमों के हिसाब से निकाली जाए तो भी नर्मदा जी का अस्तित्व बना रहता लेकिन सत्ता में बैठे लोग बिना किसी की परवाह किए, ना सिर्फ बड़ी मात्रा में रेत का अवैध उत्खनन कर रहे हैं बल्कि माँ नर्मदा का सीना चीर कर पाइप लाइन डालकर अंतस से रेत को खींचने का जघन्य अपराध कर रहे हैं। माँ नर्मदा साक्षात देवी स्वरुपा हैं उनके साथ इस तरह का व्यवहार करना, धार्मावलंबी सरकार के घिनौने चेहरे को प्रदर्शित करता है।

आश्चर्य इस बात का होता है कि नदियों के संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाई गयी संवैधानिक संस्थाए किन्ही मामलों में स्वमेव संज्ञान ले लेती हैं और कहीं इतने बड़े स्तर पर मध्यप्रदेश के लगभग सभी नर्मदा घाटों पर सार्वजनिक सभाएं की जा रही हैं, सभाओं के बाद घाट व नदी के किनारे गन्दगी से पटे होने के बावज़ूद भी न कोई संस्थाएं इस सम्बन्ध में बोल रही हैं और न ही किसी प्रबुद्ध वर्ग का ध्यान इस ओर जा रहा है । आखिर इस शान्ति की वजह क्या है? क्या लोगों को ये लग रहा है कि ये वाकई में कोई सेवा यात्रा है, लेकिन किस आधार पर लग रहा है, एक ही राजनैतिक पार्टी के लोग मंचों में शामिल हो रहे हैं, साधू-महात्मा सब इकठ्ठा हो रहे हैं मानो धर्म यात्रा चल रही हो लेकिन जब आप उन मंचों पर माननीयों के भाषण सुनेंगे तो ऐसा लगेगा जैसे प्रदेश के मुखिया की ब्रांडिंग हो रही है और स्वयं मुख्यमंत्री ज्यादा बात प्रदेश की योजनाओं की ही करते नज़र आ रहे हैं । ये यात्रा नर्मदा सेवा यात्रा न होकर केवल वोट यात्रा ही नज़र आ रही है ।

वास्तविक रूप से समूचे सरकारी तंत्र का दुरुपयोग करके एक तरफ प्रदेश के मुखिया कहने को तो नर्मदा सेवा यात्रा निकाल रहे हैं, दूसरी और धड़ल्ले से रेत का अवैध खनन और परिवहन हो रहा है और कोई दूसरे लोग करते तब तक ठीक था जिनके पास पूरे प्रदेश की कमान हैं उन्ही के भाई-बंध, भतीजे इन कारनामों को अंजाम दे रहे हैं । ये ठीक है कि उनके परिजन इस कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं कि सैंयां भय कोतवाल तो डर काहे का, लेकिन जब कोतवाल घर का ही है तो नियमों से बंधकर दूसरे काम लिए जा सकते थे आखिर रेत के अवैध उत्खनन की क्यों ज़रूरत पड़ी? क्या मुख्यमंत्री के परिजनों को रेत के अलावा पैसे कमाने का कोई जरिया नहीं था? मुख्यमंत्री पद की मर्यादा रखने के लिए ही उनके परिजन ऐसे कुकर्मों से बाज़ आ जाते तो अच्छा रहता ।

नर्मदा सेवा यात्रा में 13 वर्षों के अवैध उत्खनन के बाद, अब माननीय मुख्यमंत्री नर्मदा जी से माफी मांग रहे हैं और बाकायदा ये कह रहे हैं कि माँ हमसे पाप हुआ, इसी को कहते हैं 900 चूहे खा के बिल्ली हज़ को चली । लोग तो अब ये चुटकी ले रहे हैं कि नर्मदा सेवा यात्रा तो बहाना है, मूल उद्देश्य तो ये पता करना है कि नर्मदा में अब किन-किन घाटों में रेत बची है जिससे रेत के अवैध उत्खनन की नई-नई योजनाएं बनाई जा सके ।

 

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