तुर्की के साथ संबंधों में कई पेच हैं – अवधेश कुमार

3:44 pm or May 6, 2017
Indian Prime Minister Narendra Modi (R) shakes hands with Turkish President Recep Tayyip Erdogan prior to a meeting and exchange of agreements in New Delhi on May 1, 2017.
Erdogan is on a two-day state visit to India. / AFP PHOTO / PRAKASH SINGH

तुर्की राष्ट्रपति की भारत यात्रा

तुर्की के साथ संबंधों में कई पेच हैं

—— अवधेश कुमार ——-

भारत और तुर्की के संबंध कभी ऐसे नहीं रहे जिसके भविष्य को लेकर ज्यादा उत्साहित हुआ जाए। जाहिर है, तुर्की के राष्ट्रपति रज्जब तैयब एर्दोगन जब दो दिवसीय भारत यात्रा पर आए तो भी बहुत ज्याद अपेक्षा किसी को नहीं रही होगी। हालांकि तुर्की इस्लामी दुनिया का एक प्रमुख देश है, लेकिन वह पाकिस्तान से संबंधोें को जितना महत्व देता है उसमें भारत के लिए उच्चस्तरीय संबंधों की संभावनाएं क्षीण पड़ जाती हैं। अपनी भारत यात्रा के दौरान भी एर्दोगन ने जिस तरह से कश्मीर मसले के समाधान के लिए बातचीत में स्वयं के शामिल होने यानी मध्यस्थता की पेशकश की, अंतरराष्ट्रीय बहुपक्षीय वार्ता द्वारा इसके समाधान का सुझाव दिया उसे कोई भारतीय स्वीकार नहीं कर सकता। ऐसा नहीं है कि एर्दोगन को भारत की कश्मीर नीति का पता नहीं है। बावजूद इसके यदि उन्होंने ऐसा प्रस्ताव रखा तो इसका अर्थ क्या है? हालांकि  भारत की ओर से उनसे साफ कह दिया गया कि कश्मीर मामले में भारत को किसी की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं है तथा कश्मीर का मसला आतंकवाद है और इसका स्रोत सीमा पार है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त पत्रकार वार्ता मंे कहा कि कोई भी तर्क या कारण आतंकवाद को जायज नहीं ठहरा सकता। इस तरह की ताकतों को पनाह एवं मदद देने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। जाहिर है, उनका इशारा पाकिस्तान की ओर भी था। एर्दोगन को भारत ने यह संदेश दे दिया है कि आप पाकिस्तान को दोस्त मानते हैं तो मानें लेकिन हमारे लिए वह आतंकवाद का निर्यातक है और हम उसी अनुसार उसके साथ व्यवहार करेंगे।

पता नहीं एर्दोगन को भारत की यह साफगोई कैसी लगी होगी, क्योंकि इसकी कोई प्रतिक्रिया अभी तुर्की की ओर से आई नहीं है। हालांकि उन्होंने भारत के साथ संबंधों को उंचाइयों पर ले जाने की बात की। दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर बातकर उसे तार्किक परिणति तक ले जाने का प्रस्ताव भी रखा। यही नहीं उनका यह भी कहना था कि भारत और तुर्की डॉलर में व्यापार करने की जगह अपनी मुद्राओं में द्विपक्षीय व्यापार करंें। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि कम से आर्थिक एवं व्यापारिक मामले पर एर्दोगन भारत के साथ बेहतर संबंध के इच्छुक हैं। वैसे भी 2016 में दोनों देशों के बीच 6.4 अरब डॉलर का व्यापार हुआ है। दोनों देशों की आबादी एवं अर्थव्यवस्था को देखते हुए यह काफी कम है और इसे काफी उपर ले जाने की संभावना है। आवास तथा आधारभूत संरचना के क्षेत्र में उसकी जो विशेषज्ञता है उसका लाभ भारत को मिल सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत तुर्की व्यावसायिक सम्मेलन में दोनांे देशों के आर्थिक संबंधों को और विस्तार देने पर जोर दिया। उन्होंने छोटे-छोटे निवेश की संभावनाओं की ओर भी इशारा किया। तो देखना होगा कि इस यात्रा के बाद भारत तुर्की व्यापारिक-आर्थिक संबंधों का कितना विस्तार होता है।

लेकिन दो देशों के संबंधों का आधार केवल आर्थिक नहीं हो सकता। यदि तुर्की कश्मीर मामले पर पाकिस्तान की पैरोकारी करेगा, वह पाकिस्तान के अंदर पल रहे आतंकवाद तथा उसका हमारी ओर निर्यात को स्वीकार नहीं करेगा तो फिर संबंधोें के विस्तार की जो संभावनाएं हैं वे उस परिमाण में फलीभूत नहीं हो सकतीं। यह भी ध्यान रखने की बात है कि एर्दोगन की यात्रा के दौरान ही पाकिस्तान की ओर से भारतीय सैनिकों के साथ बर्बरता की गई लेकिन उन्होंने इस संबंध में एक शब्द नहीं बोला। इसका कारण क्या हो सकता है? यही न कि तुर्की के दोस्त पाकिस्तान को कहीं बुरा न लग जाए। हालांक उन्हांेने मोदी के साथ संयुक्त पत्रकार वार्ता में आतंकवाद के खिलाफ सहयोग पर बल दिया और इस पर कुछ सहमति भी बनी, किंतु भारत के लिए तो आतंकवाद का स्रोत ही पाकिस्तान है। अगर तुर्की इसे ही स्वीकार नहीं करता तो फिर आतंकवाद पर सहयोग कहां से हो सकता है। एर्दोगन को भारत का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उनके सामने कुर्द समस्या को सरकारी स्तर पर नहीं उठाया गया। कौन नहीं जानता कि दक्षिण तुर्की में कुर्द लोग स्वतंत्र कुर्दीस्तान के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उन पर हर प्रकार का अत्याचार हो रहा है। जब पत्रकारों ने एर्दोगन से इस बारे में पूछा तो उनका कहना था कि कुर्द समस्या को कश्मीर से न जोड़ें। क्यों न जोड़ें? आप तो हमारी नीति के विरुद्व कश्मीर पर मध्यस्थता तक करने का सुझाव दे रहे हैं। लेकिन सरकार के स्तर पर यह उचित था कि कुर्द के विषय को न उठाया जाए। उससे हमारा कोई हित नहीं सधने वाला है। एर्दोगन एक मेहमान के नाते और लंबे चौड़े शिष्टमंडल के साथ भारत बड़ी अपेक्षाओं से आए थे। ऐसे में उनको निराश करने की आवश्यकता नहीं थी।

पाकिस्तान की ओर तुर्की के झुकाव को देखते हुए भी भारत को उसके साथ जिन क्षेत्रों में संबंध बेहतर हो सकते हैं उसमें काम करने की जरुरत है और भारत ने यही व्यावहारिक नीति अपनाया है। वैसे भी इस्लामी दुनिया में वर्चस्व के लिए एर्दोगन के नेतृत्व वाला तुर्की सउदी अरब से प्रतिस्पर्धा कर रहा है। उसमंें ये दोनों देश चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा इस्लामी देश उनके साथ रहें। यह एक ऐसा विषय है जिसमें भारत पक्षकार नहीं हो सकता है। एर्दोगन की छवि दुनिया में एक लोकतांत्रिक नेता की नहीं हैं। वे 2003 से 2014 तक वहां के प्रधानमंत्री रहे और उसी दौरान उन्होंने संविधान में परिवर्तन कराकर देश को राष्ट्रपति शासन अपनाने के लिए बाध्य कर दिया। इस नाते वे इस समय देश के राष्ट्रपति हैं।

तुर्की एक समय खलीफा के देश के रुप में अवश्य जाना जाता था, लेकिन मुस्तफा कमाल अतातुर्क के नेतृत्व में उस देश ने खिलाफत की व्यवस्था को उखाड़ फेंका तथा उदार सेक्यूलर रास्ता को पकड़ा था। आज का सच यह है कि एर्दोगन के शासनकाल में तुर्की में इस्लामिक कट्टरवाद चरम पर पहुंच रहा है। वहां भी आतंकवादी घटनाएं हो रहीं हैं। एर्दोगन ने अपने शासनकाल के दौरान हर असहमत आवाज को सत्ता के बल पर दबाने की पूरी कोशिश की है। 2013 में एक भ्रष्टाचार के मामले में जब वहां की मीडिया मुखर हुई तो न जाने कितने पत्रकारों को उन्होंने जेल में डाल दिया तथा प्रेस को नियंत्रित करने के लिए कई प्रकार के प्रतिबंध लगाए। सोशल मीडिया तक प्रतिबंधित कर दिया गया।  पिछले वर्ष जुलाई में एर्दोगन के खिलाफ बगावत दुनिया भूल नहीं सकती। एक साथ कई शहरों में बगावात हुए जिसमें 300 से ज्यादा लोग मारे गए तथा करीब ढाई हजार घायल हो गए। हालांकि एर्दोगन ने उस विद्रोह को असफल कर दिया। उसमें जितनी संख्या में उन्होंने लोगों को जेल में डाला तथा नौकरियों से बर्खास्त किया वह अपने आपमें एक रिकॉर्ड है। उसमें सेना के अलावा न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी, शिक्षक आदि सब शमिल हैं। दुनिया इसे तुर्की का आंतरिक मामला मानकर चुप है। उस विद्रोह के पीछे एर्दोगन ने फतेउल्लाह गुलेन का हाथ बताया। गुलेन इस समय अमेरिका की शरण में हैं और उनकी संस्था हिज्मत जो बहुधर्म में विश्वास करती है दुनिया भर में सक्रिय है। उसकी शाखा भारत में भी है। तुर्की चाहता है कि भारत उस संस्था पर प्रतिबंध लगाए और उससे जुड़े लोगों पर कार्रवाई करे। उसने बाजाब्ता पत्र लिखकर भारत से ऐसा करने का आग्रह किया था। पाकिस्तान ने ऐसा किया। हालांकि नवाज शरीफ को इसका विरोध भी सहना पड़ा। भारत ने ऐसा नहीं किया है।

अभी तक के रवैये से यह नहीं लगता कि भारत आगे भी ऐसा करेगा। एर्दोगन गुलेन को आतंकवादी साबित करके कार्रवाई चाहते हैं जिससे भारत सहमत नहीं है। यह पता नहीं है कि प्रधानमंत्री के साथ एर्दोगन की बातचीत में यह मसला उठा या नहीं। किंतु भारत की नीति साफ है। कुछ लोग इस बात से उत्साहित हैं कि तुर्की एनएसजी में भारत की सदस्यता के पक्ष मंें आ गया है। हम न भूलें कि अगर भारत को एनएसजी की सदस्यता नहीं मिली तो उसमें चीन और न्यूजीलैंड के साथ तुर्की की भी भूमिका थी। अब वह पाकिस्तान को भी इसकी सदस्यता दिलाना चाहता है। यह भारत को स्वीकार नहीं हो सकता। हमें तुर्की का इसके लिए समर्थन तो चाहिए लेकिन इस शर्त पर नहीं कि गुलेन और उसकी संस्था या उससे जुड़े लोगों को हम आतंकवादी मान लें। इस तरह तुर्की के साथ संबंधों में कई पेच हैं जिन्हें समझना होगा तथा उसी अनुसार भविष्य की तस्वीर की कल्पना करनी होगी।

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