छद्म राष्ट्रवाद का यह उन्मादी नक़ाब ! – शैलेन्द्र चौहान

3:56 pm or May 6, 2017
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छद्म राष्ट्रवाद का यह उन्मादी नक़ाब !

—— शैलेन्द्र चौहान ——

मौजूदा वक़्त में देश एक गहरे अनुदारवादी और अति-राष्ट्रवादी दौर से गुज़र रहा है। वैचारिक मतभेदों की परवाह किए बिना हर राजनीतिक दल भारत में मूढ़ता को बढ़ावा दे रहा है। राष्ट्रवाद एक उन्माद के पर्याय के रूप में परोसा जा रहा है। यह तो सर्वविदित है कि राष्ट्रवाद की जो परिभाषा सरकार दे रही है वह संकुचित और रूढ़िवादी है। यह सिर्फ़ बहुसंख्यक धार्मिक समूहों को तुष्ट करने के लिए और असहमति के स्वर दबाने वाली है। अफ़सोस है, राष्ट्रवाद की इतनी संकीर्ण दृष्टि सत्तारूढ़ पार्टी की है। राष्ट्रवाद की उसकी अवधारणा भारतीय संविधान में निहित उदारवादी लोकतांत्रिक मूल्यों को चुनौती देती है। फ्रेंच लेखक अल्बेयर कामू ने एक बार लिखा था, “मैं अपने देश को इतना प्यार करता हूँ कि मैं राष्ट्रवादी नहीं हो सकता।” कामू के ये शब्द भारत के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में प्रासंगिक मालूम पड़ते हैं। यह स्वभाविक है कि बहुत नहीं तो कुछ भारतीय बुद्धिजीवी कामू के इस शानदार विचार के साथ ज़रूर खड़े होंगे. इन्हीं भावनाओं को भारतीय संविधान निर्माताओं ने अपनाया था। भारतीय राष्ट्रवाद एक आधुनिक तत्त्व है। इस राष्ट्रवाद का अध्ययन अनेक दृष्टिकोणों से महत्त्वपूर्ण है। राष्ट्रवाद के उदय की प्रक्रिया अत्यन्त जटिल और बहुमुखी रही है। भारत मे अंग्रेजों के आने से पहले देश में ऐसी सामाजिक संरचना थी जो कि संसार के किसी भी अन्य देश मे शायद ही कहीं पाई जाती हो। वह पूर्व मध्यकालीन यूरोपीय समाजों से आर्थिक दृष्टि से भिन्न थी। भारत विविध भाषा-भाषी और अनेक धर्मों के अनुयायियों वाले विशाल जनसंख्या का देश है। सामाजिक दृष्टि से हिन्दू समाज जो कि देश की जनसंख्या का सबसे बड़ा भाग है, विभिन्न जातियों और उपजातियों में विभाजित रहा है। स्वयं हिन्दू धर्म में किसी विशिष्ट पूजा पद्धति का नाम नहीं है। बल्कि उसमें कितने ही प्रकार के दर्शन और पूजा पद्धतियाँ सम्मिलित है। इस प्रकार हिन्दू समाज अनेक सामाजिक और धार्मिक विभागों में बँटा हुआ है। भारत की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक संरचना तथा विशाल आकार के कारण यहाँ पर राष्ट्रीयता का उदय अन्य देशों की तुलना मे अधिक कठिनाई से हुआ है। शायद ही विश्व के किसी अन्य देश में इस प्रकार की प्रकट भूमि में राष्ट्रवाद का उदय हुआ हो। सर जॉन स्ट्रेची ने भारत के विभिन्नताओं के विषय मे कहा है कि “भारतवर्ष के विषय में सर्वप्रथम महत्त्वपूर्ण जानने योग्य बात यह है कि भारतवर्ष न कभी राष्ट्र था, और न है, और न उसमें यूरोपीय विचारों के अनुसार किसी प्रकार की भौगोलिक, राजनैतिक, सामाजिक अथवा धार्मिक एकता थी, न कोई भारतीय राष्ट्र और न कोई भारतीय ही था जिसके विषय में हम बहुत अधिक सुनते हैं।” इसी सम्बन्ध मे सर जॉन शिले का कहना है कि “यह विचार कि भारतवर्ष एक राष्ट्र है, उस मूल पर आधारित है जिसको राजनीति शास्त्र स्वीकार नहीं करता और दूर करने का प्रयत्न करता है। भारतवर्ष एक राजनीतिक नाम नही हैं वरन् एक भौगोलिक नाम है जिस प्रकार यूरोप या अफ्रीका।” राष्ट्रवाद के जन्म के लिए कारणों का विश्लेषण करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत में इसका जन्म ब्रिटिश सरकार की नीतियों के परिणामस्वरूप हुआ। भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के दो विरोधी दृष्टिकोण सामने आते हैं- विकासवादी और प्रतिक्रियावादी। लेकिन इन दोनों ही स्वरूपों ने राष्ट्रवाद के जन्म में सहायता प्रदान की। स्पष्ट है कि ब्रिटिश शासन में ही भारत में राजनीतिक एकता स्थापित हुई, पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार हुआ और यातायात के साधनों का विकास हुआ। इससे यदि एक ओर ब्रिटिश शासन को लाभ हुआ तो दूसरी ओर अप्रत्यक्षरूप से राष्ट्रवाद के जन्म में भी योगदान मिला।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि 20वीं सदी के आख़िरी दशक में भारत अपने उन उद्देश्यों से बहुत भटक गया, जिसकी परिकल्पना भारत और संविधान निर्माताओं ने की थी और आज अतिवाद का शिकार हो गया है। जन सामान्य के लिए राष्ट्रवाद पर हो रही यह पेचीदा राजनीति समझना जरा मुश्किल है आज ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रवाद की परिभाषा को तय करने पर अपना एकाधिकार जमा रखा है। उनसे अलग सोच रखने वाले बुद्धिजीवी, समुदाय, छात्र और सामाजिक कार्यकर्ताओं को उनका कोपभाजन होना पड़ रहा है। यह विडंबना है कि बीजेपी के शोर-शराबा वाले राष्ट्रवाद की निंदा करने वाले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे को खुद ही संकुचित कर रहे थे। नतीजतन बीजेपी की निंदा करने की उनकी रणनीति नक्कारखाने में तूती की आवाज़ की तरह है. बीजेपी जिसने संविधान में उल्लेखित बहुलतावाद और धर्मनिरपेक्षता के प्रति कभी भी बहुत आस्था नहीं दिखाई है। अब अपनी विचारधारा के ख़िलाफ़ सवाल उठाने वालों को आंखें दिखा रही है। इसका ताज़ा उदाहरण जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के कुछ छात्रों को प्रताड़ित करने के रूप में हमारे सामने है। यहां तक कि संगठित वामदल भी जो अभी राष्ट्रवाद के नाम पर सरकार की कार्रवाइयों पर बरस रहे हैं, इससे पहले अलोकप्रिय और लीक से हटकर विचारों पर हो रहे हमले पर चुप्पी साधे थे। दशकों से जेएनयू जो अपने वाम रुझानों के लिए जानी जाती रही है। अचानक वह बौद्धिक स्वतंत्रता और बहस का केंद्र बन गई. छात्रों पर 2001 में संसद पर हमला करने के मामले में दोषी अफज़ल गुरु की फांसी की बरसी मनाने का आरोप है। इस मौके पर छात्रों के कथित रूप से ‘भारत-विरोधी नारे’ लगाने के भी आरोप हैं. वाकई ज़्यादातर नारे ऐसे लगाए गए, जो आम नारे थे लेकिन इसकी वजह से उन्हें सरकार की कठोर कार्रवाई का सामना करना पड़ा। ये बिल्कुल बेतुकी बात है कि इस तरह की बचकाना बातें भारतीय गणराज्य या भारतीय राष्ट्रवाद को चुनौती देती हैं। अफज़ल गुरु को राष्ट्रपति के दया याचिका ख़ारिज करने के बाद 2013 में फांसी दी गई थी। फिर उनकी मौत की बरसी मनाना शायद ही कोई अच्छा फ़ैसला होगा। यह न समझ पाना छात्रों की भूल थी। लेकिन वर्तमान सरकार इस आयोजन की  सिर्फ़ निंदा करके मामले को रफ़ा-दफ़ा कर सकती थी। परंतु सरकार ने इसके बदलेयूनिवर्सिटी कैंपस में पुलिस भेजी और छात्र संघ अध्यक्ष समेत दूसरे छात्रों को गिरफ़्तार किया। हो सकता है कि छात्रों को नियंत्रित करना मुश्किल हो और वह अब भी कहते हों कि उनका भाषण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत आता है। छात्र संघ अध्यक्ष को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया. छात्रों की ओर से की जा रही बड़ी-बड़ी बातों की पूरी दृढ़ता से निंदा की जा सकती थी। सरकार ने इसकी जगह असहमित के स्वर दबाने के लिए औपनिवेशिक काल के राजद्रोह क़ानून का सहारा लिया। इससे भी ज्यादा बुरा तब हुआ, जब एक अभियुक्त के न्याय पाने के अधिकार के प्रति असहिष्णुता दिखी। कोर्ट में पेशी के दौरान कोर्ट में ऐसा माहौल बनने दिया गया, जिसमें वकीलों के एक समूह ने अभियुक्त को मारा-पीटा. इसमें तत्कालीन दिल्ली पुलिस कमिश्नर की भूमिका बेहद पक्षपातपूर्ण एवं अशोभनीय रही। इस त्रासद कार्रवाई ने लोगों को दो खेमों में बांट दिया। देश के प्रबुद्ध वर्ग का एक तबक़ा छात्रों के समर्थन में आ गया. वहीं पूरा सरकारी और सत्तारूढ़ पार्टी का प्रचारतंत्र इन छात्रों के विरोध में खड़ा हो गया. पूरे देश में राष्ट्रवाद और राष्ट्र द्रोह की भावनात्मक बहस छेड़कर सत्तारूढ़ पार्टी ने बहुसंख्यक संप्रदाय में देशप्रेम का आभासी जूनून और उन्माद पैदा करने में सफलता हासिल कर ली. भारत के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इसमें अपना बेहद अविवेकपूर्ण, बेईमान रुख अपनाया। बहुत चालाकी से सत्तारूढ़ पार्टी ने आम आदमी का ध्यान महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था, किसानों की आत्महत्या जैसे मुद्दों की जगह राष्ट्रद्रोह की ओर मोड़ दिया. इससे भाजपा और संघ के समर्थक बेकाबू होने लगे. असहिष्णुता की जो बात पहले चली थी वह अब वास्तविक रूप में हमारे सामने है। गौ रक्षा, लव जिहाद जैसे मुद्दे भी छद्म राष्ट्रवाद की आड़ में साम्प्रदायिकता का जहर घोल रहे हैं। सैनिकों के शव छद्म राष्ट्रवाद की राजनीति का मोहरा बन रहे हैं। इसे पाकिस्तान के खिलाफ़ जनोन्माद भड़काने के लिए प्रयुक्त किये जा रहे हैं। मीडिया दिनरात उन्हें प्रसारित कर रहा है, मानो पाकिस्तान के खिलाफ़ आखिरी जंग सेना के स्थान पर मीडिया ही लड़ने वाला है। उधर सोशल मीडिया पर जुनूनी लोग हर उस शख्स की ऐसी तैसी कर रहे हैं जो सत्तारूढ़ पार्टी से असहमति दिखा रहा है। यह बहुत निम्नस्तरीय सोच है. यह पूरी तरह एक दमनात्मक कार्यवाई है। यह जो माहौल है यह अंततः बीजेपी के लिए भस्मासुर का ही काम करेगा. चाहे बीजेपी आज कितनी ही बलवान क्यों न दिख रही हो।

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