रीत रहा पाताल – शब्बीर कादरी

2:57 pm or May 8, 2017
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रीत रहा पाताल

—– शब्बीर कादरी ——

सदियों से हमारे यहां धरती के नीचे का पानी ऐसी सर्वसुलभ सुविधा के रूप में उपलब्ध है जिसका उपयोग सुगमता से किया जाता रहा हैं, कुंए बावड़ियां, तालाब और बांध का निर्माण हमारी सांस्कृतिक परम्परा में शामिल रहे हैं। सिर्फ छह-सात दशक तक हमारे पास घने जंगल थे आबादी कम थी और पानी उलीचने के साधन सीमित और पारम्परिक थे। अब हमारी आबादी बंपर है, पानी खीचने के आधुनिक उपकरण इशारे पर काम कर रहे हैं और जंगल का बड़ा भाग समतल होकर विकास की भेंट चढ़ चुका है। इस परिस्थिति के चलते अब भूजल वैज्ञानिक बताते हंै कि सिर्फ वर्ष 2020 तक हमें भीषण पेयजल का सामना करना पड़ेगा। क्योंकि जंगल नहीं, दोहन अधिक और बढ़ती आबादी सिर्फ विकराल समस्या का कारण बनेगी। तेजी से बढ़ती आबादी, औद्योगिक उत्पादन की बढ़ती मांग और कृषि उत्पादन के लिए निरंतर जल की जरूरत हमें धरती के जल को अधिकाधिक उलीचने के लिए मजबूर करती है। अभी हमारे यहां 70 प्रतिशत शहरी क्षेत्र की जलापूर्ति भू-जल पर आश्रित हैं और लगभग इतना प्रतिशत ही भू-जल हमारी कृषि उत्पादन में लग रहा है। पानी की यही मांग भूजल स्तर को विकराल बनाकर उसकी समृद्धि को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के कुछ आंकड़े इस विषम परिस्थिति पर से परदा उठाने को काफी हैं। देश के एक लाख 87 हजार 139 गांव ऐसे हैं जिनमें उचित मापदंडों के अनुसार जलापूर्ति नहीं है। आजादी के समय देश में 223 गांवों में पानी कम था जो आज बढ़कर 90 हजार हो गए हैं। देश में 1947 में उपलब्ध प्रतिव्यक्ति जल की मात्रा 6000 घनमीटर थी सन् 2025 तक यह मात्रा सिर्फ 750 घनमीटर रह जाने की संभावना है।

नासा के आंकड़े बताते हैं कि आज भी हमारे यहां उत्तर भारत के ही 11 करोड़ 80 लाख परिवारों को घर में पीने का साफ पानी नहीं मिलता और देश की 80 प्रतिशत आबादी भू-जल का अनियंत्रित दोहन कर रही है। अंधाधुंध बोरवेल के जरिये हम जहां एक ओर जमीन से बड़ी मात्रा में पानी खींचकर रहे हैं, वहीं वर्षा-जल के रूप में कुदरत हमें जो अनमोल तोहफा देती है उसे हम नालियों, गडढ़ों नालों में व्यर्थ बहने देकर बेशकीमती संपदा से हाथ धो लेते हैं।

कुछ वर्ष पूर्व अमेरिका के अंतरिक्ष संगठन नासा ने यह कहकर भारत को चिंता में डाल दिया था कि हमारे यहंा भू-जल तेजी से और अधिक गहराई तक नीचे जा रहा है। अपने ग्रेविटी रिकवरी एंड क्लाइमेट एक्सपेरीमेंट के तहत अध्ययन के उपरंत नासा इस निष्कर्ष पर पहुंचा है। भारत के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में भू-जल का स्तर तेजी से नीचे गिर रहा है। इस क्षेत्र में दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब के साथ पश्चिम उत्तरप्रदेश के कई हिस्से दर्ज किए गए हैं। 2014 की केन्द्रीय जल आयोग द्वारा जारी की गई हमारे जलाशयों में जल उपलब्धता के आंकड़ों के अनुसार भू-जल घटने की स्थिति सामने आई थी जो वर्ष 2015 में भी बनी रही जिन राज्यों में यह स्थिति बनी उसमें उ.प्र. मध्यप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट, उत्तराखंड, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और त्रिपुरा इत्यादि शामिल हैं नासा वैज्ञानिकों का मत हैं कि हमारे यहां प्रतिवर्ष 18 क्यूबिक किलामीटर जल समाप्त हो रहा है यहां तक कि वाॅटर टेबल हर तीन साल में एक मीटर की दर से नीचे गिर रहा है। देश के ही वैज्ञानिक मानते हैं कि हमारे कई राज्य तेजी से डार्क जोन की चपेट में आते जा रहे हैं कुल 5723 ब्लाॅक में से लगभग एक हजार डार्क जोन की श्रेणी में दर्ज किए जा चुके हैं।

दरअसल भूजल को पानी का अनंत भंडार समझना हमारी भारी भूल साबित हो रहा है। भूजल वास्तव में वर्षाजल ही है जो गुरूत्वाकर्षण के कारण भूमि में समा गया है। क्योंकि वार्षिक वर्षा की मात्रा लगभग सीमित है इसलिये भूजल की भरपाई एक सीमा तक हो सकती है। केन्द्रीय जल और ऊर्जा आयोग के आकलन के अनुसार वर्षा के जरिये औसतन प्रतिवर्ष लगभग अस्सी लाख घनमीटर पानी धरती में समा जाता है, परन्तु वर्षा द्वारा भूजल की भरपाई की दर अलग-अलग भूमि में अलग-अलग होती है। किसी राज्य में यह 20 प्रतिशत है तो किसी राज्य में केवल एक प्रतिशत ही है। यही कारण है कि देश के अलग-अलग राज्यों में भू-जल की उपलब्धत विभिन्न आंकी जाती है। भू-जल की सुगमता भूमि की संरचना पर निर्भर करती है। भूमि की ढलान, उस पर पाई जाने वाली वनस्पति तथा मिट्टी की गुणवत्ता इसमें महत्वपूर्ण कारक हैं। हमारे यहां वर्षभर में वर्षा से जितना पानी मिलता है उसका 18 प्रतिशत भाग ही हमारे उपयोग में आ पाता है शेष 82 प्रतिशत वर्षाजल नदियों के माध्यम से समुद्र में चला जाता है। दरअसल हम वर्षाजल संग्रहण के मामले में भी बहुत पीछे हैं वर्तमान संग्रहण क्षमता के मान से हम अभी केवल वर्षाकाल के 30 दिनों के वर्षाजल को ही संग्रहीत कर पाते हैं। रेनवाटॅर के प्रति हमारी उदासीनता और नकारात्मक रवैया इसकी प्रमुख वजह है। वर्षाजल के प्रति कुप्रबंधन विशाल जलराशि को यूं ही नष्ट हो जाने में मदद करता है जिस पर चिंता और प्राथमिकता से काम किया जाना जरूरी है। खेती के लिए ट्यबवेल से जल दोहन भू-जल का सर्वाधिक कालापक्ष है। बढ़ते उद्योग-धंधे और सेवाक्षेत्र में पानी की मांग 50 अरब क्यूबिक मीटर है जिसका विशाल भाग भी भू-जल से प्राप्त किया जा रहा है क्योंकि वर्षा जल इस क्षेत्र को पानी देने में सक्षम नहीं है। हमारी शहरी या आधुनिक जीवनशैली भी अधिक जल के उपयोग की मांग बिना अधूरी है, शौचालय में धड़ल्ले से पेयजल का उपयोग, कपड़े धोने के लिए वाशिंग मशीन्स और कूलर में पेयजल का इस्तेमाल अब समाज में चिंतामुक्त प्रसंग है।

जिस समाज में हम रह रहे हैं वहां हमने सिर्फ नल की टोंटी खोलकर पानी की धार से खेलना सीखा है, पानी बचाने की जिम्मेदारी हमारी नहीं सरकार की है क्योंकि वह हमसे प्रतिवर्ष जल प्रदाय का सेवाशुल्क वसूलती है शायद  इसलिए। टोंटी से पानी न आने पर हम सभी प्रकार के प्रतिरोध के लिए आजाद हैं पर पानी बचाने और उसकी सुगम और निरंतर आपूर्ति के लिए अपने स्तर पर छोटे से छोटा उपाय करने में बिल्कुल बेफिक्र और आजाद हैं। अगर हम अभी भी यथार्थ में पानी बचाने की चिंता नहीं कर पाए तो आने वाले वर्षों में राजनीतिक दलों को शायद ही इतने बंपर वोट मिल पाऐं कभी।

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