भारत में किसानों की आत्महत्या – शैलेन्द्र चौहान

3:51 pm or May 17, 2017
An Indian farmer looks skyward as he sits in his field with wheat crop that was damaged in unseasonal rains and hailstorm at Darbeeji village, in the western Indian state of Rajasthan, Friday, March 20, 2015. Recent rainfall over large parts of northwest and central India has caused widespread damage to standing crops. (AP Photo/Deepak Sharma)

भारत में किसानों की आत्महत्या

—— शैलेन्द्र चौहान ——

इक्कीसवी सदी का दूसरा दशक. यदि हम इस दशक पर दृष्टिपात करें तो  इस दशक में सदी की सबसे बड़ी घटना विकास दर के बजाय किसानों की आत्महत्या के दर में वृध्दि रही, और इससे बड़ा शर्मनाक पहलू यह है कि चुनावी मुद्दों की राजनीति में आकर्षण का केंद्र किसान है। हिन्दी साहित्य का इकलौता किसान होरी जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था का नायक भी रहा है प्रेमचंद के बाद किसी और ने किसानों के पक्ष में पैरवी नहीं की। कृषि मंत्री को आज तक यह पता नहीं चल सका कि आखिर किसान आत्महत्या किस लिए कर रहे हैं। सुविधाओं का सारा का सारा जमाव आज शहरों में है, जबकि सारा अभाव गांवों  में है। गावों की इतनी अधिक उपेक्षा चिंतनीय है। केंद्रीय योजनाओं में वितरण व्यवस्था का यह असंतुलन आज पूरी सदी का असंतुलन है। अपनी मिट्टी एवं बुनियाद के प्रति हमारी उदासीनता की यह समझ हमारी सदी एवं अर्थव्यवस्था की नाकामयाबी है। और भटकाव के इस सफर में हमने एक और सदी कुर्बान कर दी है। इस सदी में देश के नेतृत्व का संकट सबसे बड़ा संकट रहा है। दरअसल स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही एक युग की समाप्ति हो गई और जब सफर की शुरुआत ही दुविधा जनक हो फिर रास्ते और मंजिल का का क्या भविष्य होता यह आसानी से समझा जा सकता है। आजादी के बाद हर क्षेत्र में भटकाव दर भटकाव का क्रम चलता रहा और आज भी हम देश के नेतृत्व को लेकर दुविधा में है। किसी बाहुबली या धनबली को नेता मान लेना क्या हमारी जन चेतना की अपरिपक्वता नहीं है?  देश वाहन नहीं है जिसे कोई भी चला ले। जहां विवेकहीन मुद्दों की अपनी जरुरतें व मांग है, वहां किसी को गणेशजी बनाकर न तो बैठाया जा सकता है और न ही अवधि समाप्ति के पश्चात इसका विसर्जन किया जा सकता है। यह देश जनतान्त्रिक  देश है। देश के नेतृत्व में श्रध्दा, भक्ति नहीं देखी जाती, क्षमता व निर्णय के आधार पर निर्णय लेने होते हैं। नेतृत्व के लिये अतिरिक्त बुध्दि कौशल, जनतान्त्रिक विवेक  व साहस की जरुरत होती है।

यद्दपि इस सदी में मानवता को कलंकित करने वाले कई समाचार लगातार सुर्खी में  छाये रहे,सांसदों, मंत्रियों के वाहियात वक्तव्य भारतीय परिवेश के वायु मंडल को  दूषित करते रहे  । इस संकीर्णता से राष्ट्रीयता का अपमान  तो हुआ ही, राष्ट्र का कद भी  बौना ही हुआ। यह प्रसंग 1948 के बंटवारे की पुनरावृत्ति है,  इसे लोकतंत्र के लिये इस सदी का सबसे बड़ा खतरा मान जा सकता है। स्वनिर्मित दायरों के संतुलन में हम इतना भी न सिमटे कि अपनी पहचान खो देनी पड़े।द्वेष जब भीतर रहता है तब यह शरीर को नष्ट करता है और बाहर आते ही संक्रमित होकर पूरे माहौल को दूषित करता है। राजनीतिक द्वेष-विद्वेष की इस देखा-देखी प्रवृत्ति एवं कुंठित मानसिकता का यदि इसी तरह अन्धानुकरण किया जाता रहा, तो हमारी जातीयता का क्या होगा ?  क्षेत्रवाद के इस उन्माद में हमारे संसाधनों, खदानों, ट्रेनों  और राष्ट्रीय उत्पादों का क्या होगा,  जल बंटवारे का विवाद आदि क्षेत्रीय राजनीति में प्रायोजित होते रहे हैं। मानवीय पक्ष एवम मानवीय चेतना के लिये सबसे बड़ी चुनौती आज यही है कि आदमी को आदमी के रूप में कैसे सहेजा जाये। इस सदी में मीडिया की भूमिका आग में घी डालने के समान रही  है, घी डालकर घटना को टीवी टीआरपी के लिये कलर फुल बनाना।  चूंकि हम सदी का जिक्र  कर रहे हैं और सदी वर्षों का लेखा मात्र नहीं है। वह समय का आईना है। सदी के आईने में हम इतिहास और भविष्य को देख सकते हैं। बंजर पड़ी जमीन, अनुत्पादक सरकारी संस्थानों का आकलन  नहीं किया जाता । विकास दर या प्रति व्यक्ति आय का अवलोकन करने के बजाय प्रति व्यक्ति की व्यस्तता का आकलन क्यों न करें। व्यस्तता की इसी कसौटी पर हम सभी को विकास व चेतना की नई दृष्टि दे सकेंगे। जन-हित से जुड़े मसलों के प्रति हमारी उदासीनता का आलम यह है कि नेतृत्व चिन्तन आज हमारी सोच को उद्वेलित नहीं करता  जबकि क्रिकेट टीम के नेतृत्व चिन्तन में लोगों की गहरी दिलचस्पी  है। देश का नेतृत्व तय करे या न करे मीडिया ने अपना रुख तय कर रखा है।  जो चाहे लिखे, छापे या कि दिखाये वह सब जायज है क्योंकि हम  लोग सचेत नहीं हैं, राजनीति के पचड़े में नहीं पड़ना चाहते। क्या फर्क पड़ता है कि कोई भी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या कि मुख्यमंत्री हो, फिजूल की बातें सोचकर दिमाग को तकलीफ क्यों दें? यह हमारी सोच है और कुल भारतीय जन की मानसिकता भी। जिसे देखो वही आज चोरी में तल्लीन है  सरकारी अमला इस चोरी के प्रति उदासीन है क्योंकि उसका भी इस सब में हिस्सा है करें  तो क्या करें,  किस-किस से लड़ें जनता  चुप है, विद्वान  लोग चुप हैं, और यह चुप्पी पूरे सदी की सोच है। जहां हम सोच को भी कोई सही  दिशा  नहीं दे पाते। यदि हमारा काम होता हो तो हम घूस देने को तत्पर हो जाते हैं यह हमारी सोच  हैजो  बरसों से जारी है। यह आगे भी जारी रहेगी,  इससे ही हम अपने चरित्र  को समझ सकते हैं। व्यवस्था पर, सरकार पर सोचें   तो कितना सोचें , क्या क्या सोचें  और सोचने का अर्थ  ही क्या निकलेगा। एक समय में जनसेवा का पर्याय रही राजनीति आज सत्ता की स्वार्थगत दलाली में बदनाम है। आज की राजनीति में न आदर्श है, न सेवा है और न ही समाजवाद का चिंतन। शासकों की  मनमानी के चलते योजनाओं का भारी भरकम बजट भी अपने उद्देश्यों एवं कल्याणकारी योजनाओं को अंजाम दे पाने में समर्थ नहीं है। फिर भी व्यवस्था चल रही है और हम अपनी निजी लाभ  पर सोच रहे है। सब अलग-अलग सोच रहे हैं। सबके अपने झंडे, अपने नारे व अपने वादे हैं। चुनाव के अंतिम साल में ढेर सी योजनायें बनती हैं, घोषणायें होती हैं, फिर शेष रह जाता है चुनाव परिणाम और परिणाम के बाद जीत का जश्न, आरोप प्रत्यारोप, फिर ऐसे ही बीत जाते हैं पांच साल। घर हो, परिवार हो, समाज हो, क्षेत्र हो, प्रदेश हो या कि फिर देश सबका विकास नेतृत्व की इच्छाशक्ति एवं पहल पर संभव हो पाता है। हमारे क्रमिक विकास में राजनैतिक चेतना व नेतृत्व का संकट सबसे बड़ा संकट रहा है। क्या यह लोकतंत्र का राजशाही तंत्र में परवर्तन नहीं है?  नेतृत्व की महत्ता पर क्या हमारी चुप्पी जायज है? क्या देश के नेतृत्व का चिन्तन हमारी चिंता और कर्म का अंग नहीं होना चाहिये? आज हम कहीं भी छोटा मोटा काम या नौकरी मांगने जाते हैं, तो हमसे हमारी योग्यता तथा कार्य का अनुभव पूछा जाता है। क्या इतने बड़े देश के संचालन के लिये योग्य उम्मीदवार से उनकी योग्यता अथवा अनुभव नहीं पूछा जाना चाहिये? यह कैसी व्यवस्था है। कैसा लोकतंत्र है, जहां हम अपने देश के नेतृत्व के पक्ष में अपनी सहमति या असहमति जाहिर वोट डालने के आलावा जाहिर नहीं कर सकते।कार्टून नहीं बना सकते । राहुल को भावी प्रधानमंत्री के रुप में मीडिया द्वारा पेश किया जा रहा है। जैसे प्रधानमंत्री कोई शख्स न होकर बाजार का कोई नवीन उत्पाद हो। कांग्रेस जो बरसों बरसों तक शोषित तथा पिछड़े वर्ग की पैरोकार रही है, धर्मनिरपेक्ष छवि व सिध्दांतों के प्रति अपनी निष्ठा जताती रही है। बरसों तक जनता ने जिसे सिर आंखों पर बिठाया उस वृहत राष्ट्रीय संगठन का कोई कुशल व दमदार नेतृत्व न होना देश की सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी है। दूसरी ओर बीजेपी है जिसे जनता से जियादा देश और धार्मिक उन्माद फ़ैलाने का भावनात्मक दोहन करना होता है। क्षेत्रीय पार्टियों की भूमिका शीघ्रातिशीघ्र अपना भंडार भरने की रही है । इस पर हमारी बौध्दिक चुप्पी, इस चुप्पी का क्या अर्थ है। जरुरी मसलों के प्रति हमारी उदासीनता इस सदी की सबसे बड़ी चुनौती है और जिसे हमने चुनौती समझा ही नहीं तो सामना करने का सवाल ही कहाँ है। क्षेत्रीय मुद्दों की राजनीति में राष्ट्रीय हित तिरोहित होते चले गये।  समय के सोच व चिंतन में राजशाही परंपरा से परे नेतृत्व परिवर्तन पर विचार विमर्श किया जाना था जो नहीं हो सका। यह आजादी के बाद का दूसरा भटकाव था। लोकतंत्रीय व्यवस्था में चरित्र और निष्ठा के स्थापित आदर्श प्रतिमानों के बीच सारे योग्य उम्मीदवार नकार दिये गये, यह राजनैतिक षड़यंत्र की बौध्दिक शुरुआत थी। सत्ता हस्तांतरण की उस भूल को हम आज तक अपनी व्यवस्था में निर्णय शक्ति के क्षरण, अथवा निर्णय के दुविधा के रुप में देख सकते हैं। चाहे मामला तिब्बतियों का हो, कश्मीर का, उत्तर पूर्वी प्रदेशों का  या फिर सरबजीत सिंह का। सही वक्त में वक्त के खिलाफ लिया गया निर्णय ही वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था का दोष रहा है। हम गलतियां दुहराते रहे और गलतियों का इतिहास अपने आपको दोहराता रहा है । पत्थरों पर हमारी आस्था हो या नेतृत्व पर हमारा अंधविश्वास, लोकतंत्र के विकास के लिये दोनों ही स्थितियां  दुविधाजनक है। गरीबों की बात करना आज महत्वहीन समझा जाता है, बेरोजगारों की कतारों को छोटा करने के प्रयत्न   नहीं हो रहे हैं, श्रम की गरिमा घट रही है, मजदूर बुरी तरह सताए जा रहे हैं, छटनी होना सहज कर्म हो गया है।

भारतीय लोकतंत्र में धर्मनिरपेक्षता के सवालों व बवालों के बीच आखिरकार तसलीमा नसरीन को देश छोड़ना पड़ा। अतिथि देवो भव: की इस वसुन्धरा पर हम उन्हें विदाई भी नहीं दे सके। तसलीमा के जाने पर कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। यह सदी हमें कुछ दे या न दे पर यह ऐसा आईना जरुर दे गया जिसमें हम अपने धर्म निरपेक्ष राष्ट्र की धूमिल छवि को निहार सके, अपने गिरेबाँ में झांक सके। तसलीमा को शायद अपनी धरती से कहीं अधिक हमारे नीले आकाश पर नाज था। जाहिदा हीना भी अपने लेख में अक्सर हिन्दुस्तान की सहिष्णुता व उदारता की तारीफ करती रही हैं। किन्तु यह वहम भी जाता रहा और हम तसलीमा नसरीन को पनाह नहीं दे सके। अखबार व मीडिया का पहला समाचार क्रिकेट है। क्रिकेट के प्रति दीवानगी का आलम यह है कि मैच वाले दिन में सबका बहाना क्रिकेट ही है। मैच देखने के अलावा कोई भी दूसरा कार्य संपन्न हो पाना संभव नहीं है। हमारी कार्य संस्कृति में खेल के बहाने इस विलासिता ने हमारी सामुदायिक उर्जा को प्रभावित किया है। क्रिकेट के प्रति जन के पागलपन को देखकर लगता है जैसे यह खेल खेल न होकर पौराणिक अथवा अध्यात्मिक आस्था का प्रसंग हो। मीडिया के लिये क्रिकेट का मसला आज चर्चा में किसी भी राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दे से अधिक महत्वपूर्ण मसला है। भारतीय व्यवस्था में क्रिकेट को प्राणवायु अथवा धड़कन के रुप में बाजार द्वारा एक जरुरत बनाकर कुछ इस तरह प्रस्तुत किया गया है कि लोग आते जाते खाते पीते सोते उठते इस पर दीवानगी की हद तक फिदा हैं। जब हम यार मित्रों से या रिश्तेदारी में अपनों से मिलते हैं तो अपने बाल बच्चों की चर्चा न कर क्रिकेट के हालिया बयान या स्कोर पर हमारा ध्यान मुड़ जाता है, यह हमारी रुचि में बाजार का अतिक्रमण है। व्यवस्था से जुड़े सारे लोग क्रिकेट पर फिदा है और इसे किसी भी दृष्टि से नुकसानदायक नहीं माना जाता। हजारों लाखों लोग एक साथ एक ही समय में इस बहाने ठहर जाते हैं, क्या यह कार्य संस्कृति का ह्रास नहीं है? क्या हमारे इस कृत्य से वक्त का एक बड़ा हिस्सा या अवसर जाया नहीं होता? निर्माणों के इस देश में चरित्र निर्माण से ही हमारी दृष्टि भटक जाये, इसे सदी का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है। दूरदर्शन का नेशनल नेटवर्क जो सालों साल से अपने दायित्वों का बखूबी निर्वहन करता रहा है, वह आज मीडिया के दौर से बाहर है और जो मीडिया में है वह मानवीय मूल्यों व चरित्र के प्रसंग से कोसों दूर है। वेब व नेट माध्यमों से जुड़े होने के बाजवूद हम विमर्श संवाद व संवेदना से लगभग कटे हुये हैं। कोई आत्महत्या करने पर तुला हो और लोग उसे बचाने के बजाय देखने व उकसाने में लग जायें, और निजी चैनलों का यह साहस कि इसे खेल समझकर लाइव टेलीकास्ट की व्यवस्था भी कर दे, यह भारतीय मीडिया और हमारी संवेदना का वीभत्स रुप है। सूचना व संवाद की तमाम साधन संपन्नता के बाजवूद हम अपनी जनचेतना को बुध्दि संपन्न या उर्जा संपन्न नहीं मान सकते क्योंकि आज हमारा समाज नायक विहीन है। तमाम विकृतियों, विसंगतियों एवं कमजोरी के बाजवूद हमारे बीच चेतना के सकारात्मक स्वर भी मुखरित होते रहे हैं। असंगठित मजदूर व किसान अपनी बात कहे तो किससे कहे? जन जब दम तोड़ता नजर आये, जब जीवन के आदर्श अपना मूल्य खोने लग जायें, भारतीय संस्कृति  का वर्तमान जब त्रिशंकु की भूमिका में हो तब  जनांदोलनों की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है।

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