आरएसएस-प्रायोजित गर्भ विज्ञान संस्कार “प्रभु नस्ल की खोज” -राम पुनियानी

5:01 pm or May 19, 2017
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आरएसएस-प्रायोजित गर्भ विज्ञान संस्कार

प्रभु नस्ल की खोज

—– राम पुनियानी ——

आर्य नस्ल की श्रेष्ठता और ब्राह्मणवादी मूल्यों की महानता ही वह नींव है, जिस पर आरएसएस, हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करना चाहता है। आरएसएस की विचारधारा यह मानती है कि आर्य एक श्रेष्ठ नस्ल हैं और हिन्दू राष्ट्र, विश्व का गुरू और नेतृत्वकर्ता दोनों है। अंग्रेज़ों और ब्राह्मणवादियों ने विशिष्ट नस्लों की श्रेष्ठता की अवधारणा को प्रोत्साहन दिया।

हाल में, आरएसएस की स्वास्थ्य शाखा ‘आरोग्य भारती’ ने प्राचीन भारत के आयुर्वेद के ज्ञान के आधार पर ‘गर्भ विज्ञान संस्कार’ के ज़रिए उत्तम संतति को जन्म देने की परियोजना लागू करने की घोषणा की। यह दावा किया जा रहा है कि इस संस्था द्वारा निर्मित मार्गदर्शिका का अक्षरश: पालन कर, उत्तम संतति को जन्म दिया जा सकता है। यहां तक कि अगर माता-पिता का कद कम और रंग गेहुंआ हो, तब भी वे ऊँचे और गोरे बच्चों को जन्म दे सकते हैं।

आरोग्य भारती ने अत्यंत सूक्ष्म निर्देशों की एक मार्गदर्शिका तैयार की है, जिसका उपयोग कर विवाहित युगल बिलकुल वैसी संतान पैदा कर सकते हैं जैसी वे चाहते हैं। मीडिया की रपटों के अनुसार, आरोग्य भारती ने जिस पद्धति का आविष्कार किया है उसके अंतर्गत होने वाले माता-पिता को पहले तीन माह की शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गुज़रना होता है। उनके बीच संभोग का समय, ग्रहों और नक्षत्रों के योग के आधार पर तय किया जाता है। गर्भधारण के बाद, एक निश्चित अवधि तक दंपत्ति को शारीरिक संपर्क से दूर रहना होता है। उत्तम संतति के लिए गर्भवती महिला को कई प्रक्रियाओं और कर्मकांडों से गुज़रना होता है। उसे खानपान से संबंधित नियमों का पालन भी करना होता है।

इन दिनों पारंपरिक और प्राचीन ज्ञान के नाम पर आमजन किसी भी अतार्किक या असंगत बात को स्वीकार करने को तैयार रहते हैं। यहां तक कि कुछ लोग यह मानते हैं कि प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी की तकनीकी काफी उन्नत थी और विमानन के क्षेत्र में भारत को महारत हासिल था। हमारे पास पुष्पक विमान थे, जो आज के हवाईजहाजों की तरह थे।

आधुनिक विज्ञान ने गर्भधारण और गर्भस्थ शिशु के विकास के संबंध में कई भ्रांतियों को तोड़ा है। गर्भधारण, किसी विशिष्ट ग्रहयोग के कारण नहीं बल्कि शुक्राणु द्वारा अंडाणु के निषेचन से होता है। यह निषेचन, सामान्यतः, महिला के मासिक धर्म के चक्र के बीच की अवधि में ही संभव हो सकता है। हिन्दुत्व की विचारधारा, विज्ञान की इन खोजों, जो सूक्ष्म शोधों और प्रयोगों पर आधारित हैं, को नकारने में जुटी हुई है। पिछली एनडीए सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी ने पाठ्यक्रम में पौरोहित्य और कर्मकांड शामिल किए थे। इनमें से एक कर्मकांड का नाम था पुत्र कमेष्ठी यज्ञ, जिसको करने से पुत्र जन्म सुनिश्चित किया जा सकता था। विज्ञान यह कहता है कि शिशु कन्या होगा या बालक, यह इस बात पर निर्भर करता है कि पुरूष के वाई और एक्स क्रोमोज़ोम में से कौन-सा अंडाणु को निषेचित करता है। कोई भी यज्ञ या कर्मकांड यह तय नहीं कर सकता कि शिशु बालक होगा या कन्या।

गर्भवती महिला और गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए उचित खानपान और नियमित व्यायाम ज़रूरी हैं। शिशु का शारीरिक और मानसिक विकास, उचित पोषण और उसके आसपास के वातावरण पर निर्भर करता है। परंतु आरोग्य भारती हमें यह समझाने में लगी है कि हमसे लाखों मील दूर अंतरिक्ष में तैर रहे गृह, बच्चे के लिंग और उसके स्वास्थ्य का निर्धारण करते हैं।

आरएसएस की विचारधारा, जर्मन फासीवाद से गहरे तक प्रभावित है और यह प्रभाव केवल राष्ट्रवाद की फासीवादी अवधारणा तक सीमित नहीं है। इसमें आर्य नस्ल की श्रेष्ठता का विचार भी शामिल है। आरएसएस यह मानता है कि आर्य ही दुनिया के गुरू और नेता हैं। एक प्रभु नस्ल की अवधारणा, आरएसएस की विचारधारा का अविभाज्य हिस्सा है। हिटलर की जर्मनी में ‘यूजेनिक्स’, जिसे सुजनन विज्ञान कहा जाता है, में कई प्रयोग किए थे, जो पूरी तरह असफल रहे। नाज़ियों ने एक कार्यक्रम प्रारंभ किया था जिसका नाम था ‘लेबिसबोर्न’ (जीवन का बसंत)। इसका उद्देश्य एक आर्य प्रभु नस्ल का निर्माण करना था। इस परियोजना के अंतर्गत, जर्मनी में 8,000 और नार्वे में 12,000 बच्चों के जन्म और लालन-पालन का कार्य नाज़ी सिद्धांतकार और नेता हेनरिक हिमलर के सीधे पर्यवेक्षण में किया गया था। इस परियोजना के अंतर्गत, ‘शुद्ध रक्त’ की महिलाओं को गोरे और लंबे आर्य बच्चों को जन्म देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था, परंतु इस परियोजना के अंतर्गत जन्मे बच्चों की अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई और पूरी परियोजना असफल हो गई। यह भयावह परियोजना नाज़ियों की अमानवीय नस्लीय नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। इस नीति के अंतर्गत, एक ओर शुद्ध आर्य बच्चों के जन्म को प्रोत्साहित किया जाना था तो दूसरी ओर यहूदियों जैसे गैर-आर्यों को खत्म किया जाना था। इस परियोजना के अंतर्गत 60 लाख यहूदियों को मार डाला गया और ऐसे पुरूषों की जबरन नसबंदी कर दी गई, जो अनुवांशिक बीमारियों से ग्रस्त थे। यह नीति उन वर्गों के प्रति अत्यंत क्रूर थी जो वर्चस्वशाली नहीं थे या जिनमें अलग तरह की योग्यताएं थीं। अब तो नस्ल का पूरा सिद्धांत ही अमान्य घोषित कर दिया गया है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार मानव नस्ल का जन्म दक्षिण अफ्रीका में कहीं हुआ था और आज की मानव जाति के सभी सदस्य विभिन्न नस्लों का मिश्रण हैं।

इस संदर्भ में भाजपा नेता तरूण विजय का यह वक्तव्य महत्वपूर्ण है कि ‘‘हम काले लोगों के बीच रहते आए हैं’’। इससे यह स्पष्ट है कि आरएसएस यह मानता है कि उत्तर में रहने वाले अपेक्षाकृत साफ रंग के लोग, आर्य और श्रेष्ठ हैं और दक्षिण में रहने वाले अपेक्षाकृत काले लोग, गैर-आर्य और निम्न हैं। आरएसएस के महत्वपूर्ण चिंतकों में से एक एमएस गोलवलकर भी एक बेहतर नस्ल का विकास करने के हामी थे। उन्होंने लिखा, ‘‘आइए, हम देखें कि हमारे पूर्वजों ने इस क्षेत्र में क्या प्रयोग किए थे। संकरण के जरिए मानव प्रजाति को बेहतर बनाने के लिए उत्तर भारत के नम्बूदरी ब्राह्मणों को केरल में बसाया गया और यह नियम बनाया गया कि नम्बूदरी परिवारों का सबसे बड़ा पुत्र केवल केरल की वैश्य, क्षत्रिय या शूद्र परिवारों की कन्या से विवाह करेगा। इससे भी अधिक साहसिक नियम यह था कि किसी भी वर्ग की विवाहित महिला की पहली संतान का पिता कोई नम्बूदरी ब्राह्मण होगा और उसके बाद ही वह महिला अपने पति से बच्चे पैदा कर सकती है’’ (आरएसएस के मुखपत्र आर्गेनाईज़र के 2 जनवरी, 1962 के अंक में उद्धृत)।

आरोग्य भारती की गर्भविज्ञान संस्कार परियोजना के प्रवक्ता बताते हैं कि उन्होंने गुजरात से अपना कार्य शुरू किया है और अब तक वहां इस परियोजना के अंतर्गत 450 बच्चे जन्म ले चुके हैं। वे अब इस परियोजना का विस्तार अन्य राज्यों में करना चाहते हैं। वे सन 2020 तक इस परियोजना को सभी राज्यों में शुरू कर देना चाहते हैं। हिन्दुत्व के प्रतिपादक संगठन की स्वास्थ्य शाखा आखिर हमें किस ओर ले जाना चाहती है? क्या हम अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की बजाए, प्रकाश से अंधकार की ओर बढ़ना चाहते हैं?

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