मोदी सरकार के तीन साल ने देश को 1940 के दशक में कैसे धकेला? एक विश्लेषण – मिताली सरन

5:50 pm or May 24, 2017
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मोदी सरकार के तीन साल ने देश को 1940 के दशक में कैसे धकेला? एक विश्लेषण

हमें सड़कों पर, हमारे रसोईघरों में और रेस्तरा के मीनू में क्या हो, इसके आधार पर भारत का चिन्तन करने को विवश किया जा रहा है……..

मिताली सरन

पीछे मुड़कर 1950 को देखें: तीन वर्षों की हिफाजत, विचार विमर्श, व्यापक ज्ञान, गंभीर वाक्पटुता, मतभेद और सर्वसम्मति के बाद, संविधान सभा ने एक राष्ट्रीय दस्तावेज को तराशा है जिसमें भारत का समावेशी, बहुलवादी दृष्टिकोण समाहित है। हम 26 जनवरी 1950 को इस संविधान का जश्न मनाते हैं, हमारे प्रथम गणतंत्र दिवस का। भारत को शासित करने का अद्भुद विशालकाय कार्य एक अकल्पनीय चुनौती है। देश अनेक प्रकार के दर्द सहते हुये धीरे-धीरे आकार लेता है। दर्द, जो भारी पीड़ादायक और चुनौतीपूर्ण है। गरीबी, अकाल, दंगे, युद्ध और लालफीताशाही। इस प्रक्रिया में भारी नुकसान हुये, अनेक गलतियां हुई और दिल टूटे। किन्तु हम अपने रास्ते पर निरंतर चल रहे हैं। उपनिवेशवाद के असाधारण जख्मों से उबरकर हमने एक सार्वभौमिक, लोकतांत्रिक (और बाद में, धर्मनिरपेक्ष) गणतंत्र को अपनाया जो प्रत्येक नागरिक के लिये न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे से युक्त जीवन के लिए प्रतिबद्ध है। उन दिनों हम स्वतंत्रता के उत्साह में और हमारे स्वयं के लिये कुछ नया करने के जोश में उतावले भी थे, और थोड़े नर्वस भी।

आज उन शुरूआती दशकों के उल्लास और संघर्ष को भुला दिया गया है, जिसमें भारत के गणतंत्र की अस्थियों का निर्माण हुआ। भारत के अनेक हिस्से आज भी पिछड़े और अविकसित हैं, जो कि शर्मनाक है लेकिन इनमें से अधिकांश 21 वीं शताब्दी में प्रवेश कर चुके हैं। मेरी पीढ़ी के लोग आज भी लंबी दूरी की फोन कॉल की बुकिंग को याद करते हैं कि ऑपरेटर किस तरह से एक या दो दिन में अपने परिजनों या मित्रों से बात करवा देता था। और यदि आप तत्काल वाली सर्विस बुक करते थे तो एक या दो घंटे की प्रतीक्षा के बाद बात होती थी। आज हमारे बच्चों ने इंटरनेट और स्मार्टफोन के बिना दुनिया को कभी नहीं जाना है। सूचना और संचार क्रांति ने दुनिया को बदल दिया है, दुनिया के साथ भारत भी बदल गया है। हम अभी भी गरीबी, अकाल, दंगे, युद्ध और लालफीताशाही का सामना कर रहे है, लेकिन हम चकित कर देने वाले बदलाव भी देख रहे हैं।

हममें यह जानने की पर्याप्त क्षमता है कि हममे कमियां क्या हैः हम अपनी इच्छा अभिलाषाओं के बारे में महत्वाकांक्षी है, रचनात्मक ऊर्जा के भरे हुये है, और भ्रष्टाचार को लेकर व्याकुल है लेकिन हममे निजी स्वार्थपरता है और राजनीतिक वर्ग तथा नौकरशाही में अकुलशलता है। हम इस मुद्दे पर पहुंचे, जहां एक लंबे समय से पीड़ित, राजनीतिक दुराचार और उपेक्षा से तंग आ चुके लोगों ने गलती से उस व्यक्ति के लिये मतदान किया जिसमें उन्हे आशा थी कि वह उन्हे भ्रष्टाचार और अक्षमता की नई जंजीर से मुक्त कर देगा और उनकी किस्मत बदल जाएगी।

गलती से क्यों ? मोदी लहर, जिसने 2014 के आम चुनावों में भाजपा को अप्रत्याशित जीत दिलाई, इस बात का प्रमाण है कि लोगों को उनसे बहुत अधिक उम्मीदें थी। अप्रिय नीरसता से भरे अनेक वर्षों के बाद मोदी लहर ने लोगों में उत्साह की चिंगारी पैदा कर दी थी। शायद, कई मतदाताओं ने सोचा होगा कि अंततः वे हमें निर्माण, प्रगति और सुधार करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र कर देंगे। समस्या यह है कि जिन लोगों ने इस व्यक्ति को चुना उन्होने उसकी क्षमता का वास्तविकता से अधिक आकलन कर लिया। लोगों ने उन तथ्यों को या तो अनदेखा किया या उन्हे पसन्द किया कि वे मोदी की छाया में देश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे एक ऐसे वटवृक्ष का लाभ प्राप्त करेगा जिसके पास लोगों का, संगठन का और विचारों का प्रचुर खजाना है, और यह सब उस भारत को सीधे चुनौती देते है जो संविधानरूपी दस्तावेज में हस्ताक्षरित है। यही संघ परिवार अब परोक्ष रूप से सत्ता में है।

तीन साल में, यह आशाजनक उत्साह – #स्टेंडअप इंडिया,  #स्टार्टअप इंडिया, र #कैशलेस,  #लेस कैश इंडिया – जैसे सुन्दर शब्दों और हेशटैग में सजीव दिखाई दे रहा है जो आर्थिक अवसाद का शुष्क स्मारक मात्र है। लेकिन यह भविष्य में आने वाले भयावह मंजर की तुलना में एक अच्छा हिस्सा है। इससे भी बदतर बात यह है कि अब बहुत बड़ी-बड़ी उम्मीदें डर में बदल गई है। जैसा कि हम देख रहे है, हमारे समाज के पहले से ही इतने विभाजित ढांचे को जानबूझकर हमारे अपने देश में पैदा हुये आतंकितयों द्वारा कई टुकड़ों में बांट दिया गया है। ये वे आतंकी है जो स्वयं को राष्ट्रवादी, धार्मिक या संस्कृति के पहरेदार कहते है और इस कट्टरता को शिक्षा की मुख्य धारा में लाना चाहते है।

मोदी सरकार के तीन वर्ष पूरे होने पर हम स्वयं एक दूसरे को वैसे ही बधाई दे रहे है जैसे विश्वप्रसिद्ध मेंढ़क की कहानी में सभी मेंढ़क अपने तालाब की कोमलता को लेकर एकदूसरे को बधाई देते है और वे निरंतर तेजी से बढ़ रहे तालाब के तापमान को समझने में असफल रहते है। वे अब यह स्वीकार करने में भी असमर्थ है कि हम इस गरम पानी में जीवित उबल रहे है। सरकार और उसके छद्म सहभागी संगठन भारत का चरित्र किस प्रकार बदल रहे है, हम इसे समझने और सजग होने में या तो असमर्थ हैं, या सतर्क होना नही चाहते। हमने सरकार द्वारा प्रचारित बातों को वास्तविकता के रूप में स्वीकार कर लिया है। अपने निजी स्वार्थों को खतरे में डाल देने के बजाय हमने स्वार्थवश अपने सिर झुका लिये है और देश के प्रति प्यार को परिभाषित करने के लिए आक्रामक अंधराष्टवाद को अनुमति दे दी है। हम अपने संस्थापक आदर्शों की रक्षा करने में नाकाम रहे हैं। हम स्वयं के सर्वश्रेष्ठ संस्करण की चाह रखने में असफल रहे है। हम एक महत्वपूर्ण विचार में अपनी हिस्सेदारी की रक्षा करने में नाकाम रहे हैं।

और अब, तीन साल बाद, हम 1940 के दशक के संस्करण में वापस आ गए है और भारत के विचार पर बहस कर रहे है। लोगों द्वारा चुनी गई विधानसभाओं नही, बल्कि सड़कों पर चाकू और पत्थरों के साथ बहस करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। अब हमारी रसोई में क्या बन रहा है और हमारे रेस्तरां मेनू में क्या हो, इस पर बहस करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। हमें अपने निजी प्रेम जीवन और कपड़ों पर और सिनेमा हाल में में क्या और कैसे देखा जाये, इस पर बहस करना पड़ रहा है। हमें हमारे विश्वविद्यालयों और कला में तथा पत्रों में क्या हो, या न हो आदि पर बहस करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। हमें अदालत में इसे चुनौती देने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

राष्टीयता हमेशा प्रगतिशील होती है। यह एक विरोधाभासी विचारों के बीच सतत बने रहने का नाम है। मूर्ति को तराशने की प्रक्रिया में उस पर छैनी से काट-छाॅट करने की सतत प्रक्रिया है। लेकिन मोदी सरकार के तीन साल में भारत के निर्माण का यह खाका बदल रहा है। हमारी स्थापना के मौलिक आदर्शो को खींच कर हथिया लेने की तैयारी हो रही है।

यह वे लोग हैं जो हमारे मूल आदर्शों को इसलिये खींचकर अपना रहे है ताकि उन्हे हमेंशा के लिये समाप्त कर दिया जाये। अब यह हम सब पर निर्भर है कि इन आदर्शों को हम पुनः कैसे हासिल करते है।

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