वर्ग भेद की पहचान कराती फिल्म ‘हिन्दी मीडियम’ – वीरेन्द्र जैन

4:00 pm or May 29, 2017
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वर्ग भेद की पहचान कराती फिल्म ‘हिन्दी मीडियम’

—– वीरेन्द्र जैन ——

जो लोग फिल्मों की कथा वस्तु और कथा कथन में ताज़गी को पसन्द करते हैं, उनके लिए हिन्दी मीडियम एक बेहतरीन फिल्म है। हमारे जैसे अर्ध-सामंतवादी, अर्ध-पूंजीवादी समाज में अंतर्विरोधों के स्वरूप भी भिन्न भिन्न प्रकार के हैं, जिसमें से एक की कथा इस फिल्म में कही गयी है।

अंग्रेजों के उपनिवेशवाद से हमने बिना सीधे टकराव के जिस शांति और अहिंसा के सहारे आज़ादी प्राप्त की है उसकी कुछ अच्छाइयां, और कुछ बुराइयां हमसे जुड़ी हुयी हैं। यह सच है कि अंग्रेजी शासन के दौर ही में हम कूप मण्डूपता से बाहर निकलने की ओर बढे और हमने दुनिया को अपना परिचय देते हुये उससे अधिक सीखा भी है। आर्यसमाज जैसे संगठन का उदय, सती प्रथा जैसी अनेक बुराइयों को निर्मूल करने वाले राजा राम मोहन राय, जातिवाद के खिलाफ लड़ाई छेड़ने वाले ज्योतिबा फुले, और अम्बेडकर आदि उन्हीं के शासनकाल में सामने आये। हमारे समाज के बदलाव में विदेश से शिक्षा ग्रहण करके स्वतंत्रता आन्दोलन में उतरे गाँधी और नेहरू जैसे महान विचारकों की सक्रियता के साथ सोवियत संघ की क्रांति की बड़ी भूमिका रही। किंतु आज़ादी के बाद भी जिन राजाओं नबाबों को गुलाम बना कर अंग्रेज राज्य किया करते थे, उनकी भक्ति से समाज का एक हिस्सा मुक्त नहीं हो पाया और उनमें से बहुत सारे अभी भी सांसदों, विधायकों के रूप में हमारे ऊपर शासन कर रहे हैं। अंग्रेजी का सम्मान भी उसके अंतर्राष्ट्रीय भाषा होने से अधिक हमारे प्रभुवर्ग की भाषा होने की स्मृति के रूप में बना हुआ है, जिनका हम अभी भी सम्मान कर रहे हैं। आज़ादी के बाद में पैदा हुआ प्रभुवर्ग भी अपनी महत्ता विदेशी वस्त्रों के साथ साथ उनकी भाषा से बनाये हुये है। हमारी चेतना में यह छाया हुआ है कि अगर हमको सामाजिक स्तर में ऊपर उठना है तो अंग्रेजी जैसी भाषा के सहारे ज्ञान प्राप्त होना चाहिए। ऐसी इच्छा रखने वाले लोग अगर खुद अंग्रेजी स्कूलों में नहीं पढ पाये हैं तो भी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के नामी स्कूलों में पढाना चाहते हैं।

जब पूर्ति से अधिक मांग होती है तो वस्तु या सेवा की कीमतें बढती हैं और कई मामलों में ये कीमतें क्रेता के नैतिक मूल्यों से गिरने के रूप में भी चुकायी जाती हैं। यही नैतिक पतन कभी कभी आत्मा को कचोटता है। हिन्दी मीडियम की कहानी इसी कचोट की कहानी है, जिसे साकेत चौधरी के निर्देशन व इरफान, कमर सबा, और दीपक डोब्रियाल आदि के अभिनय ने मर्मस्पर्शी ढंग से व्यक्त की है।

पिछले दशक में ही गैर सरकारी संगठनों ने शिक्षा के अधिकार के लिए जो प्रयास किये थे, वे फलीभूत होने की दिशा में बढे थे। [भोपाल के स्व. विनोद रैना भी उस आन्दोलन के प्रमुख योजनाकारों में एक थे व भारत ज्ञान विज्ञान समिति के माध्यम से योजना को मूर्त रूप देते हुए पाये जाते थे] इस योजना का एक भाग यह भी था कि स्कूल को निवास के निकट होना चाहिए व स्कूल के आस पास रहने वाले गरीब समुदाय के बच्चों को भी 25% तक की सीमा में प्रवेश देना हर स्कूल के लिए जरूरी होगा जिनकी फीस का अतिरिक्त हिस्सा सरकार वहन करेगी। किंतु जैसा कि ऐसी योजनाओं में होता है वही इसमें भी हुआ कि अमीर वर्ग के लोग गरीबों के रूप में कोटा हड़पने लगे। इसी फिल्म का ही एक डायलाग है जिसमें फिल्म का सहनायक कहता है कि हम गरीबों को मिली जमीनों पर अमीरों ने कब्जा कर लिया, हमारा सस्ता राशन ले लिया और अब शिक्षा का अधिकार भी तिकड़म से हथियाने लगे। देश भर में तेज हो रहे दलित अधिकार आन्दोलन भी इसी अहसास से प्रज्वलित हो रहे हैं।

कहानी एक अच्छी कमाई वाले नव धनाड्य परिवार की पढी लिखी बहू की उस महात्वाकांक्षा की है जिसे भ्रम है कि अगर उसकी इकलौती लड़की अच्छे अंग्रेजी स्कूल में नहीं पढी तो वह हीन भावना की शिकार होकर ड्रग लेने लगेगी। उसका पति उसे खुश रखने और उसकी हर इच्छा पूरी करने के लिए चाँदनी चौक की घनी बस्ती को छोड़ कर वसंत बिहार की पाश कालौनी में रहने लगता है किंतु उसके अंग्रेजी अज्ञान और व्यावसायिक पृष्ठभूमि के कारण जब उसकी लड़की का प्रवेश नहीं हो पाता किंतु गरीबों के कोटे में उसके नौकर की बेटी का हो जाता है तो एक दलाल के कहने पर कुछ दिनों के लिए वह गरीब बस्ती में रहने चला जाता है। अमीरी और नकली गरीबी के इस द्वन्द से उपजी विसंगतियां हास्य भी पैदा करती हैं, और उस बस्ती की दशा पर करुणा भी जगाती हैं। गरीबी में भी त्याग, आपसी सहयोग, भाईचारा, आदि उसकी आंखों पर अमीरी से उपजी असंवेदनशीलता की चर्बी को उतार देती है। संयोग से उसकी लड़की का प्रवेश तो गरीबों के कोटे से हो जाता है किंतु उसे सहयोग करने वाले के बेटे का नहीं हो पाता जो उस सीट का असली हकदार था। इसी विडम्बना से जन्मी आगे की कहानी जल्दी समेटने के चक्कर में थोड़ी बम्बइया हो जाती है, पर मर्मस्पर्शी बनी रहती है।

रोचक बनाने के लिए हास्य के दृश्य और संवाद स्वाभाविक हैं व ठूंसे हुए नहीं लगते। विवेकहीन फैशन, और व्यापार कौशल के दृश्य मनोरंजक हैं। इस फिल्म में व्यवस्था ही खलनायक है और व्यवस्था पर सवाल उठाने वाली सभी फिल्में परोक्ष में राजनीतिक फिल्में ही होती हैं, जो कुछ सोचने और बदलने के लिए प्रेरित करती हैं। यह आमिरखान की अच्छी फिल्मों की परम्परा में इरफान की एक नई कड़ी है।

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