किसान आंदोलन के निहितार्थ – जे.पी. शर्मा

3:15 pm or June 9, 2017
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किसान आंदोलन के निहितार्थ

—— जे.पी. शर्मा ——

किसान पूरे देश में आंदोलित है लेकिन मध्यप्रदेश में आंदोलन नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है। मंदसौर में 6 किसानों की पुलिस की गोलियों से मौत के बाद आंदोलन उग्र हो गया है और किसान हिंसा और आगजनी पर उतर आया है। यह उसी मध्यप्रदेश का किसान है जिसे सर्वाधिक गेंहू उत्पादन के लिये लगातार पांचवी बार कृषि कर्मण अवार्ड प्राप्त हुआ है। यद्यपि अब यह अवार्ड गर्व का नही बल्कि शर्म का कारण बन गया है क्योंकि जब सर्वाधिक अन्न उत्पादन करने वाले राज्य के किसान को अपनी जायज मांगों के लिये गोलियों से भून दिया जाता है और सरकार अपना दोष छिपाने के लिये जब किसानों को गुण्डे और असामाजिक तत्वों की संज्ञा देती है तो इससे अधिक शर्मनाक हो भी क्या सकता है। यदि यह आन्दोलन गुंडों या असामाजिक तत्वों का आन्दोलन होता तो उसे एक ही दिन में कुचल दिया गया होता. यदि यह आन्दोलन कांग्रेस प्रेरित होता तो भी एक दो दिन ही इसे कुचलने के लिए पर्याप्त थे, लेकिन यह एक स्वस्फूर्त किसान आन्दोलन है, यही वजह है कि इसे सरकार शांत करने में असफल रही है।

आखिर ऐसी क्या परिस्थितियां है कि मध्यप्रदेश में किसान इतना अधिक उग्र होने को विवष हुआ? यदि हम अपने आसपास नजर दौड़ायें तो उत्तर स्वतः समझ में आ जायेगा। कोई भी व्यक्ति जब असहनीय पीड़ा और कष्ट भोगता है तो उसके मन में दो ही विचार आते है। या तो वह मर जाना चाहता है, या जिसे वह अपनी पीड़ा का कारण समझता है उसे मार देना चाहता है। पांचवी बार कृषि कर्मण अवार्ड प्राप्त करने वाले मध्यप्रदेश का किसान जब आत्महत्या करके भी कुछ हासिल नही कर पाता तो वह आंदोलन का रास्ता अख्तियार करता है। या तो मर जाना चाहता है या मार देना चाहता है। मध्यप्रदेश विधानसभा में दिनांक 27 फरवरी 2017 को एक प्रश्न के उत्तर में गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह ने यह स्वीकार किया कि नवंबर 2016 से फरवरी 2017 तक मध्यप्रदेश में कुल 287 किसानों ने आत्महत्या की है। नोटबंदी के बाद किसानों की ऐतिहासिक दुर्दशा उनकी आत्महत्या के आंकड़ों में प्रकट होती है। यह आंदोलन अप्रत्याशित नही है क्योंकि सिर्फ चार महीने में 287 आत्महत्याएं किसानों की भयंकर पीड़ा और परिणामस्वरूप उत्पन्न आक्रोश का संकेत ही था जिसे हमारी सरकारों ने राष्ट्रवाद के चोले में ढॅकने का कुत्सित प्रयास किया।

जो किसान सब्जी, दूध, अन्न, दालें और हमारे जीवन से जुड़ी अनेक वस्तुएं पैदा करता है क्या उसे राष्ट्रवाद के नाम पर भूख से मरने को विवश किया जा सकता है? नोटबंदी के बाद किसानों का यही हाल तो हुआ था। अपनी ही फसल को बेचकर नकदी के बदले चेक पाने वाले किसानों की ऐतिहासिक दुर्दशा ही इस आंदोलन का मूल है। हिन्दुस्तान का किसान, जिसके बारे में जगत्प्रसिद्ध कहावत है कि वह कर्ज में पैदा होता है, कर्ज में जीता है और कर्ज में ही मर जाता है, क्या उस किसान को अपनी समस्याओं को सरकार के समक्ष रखने, जायज मांगों के लिये आंदोलन करने, प्रदर्शन करने का हक नही है? कब तक हमारी सरकारें अपनी नाकामियों को छिपाने के लिये किसानों को गुण्डे और असामाजिक कहती रहेंगी और विपक्ष पर भड़काने का आरोप लगाती रहेगी? आखिर कब हमारी सरकारें उस अन्नदाता को सम्मान से जीने का हक देगी, जिसके खून पसीने की कमाई से एक वर्ग के लोग अच्छे घरों में रहते है, अच्छी सड़कों पर चलते है, अच्छी गाड़ियों में सवारी करते है और मरने के बाद भी अच्छी एम्बुलेंस में उनकी शवयात्रा निकाली जाती है। जबकि वही गरीब किसान जो हमारे एश-आराम और विलासिता का कारण है उसे न तो अच्छी रोटी नसीब है, न अच्छे कपड़े, न अच्छा घर और मरने के बाद उसी गरीब मजदूर या किसान की लाश को उसके परिजन या तो कंधे पर ढोकर ले जाते है या फिर साइकिल पर ले जाने को मजबूर होते है। इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कि किसान उड़ीसा के कालाहाण्डी का है, उत्तरप्रदेश के महाराजगंज का है, या मध्यप्रदेश के मालवा का। आखिर कब जागेगी हमारी संवेदनाएं? आखिर कब तक हम गरीबों , मजदूरों और किसानों का इसी तरह शोषण करते रहेंगे?

यहां किसी एक आंदोलन से उत्पन्न स्थिति पर नही बल्कि देश में किसानों और गरीबों की समूची दशा पर चिन्तन करने की आवश्यकता है। इस बात की आवश्यकता है कि हम किसानों की समस्याओं को समझने का सिर्फ दिखावा न करें। मंदसौर में 6 किसानों की निर्मम हत्या करके उनकी लाश की सरकार द्वारा जिस दुर्दान्त तरीके से बोली लगाई गई है वह न सिर्फ हमारी सरकार को बल्कि हमारी संस्कृति को भी शर्मसार करता है। हमें इस बात को सोचने को विवश करता है कि क्या किसी मृत किसान के परिजनों की चीख और पुकार को एक लाख, दो लाख, पांच लाख, दस लाख या एक करोड़ रूपये देकर बंद किया जा सकता है? लाशो पर बोलियां लगाने की यह परंपरा बहुत खतरनाक है जो मध्यप्रदेश से शुरू हुई है। क्या सरकारों में इतनी क्षमता और साहस आ गया है कि वे अपने नागरिकों के जीवन को  रूपयों से तौल सके?

अन्ततः एक कल्याणकारी राज्य का असली उद्धेश्य जनता का कल्याण है। अब्राहम लिंकन की प्रजातंत्र के बारे में दी गई परिभाषा- जनता का, जनता के लिये, जनता द्वारा चलाया जाने वाला शासन ही प्रजातंत्र है। क्या हम वास्तव में उसी प्रजातंत्र में जी रहे है जो प्रत्येक नागरिक को समानता, स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी, शिक्षा और धर्म की आजादी तथा न्याय पाने की आजादी का भरपूर उपयोग करने का अवसर देता है? नही। हमारी सभ्यता और संस्कृति का सिर शर्म से झुक जाता है जब मंदसौर जैसी घटनाएं द वाशिंगटन पोस्ट, बीबीसी लंदन, चाइना डेली और हफिंगटनप पोस्ट जैसे दुनियां भर के अखबारों की सुर्खियां बनती है।

चाहे जो भी हो, हमें किसानों की इस भयंकर दुर्दशा को समाप्त करना ही होगा। विलुप्त होती असल भारतीय संस्कृति और लोकतांत्रिक मूल्यों को जीवित करना ही होगा। हमें हमारे खोते जा रहे नैतिक मूल्यों को पुनर्जागृत करना होगा। हमें हमारे पड़ोस में भूखे सो रहे व्यक्ति को हमारी रोटी छीनने से पहले रोटी देनी ही होगी। हमें ऐसी सरकारों की पुनर्स्थापना करनी ही होगी जो सबके लिये समान न्याय, अवसर, आजादी, अभिव्यक्ति और रोटी, कपड़ा तथा मकान उपलब्ध करा सके। किसान आन्दोलन के यही निहितार्थ है जिन्हे हमें समझने की आवश्यकता है।

जय हिन्द।

 

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