सवाल अकेले पर्यावरण की सुरक्षा का नहीं, दुनिया को बचाने का भी – जाहिद खान

3:22 pm or June 12, 2017
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सवाल अकेले पर्यावरण की सुरक्षा का नहीं, दुनिया को बचाने का भी

—- जाहिद खान —–

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एक अप्रत्याशित फैसला लेते हुए ऐतिहासिक पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकलने का एलान कर दिया है। इस फैसले से पीछे हटने पर अमेरिका की दलील है कि ‘‘पेरिस समझौता, एक कठोर वित्तीय व आर्थिक बोझ हैै। जिसे समझौते के रूप में अमेरिका पर थोपा गया है। हमारे नागरिकों के संरक्षण के अपने गंभीर कर्तव्यों को पूरा करने के लिए अमेरिका पेरिस जलवायु समझौते से हटता है।’’ जाहिर है कि अमेरिका के फैसले से सारी दुनिया हैरान-परेशान है और तमाम देशों ने उसके इस गैर जिम्मेवाराना रवैये पर अपनी नाराजगी जतायी है। जर्मनी, इटली, रूस और फ्रांस जैसे विकसित देशों ने एक संयुक्त बयान जारी करके अमेरिका के इस एकतरफा फैसले पर निराशा जाहिर की है। वहीं संयुक्त राष्ट्र ने भी पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका के हटने को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है। अमेरिका के इस तुगलकी फैसले से वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को बढ़ावा देने के नियंत्रण प्रयासों को गहरा धक्का लगेगा। अमेरिका के इस अकेले कदम से जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निबटने और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर और सुरक्षित दुनिया बनाने की कोशिशें प्रभावित होंगी।

पेरिस जलवायु समझौता पिछले साल दिसंबर में कई दौरों की गहन बातचीत के बाद अस्तित्व में आया था। इस समझौते पर अमेरिका समेत 196 देशों ने हस्ताक्षर किए थे। एक साल के अंदर सभी देशों को इस समझौते को अपने-अपने यहां अमल में लाना था। समझौता कानूनी रूप से सभी के लिए बाध्यकारी था। इस समझौते में शताब्दी के आखिर तक वैश्विक तापमान में दो डिग्री की कमी लाने का लक्ष्य तय किया गया था। इसके लिए हर देश को अपने यहां कार्बन उत्सर्जन में कमी लानी थी। ऐसा इसलिए क्योंकि 2 डिग्री से ऊपर तापमान जाने पर पृथ्वी पर समुद्र का स्तर बढ़ने लगेगा। मौसम में भयकंर बदलाव देखने को मिलेगा। पानी और खाने की किल्लत भी पड़ सकती है। लिहाजा दुनिया के तापमान को काबू में रखने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि ईंधन के तौर पर कार्बन उत्सर्जन यानी कोयले और पेट्रोलियम के दोहन को कम किया जाए। दुनिया में सबसे अधिक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करने वाले देशों में चीन सबसे बड़ा देश है, जो 23 फीसद ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करता है। वहीं संयुक्त राज्य अमेरिका 19 फीसद ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के साथ दूसरे नंबर पर है। पेरिस जलवायु समझौते पर चीन, रूस और भारत के हस्ताक्षर करने की वजह से अमेरिका को भी इस पर हस्ताक्षर करने पड़े थे। लेकिन उसके इस फैसले का अमेरिका में कई हलकों में विरोध हुआ था। विरोध करने वालों का मानना था कि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम हुआ, तो अमेरिका की विकास दर गिर जाएगी और उसके नागरिकों के जीवन स्तर में गिरावट आ जाएगी।

कल तक अमेरिका पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते के हक में खड़ा था, लेकिन अब वह इस समझौते को अपने लिए एक धोखा करार दे रहा है। जबकि धोखा देना खुद उसकी फितरत में शामिल है। सब जानते हैं कि पर्यावरण संरक्षण के मामले में अमेरिका का रवैया शुरू से ही आलोचना का विषय रहा है। दुनिया का सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश होने के बावजूद वह ऐतिहासिक क्योतो संधि में भी शामिल नहीं हुआ था। यही नहीं बाद की जलवायु वार्ताओं और समझौतों में भी उसका रुख जिम्मेदारी से भागने और रोड़े अटकाने का ही रहा है। यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण समझौते से बाहर निकला हो, बल्कि वह क्योटो प्रोटोकॉल से भी यह झूठ बोलकर बाहर निकल गया था कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य की मात्रा निर्धारित नहीं की है। बहरहाल जब पेरिस जलवायु समझौता अस्तित्व में आया, तो लगा कि अमेरिका इस बार समझौते से पीछे नहीं हटेगा। इस यकीन की वजह यह थी कि पेरिस जलवायु समझौते को परवान चढ़ाने में अमेरिका ने बढ़-चढ़ कर रोल निभाया था। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा जहां लंबे समय तक अपने अलग रुख पर डटे रहे, वहीं इस समझौते के लिए उन्होंने चीन एवं भारत को राजी करने के साथ ही, समझौते में शामिल हुए 198 देशों में से अधिकतर को सहमति के मुकाम तक ले आने में बड़ी भूमिका निभाई। पेरिस जलवायु समझौते में इस बात का भी एलान किया गया था कि पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों के लिए एक ग्रीन फंड बनाया जाए। इस फंड में अमेरिका और विकसित देशों को 10 अरब डॉलर की राशि देनी थी। अमेरिका ने वादा किया था कि सारी दुनिया में कार्बन कटौती के लिए वह ग्रीन क्लाइमेट फंड में तीन बिलियन डॉलर देगा। पूर्व राष्ट्रपति ओबामा के कार्यकाल में एक बिलियन डॉलर इस फंड में आ भी गए थे। लेकिन अब मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस फंड में कुछ भी रकम देने से साफ मना कर दिया है। जिस समझौते को तैयार करने में और दुनिया के तमाम देशों को इसके लिए राजी करने के लिए अमेरिका का रोल रहा, उसी समझौते से अब डोनाल्ड ट्रंप ने अपना पल्ला झाड़ लिया है।

पेरिस जलवायु समझौते से पीछे हटने के अपने कदम को अमेरिका यह कहकर न्यायोचित ठहरा रहा है कि ‘‘इस समझौते से भारत और चीन को सर्वाधिक फायदा हुआ है। जबकि अमेरिका के साथ नाइंसाफी हुई।’’ अमेरिका का कहना है कि ‘‘पेरिस समझौते के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए भारत को अरबों डॉलर मिलेंगे। आने वाले वक्त में चीन के साथ-साथ भारत अपने कोयला आधारित विद्युत संयंत्रों की संख्या दोगुनी कर लेंगे, जिससे उन्हें वित्तीय तौर पर अमेरिका की तुलना में लाभ होगा। वहीं समझौते का पालन करने से अमेरिका में साल 2025 तक 27 लाख नौकरियां जाएंगी।’’ अमेरिका पेरिस जलवायु समझौते से पीछे हटने पर जो दलीलें दे रहा है, उन दलीलों और दावों में जरा सी भी सच्चाई नहीं है। भारत और चीन जैसी विशाल और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं ने पिछले कुछ सालों में अपने यहां ग्रीनहाऊस गैस उत्सर्जन को रोकने के लिये स्वच्छ ऊर्जा और कम कार्बन अर्थव्यवस्था को विकसित करने के मानकों को प्राथमिकता से लागू किया है। तेजी से वहां यह कार्य हो रहा है। भारत की आबादी अमेरिका से चार गुना ज्यादा है, फिर भी भारत का कार्बन उत्सर्जन अमेरिका के आधे से भी कम है। कुल उत्सर्जन में भारत का हिस्सा चार फीसदी के करीब है। भारत और चीन दोनों ही संधि के तहत निर्धारित लक्ष्यों को लेकर गंभीर हैं। संयुक्त राष्ट्र ने इस संदर्भ में पिछले दिनों एक रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत और चीन ने पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते में कार्बन उत्सर्जन कम करने का जो लक्ष्य तय किया था, वे उससे आगे चल रहे हैं। वहीं रिपोर्ट में यह उम्मीद भी जताई गई है कि भारत निर्धारित लक्ष्य से आठ साल पहले, यानी 2022 तक ही अपनी 40 प्रतिशत बिजली गैर-पारंपरिक स्रोतों से पैदा करने लगेगा।

एक बात तय है कि पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका के अपने पैर पीछे खींच लेने के बाद जलवायु संरक्षण के लिए पहले की तुलना में और ज्यादा चुनौती पेश आएगी। जलवायु कोष का लक्ष्य पूरा करना काफी कठिन काम होगा। अच्छी बात यह है कि अमेरिका को छोड़कर दुनिया के बाकी देश अभी भी अपने इरादे पर कायम हैं। इन देशों को अभी भी इस बात का पूरा यकीन है कि वे अपनी कोशिशों से धरती के बढ़ते तापमान में दो डिग्री सेल्शियस तक की कमी ले आएंगे। हालांकि यह बात भी सच है कि अमेरिका की पूरी हिस्सेदारी के बिना पेरिस समझौता अपने मकसद को नहीं पा सकता। क्योंकि दुनिया की आबोहवा बिगाड़ने में अमेरिका का सबसे बड़ा योगदान है। पर्यावरण में कुल कार्बन के 21 फीसदी का जिम्मेदार वह है। अमेरिका दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्रदूषक देश है। वहीं प्रति-व्यक्ति उत्सर्जन के मामले में भी वह अव्वल नंबर पर है। पेरिस जलवायु समझौते पर अमेरिका के हालिया धोखे के बाद अब पूरी दुनिया के सामने एक ही रास्ता बचता है। पर्यावरण की समस्या को सुलझाने के लिए तमाम देश एक बार फिर मिलकर बैठें और पेरिस समझौते में जरूरत के मुताबिक संशोधन करें। इस समझौते को पहले से और ज्यादा मजबूत बनाया जाए। समझौते में आइंदा के लिए यह भी सुनिश्चित किया जाए कि अगर अमेरिका जैसा कोई देश अपनी न्यायसंगत जिम्मेदारियों से बचकर बाहर निकले, तो उस पर दंडात्मक कार्यवाही की जाए। आखिर सवाल अकेले पर्यावरण की सुरक्षा का ही नहीं, दुनिया को बचाने का भी है।

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