राजनीतिक दलों में शुचिता और नैतिकता के अलग-अलग पैमाने – योगेन्द्र सिंह परिहार

4:44 pm or June 27, 2017
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राजनीतिक दलों में शुचिता और नैतिकता के अलग-अलग पैमाने

—– योगेन्द्र सिंह परिहार ——

वैसे तो राजनीति शब्द को सुनने मात्र से हर एक व्यक्ति के दिमाग में एक ही बात सामने आती है कि राजनीति का मतलब सिर्फ चाल-बाजियां, बदमाशी और कुटिलता ही है । जबकि राज-काज को सुचारू रूप से चलाने के लिए जिन नीतियों का प्रयोग किया जाता है, उसे राजनीति कहा जाना चाहिए। हमने तो राजनीति का यही मतलब समझा क्योंकि जब देश आज़ाद हुआ तब सत्ताधारी दल के नेताओं ने देश को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए जो सर्वश्रेष्ठ नीतियां बनाई जा सकती थी वो बनाई, उन्ही राजनेताओं की इच्छा शक्ति और दूरदर्शी सोच ने देश को मज़बूत राष्ट्र के रूप में स्थापित किया।  देश ने आज़ादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू, गुलजारीलाल नंदा, लाल बहादुर शास्त्री, डॉ भीमराव आम्बेडकर, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, मोरारजी देसाई, ज़ाकिर हुसैन, जय प्रकाश नारायण, सरदार बल्लभभाई पटैल, इंदिरा गांधी, ज्योति बसु, राजीव गांधी, माधवराव सिंधिया, डॉ मनमोहन सिंह, डॉ एपीजे अब्दुल कलाम, प्रणव मुख़र्जी, अटल बिहारी वाजपेयी, पीव्ही नरसिम्हाराव व सोनिया गांधी जैसे राजनीति के महारथियों की कार्यशैली को नज़दीक से देखा । ये ऐसे नाम हैं जिनकी वजह से ही राजनीति में शुचिता और नैतिकता की बात की जाती है। इनके नाम सामने आने से हर एक भारतीय को गौरव की अनुभूति होती है ।

आज राजनीति का स्वरुप बदला-बदला सा है, अब सत्ता हथियाना ही राजनैतिक दलों का सबसे बड़ा मकसद है। अब आपको गरीबी हटाओ जैसे नारे नहीं सुनाई देते, अब कोई जय जवान-जय किसान नहीं कहता । सब कुछ स्वार्थ-परक हो गया है, नीतियां है तो सिर्फ अपने राजनैतिक दल को बढ़ावा देने की और अपने सहयोगी उद्योगपतियों की मदद करने की । देश के मज़दूर, किसान, गरीब-शोषित वर्ग की बात करने वाला वर्तमान सरकार में कोई नहीं है। राजनीति अब सिर्फ अपने आपको महान बताने की और दूसरे को नीचा दिखाने की रह गयी है। व्यक्ति अब विशेष हो गए हैं और दल बौने रह गए हैं ।

मुझे याद है 1987-88 में एक रेल दुर्घटना हुई थी और करीब 100 यात्री मारे गए तब राजीव गांधी सरकार के रेल मंत्री माधवराव सिंधिया ने नैतिकता के आधार पर मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। अब नैतिकता एक कौने में बैठकर धूल खा रही है, जिसका एक उदहारण ये है कि वर्ष 2015 में मध्यप्रदेश के हरदा के पास ही कामायनी एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हो गयी थी जिसमें करीब 27 लोग मारे गए परंतु केंद्र सरकार के रेल मंत्री सुरेश प्रभू के इस्तीफे की बात तो छोड़िये, माननीय मंत्रीजी रेल यात्रियों की सुध लेने की बजाय भोपाल की एक पांच सितारा होटल में आराम फरमाते रहे ।

राजनैतिक शुचिता की बात करें तो 1989 के आम चुनाव में जब कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर आयी, तब भी राजीव गांधी ने ये कहकर सरकार बनाने से इंकार कर दिया कि हमारे पास सरकार बनाने जितने आंकड़े नहीं है, इसीलिये वे विपक्ष में बैठेंगे । वर्तमान में हमने देखा कि 5 राज्यों के चुनावों के बाद 3 राज्यों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर आई तब भी सिर्फ पंजाब में ही कांग्रेस ने पूर्ण बहुमत मिलने की वजह से सरकार बनाई जबकि गोवा और मणिपुर में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद राज्यपाल ने संवैधानिक नियमों को ताक पर रखते हुए कांग्रेस पार्टी को बहुमत साबित करने के लिए नहीं बुलाया, वहीँ बीजेपी ने बाकायदा तोड़-फोड़ करके अपनी सरकार बनाई । बीजेपी जैसे राजनैतिक दल अब जल्दी में है, वे चाहते हैं हम येन-केन-प्रकारेण पूरे राज्यों में कैसे भी सत्ता पर काबिज हो जाएँ । ये और बात है कि सत्ता पर काबिज होने के बाद उन्हें क्या करना है, यह नीतियां अभी तक स्पष्ठ नहीं हैं ।

आज देश में सरकार बदली है तो सिर्फ भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्ला मचाये जाने की वजह से। समूचे देश में ये प्रचारित किया गया कि कांग्रेस ने जमकर देश को लूटा, जिसमे टेलीकॉम घोटाले की सबसे ज्यादा चर्चा की गयी जिसमेे 1 लाख 76 हज़ार करोड़ की लूट की बात की गयी । यहां ये बात बताना ज़रूरी है कि आखिर ये चर्चा शुरू कहाँ से हुई, मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली लोक लेखा समीति ने लोकसभा में पटल पर एक रिपोर्ट रखी जिसमे 1 लाख 76 हज़ार करोड़ के टेलिकॉम घोटाले का अनुमान दर्शाया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब टेलिकॉम घोटाले की सिर्फ चर्चा हुई तभी यूपीए की अध्यक्षा सोनिया गांधी ने सहयोगी पार्टी द्रुमक के टेलिकॉम मिनिस्टर ए राजा से इस्तीफा ले लिया । कुछ समय बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने सारे स्पेक्ट्रम की नीलामी को निरस्त करते हुए पुनः स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए थे और आश्चर्य की बात यह थी कि नई दरों के बाद भी स्पेक्ट्रम नीलामी से 15 हजार करोड़ के आसपास का राजस्व ही सरकार को प्राप्त हुआ, जबकि भाजपा ने पूरे देश में 1 लाख 76 हजार करोड़ का टेलीकॉम घोटाला बताकर इसे प्रचारित किया। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण का नाम आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाले में आया, तब भी श्रीमती सोनिया गाँधी ने उनसे तत्काल मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा ले लिया। इसी तरह के एक और अन्य मामले में पूर्व रेल मंत्री पवन बंसल के भांजे का नाम मात्र ढाई लाख रूपए की रिश्वत लेने में आया तुरंत ही नैतिकता के चलते पवन बंसल ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।

मैंने अभी तक राजनीति में मूल्यों और आदर्शों में चलने के सबसे अच्छे और ज्यादा उदाहरण कांग्रेस पार्टी में ही देखे हैं। हो सकता है देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाली कांग्रेस के नेताओं में वो भाव हमेशा से जीवित रहा हो कि किन संघर्षों व विपरीत परिस्थितियों में अंग्रेजों से लोहा लेकर हमारे पूर्वज नेताओं ने देश को आज़ादी दिलाई, हम कैसे देश के साथ बेईमानी करें।

पूरे देश में कांग्रेस को CAG और PAC द्वारा संसद के पटल पर पेश किये गए अनुमानित और भ्रमित करने वाले करोड़ों के आंकड़ों को घोटाला बताकर भ्रष्टाचार के नाम से बदनाम करने वाली पार्टियों ने अपने दामन में लगे दागों पर चर्चा भी नहीं की। वो लालकिले की प्राचीर से चिल्लाते रहे “ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा” और उनके नेता गण भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगाने से किंचित मात्र भी नहीं चूके, चाहे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का नाम डंपर व व्यापम जैसे घोटाले में आया हो जिसमे करीब 50 लोगों की जान चली गयी हो, फिर चाहे शिवराज सिंह के ही परिवार का नाम रेत के अवैध उत्खनन और परिवहन में प्रमुखता से आया हो, चाहे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह का नाम 36 हज़ार करोड़ के पीडीएस घोटाले में आया हो, चाहे राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का नाम 45 हज़ार करोड़ के खनिज घोटाले में आया हो, एक भी मुख्यमंत्री ने इस्तीफे की बात भी नहीं सोची और न ही माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने उनसे इस्तीफा माँगा। ये तो बड़े नेताओं की बातें हैं, बीजेपी शासित राज्यों के मंत्री भी भ्रष्टाचार के सारे पैमाने तोड़ते नज़र आ रहे हैं लेकिन रोकने वाला कोई भी नहीं है । मध्यप्रदेश की ही बात करें तो हाल ही में एक मामला प्रकाश में आया है जब मध्यप्रदेश के काबीना मंत्री नरोत्तम मिश्रा को 2008 के चुनाव में पेड न्यूज़ मामले में चुनाव आयोग ने अयोग्य करार दे दिया और उनके चुनाव को शून्य घोषित कर दिया, लेकिन न ही उन्होंने इस्तीफा दिया और बल्कि मध्यप्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान तो ये कहते नज़र आये कि चुनाव आयोग के निर्णय दूषित होते हैं। हैं न अजीब बात, केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकारें हैं, बावजूद उसके बीजेपी अध्यक्ष चुनाव आयोग पर आरोप मढ़ रहे हैं।

आज देश में ईमानदारी, नैतिकता और आदर्शों की बातें, मन की बातों का हिस्सा बन के रह गयी हैं । पूरे देश को प्रवचन देकर समझाया जाता है कि देश के नागरिक ईमानदार रहे, लोग सड़क पर झाडू लगाएं, मज़दूर अपनी मज़दूरी छोड़ दें, समझ ये नहीं आता है कि सरकारें अपना कर्तव्य कब निभाएंगी, जिन सरकारी कर्मचारियों को सफाई के लिए वेतन दिया जाता है वे कब काम करेंगे? जिन नेताओं को देश के नागरिक अपना प्रतिनिधि बनाते हैं, वे कब ईमानदार होंगे?

आश्चर्य तब होता है जब देश की सरकारें लाखों करोड़ रूपए उद्योगपतियों के कर्ज माफ़ कर देती है, औने-पौने दामों में बल्कि लगभग मुफ़्त में उद्योगपतियों को ज़मीन दे देती हैं और देश की जनता से कहती हैं कि गैस की सब्सिडी छोड़ दो, तथाकथित कृषि विशेषज्ञ कहते हैं किसानों को सब्सिडी देना धीमा ज़हर देने के बराबर है, यदि ऐसा है तो मुफ़्त में उद्योगपतियों को ज़मीन देना किस श्रेणी में आएगा ।

राजनैतिक शुचिता और नैतिकता के पैमाने अपने हिसाब से, अपने स्वार्थ के लिए बदल दिए जाएँ ये कहाँ तक उचित है? एक बात पक्की है, यदि वर्तमान सरकारों के मुख्यमंत्री और मंत्रीगण थोड़ी सी भी नैतिकता और ईमानदारी का परिचय देंगे तो 80 प्रतिशत माननीयों को घर बैठना पड़ जाएगा!

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