उत्तर प्रदेश-आधी हकीकत आधा फ़साना -अब्दुल रशीद

3:01 pm or July 6, 2017
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उत्तर प्रदेश-आधी हकीकत आधा फ़साना

—- अब्दुल रशीद —–

कानून-व्यवस्था को उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने मुद्दा बनाकर भारी बहुमत से जीत हासिल की. मायावती और अखिलेश यादव की सरकारों पर जंगल राज का आरोप मढ़ते हुए यह वादा किया था कि अगर वह सत्ता में आई तो कानून व्यवस्था को प्रमुखता देकर तुरंत व्यवस्था चुस्त – दुरुस्त कर देगी। तीन महीने बीत जाने के बाद भी कानून- व्यवस्था में कोई खास परिवर्तन जमीनी स्तर पर दिखाई नहीं पड़ता ।

ये और बात है की अपनी सरकार के सौ दिनों का रिपोर्ट कार्ड जारी करते समय मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी कानून-व्यवस्था में सुधार पर भारी कामयाबी का दावा करते नजर आए। लेकिन ऐसे दावों का जमीनी हकीकत से कोई तालमेल दिखता ही नहीं।

बिजनौर में बीते शुक्रवार की रात अज्ञात अपराधियों ने एक सब इंस्पेक्टपर की गला रेत कर हत्या कर दी, उनका शव गन्ने के एक खेत में फेंक दिया और उनकी सर्विस रिवाल्वर लेकर भाग गए। कानून- व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने वाले को ही अपराधियों द्वारा निशाना बनाया जाना इस बात की तस्दीक करता है कि अपराधियों का मनोबल कितना बढ़ा हुआ है, राज्य सरकार के वादों और दावो को मुंह चिढाते घटनाओं में,एक पेट्रोल पंप के मालिक को लूटा जाना, एक व्यापारी की हत्या, दो लड़कियों समेत एक परिवार के चार सदस्यों की धारदार हथियार से हत्या, गहने की दुकान में डकैती, एक पुलिस सब इंस्पेक्टर को खुलेआम पीटा जाना। सहारनपुर में जातिगत टकराव व हिंसा। गोरक्षा के नाम पर सरेआम हिंसा। आखिर इस तरह के अपराध पर लगाम क्यों नहीं लगता ?

मुख्यमंत्री पद कि शपथ लेने बाद कानून-व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए कई दिशानिर्देश जारी किए जैसे प्रदेश के सभी पुलिस अधीक्षक सुबह नौ बजे तक दफ्तर पहुंचें,रोज कम से कम एक थाने का निरीक्षण करे। मुख्यमंत्री ने थाने का औचक निरीक्षण करके यह संदेश भी देना चाहा कि पुलिस महकमे के कामकाज पर उनकी सीधी नजर है। गृह मंत्रालय उनके पास ही है तो आखिर क्या वजह है कि न तो आपराधिक घटनाओं में कोई कमी दिखाई दे रहा और नहीं पुलिस के मनोबल में बढ़ोतरी?

 

पुलिस महकमे में राजनैतिक हस्तक्षेप न नया है और नहीं किसी से छुपा है,पुलिस महकमे को राजनैतिक प्रभाव मुक्त और प्रभावशाली निष्पक्ष कार्यशैली को ध्यान में रखते हुए सोली सोराबजी समिति ने वरिष्ठ पुलिस अफसरों का कम से कम दो साल तक तबादला न करने और उनकी पदोन्नति, निलंबन आदि के लिए एक स्वायत्त बोर्ड बनाने की सिफारिश की थी। सोराबजी समिति की सिफारिशें, सर्वोच्च न्यायालय की कई बार की हिदायत के बावजूद, राज्य सरकारों ने इस सुझाव को लागू नहीं होने दिया। मुख्यमंत्री ने पहले तय किया था कि वे पुलिस अफसरों के तबादले नहीं करेंगे, क्योंकि इससे बदले की कार्रवाई के तौर पर देखा जाएगा। मगर फिर थोक में ताबड़तोड़ तबादले किए गए। भाजपा नेता पर कार्यवाही करने वाली महिला पुलिस अधिकारी श्रेष्ठ ठाकुर का तबादला किया जाना। सहारनपुर में एसएसपी के निवास को घेर लेने वाली भीड़ को उकसाने का आरोप सत्तारूढ़ पार्टी के एक सांसद पर ही लगा था। तो क्या यही है भाजपा का भयमुक्त और अपराधमुक्त उत्तर प्रदेश ?

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