क्या आप बिना काम वेतन लेना चाहेंगे? – डाॅ0 गीता गुप्त

4:15 pm or July 10, 2017
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क्या आप बिना काम वेतन लेना चाहेंगे?

—– डाॅ0 गीता गुप्त —–

इन दिनों दुनिया भर में अर्थशास्त्रियों और नीति निर्माताओं द्वारा न्यूनतम आय गारण्टी के पाँच सौ वर्ष पुराने आइडिया पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया जा रहा है। यह ‘यूनीवर्सल बेसिक इनकम‘ शीर्षक से चर्चा में है। इसके अन्तर्गत सरकार प्रत्येक वयस्क को एक निश्चित धनराशि प्रति माह देगी। इसका उनकी सम्पत्ति, रोज़गार से आय और उनके काम से कोई सम्बन्ध नहीं होगा। सर्वप्रथम वर्ष 1516 में थाॅमस मूर की पुस्तक ‘यूटोपिया‘ मेें यह विचार प्रस्तुत किया गया था।

फ़िलहाल फिनलैण्ड में प्रयोग के तौर पर इस योजना की शुरुआत की गई हैै। दो वर्ष के राष्ट्रीय पायलट प्रोग्राम के तहत 25 से 58 वर्ष की उम्र के दो हज़ार बेरोज़गारों को 37000 रुपये दिये जा रहे हैं। नौकरी लगने के बाद भी उन्हें यह धन मिलता रहेगा। कनाडा, नीदरलैण्ड, इटली और ब्राजील में भी ऐसे प्रयोगों की पहल हुई है। सिलिकाॅन वैली से भी यूनीवर्सल बेसिक इनकम( यूबीआई ) के विचार को समर्थन मिला है। बिल गेट्स और एलोन मस्क जैसे टेक्नोलाॅजी के दिग्गज यूबीआई को अपरिहार्य मानते हैं।

स्विट्जरलैण्ड में भी एक अभियान चलाकर माँग की जा रही थी कि देश के सभी लोगों को सरकार अनिवार्य न्यूनतम वेतन दे, वह भी बिना कोई काम किये। बच्चों के लिए लगभग 42 हज़ार और बड़ों के लिए 1.71लाख रुपये महीने की माँग थी। इसे नाम दिया गया-यूनीवर्सल बेसिक इनकम। इस माँग के समर्थन में एक लाख से अधिक लोग थे। स्विट्ज़रलैण्ड में नियम है कि किसी अभियान के समर्थन में यदि एक लाख से अधिक लोग हस्ताक्षर कर दें ंतो मतदान कराया जाता है। अतः जून 2016 में वहाँ मतदान हुआ, जिसमें देश के 78 प्रतिशत लोगों ने मुफ़्त में वेतन लेने से इनकार कर दिया। केवल 22 प्रतिशत लोगों ने प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया इसलिए उक्त प्रस्ताव वहाँ ख़ारिज़ कर दिया गया। ऐसी माँग को लेकर मतदान कराने वाला स्विट्ज़रलैण्ड पहला देश है। यदि उक्त प्रस्ताव पास हो जाता तो सरकार को हर माह देश के सभी नागरिकों सहित पाँच वर्ष से वहाँ रह रहे तमाम विदेशियों को( जिन्होंने वहाँ की नागरिकता ले ली हो ) न्यूनतम वेतन देना पड़ता।

उल्लेखनीय है कि स्विट्ज़रलैण्ड में यूबीआई के समर्थकों ने रोबोट बनकर समर्थन किया। उनकी दलील थी कि देश में अधिकतर काम रोबोट कर रहे हैं। फैक्ट्रियाँ आॅटोमेटेड हो चुकी हैं। पचास प्रतिशत से अधिक काम निःशुल्क होता है। ऐसे में देश में काम का अभाव होता जा रहा है। लोग बेरोज़गार हो रहे हैं। अतएव देश में निर्धनता और असमानता में वृ़िद्ध हो रही है। अनिवार्य न्यूनतम आय लागू होने से इस स्थिति में सुधार होगा और लोगों को घर-परिवार चलाने में सुविधा होगी। साथ ही यह समाज में बदलाव लाने में भी कारगर होगा।

लेकिन स्विट्ज़लैण्ड के अधिकतर राजनीतिक दल इस अभियान के विरोध में थे। उनका तर्क था कि ऐसे प्रस्ताव से अर्थ-व्यवस्था बिगड़ जाएगी। इसके अलावा इतने धन का प्रबन्ध कहाँ से होगा ? फिर बिना कुछ किये यदि लोगों को वेतन मिलने लगेगा तो वे सचमुच कुछ नहीं करेंगे और निष्क्रिय हो जाएँगे। यह समाज के लिए अत्यन्त घातक होगा। उनका यह तर्क भी दमदार था कि यदि स्विट्ज़रलैण्ड टापू होता तो ऐसा कर भी देते। यह नियम लागू हो गया तो दुनिया भर के लोग सीमा पार कर यहाँ आने लगेंगे। पाँच साल रहेंगे और उसके बाद यूबीआई की माँग करने लगेंगे।

जनवरी 2017 में ख़बर आई कि फ्रांस भी ऐसी योजना पर विचार कर रहा है जिसमें देश के हर वयस्क नागरिक को घर बैठे प्रति माह लगभग 54 हज़ार रुपये दिये जाएँगे। ऐसा इसलिए कि आॅटोमेशन और मशीनीकरण के कारण कामगारों को नौकरियों से हाथ धोना पड़ रहा है। परिणामतः वर्ष 2025 तक लगभग 30 लाख नौकरियाँ ख़त्म हो जाएँगी। ऐसी स्थिति में योजना के तहत मिलने वाली राशि से लोग भविष्य के प्रति आश्वस्त रह सकेंगे। हालाँकि इससे सरकार पर प्रति वर्ष 50450 अरब रुपये का भार आएगा। योजना के समर्थक फ्रांस के शिक्षामन्त्री बेनोइट हैमन का कहना है कि आरम्भ में 18 से 25 वर्ष की उम्र के ग़रीब लोगों को 600 यूरो ( 43500 रुपये ) देकर शुरुआत की जानी चाहिए; बाद में सभी वयस्कों को 750 यूरो (54500 रुपये) दिये जाने चाहिए। हैमन की तरह योजना का समर्थन करने वाले पूर्व सांसदों का भी मानना है कि वर्तमान में तेज़ आर्थिक विकास और सभी को नौकरियों के दौर की बात करना बेमानी है। यूरोपीय देशों में चार-पाँच फ़ीसदी विकास का समय अब बीत चुका है।

आॅक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी के 2015 के एक अध्ययन के अनुसार ‘अमेरिका में आॅटोमेशन के कारण लगभग आधी नौकरियाँ ख़तरे में हैं। यह ख़तरा अन्य देशों में भी पाँव पसार रहा है। सम्भवतः इसीलिए अनिवार्य न्यूनतम वेतन की योजना और इसकी न्यूनतम सीमा पर दुनिया भर में बात हो रही है। वर्ष 1980 के दशक में भी इस आइडिया का प्रचार ‘बेसिक इनकम अर्थ नेटवर्क‘ ने किया था। उसकी प्रभारी केट मॅकफार्लेन्ड इसे एक अच्छी अवधारणा मानती हैं । फ़िलहाल फिनलैण्ड सरकार ने ‘बेसिक इनकम प्रोग्राम‘ के तहत दस प्रतिशत बेरोज़गारों को भत्ते देने की बजाय न्यूनतम वेतन देने की शुरुआत की है। राष्ट्रीय स्तर पर कल्याणकारी कार्य करने वाली संस्था ‘केला‘ पर न्यूनतम वेतन योजना का दायित्व है। वह वर्ष 2019 के पहले इसमें शामिल किसी व्यक्ति से नहीं मिलेगी और न्यूनतम वेतन प्राप्त करने वाले परिवारों पर राष्ट्रीय रजिस्टर की मदद से नज़र रखेगी साथ ही इस योजना के प्रभाव का अध्ययन करेगी।

फिनलैण्ड में अभी प्रयोग के तौर पर दो हज़ार लोगों को योजना का लाभ मिल रहा है। वहाँ अलग-अलग राजनीतिक दलों ने बेरोज़गारों को न्यूनतम वेतन देने का समर्थन किया है। पार्ट टाइम जाॅब करने वालों को यह योजना पसन्द आई है। एक सर्वेक्षण के अनुसार 70 प्रतिशत लोगों ने इसका समर्थन किया है। इस प्रयोग का प्रभाव दो वर्ष बाद आँका जाएगा। केट मॅकफार्लेन्ड मानती हैं कि ‘यह एक परीक्षण है, जिसमें ख़ामियाँ भी होंगी लेकिन अच्छे प्रयोगों के लिए यह दरवाज़ा खुलने के समान है। एक सामाजिक प्रयोग का असर जानने के लिए दो वर्ष का समय बहुत कम है। फिर भी फिनलैण्ड ने एक अच्छी शुरुआत की है। ‘

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस तरह के कार्यक्रम के प्रति रुझान बढ़ रहा है। भारत में अभी इसपर चर्चा आरम्भ हुई है। 2016-2017 के आर्थिक सर्वेक्षण में एक पूरा अध्ययन ‘सार्वभौमिक बेसिक इनकमः अ कन्वर्सेशन विद एण्ड विदइन द महात्मा‘ के विचार पर है। इस अध्याय में महात्मा गाँधी के सामाजिक कल्याण सम्बन्धी विचारों के माध्यम से कामकाजी आबादी और ग़रीबों के लिए सुरक्षित आर्थिक नीति की आवश्यकता पर बल दिया गया है। आर्थिक सर्वेक्षण में बेसिक इनकम की कोई स्पष्ट सीमा निर्धारित नहीं की गई है।

भारत में इस योजना के पक्ष और विपक्ष में बहस के दौरान जो बिन्दु सामने आए हैं उनसे ज़ाहिर है कि इस विशाल देश में ऐसी योजना कारगर नहीं हो सकती। बेशक ‘अनिवार्य न्यूनतम आय‘ देश की 75 प्रतिशत आबादी के लिए क्र्रान्तिकारी क़दम हो सकता है। यह ग़रीबों के लिए सचमुच लाभप्रद होगा। मगर इस नीति से कामकाजी आबादी काम के प्रति उदासीन होगी। वह असंगठित क्षेत्रों में काम को प्राथमिकता देकर इस योजना का लाभ उठाना चाहेगी। अर्थ-व्यवस्था पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। यदि इसे कामकाजी आबादी तक सीमित किया जाता है तो प्रश्न यह है कि फिर गर्भवती स़्ित्रयों, विधवाओं, वरिष्ठ नागरिकों और मानसिक रूप से कमज़ोर तबक़ों का क्या होगा; जिन्हें विशेष सुविधा की आवश्यकता होती है? सही क्रियान्वयन के अभाव में कामकाजी आबादी के उपसमूह भी लाभ से वंचित रह जाएँगे।

एक समस्या यह भी है कि देश के कई भागों में लाभकारी योजनाओं का पैसा लोगों तक नहीं पहुँच पाता। ऐसे कई प्रकरण सामने आए हैं जिनसे यह बात सिद्ध हो चुकी है। एक रपट के अनुसार चण्डीगढ़ और पाण्डिचेरी जैसे राज्यों में भी सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत आधे से ज़्यादा लोगों को लाभ नहीं मिला था। केन्द्रीय वित्त मन्त्री श्री अरुण जेटलीजी ने भी स्वीकार किया है कि भारतीय राजनीति अभी इतनी परिपक्व नहीं है कि सभी के लाभ के लिए देश एकजुट हो पाए। ज़ाहिर है कि नयी योजना पर भी राजनीति का प्रभाव दिखाई देगा। इसके लागू होने के पहलेे भी और क्रियान्वयन में भी निचले स्तर पर राजनीति हावी होगी। फिर भी कल्पना तो की ही जा सकती है कि भारत जैसे देश में यदि सरकार की तरफ से ‘यूनीवर्सल बेसिक इनकम‘ का प्रस्ताव आया तो क्या होगा ? शायद 99 प्रतिशत लोग घर बैठे वेतन के प्रस्ताव पर सहर्ष सहमत हो जाएँगे, बिना यह विचार किए कि शारीरिक व मानसिक दृष्टि से सक्षम होते हुए भी बिना कार्य किये घर बैठे वेतन क्यों लिया जाए ?

उल्लेखनीय है कि सवा अरब से भी अधिक आबादी वाले भारत देश में हज़ारों गाँव और शहर ऐसे हैं जहाँ के लोग सरेआम बिजली चोरी करते नहीं झिझकते। कर-चोरी करना तो वे अपना अधिकार समझते हैं। यात्रा करते समय अपने बच्चों की उम्र कम बतलाकर आधा टिकट लेने से भी वे नहीं हिचकते। ऐसी कई सरकारी योजनाएँ हैं जो लोगों को मुफ़्तखोर बना रही हैं। ग़रीबों को एक-दो रुपये किलो अनाज मिल रहा है इसलिए वे मेहनत मज़दूरी करने से कतराते हैं। सरकार उन्हें निःशुल्क गैस कनेक्शन, निःशुल्क चिकित्सा, निःशुल्क शिक्षा-सुविधाएँ सुलभ करा रही है। सरकारी विद्यालयों में निःशुल्क मध्याह्न भोजन, गणवेश और साइकिल का प्रावधान है ही। कई राज्य-सरकारें विवाह का ख़र्च उठा रही हैं और दहेज़ तक दे रही हैं। बुज़ुर्गों को मुफ़्त में तीर्थयात्रा करायी जा रही है। युवाओं को मुफ़्त में सरहद पर भ्रमण का सुअवसर सुलभ कराया जा रहा है। निर्धनों को मुफ़्त में आवास उपलब्ध कराये जा रहे हैं। कथन का आशय यह कि देश की एक बड़ी जनसंख्या की अधिकाधिक आवश्यकताएँ सरकार की बदौलत मुफ़्त में पूरी हो रही हैं इस कारण वैसे भी वे श्रम से दूर होते जा रहे हैं। अब यदि ‘अनिवार्य न्यूनतम आय‘ की योजना लागू कर सबको बिना कोई काम किये घर बैठे प्रति माह एक निश्चित धनराशि मिलने लगेगी तो वे पूर्णतः नाकारा हो जाएँगे।

यह भी विचारणीय है कि भारत जैसे देश में, जहाँ कर्म को ही प्रधानता दी जाती रही है और ‘कर्मेव जयते‘ तथा ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन‘ जैसी सूक्तियाँ दोहरायी जाती रही हैं; ऐसी किसी योजना को कैसे स्वीकार किया जा सकता है जो मनुष्य को कर्मविमुख करने वाली हो ? फिर हमारे देश में न तो यूरोपीय देशों जैसी स्थितियाँ हैं, न निकट भविष्य में संचार साधनों और तकनीकी विकास के कारण लोगों की बेरोज़गारी बढ़ने का ख़तरा है। निश्चय ही हमें स्विट्ज़रलैण्ड जैसे छोटे देश के नागरिकों से सीख लेनी चाहिए जिन्होंने बिना काम के वेतन लेने से स्पष्ट मना करके अपने स्वाभिमान और पौरुष का परिचय दिया है। हमें किसी ऐसी अवधारणा के बारे में स्वप्न में भी सोचकर अपने पौरुष, अपने आत्मसम्मान और अपने देश की कर्मप्रधान संस्कृति को लज्जित नहीं करना चाहिए।

यह चिन्ताजनक है कि आज व्यक्ति देश की बात अवश्य करता है लेकिन चिन्ता उसे केवल अपनी और अपने परिवार की होती है। भौतिक समृद्धि उसका एकमात्र लक्ष्य रह गया है, यही कारण है कि भ्रष्टाचार के इतने मामले सामने आ रहे हैं। नेता, अधिकारी, कर्मचारी भ्रष्टाचार करते पकड़े जाने पर भी अपनी ईमानदारी का डंका पीटते हैं और स्वयं को देशभक्त साबित करना चाहते हैं। वस्तुस्थिति यह है कि अब ईमानदारी, नैतिक मूल्य और देशभक्ति जैसे शब्द केवल पाठ्यक्रमों की शोभा बढ़ाने के लिए रह गए हैं, असल जीवन में इनका अस्तित्व नहीं रह गया है। इसीलिए भाषणों में राष्ट्रोत्थान के नारे लगाये जाते हैं और राष्ट्रहित की बहुत बातें की जाती हैं मगर हक़ीक़त सबको मालूम है। बहरहाल, हमें बिना काम के वेतन की अवधारणा को नकारना चाहिए और अपने देश की उन्नति के लिए सदैव अपने बाहुबल, परिश्रम और पुरुषार्थ को सिद्ध करना चाहिए। हमारा देश कर्मप्रधान है और हमें अपने कर्म का ही फल स्वीकार्य होना चाहिए।

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