नोटबंदी पर जायज है, अदालत का सख्त रुख – जाहिद खान

5:04 pm or July 13, 2017
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नोटबंदी पर जायज है, अदालत का सख्त रुख

—– जाहिद खान ——

500 और 1000 रुपये के बंद हो चुके नोट जमा कराने से रह गए लोगों के दिल में एक उम्मीद की किरण जगी है। सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में नोटबंदी से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए नोटबंदी के दौरान किसी मजबूरीवश 500 और 1000 के पुराने नोट जमा न करा पाए लोगों को एक और मौका दिए जाने पर केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया दोनों से जवाब मांगा है। चीफ जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए उससे कई गंभीर सवालों के जवाब तलब करते हुए कहा, ‘‘किसी की मेहनत से कमाई गई वैध रकम को ऐसे कैसे बर्बाद होने दिया जा सकता है ? कोई अगर जेल में बंद है, तो वह रुपये कैसे जमा कराएगा ? यदि ऐसा मौका नहीं दिया जाता, तो ये गंभीर मामला है। आप किसी की वाजिब रकम को कैसे बर्बाद होने दे सकते हैं।’’ अदालत की यह चिंताएं वाजिब भी हैं। वाजिब वजह से जो लोग तयशुदा वक्त पर अपने पुराने नोट बैंक में जमा नहीं करा सके हैं, उन्हें अपने ही पैसे से वंचित करने की इजाजत कोई लोकतांत्रिक सरकार कैसे दे सकती है ? जबकि यह उनका संवैधानिक अधिकार है। संविधान का अनुच्छेद-21 देश के सभी नागरिकों को जीवन का अधिकार देता है। यह अनुच्छेद उसे सम्मान से जीवन जीने का अधिकार भी देता है। यही वजह है कि शीर्ष अदालत ने भी इस बात को माना कि जिनके पास तार्किक आधार है, उनकी बात सुनी जानी चाहिए। उन्हें सरकार नोट जमा करने का एक और मौका दे।

गौरतलब है कि सुधा मिश्र और कुछ अन्य याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं दाखिल कर निश्चित अवधि में पैसा जमा न करा पाने की अपनी मजबूरी बताते हुए अदालत से पुराने नोट जमा कराने का निर्देश मांगा था। मामले की सुनवाई के बाद अदालत को भी याचिकाकर्ताओं की दलील में दम दिखाई दी। लिहाजा उसने सरकार से इस मसले पर संजीदगी से विचार करने को कहा। अदालत, इस मामले में सरकार के उदासीन और नकारात्मक रवैये से इस कदर खफा थी कि उसने सरकार को दो टूक कह दिया कि सरकार यदि इस मसले पर सकारात्मक रवैया नहीं अपनाती, तो वह नोटबंदी के बाद नोट जमा कराने की तय समय सीमा घटाने संबंधी अध्यादेश को निरस्त कर सकती है और इसकी पूरी जवाबदेही सरकार की होगी। अदालत का कड़ा रुख देखते हुए सरकार की ओर से पेश साॅलिसिटर जनरल ने अपना जवाब दायर करने के लिए उससे दस दिन की मोहलत मांगी। इस पर अदालत ने उसे दो हफ्ते के भीतर अपना जवाब दायर करने का समय दे दिया। अब इस मामले की अगली सुनवाई 18 जुलाई को होगी, जिसमें सरकार अपना पक्ष अदालत के सामने रखेगी। हालांकि सरकार, अदालत में पहले ही एक हलफनामा दाखिल कर यह कह चुकी है कि वह पुराने नोट जमा कराने के लिए अब कोई विंडो नहीं खोलने जा रही। सरकार के इस हलफनामे के बावजूद शीर्ष अदालत को अब भी यह लगता है कि जो लोग किसी मजबूरी से अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा बैंक में जमा नहीं कर पाए, उन्हें रियायत मिले। चलन से बाहर हो गए उनके नोट बैंक में जमा हों। जिससे उनकी परेशानियां दूर हों। अपने ही पैसे जमा कराने के लिए वे दर-दर न भटकें।

पिछले साल 8 नवंबर की शाम को अचानक नोटबंदी का एलान करते हुए देश के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को यह आश्वासन दिया था कि सभी लोग 30 दिसंबर तक बैंक और पोस्ट ऑफिस में पुराने 500 और 1000 के नोट जमा करा सकते हैं। अगर इस दरमियान कोई पैसे जमा नहीं करा पाता, तो वह कुछ शर्तो के साथ आरबीआई की शाखाओं में 31 मार्च तक पुराने नोट जमा करा सकता है। लेकिन बाद में सरकार ने नोट जमा कराने की समय सीमा सिर्फ 30 दिसंबर तक ही सीमित कर दी। हालांकि एनआरआई लोगों के लिए यह समयसीमा अब भी 30 जुलाई तक बरकरार है। सरकार की इस वादाखिलाफी से देश में हजारों लोग मुश्किल में फंस गए। खास तौर पर वे लोग जो किसी मजबूरी के चलते निर्धारित समय पर अपने नोट बैंक में जमा नहीं कर पाए। अब वे लोग रिजर्व बैंक के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही। जब वे हर तरफ से कोशिशें कर-कर हार गए, तो उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में अपनी गुहार लगाई।

नोटबंदी से पीड़ित लोगों के किस्से यदि जानें, तो वह ऐसे हैं कि उन्हें सुनकर पत्थर दिलवालों का भी दिल पसीज जाए। उन्हें उनसे सहानुभूति पैदा हो जाए। मसलन एक याचिकाकर्ता की यह शिकायत है कि वह अपने 66 लाख, 80 हजार रुपये महज इसलिए बैंक में नहीं जमा करा सका, क्योंकि बैंक में उसकी केवाईसी अपडेट नहीं थी और बैंक ने उस वक्त केवाईसी अपडेट करना स्वीकार नहीं किया। वहीं दूसरी याचिकाकर्ता सुनीता गुप्ता जो कि राजस्थान के अलवर जिले की रहने वाली हैं, उन्हें लंबे समय से लंग्स कैंसर हैं। उनका एम्स में इलाज चल रहा है। जब पुराने नोट बंद किए गए, तब वह कोमा में थीं। तीन महीने बाद वह कोमा से बाहर आईं, तो उन्हें यह मालूम चला कि इलाज के लिए जो उनके पुराने नोट घर में रखे हैं, उनका कोई मोल ही नहीं है। फिर भी आखिरी उम्मीद लेकर सुनीता और उनके पति रिजर्व बैंक पहुंचे, लेकिन गार्ड ने उन्हें अंदर ही नहीं जाने दिया। उन्हें बाहर से ही भगा दिया गया। तीसरी याचिकाकर्ता सुधा मिश्र नोटबंदी के दरमियान अस्पताल में भर्ती थीं। बच्चे को जन्म देने की वजह से वह बंद कर दिए गए नोट जमा नहीं कर सकीं। अब जब वे ठीक होकर रिजर्व बैंक पहुंची, तो उन्हें भी निराशा हाथ आई। वहीं एक दीगर याचिकाकर्ता 71 साल की सरला श्रीवास्तव का कहना था कि उनके पति की मौत बीते साल अप्रेल में हुई। उन्हें जनवरी में यह बात मालूम चली कि पति के बक्से में 1.79 लाख के पुराने नोट हैं। इसके अलावा देश में तमाम लोग ऐसे मिल जाएंगे, जो नोटबंदी के दरमियान जेल में बंद थे, लिहाजा वे अपने नोट बैंक में जमा नहीं कर पाए।

सरकार के वादे के मुताबिक पहले तो पुराने नोट 31 मार्च तक हर हाल में जमा होने चाहिए थे, पर सरकार ने देशवासियों से किया अपना वादा नहीं निभाया। वह अपने वादे से मुकर गई। अब जबकि कुछ लोग उचित कारणों के साथ अपना पैसा आरबीआई में जमा कराने आ रहे हैं, तो बैंक को उनका पैसा जमा करना चाहिए। वह पैसा जमा करने से कैसे इंकार कर सकता है ? हां, पैसे के बारे में यदि उसे कोई शक है, तो वह इसकी जांच करा सकता है। पीड़ित से इस बारे में सबूत मांग सकता है। लेकिन बिना किसी ठोस वजह के पैसों को जमा करने से इंकार करना, उनके साथ नाइंसाफी होगी। जो लोग थोड़ा-थोड़ा कर पैसा जमा करते हैं, यदि उनकी ये रकम कागज हो जाएगी, तो उनके ऊपर क्या बीतेगी ? उनकी और उनके बच्चों की सारी जिंदगी ही तबाह हो जाएगी। यही वजह है कि अदालत ने याचिकाकर्ताओं की पीड़ा को संजीदगी से लेते हुए बीते 21 मार्च को भी सरकार से ऐसे ही सवाल पूछते हुए, उसे राय दी थी कि वैधता और तार्किकता के आधार पर उन लोगों को एक विंडो देनी चाहिए, जो व्यावहारिक कारणों से 30 दिसंबर तक पुराने नोट नहीं जमा करा पाए थे। शीर्ष अदालत ने एक बार फिर अपनी वही बात दोहराई है। अपनी जिद छोड़कर, सरकार और आरबीआइ को भी ऐसी राह निकालना चाहिए, जिससे नोटबंदी से पीड़ित लोगों को राहत मिले। वह अपना बाकी का जीवन सम्मान के साथ बिता सकें।

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