एक खुला पत्र सदी के महानायक के नाम! – डाॅ0 गीता गुप्त

5:43 pm or July 19, 2017
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एक खुला पत्र सदी के महानायक के नाम!

—– डाॅ0 गीता गुप्त —–

आदरणीय अमिताभ बच्चनजी,

सोचा नहीं था कि कभी आपको पत्र लिखूँगी। मगर आपने जिस तरह तिल का ताड़ बना दिया, उसपर मौन रहना मेेरे लिए सम्भव नहीं है।

समाचारपत्रों से ज्ञात हुआ कि आपने आम आदमी पार्टी के नेता और लोकप्रिय कवि कुमार विश्वास को काॅपीराइट उल्लंघन का नोटिस भेजा है। वह भी सिर्फ़ इसलिए कि उन्होंने आपके बाबूजी को श्रद्धांजलि देने के लिए एक वीडियो में उनकी कविता का उपयोग किया था। आपके द्वारा नोटिस भेजने की ख़बर आने पर कुमार ने ट्वीट करके आपको सूचित किया कि बाबूजी को श्रद्धांजलि देने हेतु बनाया गया वीडियो वे डिलीट कर रहे हैं और इससे कमाये गए बत्तीस रुपये भी आपको भेज रहे हैं। मुझे विश्वास है कि कुमार ने ट्विट में जैसा कहा है, वैसा कर दिया होगा।

अमिताभजी, मैं दुःख के साथ कहना चाहती हूँ कि आपने काॅपीराइट का मामला उठाकर अपना सम्मान घटा लिया है। हरिवंशराय बच्चन सिर्फ़ आपके पिता ही नहीं, कवि भी थे और कवि का परिवार केवल उसके रक्त-सम्बन्धी ही नहीं होते वरन् सभी शब्द-साधक, जिनका धर्म सृजन है और साहित्य के सुधी पाठक भी कवि के परिजन ही होते हैं। कवि को उनसे प्रेरणा, सम्बल और सम्मान की प्राप्ति होती है। रचनाकार की कृति को यदि कोई न पढ़े, प्रशंसा न करे, तो वह कैसे चर्चित और सम्मानित हो सकता है ? उसका हर शब्द समाज के लिए होता है और होना भी चाहिए; इसी में लेखन की सार्थकता है।

महोदय, मैं हिन्दी की प्रोफ़ेसर हूँ और आपको बता दूँ कि महान् साहित्यकारों, लेखकों-कवियों की जन्म व पुण्य तिथि पर लेख और भाषण आदि में हम उनकी रचनाओं का उपयोग करते आ रहे हैं। इसमें कुछ ग़लत नहीं है। यह एक सहज, स्वाभाविक क्रिया है। प्रसिद्ध शायर और फ़िल्मी गीतकार डाॅ0 राहत इन्दौरी के शब्दों में-‘‘यह किसी भी कवि के लिए सम्मान की बात होती है कि उसकी पंक्ति को कभी किसी बहस, किसी निबन्ध या लेख या कहीं पर किसी भाषण में उद्धृत किया जाता है। अक्सर लोग ऐसा करते भी हैं। कवि-सम्मेलनों या मुशायरों में तो ऐसा होता ही रहता है कि किसी वरिष्ठ कवि को सम्मान देते हुए सन्दर्भ विशेष में उनकी कविता या शायरी को पढ़ दिया जाता है।‘‘ ऐसा करने पर किसी कवि का मान नहीं घटता, न उन्हें कोई हानि पहुँचती है बल्कि इससे उनका क़द और बढ़ जाता है तथा उनकी प्रतिष्ठा में भी वृद्धि होती है। मुझे नहीं लगता कि कुमार का इरादा हरिवंशराय जी की कविता के व्याज से धन कमाना रहा होगा। राहत इन्दौरी की तरह मैं भी मानती हूँ कि आपके बाबूजी के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए ही कुमार ने ऐसा किया होगा। बेशक उन्हें इसके लिए सराहना मिली होगी। पता नहीं बत्तीस रुपये कहाँ से मिल गए, काश! ये रुपये न मिले होते। ख़ैर……

बहरहाल, इसी सन्दर्भ में उर्दू में लेखन के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित एक प्रसिद्ध शायर मुनव्वर राणा के शब्द भी सुन लीजिए-‘‘साहित्य कोई मकान या दुकान नहीं है, जिसपर किसी बेटे का अधिकार हुआ करता है और वह किसी अन्य से उसे बाँटने में एतराज़ जता सकता है। वह ऐसी सम्पदा होती है जिसपर किसी व्यक्ति का विशेष अधिकार नहीं होता। साहित्य समाज की सम्पत्ति होता है।‘‘ कभी-कभी किसी कवि की पंक्ति सीधे दिल में उतर जाया करती है, तब लोग उसे गाहे-ब-गाहे दोहराते रहते हैं। जैसे-

‘बुन्देले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी,
ख़ूब लड़ी मरदानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।‘‘-सुभद्राकुमारी चैहान

‘‘मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फंेक,
‘‘मातृ-भूमि पर शीष चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक।‘‘- माखनलाल चतुर्वेदी

‘‘आवहु सब मिलिकै रोवहु भाई।
हा-हा! भारत-दुर्दशा देखि न जाई।‘‘-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

ऐसी अनेक पंक्तियाँ वर्षों से मंचों पर दोहरायी जाती रही हैं और किशोर व युवा विद्यार्थी तो सोत्साह पूरी काव्य-रचना का पाठ कर श्रोताओं को मन्त्रमुग्ध करते आ रहे हैं। हम प्रोफ़ेसर्स भी वर्चुअल क्लाास में स्क्रीन पर और रेडियो पर ‘ज्ञानवाणी‘ में प्रसिद्ध कवियों की कविताओं एवं अन्य साहित्यिक रचनाओं का समग्र पाठ करके विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करते आ रहे हैंै। यह अध्यापन का एक अंग है। भोपाल के प्रतिष्ठित ‘भारत भवन‘ में तो निरन्तर कालजयी कृतिकारों पर एकाग्र कार्यक्रम होते रहते हैं। अभी जुलाई में जयशंकर प्रसाद की काव्य-कृति ‘कामायनी‘ और नाटक ‘ध्रुवस्वामिनी‘ के गीतों पर कथक नृत्य की मनोहारी प्रस्तुति हुई। उनकी कविताओं का भावपूर्ण पाठ भी प्रस्तुत किया गया। ( आपके हिसाब से तो यह सब काॅपीराइट उल्लंघन का मामला है क्योंकि कलाकारों को मानदेय मिलता है। )

अमिताभजी, संयोगात् कोई रचनाकार अपनी रचना के माध्यम से अमरत्व को प्राप्त होता है। यह सौभाग्य विरलों को ही मिलता है। अनवरत् प्रासंगिक बने रहने वाले रचनाकार नगण्य और कालजयी हैंै, जिनकी चर्चा अनेकानेक सन्दर्भों में की जाती है। वर्षों पूर्व, सन् 1981 में उपन्यास-सम्राट् मुंशी पे्रमचन्द की जन्म शताब्दी के अवसर पर उनके चार उपन्यासों-‘गोदान‘, ‘ग़बन‘, ‘प्रेमाश्रम‘, ‘सेवासदन‘ और कहानी ‘फ़ातिहा‘ का रेडियो नाट्य रूपान्तर प्रसारित किया गया था। मैंने प्रेमचन्दकृत उपन्यास ‘ग़बन‘, कालिदासकृत ‘विक्रमोर्वशीयम्‘ और भारतेन्दु हरिश्चन्द्रकृत ‘अन्धेर नगरी चैपट राजा‘ का रेडियो नाट्य रूपान्तर किया था। देश में जाने कितने लोग इस तरह का कार्य करके साहित्य को नयी पीढ़ी सहित जन-जन तक पहुँचा रहे हैं। आप इसे क्या कहेंगे ? स्वाधीनता-आन्दोलन सम्बन्धी रेडियो रूपक और महात्मा गाँधी पर रेडियो-कार्यक्रम तैयार करते समय मुझे उनमें कई महान् रचनाकारों की काव्य-पंक्तियों ( और कहीं-कहीं सम्पूर्ण गीत ) का समावेश करना पड़ा क्योंकि यह विधा की माँग थी। तो क्या इसके लिए आपके दृष्टिकोण से हम मसिजीवियों और कलाकारों को अदालत की दहलीज़ पर खड़े होने की सज़ा मिलनी चाहिए ?

भोपाल के ग़ज़लकार दुष्यन्त त्यागी का नाम आपने सुना होगा। अल्पायु में ही वे दिवंगत हो गए। लेकिन उनकी लेखनी ने उन्हें अमर कर दिया।

‘‘हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
तेरे सीने में नहीं तो मेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।‘‘

और ‘‘अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
कमल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।‘‘
और‘‘एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो,
कौन कहता है कि आसमाँ में सूराख नहीं हो सकता ?‘‘ जैसी उनकी पंक्तियाँ आए दिन यहाँ मंचों पर गुंजायमान होती हैं; मगर ऐसी शर्मनाक स्थिति कभी पैदा नहीं हुई कि दुष्यन्तजी के परिवारजन प्रस्तोताओं को कटघरे में खड़ा कर दें।

अमिताभजी, आप अन्यथा न लीजिएगा। मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहती हूँ, सच तो यह है कि आप कोई सृजनधर्मी नहीं वरन् सिर्फ़ एक कलाकार हैं जो केवल पैसों के लिए काम करता है। सच्चा कवि, लेखक या सृजनधर्मी बहुत संवेदनशील मानव होता है। उसका लेखन व जीवन समाज और देश को समर्पित होता है। भले ही अपनी लेखनी के दम पर वह जीविकोपार्जन न कर सके फिर भी एक जुनून, एक प्रतिबद्धता उसे शब्दों की ज़मीन से जोड़े रखती है। पाठकों, साहित्य-प्रेमियों से मिली प्रशंसा व कदाचित् पुरस्कार उसके लेखन, परिश्रम और समूूचे जीवन को सार्थकता प्रदान करते हैं। मृत्योपरान्त भी उसकी रचना का स्मरण उसकी मूल्यवत्ता को सिद्ध करता है और उसे जीवन्त बनाये रखता है।

आपने तो स्वयं एक साक्षात्कार में कहा था कि ‘‘हो सकता है कि मेरी अभिनय-कला को कुछ वर्षांे बाद भुला दिया जाए लेकिन बाबूजी की कला तो शताब्दियों तक जीवित रहेगी।‘‘ मगर आपकेे इस क़दम से तो साहित्यिक बिरादरी और शि़क्षाविद् भी उन्हें याद करने से भी परहेज़ करेंगे क्योंकि आपसे पंगा लेने में किसी की दिलचस्पी नहीं, न किसी के पास इतना समय है। सोचती हूँ, हरिवंशराय बच्चन आज जीवित होते तो क्या करते ? उनके तो जीवन-काल में ही उनके साथ किये गए पत्राचार को लोगों ने प्रकाशित करके भुना लिया, पर वे मौन रहे। अब आप चाहें तो ऐसे लोगों को खोज निकालिए और बाबूजी को हुई क्षति-पूर्ति का उपाय भी कर डालिए।

बस एक अन्तिम बात और अमिताभजी, जीवन में धन ही सब कुछ नहीं होता। धन-बल से लोगों का दिल नहीं जीता जा सकता। आपने राई को पहाड़ बनाकर जो उदाहरण प्रस्तुत किया, उससे आपकी छवि ही धूमिल नहीं हुई है बल्कि इससे आपके बाबूजी के साहित्य को भी क्षति पहुँच सकती है। यह बहुत दुःखद है। यह अनावश्यक विवाद जीवन के उत्तरार्द्ध में भी आपकी धनलिप्सा और संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है। मुझे लगता है इससे बचा जा सकता था।

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