प्रधानमंत्री द्वारा की गई गौरक्षकों की कड़ी निंदा – शैलेन्द्र चौहान

5:58 pm or July 19, 2017
dalits

प्रधानमंत्री द्वारा की गई गौरक्षकों की कड़ी निंदा

—— शैलेन्द्र चौहान ——

गौरक्षकों द्वारा अल्पसंख्यकों पर की जा रहीं जघन्य क्रूरताओं के लिए हमारे प्रधानमंत्री कभी कभी चिंतित होते हैं, इसे रोकने की सलाह भी देते हैं और चेतावनी भी. कड़ी निंदा भी करते हैं. लेकिन गौरक्षक हैं कि इसे शाबासी समझते हैं और विधर्मियों को मारते काटते रहते हैं. उनके अपने मुख्यमंत्री और राज्य प्रशासन भी उसी भाव से यह ग्रहण करते हैं. जबकि हमारा संविधान भारत के सभी नागरिकों को समान रूप से ससम्मान जीने का अधिकार देता है. जिसको सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सरकार की होती है. हम आपको याद दिलाना चाहेंगे कि गुजरात के ऊना में गाय मारने के आरोप में कथित गोरक्षकों ने दलितों की घंटों पिटाई की थी. इस घटना को एक साल पूरा हो चुका है. उस वक्त ऊना की घटना के बाद बहस के लिए बुलाई गए संसद के विशेष सत्र में बड़े पैमाने पर सीटें खाली रह गई थीं. ये तब था जब मौजूदा एनडीए के पास यूपीए की तुलना में अधिक सांसद हैं और दलितों की बात संसद में रखने के लिए दलित ख़ुद वहां मौजूद हैं. ये सभी दलित सांसद ये बताने में गर्व जताते रहे कि उनकी सरकार ने इस घटना के बाद पीड़ितों को कितनी मेडिकल सहायता और अन्य तरह की मदद मुहैया कराई. यूपीए के समय में दलितों पर ज़्यादा जघन्य अपराध हुए, इस बात को साबित करने के लिए उनके पास अपने ही सबूत हैं. दुख की बात तो है कि कोई ये सवाल नहीं पूछता कि अभी तक भारत में भेदभाव और छुआछूत इतने बड़े पैमाने पर क्यों हैं? क्या भारत साल 2047 तक, जब अपनी आज़ादी के सौ साल पूरे होने का जश्न मना रहा होगा, तब तक भेदभाव मुक्त समाज बन पाएगा? गुजरात के ऊना से लेकर सहारनपुर में दलितों पर हो रहे अत्याचार के ख़िलाफ दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन पर  मीडिया की भूमिका भी पक्षपात की दिखी. इन प्रदर्शनों में काफी तादाद में दलित शामिल रहे. लेकिन 24 घंटे दर्जन भर विशेष महत्वपूर्ण राजनीतिक मेहमानों को बैठाकर बहस कराने वाली मुख्यधारा मीडिया ने इन प्रदर्शनों की कवरेज से दूरी बनाए रखी. किसानों के प्रदर्शनों पर भी मीडिया का यही रुख दिखा. दलितों के उभार को ऐतिहासिक तौर पर हमेशा नुकसान पहुंचाया जाता रहा है. इसी सिलसिले में कभी-कभी ऊना जैसी घटना के बाद गुस्सा भी फूट पड़ता है. यह द्वंद्व बना हुआ है कि उन्हें अपमान सहते हुए भी बहुसंख्यकों से जुड़कर रहना होगा या फिर राजनीति से अलग होकर बराबरी के लिए सामाजिक संघर्ष करना बेहतर होगा?

जाति व्यवस्था ख़त्म करने पर राजनीतिक इच्छाशक्ति और उत्साह का अभाव दिखता है क्योंकि कथित ऊंची जातियों की कई पीढ़ियों ने इस व्यवस्था से फ़ायदा उठाया है. सभी राजनीतिक दल यह बात बखूबी समझते हैं कि दलित भले ही ‘अछूत’ हो सकते हैं, लेकिन उनके वोट तो काम के हैं. 16.6 फ़ीसदी दलित वोट के बिना कोई भी राजनीतिक दल बहुमत नहीं पा सकता है. इसलिए एनडीए ने पहली बार बौद्ध भिक्षुओं को दलितों को समझाने-बुझाने के काम पर लगाया है. दलित अगर बराबर के नागरिक बन गए तो उन्हें क्या फ़ायदा होगा? ऊना की घटना के बाद एनडीए की छवि को नुक़सान पहुंचा है. गुजरात में दलितों की आबादी महज 7.01 फ़ीसदी है. वो अकेले अपने दम पर किसी भी बड़े दल की किस्मत बदलने की स्थिति में नहीं है. लेकिन सत्तारूढ़ बीजेपी गुजरात को लेकर आशंकित है क्योंकि यह कभी उसकी प्रयोगशाला रही है. हाल में ग़ैर-दलित वोट में बिखराव देखा गया है. हिंदू राष्ट्र का विचार लोगों की भावनाओं को छूने में कामयाब होता नहीं दिख रहा. जाट, पटेल और मराठा जैसी जो कथित ऊंची जातियां हैं, वो अपने आरक्षण को लेकर अधिक जागरूक दिख रहे हैं न कि हिंदू राष्ट्र के नाम पर बलि का बकरा बनने को लेकर. प्रभावशाली जातियों में भी जो गरीब लोग हैं, उन्हें इस बात का एहसास है कि ऊंची जाति की पहचान भी उनकी आर्थिक स्थिति नहीं सुधार पाई है. यह राजनीति है. सवाल यह भी है कि क्या देश के सभी नागरिकों के साथ एक समान व्यवहार करने के मामले में भारत 70 सालों में कुछ बेहतर हो पाया है या फिर हालात पहले जैसे ही हैं? क्या जातीय हिंसा और भेदभाव से देश और इसे भुगतने वाले दलित, दोनों एक बराबर प्रभावित होते हैं? ऊना के बाद हर कोई गोरक्षकों के अवैध तरीकों के बारे में बात कर रहा था. प्रधानमंत्री ने भी अपने पीड़ा भरे शब्द अगले दिन व्यक्त किए. उन्हें पता था कि गाय की राजनीति उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा वोट दिला सकती है.  बीजेपी की राज्य सरकार इसके बाद ऐसे कड़े कानून ले आई जिससे गायों की सुरक्षा कम और गोरक्षकों की सुरक्षा ज़्यादा हो.

ऊना की घटना ने हर संवेदनशील व्यक्ति को परेशान किया क्योंकि सबने टीवी और मोबाइल फोन पर दलितों के साथ होने वाली क्रूरता देखी. लेकिन गैर सरकारी संगठन नवसर्जन ट्रस्ट के साल 2010 के सर्वे में एक भयावह तस्वीर सामने लाई है. यह उसी गुजरात की तस्वीर है जहां ऊना की घटना हुई है. गांवों में रहने वाले 90.2 फ़ीसदी दलित हिंदू होते हुए भी मंदिरों में प्रवेश नहीं कर सकते. 64 फ़ीसदी पंचायत अपने निर्वाचित दलित सदस्यों के साथ भेदभाव करते हैं. 54 फ़ीसदी राजकीय प्राथमिक विद्यालयों में दलित बच्चों के लिए मिडडे मिल के वक्त अलग से लाइन लगाई जाती है. यह 1569 गावों और 98,000 लोगों की प्रतिक्रियाओं के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट कुछ ठोस तथ्य हैं. नवसर्जन ट्रस्ट को सौराष्ट्र के इलाके में उन 1500 से ज्यादा बच्चों के बारे में पता चला जिन्हें उनके शिक्षक, स्कूल के शौचालय साफ करने के लिए अलग से छांट कर रखे थे. ये साफ-सफाई करने वालों के बच्चे थे. जिन्हें उत्तर भारत में अब वाल्मीकि कहा जाता है. ये कुछ ऐसी सच्चाई हैं जो हमें टीवी या मोबाइल स्क्रीन पर नहीं दिखती है लेकिन होती हर रोज़ हैं. हालांकि ऊना की घटना ने राजनीतिक परिदृश्य में बहुत असर डाला है. तीन दशक पहले तक गुजरात के गांवों में यह पाया जाता था कि दलितों को मतदान केंद्र तक अमूमन नहीं पहुंचने दिया जाता था. सवाल उठता है ऐसा गुजरात के बारे में ही क्यों  सभी प्रांतों में ऐसा ही होता था ? तो इसलिए क्योंकि इसे एक मॉडल स्टेट की तरह पेश किया गया है. दलितों के ऊपर शारीरिक हिंसा के साथ उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं भी देखने को मिलीं. और ऐसा सिर्फ़ इसलिए क्योंकि वो ऊंची जातियों के वोट नहीं डालने के फरमान को नहीं मानने की हिम्मत करते थे. यह अभी भी आनंद ज़िले के धर्माज जैसे गांवों में ऐसा ही होता है. यह गांव प्रभावशाली गैर प्रवासी भारतीयों और बैंक में सौ करोड़ से अधिक राशि जमा करने के लिए जाना जाता है.

अगर दलित अब जाग रहा है, चैतन्य हो रहा है तो सवर्णों  को उन कारणों की छानबीन कर उनका समाधान निकालने में आगे आना चाहिए जिनसे अलगाव और अपराध बढ़ते हैं. जितना ये समाज दलितों से दूर जाएगा उतना ही अपने लिए अंधकार बढ़ाएगा. पर देखा यह जा रहा है कि ऊना और सहारनपुर की घटना के बाद राजनीतिक दल इस बात को लेकर चिंतित हैं कि जो दलित वोट बैंक पहले उप जातियों में विभाजित था, वो अब दलित पहचान के नाम पर एकजुट हो जाएगा. इतिहास की दीवारों पर यह बहुत साफ-साफ लिखा हुआ है कि सिर्फ राजनीतिक पहचान ही काफी नहीं होगी, दलितों को सामाजिक संघर्ष ही बराबरी और सम्मान दिला सकता है. उन्हें अपने अधिकारों की लड़ाई ख़ुद लड़नी पड़ेगी. यह लड़ाई पूरा देश नहीं लड़ने वाला और राजनेता तो कतई नहीं. कहा जाता था कि औद्योगीकरण और शहरीकरण के साथ आधुनिक मूल्यों का प्रसार होगा लेकिन ये सिद्धांत भारत के संदर्भ में नाकाम रहा. भारत कितनी भी आर्थिक तरक्की कर ले, पढ़ा लिखा होने का जश्न मना ले फिर भी यहां का समाज वैचारिक तौर पर अभी भी रूढ़िवादी जकड़नों से बाहर नहीं निकल पाया है और यहां की सवर्णवादी संरचना में जातिवादी दुराग्रह और वर्चस्ववादी पूर्वाग्रह धंसे हुए हैं. लोकतंत्र समानता आधारित समाज के निर्माण का सबसे कारगर रास्ता है लेकिन ये रास्ता दलितों के लिए बंद सा दिखता है. और इस दरवाजे को खोलने के लिए वैचारिक समझ तथा एकजुटता आवश्यक है.

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in