हरियाली भी हो हमारी चिंता में – शब्बीर कादरी

3:50 pm or July 24, 2017
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हरियाली भी हो हमारी चिंता में

—- शब्बीर कादरी —-

यह सच है कि विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में हरियाली को सदैव ही रौंदा गया है। यही कारण है कि हरियाली हमारे देश में पक्के निर्माण की तुलना में तेजी से पिछड़ी हैं जबकि बढ़ती आबादी और ग्रीन हाउस गैसों की तुलना में इस पर हमारा ध्यान समानरूप से बराबर होना चाहिए। पिछले एक दशक के दौरान देश के प्रमुख शहरों में ही शहरी पक्के निर्माण पांच सौ गुना बढ़े हैं तो इसके अनुपात में हरियाली केवल दो प्रतिशत तक ही सिमट गई है यह शर्मनाक है।पेड़ कटने के मामले दुनियाभर में तेजी से बढ़े हैं। वैसे एक अध्ययन भी बताता है कि वर्ष 1990 से अबतक विश्वभर में 3 प्रतिशत पेड़ घट गए हैं और यह रफ्तार अभी भी थमी नहीं है।

यदि देश के चार प्रमुख शहरों की ही बात की जाए तो अहमदाबाद में पिछले 20 वर्षों में कुल पेड़ों की कुल संख्या जो क्षेत्रफल के अनुपात में 46 प्रतिशत थी अब घटकर 24 प्रतिशत से भी कम रह गई है जबकि पक्के निर्माण की संख्या 132 प्रतिशत बढ़ गई है। कहा गया है कि वर्ष 2030 तक निर्माण और वर्तमान पेड़ो के अनुपात में हरियाली केवल 3 प्रतिशत ही रह जाने की उम्मीद है। दक्षिण के ख्यातनाम शहर हैदराबाद में भी बीते बीस वर्षों में ही कुल क्षेत्रफल के अनुपात में मौजूद पेड़ों का प्रतिशत 2.71 प्रतिशत से घटकर 1.66 प्रतिशत ही रह गया है। यहां वर्ष 1999 से लेकर 2009 के बीच पक्के निर्माण की गति 400 प्रतिशत बढ़ी, है। योजनाकार मानते हैं कि इस शहर में वर्ष 2024 तक हरियाली केवल 1.04 प्रतिशत ही रह जाने की आशा है। षहर को पेड़मुक्त किए जाने की आंधी में कोलकाता शहर भाी षामिल है। बीस वर्ष पूर्व यहां पेड़ों की संख्या, क्षेत्रफल की तुलना में 23.4 से घटकर 7.3 ही रह गई है। जबकि पक्के निर्माणों की संख्या 190 प्रतिशत बढ़ चुकी है। कहा जा रहा है कि यहां हरियाली का प्रतिशत वर्ष 2030 में केवल 3.37 ही रह जाना है। पक्के निर्माण की गति और शहरों में घटते पेड़ों के मामले मे हमारे देश का सिलीकान वैली के नाम से मशहूर शहर बैंगलुरू भी है। चार दशक में यहां पक्के निर्माण 58.4 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़े हैं जबकि हरियाली इसी अनुपात में 66 प्रतिशत घट गई है। यहां अब शहर की केवल 7 प्रतिशत ही खुली जगह बची है। ये तो हमारे देश के केवल चार प्रमुख शहरों में तेजी से बढ़ते पक्के निर्माण और घटते पेड़ों की एक झलक है इसी हिसाब में देश के दूसरे दर्ज के शहरों की हरियाली की स्थिति का आंकलन आप कर सकते हैं।

घटते जंगलों का अध्ययन बताता हैं कि बीते पच्चीस वर्षों में ग्लोबल फाॅरेस्ट एरिया 41.28 मिलियन हैक्टेयर से घटकर 39.99 मिलियन हैक्टेयर रह गया है और आग लग जाने की वजह से दुनियाभर में 1 प्रतिशत अर्थात न्यूजीलैंड के आकार के बराबर जगल साल भर में वैसे ही नष्ट हो जाते हैं। सेंटर फाॅर ग्लोबल डेवलपमेंट ने यह चेताावनी जारी की है कि यदि पेड़ के घटने की रफ्तार इसी गति से जारी रही तो वर्ष 2050 तक विश्व मानचित्र से भारत के क्षेत्रफल के बराबर जंगल समाप्त हो चुके होंगे क्योंकि पिछले तीन-चार दशक से पक्के आवास निर्माण की गति में आश्चर्यजनक तेजी अंकित की गई है। अध्ययन बताता है कि अकेले भारत में प्रति वर्ष 25 हजार हैक्टेयर जंगल नाॅन फाॅरेस्ट्री यूज की भेंट चढ़ जाता है।

वर्तमान में देश के कुल क्षेत्रफल के 21.3 प्रतिशत हिस्से में जंगल है इसमें से 77.4 प्रतिशत अर्थात 2544228 वर्ग किमी. नाॅन फाॅरेस्ट एरिया है जबकि 21.3 प्रतिशत अर्थात 701673 वर्ग किमी. फाॅरेस्ट एरिया है। इसी प्रकार 1.26 अर्थात 41362 वर्ग किमी. का क्षेत्र झाड़ीदार जंगल के रूप में चिंहित है। मौजूदा जंगल को भी हम तीन भागों में बांट कर उनका श्रेणीकरण कर सकते हैं। इसमें अधिक घने जंगल 2.61 प्रतिशत घने जंगल के रूप में, 9.59 प्रतिशत घने जंगल के रूप में और 9.14 प्रतिशत सामान्य जंगल के रूप में मौजूद है। हमारे यहां के जंगलों पर किए गए अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि पिछले एक दशक में देश के उत्तरी भाग में 6 प्रतिशत जंगल जबकि 4.38 प्रतिशत देश के मध्य भाग से और 5.77 प्रतिशत जंगल दक्षिण-प. क्षेत्र में तेजी से घटे हैं।

देश के विकास में जंगल का साफ किया जाना जरूरी है इसी ंसंदर्भ में औद्योगिक परियोजनाओं के कारण अब तक हमारे यहां लगभग 14 हजार वर्ग किमी. जंगल समाप्त हो गया है। पंजाब इस संदर्भ में सबसे ंऊपर है क्योंकि वहां जमीन का कन्वर्जन सबसे अधिक हुआ है वहां पिछले तीन दशक में जंगल की 44.55 प्रतिशत जमीन डायवर्ट की गई। इस क्रम में दूसरा नाम हरियाणा है यहां 9.89 प्रतिशत जंगल उद्योग स्थापना के नाम पर आवंटित किए गए। माइनिंग के बाद डिफेंस को भी जंगल का बड़ा भू-भाग दिया गया है।

हरियाली के विनाश का कारण जंगल की आग भी है पिछले कुछ वर्षों में हमारे यहां के जंगल आग के कारण बुरी तरह प्रभावित हुए हैं केवल उत्तराखंड में 3185 हैक्टेयर जंगल फरवरी माह से अब तक नष्ट हो चुका है इसी प्रकार हरियाणा में भी लगभग 4500 हैक्टेयर जंगल इसी तरह बर्बाद हुआ है वर्ष 2015 में जंगल में आग की कुल 15937 घटनाऐं देखी गईं इसी प्रकार वर्ष 2016 अर्प्रैल तक 20, 667 हादसे सामने आए।

हमारे यहां किसी राज्य की भूमि पर सर्वाधिक जंगल होने का श्रेय पूर्वोत्तर के राज्य नागालैंड को जाता है जहां की भूमि पर क्षेत्रफल का 88 प्रतिशत जंगल है। जबकि जंगल में अतिक्रमण के मामले मध्यप्रदेश और असम में देश भर में सर्वाधिक देखे गए हैं। यह देखा गया कि जहां सर्वाधिक जंगल हैं वहीं अतिक्रमण सर्वाधिक हुए। मध्यप्रदेश में देश का 11.04 प्रतिशत फाॅरेस्ट कवर है यहीं पर सबसे अधिक जमीन अतिक्रमण की चपेट में रही, यहां लगभग 5347 वर्ग किमी जंगल की जमीन पर कब्जा पाया गया। इसके बाद असम 3172 वर्ग किमी पर जंगल की जमीन अतिक्रमण में पाई गई, कर्नाटक में 1874 वर्ग किमी. ओडिशा 785 वर्ग किमी. और महाराष्ट्र 670 वर्ग किमी. भूमि जंगल में अतिक्रमण के नाम पर पाई गई।

भोपाल में रेल्वे की तीसरी लाइन बिछाने के नाम पर 880 पेड़ हटाने की अनुमति लेकर 1100 से अधिक पेड़ काटने पर भी बवाल मच चुका है और गेमन इंडिया की एक परियोजना के नाम पर कई हजार इमारती पेड़ साफ कर दिए गए, यही बात शहर में बीआरटीएस बनाए जाने में ओर नर्मदा नदी का पेयजल भोपाल लाने में बिछाई गई पाइप लाइन में भी देखी गई कई विशाल वृक्षों को बेरहमी से काट दिया गया। अब शहर को स्र्माट बनाए जाने के नाम पर एक विशाल क्षेत्र में मौजूद कीमती पेड़ों को साफ किए जाने की तैयारी है। परियोजनाऐं लागू की जाना चाहिए विकास इसे ही कहा जाता है, पर सांस लेने और वायु प्रदूषण से बचने के लिए बड़े पेड़ भी जरूरी हैं जिन्हें बचाया जाना चाहिए। बढ़ती आबादी, बढ़ते प्रदूषण और बढ़़ते शहर के आकार के चलते बढ़ती हरियाली की चिंता भी तो कीजिए साहब।

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